कॉकरोचों का गणतंत्र: दिल्ली की सड़कों पर युवाओं का वसंत
पेपर लीक में श्रम, आयु, विश्वास और सामाजिक गतिशीलता की संभावना चुराई जाती है. जिस युवक ने तीन वर्ष पढ़ाई की, वह तीन वर्ष ग़रीब भी हुआ, तीन वर्ष अधिक आश्रित हुआ और तीन वर्ष अधिक अपमानित हुआ. वह राज्य से अपने चुराए हुए वर्षों का हिसाब मांग रहा है. वे सरकार से सवाल पूछ रहा है कि हमारे जीवन के जो वर्ष तुमने अपनी अक्षमता, भ्रष्टाचार और उदासीनता में नष्ट किए, उन्हें कौन लौटाएगा?
दिल्ली महानगर उस दोपहर एक विशाल और तपती देह वाली राजधानी था. सड़कों पर धूप थी; बैरिकेड उसके वक्ष पर रखी लोहे की पसलियों जैसे थे. संसद मार्ग पर पुलिस की कतारें किसी ऐसे राज्य की कठोर मांसपेशियां लग रही थीं, जिसे अचानक अपनी ही संतानों की चाल से भय लगने लगा हो.
मेट्रो स्टेशनों के कुछ दरवाजे़ बंद थे. सड़कों पर तिरंगे, पोस्टर, पसीने से तरबतर कमीज़ें, पानी की बोतलें और ऊपर उठे मोबाइल फोन थे. वे फोन केवल पुलिस कार्रवाई को रिकॉर्ड नहीं कर रहे थे; वे उस गणतंत्र का एक्स-रे ले रहे थे, जिसमें परीक्षा देने वाला नागरिक धीरे-धीरे प्रदर्शनकारी बना दिया जाता है.
संसद की ओर मार्च की अनुमति नहीं थी. प्रदर्शनकारियों और पुलिस के बीच टकराव हुआ. आंसू गैस और लाठियां चलीं. घायल होने के परस्पर विरोधी दावे आए और कुछ जगह पत्थर फेंके जाने की सूचनाएं भी आईं. पैलेटगन जैसे हथियार चलने तक की बात कही गई. इन सबकी स्वतंत्र जांच होनी चाहिए. लेकिन उस दृश्य का बड़ा सत्य किसी टूटे बैरिकेड या हवा में उठते धुएं में नहीं था.
वह उन लाखों अदृश्य कमरों में था, जहां युवा वर्षों से झुके पढ़ रहे हैं; उन घरों में था, जहां एक मां परिणाम की वेबसाइट खुलने तक चूल्हे के सामने बैठी रहती है; उन पिता की हथेलियों में था, जिन्होंने थोड़ी ज़मीन, कुछ गहने या अपनी वृद्धावस्था की बचत बेचकर बच्चे की कोचिंग कराई.
दिल्ली में पुलिस और युवाओं के बीच हुई मुठभेड़ वस्तुतः प्रतीक्षा और सत्ता के बीच हुई मुठभेड़ थी. और उस प्रतीक्षा ने एक विचित्र, व्यंग्यपूर्ण नाम चुना था- कॉकरोच जनता पार्टी. नाम में हंसी थी, लेकिन ऐसी हंसी थी, जो अपमान के भीतर जन्म लेती है; वैसी हंसी, जैसी किसी बंद कमरे में घुटते हुए आदमी के होंठों पर अचानक आ जाती है, जब उसे मालूम होता है कि डरने के लिए अब कुछ बचा नहीं.
यह पार्टी पारंपरिक अर्थों में शायद पार्टी नहीं थी. उसका कोई पुराना मुख्यालय नहीं, कोई धूल खाता संविधान नहीं, कोई जिला अध्यक्षों का जाल नहीं. वह एक डिजिटल रूपक थी- कुचले जाने के बाद भी लौट आने वाले जीवन का, सत्ता की कीटनाशक भाषा के विरुद्ध जीवित रहने की निर्लज्ज और सुंदर जिद का.
प्रतीक्षालय में बदल दिया गया जीवन
भारत का युवा केवल बेरोज़गार नहीं. बेरोज़गार शब्द उसके अनुभव के लिए बहुत छोटा, बहुत सरकारी और बहुत निर्जीव है. वह प्रतीक्षा में रखा गया नागरिक है. वह परीक्षा की प्रतीक्षा करता है, फिर उत्तर-कुंजी की, फिर परिणाम की, फिर दस्तावेज सत्यापन की, फिर नियुक्ति-पत्र की. पेपर लीक हो जाए तो जांच की प्रतीक्षा; परीक्षा रद्द हो जाए तो नई तारीख़ की; मामला अदालत पहुंच जाए तो निर्णय की; और इस पूरी यात्रा में सबसे निर्दय प्रतीक्षा यह कि कहीं अवसर आने से पहले आयु-सीमा ही न निकल जाए.
दरअसल, यह ‘पॉलिटिक्स ऑफ वेटिंग’ है. उसका विस्तार अब किसी समाजशास्त्रीय अवधारणा से अधिक एक राष्ट्रीय जैविक अनुभव है. राज्य फाइल रोकता है, लेकिन युवा का जीवन रुकता है. मंत्रालय तारीख़ आगे बढ़ाता है, लेकिन अभ्यर्थी की उम्र पीछे नहीं लौटती.
किसी अधिकारी के लिए छह महीने का विलंब एक प्रशासनिक टिप्पणी है; किसी ग़रीब लड़की के लिए वही छह महीने विवाह के बढ़ते दबाव, घर से मिली अंतिम अनुमति और आर्थिक स्वतंत्रता की अंतिम संभावना के बीच की संकरी खिड़की है.
पेपर लीक में श्रम, आयु, विश्वास और सामाजिक गतिशीलता की संभावना चुराई जाती है. जिस युवक ने तीन वर्ष पढ़ाई की, वह तीन वर्ष ग़रीब भी हुआ, तीन वर्ष अधिक आश्रित हुआ और तीन वर्ष अधिक अपमानित हुआ. वह राज्य से अपने चुराए हुए वर्षों का हिसाब मांग रहा है.
डिजिटल त्वचा से सड़क की देह तक
कॉकरोच जनता पार्टी (सीजेपी) की शक्ति इस उलटबांसी में थी कि उसने मीम और हैशटैग से एक राजनीतिक दल निकाल लिया. अपमान के लिए प्रयुक्त शब्द को युवाओं ने अपने झंडे में बदल दिया. जिन्हें तुच्छ, अवांछित या कुचल देने योग्य समझा गया, उन्होंने मानो कहा- हां, हम वही हैं; और हम तुम्हारी चमकती इमारतों की दरारों से बार-बार लौटेंगे. सत्ता ने जिस शब्द में घृणा भरी थी, युवाओं ने उसी में सामुदायिकता, हास्य और प्रतिरोध भर दिया. और यह आपमान भी किसी उद्दंड राजनेता ने नहीं, सुप्रीम कोर्ट की हृदयहीनता से छनकर आया था.
लेकिन उन्हें यह बोध नहीं था कि उनके इर्दगिर्द एक डिजिटल दृष्टिबोध है और सोशल मीडिया सड़क का विकल्प नहीं; सड़क की पूर्वपीठिका है. वह बिखरे हुए दुखों को एक-दूसरे से परिचित कराता है. बिहार का अभ्यर्थी राजस्थान के युवक का वीडियो देखता है; उत्तर प्रदेश की लड़की हरियाणा की अभ्यर्थी का संदेश सुनती है; महाराष्ट्र का छात्र मध्य प्रदेश की रद्द भर्ती के बारे में पढ़ता है. अचानक निजी शर्म सार्वजनिक संरचना में बदल जाती है.
यही वह क्षण है जब डिजिटल क्रोध को एक आकार मिलता है. उंगलियों से लिखा गया आक्रोश पैरों में उतरता है. पोस्ट साझा करने वाला युवक ट्रेन पकड़ता है. फोन पर टिप्पणी करने वाली लड़की बैग में पानी रखती है और प्रदर्शन स्थल पर पहुंच जाती है. ऑनलाइन समुदाय सड़क पर एक-दूसरे की सांस सुनने लगता है.
(फोटो: पीटीआई)
मोबाइल स्क्रीन पर तैरता हुआ विरोध मनुष्य की गर्म, असुरक्षित, धड़कती हुई उपस्थिति में बदल जाता है. लेकिन न तो उस क्षण टिप्पणी करने वाले मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत को एहसास रहा होगा कि नेटवर्क आधारित आंदोलनों की गति इतनी तीव्र और असाधारण हो सकती है और न ही उसकी अंतर्निहित कमज़ोरी का भान ऐसे आंदोलनों से क्रांति की उम्मीद लगा बैठे राजनेताओं को होता है.
ये डिजिटल आंदाेलन पुरानी पार्टियों की तरह वर्षों की संगठनात्मक तपस्या के बिना विशाल भीड़ जुटा सकते हैं; लेकिन भीड़ जुटा लेना और टिकाऊ राजनीतिक शक्ति बन जाना एक ही बात नहीं. नेतृत्व अस्पष्ट हो सकता है, मांगें फैल सकती हैं, अफ़वाह प्रवेश कर सकती है, हिंसक तत्व आंदोलन की नैतिकता को दूषित कर सकते हैं और स्थापित दल उसकी ऊर्जा पर अपना झंडा गाड़ने की कोशिश कर सकते हैं.
इसलिए सीजेपी का रोमानीकरण करना भी उतना ही अनुचित होगा, जितना उसे उपद्रव कहकर खारिज करना.
उसकी शक्ति उसकी ताज़गी में है; ख़तरा उसकी अपरिपक्वता में. उसके पास संख्या हो सकती है, लेकिन क्या उसके पास वार्ता की संरचना है? उसके पास क्रोध हो सकता है, लेकिन क्या उसके पास जवाबदेही है? उसके पास साझा प्रतीक है़, लेकिन क्या उसके पास मांगों की स्पष्ट प्राथमिकता है? डिजिटल माध्यम ने इस असंतोष को बनाया नहीं; उसने उसे दृश्यता, गति और एक साझा चेहरा दिया.
शिक्षा की मशीन में गन्ने की तरह पिरता युवा
भारत ने शिक्षा को मुक्त नागरिकता की प्रक्रिया से निकालकर प्रतियोगी छंटाई की मशीन बना दिया है. विश्वविद्यालय अब विचार, असहमति और आत्म-निर्माण के सार्वजनिक परिसर कम होते जा रहे हैं; वे डिग्री, रैंकिंग, परीक्षा और रोज़गार-योग्यता के बाज़ार में बदले जा रहे हैं. विद्यार्थी को कहा जाता है- पढ़ो, कौशल प्राप्त करो, प्रतिस्पर्धा करो. लेकिन उसे यह कोई नहीं बताता कि अवसर कितने हैं, पद कब निकलेंगे, परीक्षा निष्पक्ष होगी या नहीं और चयन के बाद नियुक्ति कितने वर्ष में मिलेगी.
एक ख़तरनाक़ कुदृष्टि यह विकसित हुई है कि राज्य युवाओं को लोकतंत्र का निर्माण करने वाले नागरिक नहीं मानता. उनके लिए वह परीक्षा देने वाला उपभोक्ता है. सस्ता श्रम है. चुनावी भीड़ है. डिजिटल प्रचारक है. राष्ट्रवादी नारों का वाहक है. लेकिन असहमति जताने पर वह दहशतगर्द है. देशद्रोही है. और संघर्ष के क्षण में पुलिस की क्रूरता के साथ नियंत्रित की जाने वाली आबादी है. कोचिंग उद्योग उन्हें सफलता का स्वप्न बेचता है.
डिजिटल कंपनियां पाठ्यक्रम और टेस्ट सीरीज़ बेचती हैं. मकान मालिक कमरा बेचता है. राज्य परीक्षा का अवसर बेचता है. और अंततः जब विद्यार्थी विफल होता है, समाज उसी की ओर उंगली उठाकर पूछता है- तुमसे हुआ क्यों नहीं?
कोई उस पूरी मशीन से नहीं पूछता कि उसने लाखों युवाओं को कुछ हजार सीटों के सामने खड़ा करके उनकी आशा को एक लाभकारी उद्योग में क्यों बदल दिया?
यह बाज़ार युवा की आकांक्षा को वैसे ही छूता है जैसे कोई व्यापारी पके फल की त्वचा दबाकर उसकी कीमत तय करता है. उसकी बेचैनी बिकती है; उसके माता-पिता का भय बिकता है; उसकी असुरक्षा बिकती है. पर सफलता की संभावना लगातार संकरी होती जाती है. शिक्षा मुक्ति नहीं देती; वह प्रतियोगिता के अधिक चमकीले पिंजरे में बंद कर देती है.
किसी सरकार का युवा-विरोध केवल रोज़गार न दे पाना नहीं है. असली युवा-विरोध तब शुरू होता है जब रोज़गार मांगने वाले को आलसी, परीक्षा की शुचिता पूछने वाले को षड्यंत्रकारी और प्रदर्शनकारी विद्यार्थी को कानून-व्यवस्था की समस्या समझा जाने लगता है. छात्र दिखा तो पुलिस भेज दी गई; प्रश्न उठा तो बैरिकेड लगा दिया गया; वीडियो वायरल हुआ तो संचार सीमित कर दिया गया.
जिस युवा को संवाद की मेज चाहिए थी, उसे सुरक्षा-परिधि मिली. जिस प्रश्न का उत्तर शिक्षा मंत्रालय को देना था, उसका सामना दंगा-नियंत्रण उपकरणों ने किया.
(फोटो: पीटीआई)
कांग्रेस का प्रवेश: आलिंगन, हस्तक्षेप या अधिग्रहण?
आंदोलन में कांग्रेस के प्रवेश ने दृश्य बदल दिया. बड़े नेता आए, धरना हुआ, हिरासतें हुईं, कानूनी सहायता की घोषणाएं हुईं और राष्ट्रीय मीडिया की रोशनी अचानक अधिक तीखी हो गई.
संसद और प्रधानमंत्री आवास के आसपास का राजनीतिक नाट्य उस युवा आक्रोश को राष्ट्रीय प्रश्न बनाने लगा, जिसे सरकार संभवतः सीमित छात्र असंतोष समझना चाहती थी.
इतना विशाल राज्य इतना बहरा कैसे हुआ?
सबसे तीखा प्रश्न यह नहीं कि युवा सड़कों पर क्यों उतरे. प्रश्न यह है कि सरकार को उनके उतरने से पहले उनकी आहट क्यों नहीं सुनाई दी. राज्य के पास डेटा-सेंटर हैं, खुफिया एजेंसियां हैं, विश्वविद्यालय प्रशासन है, जिला स्तर तक फैला राजनीतिक संगठन है, सोशल मीडिया की निगरानी है और विशाल प्रचार-तंत्र है. वह नागरिक के फोन की गतिविधि जान सकता है, लेकिन उसके भीतर जमा अपमान नहीं जान पाया. वह ट्रेंड माप सकता है, लेकिन प्रतीक्षा की पीड़ा नहीं.
वह चुनावी बूथ तक पहुंचे मतदाता को पढ़ सकता है, लेकिन कोचिंग के कमरे में बैठी लड़की की घटती हुई आशा को नहीं.
संभवतः सरकार सूचना से वंचित नहीं थी; वह केवल उस सूचना से वंचित थी जिसे वह सुनना चाहती थी. केंद्रीकृत सत्ता की सीढ़ियां चढ़ते हुए तथ्य अपना ताप खो देते हैं. बेरोजगारी ‘धारणा’ बन जाती है. पेपर लीक ‘अलग-थलग घटना’. छात्र आत्महत्या ‘व्यक्तिगत तनाव’. डिजिटल आक्रोश ‘विपक्षी नैरेटिव’. जब रिपोर्ट ऊपर पहुंचती है, तब तक उसमें से मनुष्य की चीख सावधानीपूर्वक निकाल दी गई होती है.
दूसरी भूल प्रचार को जनमत समझ लेना है. चुनाव जीतना महत्त्वपूर्ण है, लेकिन वह समाज के प्रत्येक हिस्से की स्थायी सहमति नहीं. कोई युवक राष्ट्रवादी नारा लगा सकता है और भर्ती-व्यवस्था पर क्रुद्ध भी हो सकता है. वह कल सरकार को वोट दे सकता है और आज उसी सरकार के सामने बैरिकेड पर खड़ा हो सकता है. नागरिकता कोई पांच वर्षीय समर्पण-पत्र नहीं.
तीसरी भूल युवाओं को जाति, धर्म, भाषा और क्षेत्र में विभाजित देखकर उनके साझा आर्थिक दुख को न पहचानना है. सत्ता ने शायद सोचा कि पहचान की राजनीति रोज़गार की भूख को हमेशा ढंक सकती है. लेकिन बेरोज़गारी का किराया हर जाति को देना पड़ता है. पेपर लीक प्रश्नपत्र पर अभ्यर्थी का धर्म नहीं पढ़ता. आयु-सीमा की घड़ी हिंदू, मुसलमान, दलित, आदिवासी, पिछड़ा- सबके लिए एक ही निर्दय टिक-टिक करती है.
सरकार की वार्ता यदि लाठी, आंसू गैस और राष्ट्रीय शर्म के बाद शुरू होती है, तो वह संवाद कम और क्षति-नियंत्रण अधिक प्रतीत होती है. लोकतांत्रिक शासन का कौशल भीड़ हटाना नहीं; भीड़ बनने से पहले शिकायत सुन लेना है.
(फोटो: पीटीआई)
दिल्ली से बाहर फैला हुआ घायल भूगोल
यह आंदोलन केवल दिल्ली के महानगरीय मध्यवर्ग का नहीं. सरकारी नौकरी भारत के गरीब और निम्न-मध्यवर्गीय परिवार के लिए वेतन से अधिक है. वह नियमित आय है, सामाजिक सम्मान है, स्वास्थ्य सुरक्षा है, जातिगत आश्रय से निकलने का रास्ता है, सामंती निर्भरता से मुक्ति है.
संपन्न युवक परीक्षा रद्द होने पर दूसरा विकल्प खरीद सकता है- निजी विश्वविद्यालय, विदेश, पारिवारिक व्यापार या महंगा प्रशिक्षण. गरीब युवक के पास दूसरा विकल्प अक्सर अगली परीक्षा ही होती है. इसलिए एक ही प्रशासनिक विफलता अलग-अलग वर्गों को अलग गहराई से काटती है.
लड़कियों की स्थिति और अधिक कठिन है. उन्हें तैयारी के लिए घर से सीमित समय मिलता है; सुरक्षित छात्रावास, यात्रा और शहर की चिंता अलग; विवाह का दबाव लगातार उनकी पीठ पर रखा हुआ एक अदृश्य हाथ है. किसी पुरुष अभ्यर्थी के लिए परीक्षा का एक वर्ष टलना समय का नुकसान हो सकता है; किसी लड़की के लिए वही विलंब आर्थिक स्वतंत्रता का अंतिम द्वार बंद कर सकता है.
उसकी किताबों के ऊपर केवल पाठ्यक्रम नहीं रखा होता; परिवार की प्रतिष्ठा, सुरक्षा का भय, विवाह की उम्र और घर लौट आने की चेतावनी भी रखी होती है. जब वह सड़क पर आती है, तो वह केवल परीक्षा की शुचिता नहीं मांगती; वह अपने शरीर, समय और भविष्य पर अधिकार मांगती है. दिल्ली में महिलाओं की उपस्थिति ने इसी कारण आंदोलन को अधिक गहरा सामाजिक अर्थ दिया.
राज्य को युवाओं का समय लौटाना होगा
इस संकट का समाधान किसी एक मंत्री के त्यागपत्र से पूरा नहीं होगा. भारत को परीक्षा और भर्ती कैलेंडर की वैधानिक गारंटी चाहिए. परीक्षा रद्द या स्थगित होने पर फीस, यात्रा-व्यय और आयु-संबंधी नुकसान की भरपाई होनी चाहिए. पेपर लीक की स्वतंत्र, समयबद्ध जांच हो; अधिकारियों और एजेंसियों की व्यक्तिगत जवाबदेही तय हो. रिक्त पदों, विज्ञापनों, परीक्षाओं, परिणामों और नियुक्तियों का सार्वजनिक डैशबोर्ड बने.
संसद में शिक्षा, बेरोज़गारी और भर्ती संकट पर विशेष बहस हो. छात्र संगठनों और सरकार के बीच स्थायी संवाद-तंत्र बने. शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारियों पर प्रतिशोधात्मक मुकदमे न हों. आंदोलन को भी हिंसा, अफवाह, पत्थरबाजी और व्यक्तिगत अपमान से कठोर दूरी रखनी होगी. पुलिस की ज्यादती और प्रदर्शनकारियों की हिंसा- दोनों की जांच हो; एक अपराध दूसरे को पवित्र नहीं करता.
कॉकरोच जनता पार्टी स्थायी संगठन बनेगी या बिखर जाएगी, यह अभी अनिश्चित है. स्थापित दल उसकी ऊर्जा को आत्मसात करने की कोशिश करेंगे; नेतृत्व संघर्ष होंगे; डिजिटल उत्साह थक भी सकता है. लेकिन जिस संकट ने उसे जन्म दिया, वह किसी हैशटैग के शांत पड़ने से समाप्त नहीं होगा.
कोई आंदोलन अचानक पैदा नहीं होता. अचानक केवल वह क्षण आता है, जब लंबे समय से मौन रखा गया समाज बोल पड़ता है. दिल्ली की सड़कों पर केवल हजारों युवा नहीं उतरे थे; वहां परीक्षाओं, परिणामों और नियुक्तियों के बीच गंवाए गए करोड़ों घंटे उतर आए थे. वहां माताओं की अधूरी नींद थी, पिता के कर्ज का बोझ था, लड़कियों के बंद होते हुए रास्ते थे और उन कमरों की बासी हवा थी, जहां भारत की पढ़ी-लिखी पीढ़ी अपने जीवन को एक अगली तारीख से बांधकर बैठी रही.
सरकार को भीड़ की संख्या से उतना भयभीत नहीं होना चाहिए जितना उस विश्वास के टूटने से, जिसने किताब पकड़े हाथ को बैरिकेड पकड़ने पर विवश किया.
युवाओं को कॉकरोच कह देने से वे नष्ट नहीं होते. वे अपमान को अपनी चमकती हुई काली देह पर कवच की तरह पहन लेते हैं. वे अंधेरे में रास्ता खोज लेते हैं. वे राज्य द्वारा बंद की गई दरारों से फिर बाहर आते हैं. वे प्रतीक्षा को राजनीति में बदलते हैं और एक दिन सत्ता की स्वच्छ, सुगंधित, वातानुकूलित मेज के सामने खड़े होकर पूछते हैं-
हमारे जीवन के जो वर्ष तुमने अपनी अक्षमता, भ्रष्टाचार और उदासीनता में नष्ट किए, उन्हें कौन लौटाएगा?