नई दिल्ली: नीट पेपर लीक और परीक्षा में कथित अनियमितताओं के खिलाफ देशभर में हुए प्रदर्शनों और केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे के कुछ सप्ताह बाद तमिलनाडु विधानसभा ने बुधवार (11 अगस्त) को नीट की अनिवार्यता खत्म करने की मांग वाला प्रस्ताव सर्वसम्मति से पारित कर दिया है.
इस दौरान मतदान से पहले राज्य के एकमात्र भाजपा विधायक एम. भोजराजन सदन से वॉकआउट किया.
उल्लेखनीय है कि तमिलनाडु सरकार के प्रस्ताव में केंद्र की मोदी सरकार से नीट की अनिवार्यता खत्म करने और राज्यों को कक्षा 12वीं के अंकों के आधार पर मेडिकल कॉलेजों में दाखिला देने की अनुमति देने के लिए संबंधित कानूनों में संशोधन करने का आग्रह किया गया है.
इसके लिए सरकार ने नीट की तैयारी करने वाले छात्रों और उनके परिवारों पर पड़ने वाले महंगे कोचिंग के खर्च को भी इसके प्रमुख कारणों में शामिल किया है.
इस प्रस्ताव में नीट-यूजी पेपर लीक और परीक्षा से जुड़ी अन्य विफलताओं, परीक्षा रद्द किए जाने और इसके बाद हुए छात्र प्रदर्शनों का उल्लेख करते हुए कहा गया है कि इन घटनाओं ने छात्रों को ‘अकल्पनीय मानसिक पीड़ा’ दी.
मालूम हो कि तमिलनाडु विधानसभा ने 2021 में भी नीट परीक्षा के खिलाफ इसी तरह का एक प्रस्ताव पारित किया था, जिसमें शिक्षा और प्रवेश परीक्षाओं के केंद्रीयकरण का कड़ा विरोध किया गया था.
तब राज्य विधानसभा ने ‘तमिलनाडु स्नातक चिकित्सा डिग्री पाठ्यक्रमों में प्रवेश विधेयक, 2021′ पारित किया था, जिसका उद्देश्य राज्य के छात्रों के लिए राष्ट्रीय पात्रता सह प्रवेश परीक्षा नीट के आधार पर चिकित्सा प्रवेश को रोकना था. हालांकि इसे राष्ट्रपति की मंजूरी नहीं मिली थी.
इसके बाद तमिलनाडु सरकार ने सुप्रीम कोर्ट का भी रुख किया था, जहां राष्ट्रपति के उस विधेयक को मंज़ूरी न दिए जाने के फैसले को चुनौती दी गई थी. सरकार का कहना था कि नीट शहरी, संपन्न, सीबीएसई से शिक्षित छात्रों के लिए फायदेमंद है, जबकि ग्रामीण पृष्ठभूमि के वंचित छात्रों के लिए नुकसानदेह है, जो सरकारी और ज़्यादातर तमिल माध्यम के स्कूलों में पढ़े हैं.
मालूम हो कि संविधान के तहत शिक्षा समवर्ती सूची में आती है, और इसलिए राज्य का कानून केंद्रीय कानून के विपरीत होने पर राष्ट्रपति की मंजूरी के बाद ही प्रभावी हो सकता है.
बुधवार को प्रस्ताव पेश करते हुए तमिलनाडु के स्वास्थ्य, चिकित्सा शिक्षा और परिवार कल्याण मंत्री केजी अनुराग ने केंद्र से राष्ट्रीय चिकित्सा आयोग अधिनियम, 2019 और अन्य संबंधित कानूनों में संशोधन करने की मांग की.
उन्होंने कहा कि राज्यों को केंद्रीय परीक्षा के बजाय कक्षा 12 के अंकों के आधार पर मेडिकल कॉलेजों में सीटें भरने की अनुमति दी जानी चाहिए.
प्रस्ताव में कहा गया कि तमिलनाडु लंबे समय से नीट को सामाजिक न्याय, समानता और संघवाद के सिद्धांतों के खिलाफ मानता रहा है. क्योंकि नीट ने छात्रों के बीच समान अवसर पर असर डाला है, खासकर उन छात्रों के लिए जिनकी पढ़ाई का माध्यम तमिल रहा है.
द हिंदू के अनुसार, प्रस्ताव में कहा गया, ‘अब छात्र की उच्च शिक्षा की दिशा 12 साल की स्कूली शिक्षा के बजाय एक दिन की परीक्षा तय करती है.’
