प्रेमचंद की प्रासंगिकता आज भी क्यों बनी हुई है

प्रेमचंद आज की तारीख़ में प्रासंगिक हैं क्योंकि वह मान्यताओं पर सवाल उठाने से या फिर संस्था बन गए व्यक्ति की प्रविधियों पर भी आलोचकीय निगाह डालने से परहेज़ नहीं करते. पर इसका अर्थ यह नहीं था कि गांधी के व्यक्तित्व में, देश को लेकर उनकी चिंता में प्रेमचंद को कोई शक था. देखा जाए तो प्रेमचंद पर सबसे अधिक प्रभाव भी उन्हीं का ही पड़ा था.

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प्रेमचंद. (फोटो साभार: रेख़्ता बुक्स)

लिखे हुए शब्दों में, उनमें भरे विचारों में कितनी ऊर्जा समाई हुई होती है यह लगभग 146 वर्षों के बाद भी प्रेमचंद के लिखे को पढ़ कर समझा जा सकता है. साहित्य की समझ ही जिस लेखक की कहानियों से विकसित हुई हो, उसे जीवन के इस पड़ाव पर भी जब पढ़ने और गुनने की ज़रुरत महसूस होती है तो वाकई हैरानी होती है कि आखिर प्रेमचंद के व्यक्तित्व और उनके साहित्य में ऐसा क्या है जो गुज़रते समय के बहाव से धुंधला न होकर और निखरता ही जाता है. ऐसा तो नहीं है कि प्रेमचंद भारतीय साहित्य के एक मात्र ऐसे रचनाकार हों.

साहित्य में हर युग, हर विचारधारा के दौर में कुछ बेहद श्रेष्ठ लेखक हुए हैं, जिनकी रचनाओं ने साहित्य के दायरे को और मानवीय बनाया है. पर यह शायद प्रेमचंद हैं जिनको किसी युग, किसी दौर, किसी विचारधारा के अधीन होकर अनदेखा नहीं किया जा सकता. और इसका एक प्रत्यक्ष कारण जो समझ आता है वह यह कि प्रेमचंद अपने युग के सबसे सचेत और सबसे अधिक गतिशील रचनाकार के रूप में अपने पाठकों को मिलते हैं.

यह गतिशीलता उनके व्यक्तित्व, सृजन और शिल्प- इन तीनों में अंतर्धारा की तरह बहती है और यही प्रेमचंद को प्रासंगिकता के मयार पर हमेशा खरा साबित करती है.

प्रेमचंद अपने युग के सबसे अशांत लेखक थे. बनारसीदास चतुर्वेदी को 1935 में लिखी अपनी एक चिट्ठी में प्रेमचंद उस आंतरिक शांति की बात करते हैं जो उनके रचनाकार मन के लिए दुर्लभ था. प्रेमचंद में हम उस रचनाकार मानस की झलक पाते हैं जो न केवल अपने साथ बल्कि अपने युग के साथ भी संतुष्ट नहीं था. उनकी रचनाओं में हम इस असंतुष्टि की प्रतिध्वनियां बार-बार अलग-अलग स्वरूप में, अलग-अलग समस्याओं में सुनते हैं.

प्रेमचंद के लिए लेखनी उनके जीवन का एक मिशन था. और संभवतः यही वजह है कि उन्होंने 300 से भी अधिक कहानियां, अनेकों उपन्यास, निबंध, नाटक, जीवनियां और इससे भी अधिक एक पत्रकार के रूप में अपने समय की नब्ज़ को थामे हुए लगभग हर विषय पर टिप्पणियां-आलोचना-संपादकीय-निबंध लिखे. इसीलिए प्रेमचंद के साहित्य से, उसमें निहित विचारों से उस पूरे युग को समझा जा सकता है- राजनीतिक उद्वेलनों को, वैश्विक प्रभावों को, औपनिवेशिक भारतीय समाज के भीतर सुगबुगाने वाली हलचलों को और संक्रमण के एक ऐतिहासिक मोड़ पर खड़ी भारतीयता को.

और ज़ाहिर है कि यह सब कुछ अपनी रचनाओं और वैचारिक अभिव्यक्तियों में समेटने वाले रचनाकार के भीतर भी अपने अंतर्द्वंद्व, अपने विरोधाभास हो सकते हैं. विचारधाराओं से जुड़ाव पर उसकी कमियों का भी पूरा संज्ञान रखते हुए अपनी वैचारिकता में परिवर्तन लाया जा सकता है. और प्रेमचंद इससे बिल्कुल इतर न थे. उनकी वैचारिकता की यह गत्यात्मकता एक रचनाकार के अपने विकास को तो दिखलाती ही है पर साथ ही उन्हें अपने समय से आगे भी ले जाती है.

लेखन के शुरुआती दौर में अगर आर्यसमाजी प्रभावों के अंतर्गत उन्होंने सुधारवादी रचनाएं लिखीं तो वहीं उनके शुद्धतावादी आग्रहों से परेशान भी हुए. प्रेमचंद इस अर्थ में सच्चे प्रयोगवादी समझे जाने चाहिए. उन्होंने विचारों के साथ, भारतीय समाजों के प्रति अपनी समझ से जो प्रयोग किए उसमें अंतर्धारा के रूप में वंचितों के प्रति उनकी पक्षधरता तो हमेशा चलती रही, पर उसके बाह्य रूप परिवर्तित होते रहे. वह कभी तो गांधीवादी प्रयोगों को अपनाता रहा तो कभी मार्क्सवादी, तो कभी समाजवादी विचार-शृंखलाओं को भारतीय समस्याओं के लिए उपयोग में लाता रहा. हां, इस पूरी प्रक्रिया में वह प्रश्न उठाते रहे- व्यक्ति पर, संस्थाओं पर, विचारधाराओं पर.

उदाहरण के लिए गांधीवादी स्वराज्य को अधिक महत्त्व न देकर वे आर्थिक और सामाजिक मुक्ति को अधिक महत्त्व देते थे. सूरदास हो चाहे अमरकांत या फिर होरी – सभी इसी मुक्ति के लिए संघर्षशील हैं. पर कभी गांधीवादी ‘हृदय परिवर्तन’ के प्रशंसक रहे प्रेमचंद अंतिम उपन्यास ‘मंगलसूत्र’ आते-आते गांधीवाद से छिटके हुए नज़र आते हैं. उपन्यास की यह पंक्तियां व्यक्ति ‘गांधी’ के साथ-साथ उसके विचारों पर भी कड़ी आलोचना है:

‘हां देवता हमेशा रहेंगे और हमेशा रहे हैं. उन्हें अब भी संसार धर्म और नीति पर चलता हुआ नज़र आता है. वे अपने जीवन की आहुति देकर संसार से विदा हो जाते हैं, लेकिन उन्हें देवता क्यों , कायर कहो, आत्मसेवी कहो. देवता वह जो न्याय की रक्षा करे, और उसके लिए प्राण दे दे. अगर वह जानकर अनजान बनता है तो धर्म से गिरता है, और अगर उसकी आंखों में यह कुव्यवस्था खटकती ही नहीं तो तो वह अंधा भी है और मूर्ख भी, देवता किसी भी तरह नही है. और यहां देवता बनने की ज़रुरत भी नहीं है… नहीं मनुष्यों में मनुष्य बनना पड़ेगा. दरिंदों के बीच में, उनसे लड़ने के लिए हथियार बांधना पड़ेगा. उनके पंजों का शिकार बनना देवतापन नहीं जड़ता है’.

यह पंक्तियां गांधी से अधिक उनकी प्रविधियों से असहमति है और यह असहमति बहुत देर बाद जाकर आई है. प्रेमचंद के कुछ क्लासिक चरित्र सत्य और अहिंसा से ही अन्याय से लड़ते आए थे. उपन्यास रंगभूमि में सूरदास अंत-अंत तक अहिंसावादी ही बना रहता है.

वह कहता है, ‘मैं हाकिमों को दिखा देता कि एक दिन अंधा आदमी एक फ़ौज को कैसे पीछे हटा देता है, तोप का मुंह कैसे बंद कर देता है, तलवार की धार कैसे मोड़ देता है. मैं धर्म के बल पर लड़ना चाहता था’.  तो यह जो वैचारिक गतिशीलता है, वह प्रेमचंद के लेखकीय असंतोष का भी प्रमाण है और सामाजिक आवश्यकताओं के लिए प्रासंगिक टूल्स खोजने की लेखकीय ज़िम्मेदारी का भी.

प्रेमचंद इस वजह से ही प्रासंगिक हैं क्योंकि वह मान्यताओं पर सवाल उठाने से या फिर संस्था बन गए व्यक्ति की प्रविधियों पर भी आलोचकीय निगाह डालने से परहेज़ नहीं करते. पर इसका अर्थ यह नहीं था कि गांधी के व्यक्तित्व में, देश को लेकर उनकी चिंता में प्रेमचंद को कोई शक था. देखा जाए तो प्रेमचंद पर सबसे अधिक प्रभाव भी उन्हीं का ही पड़ा था. इसकी ही एक बानगी यह थी कि 8 फरवरी 1921 को गोरखपुर में उन्होंने गांधीजी का भाषण सुना और 15 फरवरी को बाईस साल की सरकारी नौकरी छोड़ दी.

धारा के विपरीत चलने का नैतिक साहस उनमें सहज ही था. उससे परहेज़ उन्होंने उस वक्त भी नहीं किया जब वह अपनी कहानियों में ब्राह्मणवादी व्यवस्था को कटघरे में खड़ा कर रहे थे. दलित आलोचकों ने प्रेमचंद पर सवर्णवादी व्यवस्था का पैरोकार होने के जितने इल्ज़ाम लगाए हैं, उससे कहीं इल्ज़ाम प्रेमचंद पर तथाकथित सवर्ण बुद्धिजीवियों ने लगाए थे.

अपनी एक कहानी मुक्ति मार्ग में प्रेमचंद दिखलाते हैं कि कैसे ब्राह्मणों द्वारा निर्धारित किए गए नियम और कर्म-कांड बने ही इसीलिए थे कि वह तथाकथित निम्न जातियों का धर्म के नाम पर उत्पीड़न कर सकें. हिंदू ब्राह्मण वर्ग की उनकी आलोचना केवल ‘मोटेराम शास्त्री’ जैसे काल्पनिक पात्रों के माध्यम से ही नहीं बल्कि उनके वैचारिक निबंधों में भी उतनी ही मुखरित होती थी. और ऐसा नहीं कि प्रेमचंद ने इसके लिए बहिष्कार जैसी स्थिति न झेली हो. हिंदू संप्रदायवादियों की बौद्धिक हिंसा का शिकार एक लेखक उस दौर में भी उतना ही था.

दिसंबर 1933 में सरस्वती के अंक में सह-संपादक श्रीनाथ सिंह ने प्रेमचंद की कहानी सद्गति के आधार पर ‘घृणा का प्रचारक प्रेमचंद’ शीर्षक लेख लिखा था. और न केवल प्रेमचंद पर ब्राह्मणों के खिलाफ़ खुलकर नफ़रत फैलाने का आरोप लगाया था बल्कि यह भी कि कैसे उनके लेखन में चित्रित भारतीय ग्रामीण जीवन की छवियां बनावटी और काल्पनिक हैं- कुछ वैसी ही जैसी रुडयार्ड किपलिंग और कैथरीन मेयो के लेखन में मिलती हैं. इसीलिए प्रेमचंद लोकप्रिय होने के साथ ही विवादास्पद भी थे. और दोनों ही में वक़्त के साथ इजाफ़ा ही हुआ है.

पर प्रेमचंद प्रतिकूलताओं से घबराने वाले लेखक नहीं थे. उन्होंने अपने ‘लेखक’ की रक्षा हमेशा की. वहां वह किसी भी तरह के समझौते के लिए तैयार नहीं थे. धारा के विपरीत चलने के शुरू से अभ्यासी प्रेमचंद की शुरुआती पुस्तकें राष्ट्रवाद के नाम पर ज़ब्त की गईं, उनके लिखने पर बंदिशें लगाई गईं. उन्होंने मित्र दयाराम निगम, जो मशहूर उर्दू पत्रिका ज़माना के संपादक थे, की सलाह पर अपना नाम प्रेमचंद कर लिया और इस क्षदं नाम से लिखते रहे पर लिखना न छोड़ा. पैसे की तंगी के कारण बंबई फ़िल्म जगत का भी रुख किया, पर वहां अपने सर्जक मन के साथ समझौता न कर सकने के कारण वापस लौटकर अपनी कहानियां और उपन्यास पूरे करने में जुट गए.

साहित्य और जीवन, इन दोनों ही की लड़ाई वह कलम से लड़ते रहे. यह आजीवन , अपने शर्त पर की जाने वाली लड़ाई ही उनके सृजन और उनके व्यक्तित्व की सबसे बड़ी प्रामाणिकता है.

बहरहाल, प्रेमचंद की गतिशीलता एक और संदर्भ में भी ग़ौर की जा सकती है. प्रायः प्रेमचंद के कथा साहित्य को एक निश्चित सामाजिक सोद्देश्यता के साथ बांधकर देखने वाली दृष्टि उनके ऐतिहासिक अवदान को कमतर कर देती है. वह अवदान क्या था? वह यह कि सही मायनों में ‘किसानों’ को एक वर्ग के रूप में व्यवस्थित प्रतिनिधित्व भारतीय कथा साहित्य में सबसे सशक्त रूप में प्रेमचंद ने दिया था. लगभग वैसा ही जैसा चार्ल्स डिकिन्स इंग्लैंड के लिए, बालज़ाक फ्रांस के लिए और टॉलस्टोय और गोर्की रूस के लिए करते हैं- किसानों को, खेतिहर वर्ग को सबालटर्न के रूप में एक स्वायत्तता प्रदान करने का.

वस्तुतः ही यह सब लेखक अपने ऐतिहासिक ‘स्थान’ के ही उत्पाद समझे जा सकते हैं, पर जैसा कि पीसी जोशी कहते हैं, प्रेमचंद इन सभी से आगे निकलते हैं. वह यह कि प्रेमचंद की सामाजिक दृष्टि किसानों को ऐतिहासिक प्रक्रिया का भुक्तभोगी भर मान कर चित्रित नहीं करती बल्कि, एक सीढ़ी और ऊपर जाकर वह किसानों को अपनी ऐतिहासिक स्थिति में परिवर्तन लाने वाले कारक के रूप में भी दिखलाती है. 1933 के भारतीय संदर्भों में किसानों के भीतर इस वर्ग-चेतना की सुगबुगाहट के अपने राजनीतिक-सामाजिक निहितार्थ थे, जिसकी ही परिणति स्वातंत्रयोत्तर संदर्भों में ज़मींदारी उन्मूलन के ऐतिहासिक निर्णय में होती है. भविष्य के स्वरों को सुन पाने की यह कला प्रेमचंद को अपने समय का सबसे गतिशील लेखक बनाती है.

पर प्रेमचंद की अपने समय और भविष्य की आहटों को सुन पाने की यह अनोखी पकड़ किताबी नहीं थी. वह दृष्टि जिसे हम प्रेमचंद की सामाजिक दृष्टि कहते हैं, उसका निर्माण वाकई गांव-घर में जनता के बीच पल-बढ़ कर, उनके बीच बैठकर हुआ था.

अमृत राय जिन्होंने प्रेमचंद की जीवनी कलम का सिपाही लिखी, इसी संदर्भ में कहते हैं,

‘प्रेमचंद के लेखन के तैंतीस वर्षों में हम बराबर एक ऐसे आदमी को आगे बढ़ते हुए देखते हैं जो कि अपने समाज से, जन-साधारण से, उनकी ज़िंदगी के हर रगो-रेशे से अधिकाधिक परिचित होते चलता है और खूब गहराई से उनको समझ रहा है और इतनी ही गहराई से उनकी कहानी को कह रहा है. और यही वह चीज़ है जहां पर वह आज भी तमाम पाठकों के दिल को अपने हाथ में पकड़े हुए हैं’.

इसीलिए केवल कोरी बौद्धिकता से साहित्य का दाना-पानी अधिक लंबा नहीं चलता. और यह प्रेमचंद प्रगतिशील लेखक संघ के 1936 के अधिवेशन में अपने अध्यक्षीय भाषण में भी लगभग कह ही रहे होते हैं ‘प्रगतिशील लेखक संघ, यह नाम ही मेरे विचार से गलत है. साहित्यकार या कलाकार स्वभावतः प्रगतिशील होता है. अगर यह उसका स्वभाव न होता तो शायद वह साहित्यकार ही न होता’.

इसीलिए प्रगतिशील आंदोलन को लेकर प्रेमचंद के अपने अंदेशे थे. केवल बौद्धिक स्तर पर प्रगतिशील होना साहित्य के लिए काफी नहीं, बल्कि पहले उन जीवन मूल्यों को जीना ज़रूरी है, निजी अनुभव होना ज़रूरी है. और यह अंदेशा उसे ही हो सकता है जिसने वस्तुतः उन जीवन मूल्यों को जिया था, खुद को उस सामाजिकता से जोड़े रखा था जिसकी बात वह करता था.

प्रेमचंद की जनप्रियता की एक सबसे बड़ी वजह यही है कि जन के साथ उसका संबंध जितना सजीव था, उसी अर्थ में वह उतना ही गतिशील भी था. समय को पहचान पाने की, इतिहास के भीतर पैठ कर पाई गई अंतर्दृष्टि, भविष्य को पहले से देख पाने की क्षमता रचनाकार प्रेमचंद की प्रासंगिकता की वजहें हैं.

और अपनी इस पूरी यात्रा में हम कभी भी प्रेमचंद की भारतीयता पर प्रश्न नहीं उठा सकते. उनका लेखकीय कोर ही राष्ट्रवादी था. पर हां, आज का आधुनिक-संकुचित राष्ट्रवाद नहीं- वह राष्ट्रवाद जो जन-साधारण के साथ अपनी पक्षधरता सिद्ध करता है, बारंबार. वह राष्ट्रवाद जिसमें वह भारत के जन से एकमेव हो जाते हैं. समझ नहीं आता कि होरी में प्रेमचंद को ढूंढे या प्रेमचंद में होरी को. प्रेमचंद के ये सभी कालजयी चरित्र अपने सर्जक से अलग नहीं जान पड़ते.

भारतीय ग्रामीण जीवन की उत्कट-अदम्य जिजीविषा को, उसके सम्पूर्ण कलेवर को जितनी विविधता और समग्रता से प्रेमचंद अकेले ग्रहण करते हैं- वह अभूतपूर्व है. डॉ. विश्वनाथ प्रसाद तिवारी की टिप्पणी अधिक समग्र है:

‘भारतीय जनता का इतना विविध और विराट दर्शन शायद ही किसी कथाकार में मिले. छोटे-छोटे चरित्र, छोटी-छोटी घटनाएं सरिताओं की तरह दीखती हैं. और इनके मिलने से एक विराट समुद्र मिलता है- एक विराट मानव समुद्र. इसी समुद्र की गहराइयों में वह आत्मा जिसे भारतीय आत्मा कह सकते हैं, लहराती है, आंदोलित होती है, कांपती है और पछाड़ खाकर गिर पड़ती है’.

कभी-कभी लगता है कि क्या आज के भारतीय समाज की चिंताएं, उसके प्रश्न, उसके सरोकार, उसका परिवेश, उसकी परिस्थितियां क्या एकदम वैसी ही रह गई हैं , जैसी प्रेमचंद के युग में थीं? क्या आज के तथाकथित निम्न वर्ग के सामने शोषण का प्रश्न वैसा ही ज्वलंत है, जैसा प्रेमचंद के समय था? क्या आज के मध्य वर्ग को भी सामाजिक सोद्देश्यता से जोड़ने की उतनी ही आवश्यकता है? आम आदमी की जो परिभाषा प्रेमचंद के समय थी, क्या वही आज भी है? वर्ग-संघर्ष और वर्ग-संबंध कितने हद तक बदले हैं? और सबसे अधिक अहम सवाल यह कि क्या आज की पीढ़ी या समकालीन साहित्य प्रेमचंद की परंपरा से जुड़ने के लिए तैयार है?

तो इन सबके जवाब में बतौर एक सचेतन पाठक यह लगता है कि भारतीय समाजों को आधुनिकता ने बहुत हद तक बदला है पर उसकी मूलभूत समस्याएं आज भी वही हैं जो प्रेमचंद के युग में थीं. हां- किंचित अलग कलेवर में, शोषण के नए लिपे-पुते तरीकों में, अभिव्यक्ति के नए माध्यमों में- पर व्यक्ति की समाज और अपने राष्ट्र से उसकी अपेक्षाएं वही हैं जो प्रेमचंद के भारत में थीं.

समाज के वंचितों को, दमितों को क्रांतिधर्मा बनाने की ज़िम्मेदारी तब भी प्रेमचंद की रचनाओं ने उठाया था और आज भी प्रेमचंद की उस जन-क्रांति की विरासत को आगे बढ़ाने की ज़िम्मेदारी समकालीन साहित्य पर है, साहित्यकारों पर है. यही प्रेमचंद रूपी विरासत की वर्तमान प्रासंगिकता है.

(अदिति भारद्वाज गद्यकार हैं, जो साहित्य और सिनेमा में रुचि रखती हैं.)