तेलंगाना एसआईआर: चुनाव आयोग ने सरकार के नए प्रमाणपत्र को ख़ारिज किया, 74 लाख मतदाताओं पर संकट

तेलंगाना में एसआईआर प्रक्रिया के दौरान समयसीमा तक 74 लाख गणना प्रपत्र जमा नहीं हो सके हैं, जिससे इन मतदाताओं के संशोधित मतदाता सूची से बाहर होने का खतरा पैदा हो गया है. चुनाव आयोग ने तेलंगाना सरकार की ओर से करीब दो सप्ताह पहले शुरू किए गए एफआरसी को राशन कार्ड के समान बताते हुए एसआईआर के तहत इसे मान्य दस्तावेज़ के रूप में स्वीकार करने से इनकार कर दिया है.

तेलंगाना में एसआईआर को लेकर जारी पोस्टर. (फोटो: एक्स/@ceo_telangana)

हैदराबाद: चुनाव आयोग ने तेलंगाना सरकार की ओर से करीब दो सप्ताह पहले शुरू किए गए फैमिली रजिस्टर सर्टिफिकेट (एफआरसी) को राज्य में मतदाता सूची के चल रहे विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) के तहत मतदाताओं के सत्यापन के लिए मान्य दस्तावेज़ मानने से इनकार कर दिया है.

चुनाव आयोग ने कहा है कि एफआरसी, राज्य सरकार की ओर से जारी किए जाने वाले फैमिली मेंबर सर्टिफिकेट (एफएमसी) से अलग है, क्योंकि एफआरसी राशन कार्ड के आंकड़ों से डिजिटल तरीके से निकाली गई जानकारी पर आधारित है.

आयोग ने कहा कि एफएमसी जारी करने से पहले दस्तावेज़ों की जांच और स्थानीय स्तर पर पूछताछ समेत सत्यापन की प्रक्रिया की जाती थी.

उल्लेखनीय है कि तेलंगाना सरकार ने एसआईआर के तहत मतदाताओं को अपने भरे हुए नामांकन फॉर्म बूथ लेवल अधिकारियों (बीएलओ) को जमा करने की 3 अगस्त की समयसीमा से महज एक सप्ताह पहले, 25 जुलाई को जल्दबाजी में एफआरसी शुरू करने का आदेश जारी किया था.

सरकार की इस जल्दबाज़ी और नए प्रमाणपत्र को लाने के पीछे यह आशंका जताई गई थी कि मतदाता सूची के पुनरीक्षण और सत्यापन की प्रक्रिया के दौरान लाखों मतदाताओं के नाम हट सकते हैं.

हालांकि, बाद में फॉर्म जमा करने की अंतिम तारीख बढ़ाकर 10 अगस्त कर दी गई थी. यह इस समयसीमा का दूसरा विस्तार था. दावे और आपत्तियां दर्ज कराने की प्रक्रिया 10 अगस्त से 9 सितंबर तक चलेगी.

नए प्रमाणपत्र का भाजपा ने किया विरोध

इस घटनाक्रम के बाद भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) ने चुनाव आयोग के समक्ष एफआरसी के खिलाफ याचिका दायर की. पार्टी ने आरोप लगाया कि एसआईआर की प्रक्रिया के बीच में एफआरसी इसलिए शुरू किया गया ताकि अपात्र मतदाताओं को संरक्षण दिया जा सके.

तेलंगाना हाईकोर्ट में भी कई रिट याचिकाएं दायर कर एफआरसी की वैधता को चुनौती दी गई है. याचिकाओं में कहा गया है कि कल्याणकारी योजनाओं से जुड़े डेटाबेस को मतदाता पात्रता तय करने का आधार नहीं बनाया जा सकता.

मालूम हो कि तेलंगाना में एसआईआर की प्रक्रिया 25 जून से शुरू हुई थी. शुरुआत में मतदाताओं को 24 जुलाई तक बीएलओ को अपनी जानकारी देनी थी. बाद में यह समयसीमा बढ़ाकर 3 अगस्त और फिर 10 अगस्त कर दी गई थी.

एसआईआर की प्रक्रिया के बीच, 25 जुलाई को जारी सरकारी आदेश में कहा गया था कि सेवाओं की आपूर्ति को आसान बनाने, परिवार से जुड़ी जानकारियों के सत्यापन में एकरूपता सुनिश्चित करने और आसानी से उपलब्ध रिकॉर्ड मुहैया कराने के उद्देश्य से एफआरसी शुरू करने का फैसला लिया गया है.

सरकार ने तब कहा था, ‘ये प्रमाणपत्र नागरिक सेवाओं के मी-सेवा प्लेटफॉर्म के जरिए आवेदन करने के दो दिनों के भीतर 62 रुपये के मामूली शुल्क पर जारी किए जाएंगे.’

इस कदम का ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन (आईएमआईएम) ने फौरन स्वागत किया था. पार्टी का कहना था कि इससे बड़ी संख्या में गरीब और दस्तावेज़ों से वंचित लोगों को फायदा होगा.

हालांकि, भाजपा ने आरोप लगाया कि कांग्रेस सरकार ऐसे प्रमाणपत्र देकर हैदराबाद में रह रहे बड़ी संख्या में रोहिंग्या, बांग्लादेशी और पाकिस्तानियों को वैध बनाने की कोशिश कर रही है.

तेलंगाना की स्थिति कुछ अलग

ज्ञात हो कि एफआरसी उन 12 दस्तावेज़ों में शामिल है, जिन्हें चुनाव आयोग ने पात्र मतदाताओं के सत्यापन के लिए अधिसूचित किया है. तेलंगाना में स्थायी निवास प्रमाणपत्र और राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर (एनआरसी) लागू नहीं हैं. हालांकि, इन्हें दस्तावेज़ों की सूची में शामिल किया गया है.

2014 में तेलंगाना के गठन से पहले अविभाजित आंध्र प्रदेश सरकार राजस्व विभाग की ओर से 25 जुलाई, 2013 को जारी एक ज्ञापन के आधार पर एफएमसी जारी करती थी.

एफएमसी के सत्यापन की प्रक्रिया उस समय शुरू होती थी, जब कोई व्यक्ति तत्कालीन मंडल राजस्व अधिकारी (एमआरओ) के समक्ष आवेदन करता था. तेलंगाना के गठन के बाद राज्य सरकार ने 25 जुलाई के हालिया सरकारी आदेश तक नए एफआरसी जारी नहीं किए थे.

नए आदेश के तहत मी-सेवा केंद्रों के जरिए प्रमाणपत्र जारी करने की प्रक्रिया को आसान बनाया गया. अब ये प्रमाणपत्र फूड सिक्योरिटी कार्ड यानी राशन कार्ड के आंकड़ों से डिजिटल रूप से निकाली गई जानकारी के आधार पर जारी किए जा रहे थे. इसमें स्वतंत्र सत्यापन की कोई प्रक्रिया शामिल नहीं थी.

इसी पृष्ठभूमि में एआईएमआईएम के अध्यक्ष और हैदराबाद से सांसद असदुद्दीन ओवैसी ने मुख्य निर्वाचन अधिकारी सी. सुदर्शन रेड्डी से मुलाकात की थी.

उन्होंने एक ज्ञापन सौंपकर मांग की थी कि राज्य में एसआईआर के लिए निर्धारित तीन दस्तावेज़ों की कमी को पूरा करने के लिए ड्राइविंग लाइसेंस, आयकर विभाग की ओर से जारी स्थायी खाता संख्या (पैन) और फूड सिक्योरिटी कार्ड (राशन कार्ड) को वैकल्पिक दस्तावेज़ के तौर पर स्वीकार किया जाए.

हालांकि, चुनाव अगोग ने उनकी मांग खारिज कर दी. आयोग ने कहा कि स्थायी निवास प्रमाणपत्र और राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर कुछ विशेष कारणों से केवल कुछ राज्यों तक सीमित हैं. वहीं, तेलंगाना में पहले से एफएमसी जारी किए जाते हैं, जिनमें एफआरसी की सभी विशेषताएं मौजूद हैं.

इस संबंध में तेलंगाना के अतिरिक्त मुख्य निर्वाचन अधिकारी वसम वेंकटेश्वर रेड्डी ने द वायर को बताया कि चुनाव आयोग ने एफआरसी को यह कहते हुए खारिज कर दिया है कि यह राशन कार्ड के बराबर है और इसे एसआईआर के तहत निर्धारित दस्तावेज़ के रूप में स्वीकार नहीं किया जाएगा.

बड़ी संख्या में मतदाताओं के नाम हटने का खतरा

वहीं, तेलंगाना सरकार के अल्पसंख्यक मामलों के सलाहकार मोहम्मद अली शब्बीर ने द वायर को बताया कि सरकार चुनाव आयोग के समक्ष एफआरसी को खारिज करने के फैसले पर दोबारा विचार करने की मांग करेगी.

उन्होंने कहा कि अगर एफआरसी को स्वीकार नहीं किया गया तो बड़ी संख्या में ऐसे लोगों का मतदान का अधिकार प्रभावित हो सकता है, जिनके नाम एसआईआर के दौरान हटाए जाने का खतरा है.

उन्होंने कहा कि चुनाव आयोग के रिकॉर्ड के मुताबिक 10 अगस्त को फॉर्म जमा करने की समयसीमा खत्म होने तक करीब 74 लाख यानी 21.7% मतदाताओं के गणना प्रपत्र जमा नहीं हो सके थे. उन्होंने कहा कि अगर एफआरसी को स्वीकार कर लिया जाता है तो इस श्रेणी में आने वाले कई लोगों को मतदाता सूची में शामिल किया जा सकता है.

शब्बीर ने आगे कहा कि सरकार की प्राथमिकता कानूनी विकल्प तलाशने से पहले चुनाव आयोग से संपर्क करने की होगी.

इस मामले पर आयोग ने तेलंगाना के मुख्य निर्वाचन अधिकारी की ओर से एफआरसी को लेकर मार्गदर्शन मांगे जाने के बाद अपना स्पष्टीकरण जारी किया है.

आयोग के सचिव नवीन कुमार ने अपने आदेश में कहा कि एफआरसी राशन कार्ड के बराबर है और राशन कार्ड को नागरिकता या मतदाता सूची में नाम जोड़ने की पात्रता का निर्णायक प्रमाण नहीं माना जा सकता.

आयोग ने कहा कि चूंकि एफआरसी पूरी तरह राशन कार्ड के डेटाबेस पर आधारित है, इसलिए इसे पासपोर्ट या जन्म प्रमाणपत्र जैसे प्राथमिक नागरिकता और पहचान संबंधी दस्तावेज़ों के विकल्प के तौर पर इस्तेमाल नहीं किया जा सकता.

आदेश में कहा गया है कि पुरानी व्यवस्था के तहत एफएमसी तहसीलदारों (जिन्हें पहले मंडल राजस्व अधिकारी कहा जाता था) की ओर से क्षेत्रीय स्तर पर पूछताछ और सहायक दस्तावेज़ों के सत्यापन के बाद ही जारी किए जाते थे. वहीं, नई व्यवस्था के तहत प्रमाणपत्र कथित तौर पर बिना किसी पूर्व क्षेत्रीय सत्यापन के मुख्य रूप से राशन कार्ड के आंकड़ों के आधार पर ऑनलाइन दो दिनों के भीतर जारी किए जा रहे हैं.

आयोग का इनकार

गौरतलब है कि इस संबंध में आयोग का कहना है कि ऐसे प्रमाणपत्र प्रभावी तौर पर राशन कार्ड के बराबर हैं. सुप्रीम कोर्ट के पिछले फैसलों का हवाला देते हुए आयोग ने कहा कि राशन कार्ड नागरिकता का निर्णायक प्रमाण नहीं है और इसलिए इसे मतदाता सूची के सत्यापन के लिए आधिकारिक दस्तावेज़ नहीं माना जा सकता.

आयोग के सचिव ने बताया, ‘25 जुलाई, 2026 का एफआरसी केवल राशन कार्ड के बराबर माना जा सकता है और इसलिए एसआईआर के तहत सत्यापन प्रक्रिया के दौरान इसे निर्धारित दस्तावेज़ों में से एक के तौर पर स्वीकार नहीं किया जा सकता. हालांकि, 25 जुलाई, 2026 से पहले पुरानी व्यवस्था (25 जून, 2013 के ज्ञापन) के तहत जारी किया गया फैमिली मेंबर सर्टिफिकेट एसआईआर के तहत सत्यापन प्रक्रिया में स्वीकार किया जाएगा.’

आयोग के फैसले का स्वागत करते हुए भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष एन. रामचंदर राव ने द वायर से कहा कि एसआईआर की प्रक्रिया में मतदाताओं को शामिल करने के लिए राज्य सरकार की ‘दुर्भावनापूर्ण मंशा’ को सबसे पहले भाजपा ने ही उजागर किया था.

उन्होंने आरोप लगाया कि यह उन लोगों को सुविधा देने की सुनियोजित कोशिश थी, जिनके पास निर्धारित 12 दस्तावेज़ों में से कोई भी दस्तावेज़ नहीं है. वहीं, उन्होंने कहा कि वास्तविक मतदाताओं के पास इन 12 दस्तावेज़ों में से कोई न कोई पहचान प्रमाण जरूर होता है.

उन्होंने कहा कि एफआरसी पहचान का प्रमाण नहीं है, इसका इस्तेमाल सब्सिडी वाला चावल जैसी सरकारी सुविधाएं हासिल करने के लिए किया जाता है. इसका पहचान साबित करने या मतदाता सूची में नाम दर्ज कराने के लिए इस्तेमाल नहीं किया जा सकता. उन्होंने आरोप लगाया कि यह कदम एआईएमआईएम के प्रभाव वाले इलाकों में फर्जी मतदाताओं को मतदाता सूची में शामिल करने में मदद करने के उद्देश्य से उठाया गया था.

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