वैष्णो देवी मेडिकल कॉलेज: एनएमसी के पास कार्रवाई के स्पष्ट मानदंड नहीं, फिर कैसे रद्द हुई मान्यता?

राष्ट्रीय चिकित्सा आयोग ने जम्मू-कश्मीर के कटरा स्थित श्री माता वैष्णो देवी मेडिकल कॉलेज की एमबीबीएस की अनुमति जनवरी 2026 में वापस ले ली थी. अब एक आरटीआई के जवाब में आयोग ने बताया है कि उसके पास यह तय करने वाला कोई अलग दस्तावेज़ नहीं है कि किस कमी पर चेतावनी दी जाए या अनुमति वापस ली जाए. ऐसे में संस्थान के ख़िलाफ़ की गई इस कार्रवाई के आधार पर सवाल उठते हैं.

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नई दिल्ली: 6 जनवरी 2026 को राष्ट्रीय चिकित्सा आयोग (एनएमसी) ने जम्मू-कश्मीर के कटरा स्थित श्री माता वैष्णो देवी इंस्टिट्यूट ऑफ मेडिकल एक्सीलेंस (एसएमवीडीआईएमई) में एमबीबीएस कोर्स चलाने की अनुमति वापस ले ली थी. यह फैसला ऐसे समय आया था, जब मेडिकल कॉलेज में मुस्लिम छात्रों की अधिकता के खिलाफ़ भाजपा समर्थित हिंदुत्ववादी संगठन प्रदर्शन कर रहे थे, जबकि सभी छात्रों का नामांकन नीट मेरिट के आधार हुआ था.

हालांकि आयोग ने अपने आदेश में फैकल्टी, बुनियादी ढांचे और क्लीनिकल सुविधाओं में गंभीर कमियों का हवाला दिया था.

अब एक सूचना के अधिकार (आरटीआई) आवेदन के जवाब ने मेडिकल कॉलेजों के खिलाफ एनएमसी की कार्रवाई के तौर-तरीकों पर नया सवाल खड़ा किया है. आयोग ने आरटीआई के जवाब में कहा है कि उसके रिकॉर्ड में ऐसा कोई विशेष दस्तावेज़ उपलब्ध नहीं है, जिसमें यह तय किया गया हो कि किसी मेडिकल कॉलेज में किस प्रकार की कमी या कमियों के किस स्तर पर सीधे अनुमति वापस ली जाएगी और किन मामलों में केवल कारण बताओ नोटिस, चेतावनी या तय समय के भीतर सुधार का अवसर दिया जाएगा.

आरटीआई में क्या पूछा गया था?

यह आरटीआई आवेदन 1 जुलाई, 2026 को राष्ट्रीय चिकित्सा आयोग के मेडिकल असेसमेंट एंड रेटिंग बोर्ड (एमएआरबी) को भेजा था. आवेदन में पिछले तीन वर्षों के दौरान मेडिकल कॉलेजों के निरीक्षण, उनमें पाई गई कमियों और उन पर की गई नियामकीय कार्रवाई से जुड़ी कुल 14 जानकारियां मांगी गई थीं.

आरटीआई कार्यकर्ता कन्हैया कुमार ने आवेदन और उसके जवाब विशेष रुप से द वायर हिंदी को उपलब्ध कराए हैं.

आवेदन के अंतिम तीन बिंदुओं में ये जानकारी मांगी गई थी:

  • पिछले तीन वर्षों में किन मेडिकल कॉलेजों का लेटर ऑफ परमिशन या मान्यता वापस ली गई, निलंबित की गई या रद्द की गई, और उसके पीछे क्या कारण थे?
  • ऐसे कौन से कॉलेज थे, जहां इसी तरह की कमियां होने के बावजूद उनकी मान्यता या अनुमति वापस नहीं ली गई? यदि नहीं ली गई तो उसका कारण क्या था?
  • एमएआरबी किन दिशानिर्देशों या मानदंडों के आधार पर तय करता है कि किसी कॉलेज की अनुमति वापस लेनी है या केवल चेतावनी देकर सुधार का समय देना है?
आरटीआई में पूछे गए सवाल.

एनएमसी ने 2 जुलाई 2026 को आरटीआई का निपटारा करते हुए लगभग पूरी जानकारी देने से इनकार कर दिया.

जवाब में कहा गया कि ‘मांगी गई जानकारी एमएआरबी के पास उस रूप में उपलब्ध नहीं है, जिस रूप में आरटीआई में मांगी गई है. आरटीआई कानून के तहत सीपीआईओ केवल वही जानकारी दे सकता है जो पहले से रिकॉर्ड में मौजूद हो. सीपीआईओ पर यह जिम्मेदारी नहीं है कि वह अलग-अलग रिकॉर्ड से जानकारी इकट्ठा करके नई सूची या नया डेटा तैयार करे. इसलिए मांगी गई जानकारी उपलब्ध नहीं कराई जा सकती.’

आखिरी बिंदु जिसमें आवेदक ने पूछा था कि एमएआरबी किन नियमों के आधार पर तय करता है कि किसी कॉलेज की अनुमति वापस ली जाए या सिर्फ चेतावनी दी जाए, को लेकर एनएमसी ने कहा, ‘ऐसा कोई विशिष्ट सूचना/दस्तावेज़ इस सीपीआईओ के रिकॉर्ड में उपलब्ध नहीं है. हालांकि, आवेदक चाहे तो एनएमसी एक्ट, 2019 और उसके तहत बनाए गए नियमों को देख सकता है, जो सार्वजनिक रूप से उपलब्ध हैं.’

यानी अनुमति रद्द करने के लिए कोई अलग लिखित मानदंड (जैसा आरटीआई में मांगा गया) रिकॉर्ड में उपलब्ध होने से इनकार किया गया है.

यह जवाब इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि मेडिकल कॉलेजों को अनुमति देना, उसका नवीनीकरण करना या उसे वापस लेना लाखों छात्रों के भविष्य से जुड़ा फैसला होता है.

क्या कहता है एनएमसी एक्ट ?

आरटीआई के जवाब में एनएमसी ने एनएमसी एक्ट, 2019 देखने की सलाह दी है. इस अधिनियम का अध्ययन करने पर यह स्पष्ट होता है कि इसकी धारा 26, 28 और 29 एमएआरबी को मेडिकल कॉलेजों का निरीक्षण करने, उनका मूल्यांकन करने तथा नए मेडिकल कॉलेज या पाठ्यक्रम के संबंध में अनुमति देने या अस्वीकार करने की शक्तियां देती हैं.

अधिनियम यह भी निर्धारित करता है कि अनुमति संबंधी निर्णय लेते समय किन व्यापक मानदंडों पर विचार किया जाएगा.

अधिनियम की धारा 26 (1) (एफ) में लिखा है, ‘यदि कोई मेडिकल संस्थान स्नातक चिकित्सा शिक्षा बोर्ड (यूजीएमईबी) या स्नातकोत्तर चिकित्सा शिक्षा बोर्ड (पीजीएमईबी) द्वारा निर्धारित न्यूनतम आवश्यक मानकों का पालन नहीं करता है, तो एनएमसी उसके खिलाफ आवश्यक कार्रवाई कर सकता है. इन कार्रवाइयों में चेतावनी जारी करना, आर्थिक जुर्माना लगाना, प्रवेश क्षमता कम करना, नए दाखिलों पर रोक लगाना या उस संस्थान की मान्यता वापस लेने की सिफारिश करना शामिल है.’

हालांकि, अधिनियम में ऐसी कोई अलग सूची या मात्रात्मक मानदंड नहीं मिलता, जिसमें यह स्पष्ट लिखा हो कि किस प्रतिशत की कमी, किस स्तर के बुनियादी ढांचे की कमी या किन विशेष परिस्थितियों में सीधे अनुमति वापस ली जाएगी, जबकि किन मामलों में केवल कारण बताओ नोटिस या सुधार का अवसर दिया जाएगा.

यानी कानून आयोग को कार्रवाई करने की शक्ति देता है, लेकिन कार्रवाई के विभिन्न विकल्पों के बीच चुनाव करने के लिए कोई अलग सार्वजनिक ‘निर्णय मैट्रिक्स’ या विस्तृत दिशानिर्देश सामने नहीं आते. यही वह प्रश्न है जिसे यह आरटीआई केंद्र में लेकर आती है.

श्री माता वैष्णो देवी इंस्टिट्यूट ऑफ मेडिकल एक्सीलेंस के मामले में राष्ट्रीय चिकित्सा आयोग द्वारा अनुमति वापस लेने का फैसला ऐसे समय आया, जब मेडिकल कॉलेज पहले से ही एक तीखे सांप्रदायिक विवाद के केंद्र में था.

किन विवादों में फंसा था मेडिकल कॉलेज?

सितंबर 2025 में एनएमसी ने श्री माता वैष्णो देवी इंस्टिट्यूट ऑफ मेडिकल एक्सीलेंस को 50 सीटों के साथ एमबीबीएस पाठ्यक्रम शुरू करने की अनुमति दी थी.

ध्यान रहे एनएमसी की धारा 28 में लिखा है, ‘यदि कोई (विश्वविद्यालय, ट्रस्ट, व्यक्तियों के किसी संघ या अन्य संस्था) नया मेडिकल कॉलेज स्थापित करना चाहता है, किसी स्नातकोत्तर (पोस्टग्रेजुएट) पाठ्यक्रम की शुरुआत करना चाहता है या किसी मेडिकल कॉलेज में सीटों की संख्या बढ़ाना चाहता है, तो उसे (एनएमसी के अंतर्गत आने वाले) एमएआरबी से अनुमति लेनी होगी. आवेदन करना होगा. आवेदन मिलने की तारीख से छह महीने के भीतर एमएआरबी उसका परीक्षण करेगा. इस दौरान वह अधिनियम की धारा 29 में निर्धारित मानकों को ध्यान में रखते हुए यह तय करेगा कि आवेदन को मंजूरी दी जाए या अस्वीकार किया जाए. …आवेदन अस्वीकार करने से पहले संबंधित व्यक्ति या संस्था को उसमें मौजूद कमियों, यदि कोई हों, को दूर करने का अवसर दिया जाएगा.’

श्री माता वैष्णो देवी इंस्टिट्यूट ऑफ मेडिकल एक्सीलेंस ने इस पड़ाव को पार कर लिया था. इसके बाद जम्मू-कश्मीर बोर्ड ऑफ प्रोफेशनल एंट्रेंस एग्जामिनेशन ने 2025-26 सत्र के लिए मेरिट के आधार पर दाख़िले की सूची जारी की. 50 सीटों में से 42 पर कश्मीर के मुसलमान छात्रों, सात हिंदू छात्रों और एक सिख छात्र का चयन हुआ. सभी छात्रों का चयन नेशनल एलिजिबिलिटी कम एंट्रेंस टेस्ट (नीट) की मेरिट सूची के आधार पर हुआ था.

हालांकि, चयन सूची सार्वजनिक होने के बाद कई हिंदुत्ववादी संगठनों ने इसका विरोध शुरू कर दिया. उनका तर्क था कि यह मेडिकल कॉलेज श्री माता वैष्णो देवी श्राइन बोर्ड द्वारा संचालित है, जिसकी आय देशभर से आने वाले हिंदू श्रद्धालुओं के चढ़ावे से होती है. इसलिए कॉलेज में अधिकतर सीटें हिंदू छात्रों के लिए आरक्षित होनी चाहिए.

इसी मांग को लेकर 22 नवंबर, 2025 को करीब 60 हिंदुत्ववादी संगठनों ने श्री माता वैष्णो देवी संघर्ष समिति का गठन किया. इसमें बजरंग दल, विश्व हिंदू परिषद और भाजपा से जुड़े कई संगठन शामिल थे. पहले इन संगठनों ने मुस्लिम छात्रों के दाख़िले रद्द करने की मांग की, लेकिन बाद में उनका आंदोलन पूरे मेडिकल कॉलेज को बंद कराने की मांग तक पहुंच गया.

इन संगठनों ने कई प्रदर्शन किए, कॉलेज के बाहर धरने दिए और जम्मू बंद तथा चक्का जाम की चेतावनी भी दी. विश्व हिंदू परिषद के महामंत्री बजरंग बागड़ा ने ‘धर्मगत असंतुलन एवं धार्मिक भावना के संरक्षण’ लेकर उपराज्यपाल मनोज सिन्हा को पत्र भेजा.

 

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भाजपा नेताओं ने भी इस मुद्दे पर उपराज्यपाल और केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री जेपी नड्डा से मुलाकात कर आंदोलनकारियों की मांगों से अवगत कराया और अपनी चिंता भी जाहिर की.

इसी बीच 2 जनवरी 2026 को एमएआरबी की टीम ने कॉलेज का आकस्मिक निरीक्षण किया. महज चार दिन बाद, 6 जनवरी को एनएमसी ने कॉलेज को दी गई अनुमति वापस लेने का आदेश जारी कर दिया.

मेडिकल कॉलेज में मुस्लिम छात्रों की अधिक संख्या को लेकर हुए विवाद पर जन स्वास्थ्य अभियान-भारत के राष्ट्रीय संयोजक अमूल्या निधि सवाल उठाते हैं कि कितने छात्रों ने आवेदन किया था और उनमें कितने हिंदू तथा कितने मुस्लिम थे. द वायर हिंदी से बातचीत में वह कहते हैं,

‘जिसने भी इस विवाद की शुरुआत की क्या यह जानने की कोशिश की कि नामांकन के लिए आवेदन करने वालों में कितने हिंदू थे, कितने मुस्लिम थे? अगर उस कॉलेज में नीट मेरिट के आधार पर आवेदन करने वाले 100 बच्चों में से 80-90 मुसलमान थे, तो उन्हीं में से सबसे अधिक चुने जाएंगे.’

इसे दूसरे उदाहरण से समझाते हुए निधि कहते हैं, ‘किसी ट्राइबल स्टेट, जैसे छत्तीसगढ़ के किसी मेडिकल कॉलेज में आदिवासी छात्र ही अधिक होंगे, क्योंकि उनकी आबादी वहां अधिक है और उन्होंने ही अधिक आवेदन किया होगा. अब कोई कहे कि उस कॉलेज में आदिवासियों को अधिक सीट क्यों मिली, तो इसका कोई मतलब नहीं. आदिवासी बहुल इलाके या राज्य के मेडिकल कॉलेज में आदिवासियों को ही अधिक सीट मिलना चाहिए, यही ठीक भी है.’

एनएमसी ने किन कमियों का हवाला दिया?

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, एनएमसी द्वारा जारी आदेश में कहा गया कि निरीक्षण के दौरान कई गंभीर कमियां पाई गईं. आयोग ने कहा कि कॉलेज में शिक्षकों की संख्या निर्धारित मानकों से 39 प्रतिशत कम थी, जबकि ट्यूटर, डिमॉन्स्ट्रेटर और सीनियर रेजिडेंट की संख्या में 65 प्रतिशत की कमी पाई गई.

इसके अलावा निरीक्षण के दौरान ओपीडी में आने वाले मरीजों की संख्या निर्धारित मानक से आधी से भी कम दर्ज की गई. अस्पताल में बेड ऑक्यूपेंसी केवल 45 प्रतिशत पाई गई, जबकि नियमों के अनुसार यह 80 प्रतिशत होनी चाहिए. आईसीयू में भी औसतन लगभग 50 प्रतिशत बेड ही भरे मिले.

एनएमसी ने यह भी कहा कि कुछ विभागों में प्रैक्टिकल और रिसर्च लैब उपलब्ध नहीं थीं. लेक्चर थिएटर न्यूनतम मानकों पर खरे नहीं उतरते थे. पुस्तकालय में निर्धारित संख्या की तुलना में केवल आधी किताबें और 15 की जगह केवल दो जर्नल उपलब्ध थे.

आयोग ने पर्याप्त ऑपरेशन थिएटर तथा पुरुष और महिला मरीजों के लिए अलग वार्ड जैसी सुविधाओं में भी कमी होने का दावा किया.

इन कथित कमियों के आधार पर एनएमसी ने मेडिकल कॉलेज की अनुमति वापस लेते हुए 2025-26 बैच के सभी 50 छात्रों को जम्मू-कश्मीर के अन्य सरकारी मेडिकल कॉलेजों में सुपरन्यूमेरेरी सीटों पर समायोजित करने का निर्देश दिया. साथ ही संस्थान की 15 करोड़ रुपये की परफॉर्मेंस बैंक गारंटी भुनाने का भी आदेश दिया.

कॉलेज ने आरोपों को नकारा

संस्थान के अधिकारियों और फैकल्टी सदस्यों ने एनएमसी के निष्कर्षों पर सवाल उठाए. उनका कहना था कि 2 जनवरी को हुआ आकस्मिक निरीक्षण सर्दियों की छुट्टियों के दौरान किया गया, जब करीब 50 फीसदी फैकल्टी अवकाश पर थी.

एक अधिकारी के मुताबिक, निरीक्षण टीम के आने की सूचना उन्हें फोन पर महज 15 मिनट पहले दी गई थी और छुट्टी पर गए शिक्षकों को वापस बुलाने की कोशिश की गई.

संस्थान के अधिकारियों ने एनएमसी की रिपोर्ट में दर्ज कई आंकड़ों को भी चुनौती दी.

इंडियन एक्सप्रेस के मुताबिक, एक अधिकारी ने दावा किया कि एनएमसी ने पुस्तकालय में 75 किताबें और दो जर्नल दर्ज किए, जबकि वहां 2,713 किताबें, 480 जर्नल, 392 राष्ट्रीय ई-जर्नल और 9,900 विदेशी ई-जर्नल उपलब्ध थे.

इसी तरह, एनएमसी की रिपोर्ट में दो ऑपरेशन थिएटर बताए जाने के विपरीत संस्थान ने आठ ऑपरेशन थिएटर होने का दावा किया. अधिकारियों ने पुरुष और महिला मरीजों के लिए अलग वार्ड नहीं होने के एनएमसी के निष्कर्ष पर भी सवाल उठाया और कहा कि इनडोर मरीजों (भर्ती होकर इलाज करा रहे मरीज) के लिए अलग कमरे उपलब्ध थे.

संस्थान के कुछ अधिकारियों और फैकल्टी सदस्यों ने यह आरोप भी लगाया कि निरीक्षण टीम का रुख पहले से तय था. उनके मुताबिक टीम कॉलेज पहुंचने से पहले ही अनुमति वापस लेने का मन बना चुकी थी. उन्होंने इस कार्रवाई को कॉलेज के खिलाफ चल रहे विरोध-प्रदर्शनों से भी जोड़कर देखा.

द वायर हिंदी ने इस मामले पर बातचीत के लिए श्री माता वैष्णो देवी इंस्टिट्यूट ऑफ मेडिकल एक्सीलेंस के एग्जीक्यूटिव डायरेक्टर डॉ. यशपाल शर्मा से संपर्क किया और जानना चाहा कि एनएमसी ने जिन कमियों के आधार पर उनके संस्थान का ‘लेटर ऑफ परमिशन’ वापस लिया क्या वे कमियां वास्तव में थीं?

डॉ. शर्मा ने कहा, ‘देखिए, अगर उन्होंने कहा कि कमियां हैं, तो हम यह नहीं कह सकते कि कमियां नहीं हैं. हम रेगुलेटर के फैसले को चुनौती नहीं दे सकते. …चैलेंज करने का निर्णय शीर्ष अथॉरिटी को लेना होता है. और वहां से ऐसा कोई फैसला नहीं लिया गया.’

यहां शीर्ष अथॉरिटी संस्थान के बोर्ड को कहा जा रहा है. एनएमसी के फैसले को चुनौती देने का निर्णय क्यों नहीं लिया गया, इसके जवाब में डॉ. शर्मा ने कहा, ‘क्योंकि हमने फैसले को मान लिया, इसलिए चुनौती देने का फैसला नहीं लिया गया.’

क्या उनके संस्थान को एनएमसी के समक्ष अपना पक्ष रखने का मौका मिला?

इसे लेकर उनका जवाब था- नहीं, ‘ऐसा कोई सिस्टम ही नहीं है. हमें कोई नोटिस तक नहीं दिया गया. सीधा रद्द कर दिया गया.’

डॉ. शर्मा ने यह कहते हुए अपनी बात खत्म कि ‘कई फैसले बहुत सारे हित सामने रखकर किए जाते हैं. आप भी जानते हैं कि तब सामान्य स्थिति नहीं थी.’

‘एनएमसी की प्रक्रियाएं पारदर्शी नहीं हैं’

अमूल्या निधि का कहना है कि एनएमसी के पास मेडिकल कॉलेजों को अनुमति देने के लिए एक निर्धारित प्रक्रिया है. उनके मुताबिक, एक टीम कॉलेज का निरीक्षण करती है और सभी मानकों की जांच के बाद अनुमति दी जाती है. इसके अलावा नियमित निगरानी भी की जाती है, जो समय-समय पर या किसी शिकायत के आधार पर हो सकती है.

निधि एनएमसी की ओर से बताई गई कमियों के आधार पर अनुमति वापस लेने के फैसले पर भी सवाल उठाते हैं.

वह मध्य प्रदेश के व्यापमं घोटाले का उदाहरण देते हुए कहते हैं, ‘मध्य प्रदेश में व्यापमं घोटाला हुआ, केस चल रहा है, फिर वे मेडिकल कॉलेज चल रहे हैं. एनएमसी ने उन कॉलेजों का परमिशन तब तक के लिए वापस क्यों नहीं लिया, जब तक केस खत्म नहीं होता?’

वह पूछते हैं कि क्या एनएमसी ने जो कमियां बताई हैं, क्या उनके आधार पर किसी मेडिकल कॉलेज का लाइसेंस रद्द किया जाना चाहिए. वह कहते हैं,

किताबों का कम होना, शिक्षक का कम होना, इसके लिए नोटिस दिया जा सकता है. तय समय में कमियों को पूरा करने के लिए कहा जा सकता था. यही प्रक्रिया है.

वह आगे कहते हैं, ‘इसके अलावा अगर कमियां इतनी गंभीर थीं कि लाइसेंस ही रद्द करना पड़ा, तब तो उस टीम को भी बर्खास्त किया जाना चाहिए, जिनके द्वारा जांच किए जाने के बाद कॉलेज को लेटर ऑफ परमिशन दिया गया था. क्योंकि तीन-चार महीने पहले ही परमिशन दिया गया था, फिर इतनी जल्दी इतनी गंभीर कमी कैसे आ गई? और अगर कमी होते हुए परमिशन दिया गया था, तब तो जांच करने वाली टीम की जांच होनी चाहिए.’

निधि का कहना है कि अगर शिक्षकों की कमी के आधार पर लाइसेंस रद्द किया गया है, ‘तब तो देश के अधिकतर प्राइवेट मेडिकल कॉलेज के लाइसेंस रद्द कर देने चाहिए. सरकारी मेडिकल कॉलेजों में भी फैकल्टी की क्या स्थिति है, सरकार उसके आंकड़े जारी करे, सब स्पष्ट हो जाएगा.’

वह सवाल उठाते हैं कि श्री माता वैष्णो देवी इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल एक्सीलेंस के मामले में शिकायत किसने की थी, ‘क्या वहां पढ़ने वाले किसी छात्र ने कोई शिकायत की? क्या किसी छात्र ने एनएमसी से कहा कि कॉलेज में किसी चीज की कमी या असुविधा है?’

निधि निरीक्षण के दिन पर भी सवाल उठाते हैं. वह कहते हैं कि 2 जनवरी 2026 शुक्रवार था और उस दिन हजरत मोहम्मद की जयंती भी थी, ‘शुक्रवार मुस्लिमों के लिए महत्वपूर्ण दिन होता है. जम्मू-कश्मीर मुस्लिम बहुल इलाका है. संभव है कि शिक्षक नमाज पढ़ने गए हों. मरीज भी उस रोज अस्पताल जाने से बचते हैं. दोपहर में तो वहां नमाज के लिए छुट्टी जैसा माहौल होता है. शुक्रवार से ज्यादा भीड़ वहां रविवार को अस्पताल में मिल सकती है.’

उनका कहना है कि एनएमसी को पिछले एक साल में किए गए अस्पतालों के निरीक्षण की सूची जारी करनी चाहिए और यह भी बताना चाहिए कि अलग-अलग अस्पतालों में हालात कैसे पाए गए. ध्यान रहे कन्हैया कुमार ने अपने आरटीआई आवेदन में यह सवाल पूछा था लेकिन जवाब नहीं मिला.

निधि के मुताबिक, ‘एनएमसी की खुद की प्रक्रियाएं पारदर्शी नहीं हैं, चाहे वह परमिशन का प्रोसेस हो, या मॉनिटरिंग का प्रोसेस हो या विड्रॉल का प्रोसेस हो.’

वह कहते हैं कि कश्मीर जैसे मुश्किल इलाके में खुले मेडिकल कॉलेज को विस्तार दिया जाना चाहिए, न कि बंद किया जाना चाहिए. ‘वहां के छात्रों के पास पहले ही एक्सेस कम है. शैक्षणिक संस्थाओं की संख्या कम है. यह तो अनैतिक है.’

अनुमति रद्द होने के बाद जश्न

गौरतलब है कि एनएमसी के फैसले के तुरंत बाद श्री माता वैष्णो देवी संघर्ष समिति, राष्ट्रीय बजरंग दल, युवा राजपूत सभा सहित कई हिंदुत्ववादी संगठनों ने इसे अपनी जीत बताया. जम्मू में मिठाइयां बांटी गईं, ढोल-नगाड़े बजाए गए और जश्न मनाया गया था.

संघर्ष समिति के संयोजक रिटायर्ड कर्नल सुखवीर सिंह मंकोटिया ने इसे अपने 45 दिन के आंदोलन की सफलता बताते हुए केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री जेपी नड्डा और केंद्रीय नेतृत्व का आभार जताया.

भाजपा नेताओं ने भी एनएमसी के निर्णय का स्वागत किया. जम्मू-कश्मीर भाजपा अध्यक्ष सत शर्मा ने कहा कि यदि कोई संस्थान एनएमसी के निर्धारित मानकों पर खरा नहीं उतरता है तो उसकी मान्यता रद्द होना स्वाभाविक है. भाजपा विधायक आरएस पठानिया ने भी इसे गुणवत्ता सुनिश्चित करने की दिशा में उठाया गया कदम बताया.

दूसरी ओर, जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने इस फैसले पर जश्न मनाने वालों की आलोचना की थी. उन्होंने कहा कि देश के अन्य हिस्सों में लोग मेडिकल कॉलेज खोलने के लिए संघर्ष करते हैं, जबकि जम्मू में एक मेडिकल कॉलेज बंद कराने का जश्न मनाया जा रहा है.

उन्होंने सवाल उठाया कि यदि संस्थान वास्तव में मानकों पर खरा नहीं उतरता था, तो उसे कुछ महीने पहले अनुमति किस आधार पर दी गई थी और इसके लिए जिम्मेदारी किसकी तय होगी.

 

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जश्न मानने को लेकर नाराज़गी श्री माता वैष्णो देवी इंस्टिट्यूट ऑफ मेडिकल एक्सीलेंस में नामांकन लेने वाले सबसे पहले छात्र मानित सर्वस्व ने भी जताई:

कॉलेज का बंद होने से केवल हम कुछ छात्रों का नुकसान नहीं हुआ, बल्कि पूरे जम्मू-कश्मीर का बड़ा नुकसान हुआ. इतना अच्छा नया कॉलेज शुरू हुआ. बहुत अच्छा इन्फ्रास्ट्रक्चर था. …इतने बड़े नुकसान के बाद जश्न मनाया जा रहा था, यह बहुत ही शर्म की बात है, बहुत ही बुरी बात है.

मानित सर्वस्व के नामांकन के बाद मीडिया में खबरें बनीं थीं. संस्थान ने खुद अपने सोशल मीडिया हैंडल से उनका और उनके परिजनों का वीडियो शेयर किया था, जिसमें वे इसे गर्व का क्षण बता रहे थे.

क्या एनएमसी ने जिन कमियों का हवाला देकर लेटर ऑफ परमिशन वापस लिया, क्या वे कमियां वाकई में थीं?

मानित ने जवाब दिया, ‘नहीं ऐसा नहीं था कुछ. जो जांच उस कॉलेज में कई गई, अगर वही जांच दूसरे जीएमसी (गवर्नमेंट मेडिकल कॉलेज) में नियमित तौर पर हो, तब तो बहुत सारे जीएमसी बंद हो जाएंगे. हम मेडिकल स्टूडेंट हैं, हमें वहां (मेडिकल कॉलेजों) के हालात पता हैं.’

मानित मानते हैं कि श्री माता वैष्णो देवी इंस्टिट्यूट ऑफ मेडिकल एक्सीलेंस को ‘निशाना’ बना गया.

नियामकीय कार्रवाई पर उठे नए सवाल

श्री माता वैष्णो देवी इंस्टिट्यूट ऑफ मेडिकल एक्सीलेंस के मामले में सबसे बड़ा सवाल अब केवल यह नहीं रह गया है कि कॉलेज में वास्तव में कमियां थीं या नहीं. सवाल यह भी है कि राष्ट्रीय चिकित्सा आयोग यह कैसे तय करता है कि किसी मेडिकल कॉलेज में पाई गई कमियों पर सीधे अनुमति वापस ली जाएगी या उसे सुधार का मौका दिया जाएगा.

इसी सवाल का जवाब जानने के लिए दायर आरटीआई में आवेदक ने मेडिकल असेसमेंट एंड रेटिंग बोर्ड से उन विशेष दिशानिर्देशों या मानदंडों की प्रति मांगी थी, जिनके आधार पर यह निर्णय लिया जाता है कि किसी संस्थान के खिलाफ कौन-सी नियामकीय कार्रवाई की जाएगी. लेकिन आयोग ने जवाब दिया कि उसके रिकॉर्ड में ऐसा कोई अलग दस्तावेज उपलब्ध नहीं है और आवेदक को केवल एनएमसी एक्स, 2019 तथा उसके तहत बने नियम देखने की सलाह दी.

यहां ध्यान देने वाली बात यह है कि एनएमसी एक्ट, 2019 मेडिकल असेसमेंट एंड रेटिंग बोर्ड को मेडिकल कॉलेजों का निरीक्षण करने, निर्धारित मानकों का अनुपालन सुनिश्चित करने और जरूरत पड़ने पर चेतावनी, जुर्माना, दाखिलों में कमी या रोक तथा अनुमति या मान्यता वापस लेने जैसी नियामकीय कार्रवाई करने की शक्तियां देता है. लेकिन अधिनियम में ऐसा कोई सार्वजनिक और स्पष्ट मानदंड नहीं मिलता, जिससे यह तय किया जा सके कि किस तरह की या किस स्तर की कमी पर कौन-सी कार्रवाई की जाएगी.

इसी तरह मेडिकल कॉलेजों के लिए लागू मिनिमम स्टैंडर्ड रिक्वायरमेंट्स (एमएसआर) नियम भी यह विस्तार से बताते हैं कि किसी 50 सीट वाले मेडिकल कॉलेज में कितने शिक्षक होने चाहिए, अस्पताल में कितने बेड होने चाहिए, ओपीडी में प्रतिदिन कितने मरीज आने चाहिए, पुस्तकालय में कितनी किताबें और जर्नल होने चाहिए तथा अन्य बुनियादी सुविधाएं क्या होंगी.

लेकिन इन नियमों में भी यह स्पष्ट नहीं मिलता कि यदि किसी मानक में कितनी कमी पाई जाती है तो उसका परिणाम सीधे अनुमति रद्द होना होगा या पहले सुधार का अवसर दिया जाएगा.

यही वजह है कि इस आरटीआई के जवाब ने एक व्यापक नियामकीय सवाल खड़ा कर दिया है. यदि अलग से कोई सार्वजनिक दस्तावेज़ उपलब्ध नहीं हैं, तो मेडिकल कॉलेजों के खिलाफ की जाने वाली अलग-अलग प्रकार की कार्रवाई, जैसे कारण बताओ नोटिस, चेतावनी, समयबद्ध अनुपालन का निर्देश या सीधे अनुमति वापस लेना, के बीच अंतर किस आधार पर तय किया जाता है.

अधिक स्पष्टता के लिए द वायर हिंदी ने एनएमसी के सचिव डॉ. राघव लैंगर को विस्तृत सवाल ईमेल के जरिए भेजे हैं. आयोग की प्रतिक्रिया मिलने पर रिपोर्ट को अपडेट किया जाएगा.