नई दिल्ली: नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (कैग) ने गुरुवार (13 अगस्त) को संसद में पेश की गई रिपोर्ट के अनुसार, ग्रीन इंडिया मिशन अपने निर्धारित लक्ष्य से 97.57% पीछे रह गया है. मिशन के तहत जहां 14 लाख हेक्टेयर (1.4 मिलियन हेक्टेयर) क्षेत्र में वन क्षेत्र बढ़ाने का लक्ष्य रखा गया था, वहीं वास्तव में केवल 0.03409 मिलियन हेक्टेयर क्षेत्र में ही बढ़ाया जा सका.
न्यू इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के अनुसार, पिछले एक दशक में वनीकरण कार्यक्रम के अपने लक्ष्यों से काफी पीछे रहने के प्रमुख कारणों में खराब योजना, कमजोर समन्वय और लगातार धन की कमी शामिल हैं.
कैग ने अपनी रिपोर्ट के लिए 2015-16 से 2024-25 के बीच 16 राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों में ग्रीन इंडिया मिशन की जांच की. पर्यावरण मंत्रालय द्वारा संचालित इस योजना का उद्देश्य वन और वृक्ष आवरण का विस्तार करना, पारिस्थितिकी तंत्र से मिलने वाली सेवाओं में सुधार करना और वन-आधारित आजीविका को बढ़ावा देना है.
रिपोर्ट में कहा गया कि कार्यक्रम अन्य वनीकरण पहल जैसे सीएएमपीए और ग्रामीण रोजगार गारंटी कार्यक्रम मनरेगा के साथ-साथ नगर वन योजना और स्कूल नर्सरी योजना सहित योजनाओं के साथ समन्वय की कमी के कारण प्रभावित हुआ, जो एक-दूसरे के साथ समन्वित तरीके से संचालित होने के बजाय अलग-अलग काम करती रहीं.
कैग ने यह भी पाया कि परियोजना क्षेत्रों के चयन में नीचे से ऊपर की ओर यानी स्थानीय स्तर से योजना बनाने का दृष्टिकोण नहीं अपनाया गया. कई बार ऐसे क्षेत्रों को चुना गया, जहां जलवायु संबंधी जोखिम कम या मध्यम था, जबकि अधिक संवेदनशील क्षेत्रों को प्राथमिकता दी जानी चाहिए थी.
ऑडिटर ने मिशन के खराब प्रदर्शन के कारणों में बजट से जुड़ी समस्याओं को भी प्रमुखता से उठाया है.
कैग के अनुसार, योजना के शुरुआती चार वर्षों के लिए 12वीं पंचवर्षीय योजना के तहत आर्थिक मामलों की मंत्रिमंडलीय समिति (सीसीईए) ने 2,000 करोड़ रुपये के खर्च को मंजूरी दी थी. इसके अलावा राज्यों के हिस्से के लिए 13वें वित्त आयोग के अनुदान से 400 करोड़ रुपये उपलब्ध कराए जाने थे.
लेकिन योजना के 2015-16 से 2024-25 तक के दस वर्षों के कार्यान्वयन के दौरान बजटीय सहायता के रूप में केवल 1,149.14 करोड़ रुपये, यानी स्वीकृत राशि का महज 47.88 प्रतिशत, ही प्राप्त हुआ.
रिपोर्ट में यह भी पाया गया कि आठ राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों ने वार्षिक लेखा (Annual Accounts) तैयार ही नहीं किए. कुछ जगहों पर लेखा तैयार किए गए, लेकिन वे अक्सर ऑडिट के बिना रह गए या सहायक रिकॉर्ड के मुकाबले उनमें विसंगतियां पाई गईं.
कैग रिपोर्ट ने इस तथ्य पर भी प्रकाश डाला कि मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ को छोड़कर किसी भी राज्य ने 2015-2025 के दौरान कार्बन पृथक्करण का कोई आकलन नहीं किया.
ऑडिट में यह भी सामने आया कि सत्यापित न किए गए केएमएल फाइलों के इस्तेमाल के कारण आंकड़ों को बढ़ा-चढ़ाकर पेश किया गया और उपलब्धियां वास्तविकता से अधिक दिखाई गईं. वहीं, जीआईएस विश्लेषण से पता चला कि जिन जगहों की नमूना लेकर जांच की गई, उनमें से 70 प्रतिशत स्थलों पर ग्रीन इंडिया मिशन के कारण कोई उल्लेखनीय बदलाव दिखाई नहीं दिया.
