प्यारे आंदोलन,
कैसे हो? पहले सब चिट्ठियों में दिल का हाल पूछते थे. लेकिन आजकल जैसा चल रहा है, उस हिसाब से देश का हाल पूछना ठीक रहेगा. कल सुबह का अख़बार देखा, तो तुम्हारा ख़याल आया. राजनीति वाले पन्ने से लेकर फिल्मी गपशप तक, सब तुम्हारी ही बात कर रहे थे. थोड़ी देर बाद चाय सुड़कते हुए इंस्टा देखा, तो वहां भी पोस्ट से लेकर रील तक तुम ही तुम थे. तुम्हारी इतनी मौजूदगी देख, हमें चिंता हो आई. तुरंत टीवी खोल लिया और कुछ सूट-बूट वालों के शोर में तुम्हें ढूंढने पहुंच गए. कोई तुम्हें देशभक्त बता रहा था, तो कोई देशद्रोही. हम चक्कर में पड़ गए. हमने इंस्टा-टीवी-अख़बार सब बंद किया और कमरे में इधर-उधर पसर गए.
फिर सब तुमसे अपनी पिछली मुलाक़ात के बारे में सोचने लगे. तुम्हें याद है कि हम आख़िरी बार कब मिले थे?
मुझे याद है जब हैदराबाद में एक छात्र ने सितारों की धूल का ज़िक्र करते हुए अपने जीवन का आख़िरी ख़त लिखा था. वो तुम ही थे जो उन मुश्किल रातों में बैठे थे उसके साथ. तुम आए थे कर्ज़ में डूबे तमिलनाडु के किसानों का हाथ पकड़कर, जो सड़क पर ही दाल-भात सान कर खाते रहे कई दिन.
तुम कोरेगांव भी चले गए थे न ट्रेन पकड़कर? और याद है, जब तुम औरतों की आवाज़ का हैशटैग बन गए थे? या जब लोगों को बेघर करने की बात हुई, तो तुमने दिल्ली से असम की ठंडी रातों में कितनी सड़कों को अपना घर बना लिया था.

जब सबको लगा कि थक चुके हो तुम, तब तुमने पंजाब से हरियाणा तक अपने तंबू गाड़ दिए, ट्रैक्टरों और लंगरों के बीच. फिर तुम राजस्थान और बिहार के उन युवाओं के पास गए, जो वर्दी के लिए सरपट दौड़ रहे थे मैदान में. उन्हें बताया गया था कि नौकरी अब चार साल के पैकेज में मिलेगी. तुम पहलवानों के साथ भी बैठे दो-दो हाथ करने. उन्हें समझाने कि खेल सिर्फ़ मैदान में नहीं होता. फिर अचानक दुनिया रुकी और सड़कें खाली हो गई. शहरों के नवाबी महलों ने अपने मज़दूरों को पहचानने से साफ इनकार कर दिया. लेकिन सैकड़ों मील लंबे रास्तों पर तुम चुपचाप चलते रहे उनके साथ-साथ.
तुम पहाड़ भी चढ़े, जब वहां सड़कों को यह फरमान जारी हुआ कि अब उन्हें नदियों से तेज़ बहना होगा. तुम घने जंगलों में भटके, जहां पेड़ों ने तुमसे पूछा कि क्या उन्हें बचाने के लिए अब कुछ भी बचा है तुम्हारे पास? बुलडोज़र की आवाज़ के बीच भी तुम उन्हें उम्मीद देकर लौटे.
हर बार किसी ने कहा तुम भटक गए हो, किसी ने कहा तुम भटका रहे हो. लेकिन तुम बने रहे.
और इस बार?
इस बार तुम लौटे हो, तो एक हाथ में किताब है और दूसरे में एडमिट कार्ड. जेब में फीस की रसीद है, मोबाइल में ‘रिज़ल्ट पेंडिंग’ का नोटिफिकेशन, भगदड़ में टूट चुकी चप्पल और पीठ पर लाठी के निशान.
तुम्हें पता है, आंदोलन? मैं कई बार सोचता हूं कि काश तुम थोड़ी एक्टिंग ही सीख लेते यार! ओढ़ लेते अलग-अलग चोगे और बन जाते पिया बहरूपिया. सिर्फ़ किसी की कहानी सुन लेते और फिर उसे अनसुना कर देते.
लेकिन नहीं. तुम्हें हर बार किसी न किसी की कहानी बन जाना है. उसका दर्द, उसकी उम्मीद, उसका गुस्सा, उसकी ज़िद, सब कुछ अपना बना लेना है. कभी किसान बनकर खड़े हो जाते हो, कभी आदिवासी. कभी छात्र बन जाते हो, कभी औरत. कभी युवाओं के सपनों में दिखते हो, कभी जंगलों और पहाड़ों की पुकार में. तुम जैसे हो, वैसे ही रहते हो. बस सूरत बदलते हो, सीरत नहीं.
शायद इसलिए सत्ता तुम्हें हर बार ऐसे देखती है, मानो पहली बार देख रही हो. सत्ता, जो विपक्ष में रहते हुए तुम्हें लोकतंत्र की सबसे सुंदर तस्वीर बताती है. सत्ता, जो सरकार में आते ही तुम पर लट्ठ भांज देती है.

तुम्हारे आते ही हम सब बड़े भावुक हो जाते हैं. और हमारे यहां भावुक होने का मतलब पता है न? नाम रखना!
जब तुम सवाल पूछते हो, तो सब तुम्हें ‘भ्रमित’ कहते हैं
जब धरना देते हो, तो ‘परजीवी’
जब भीड़ बढ़ जाए, तो ‘विदेशी ताक़त’
जब कैमरे पहुंच जाएं, तो ‘ट्रैफिक जाम’
और जब दुनिया देखने लगे, तो ‘टूलकिट’!
नाम कई, दर्शन वही.
लेकिन तुम? तुम फिर भी लौट आते हो.
कभी किसी छात्र की जेब में मुड़ा हुआ एडमिट कार्ड बनकर,
कभी किसी किसान की पगड़ी में,
कभी किसी औरत की अटकी आवाज़ में,
कभी किसी मज़दूर के घिसे हुए जूते में,
कभी किसी आदिवासी के गीत में,
कभी किसी गांव के जंगल में,
कभी किसी पहाड़ के धारे में.
तुम बुलावे का इंतज़ार नहीं करते. शायद तुम तारीख़ें नहीं, लोगों की आंखें देखते हो.
इसलिए आज तुम्हें चिट्ठी भेजने का मन हुआ.
तुम्हारा हाल पूछने के लिए नहीं. क्योंकि वह तो हम सबको ही दिख रहा है और हम देखेंगे भी. बस इतना कहना था कि अपना ख़याल रखना और लौटते रहना.
~ तुम्हारे अगले नाम के इंतज़ार में,
हम सब
24 जुलाई, 2026
(कुमार उन्नयन आईडीआर में सीनियर एडिटोरियल एसोसिएट हैं. इंद्रेश शर्मा आईडीआर हिंदी में पार्टनरशिप और आउटरीच हेड हैं.)
(यह लेख मूल रूप से आईडीआर हिंदी पर प्रकाशित हुआ है.)
