महाराष्ट्र: बॉम्बे हाईकोर्ट के आदेश के बाद महाराष्ट्र लॉ सीईटी (कॉमन एंट्रेंस टेस्ट) के सेंट्रलाइज्ड एडमिशन प्रोसेस (कैप) राउंड में अब सभी सरकारी लॉ कॉलेजों को शामिल कर लिया गया है. राज्य के सीईटी सेल ने दाखिले के लिए आवेदन की अंतिम तारीख भी बढ़ा दी है.
इससे पहले बार काउंसिल ऑफ इंडिया (बीसीआई) की मंजूरी नहीं मिलने के कारण कई सरकारी कॉलेजों को कैप राउंड की सूची से बाहर कर दिया गया था. कोर्ट के आदेश के बाद इन सभी कॉलेजों को दोबारा सूची में शामिल किया गया है.
महाराष्ट्र में लॉ सीईटी 2026 के पहले कैप राउंड में करीब 200 सरकारी लॉ कॉलेजों के नाम सूची से हटा दिए गए थे. इससे हजारों छात्र प्रभावित हुए और उन्हें अपनी पसंद के कॉलेज चुनने का विकल्प नहीं मिल पाया. लॉ सीईटी के तहत तीन वर्षीय एलएलबी और पांच वर्षीय एलएलबी पाठ्यक्रमों में दाखिला दिया जाता है.
महाराष्ट्र में कानून की पढ़ाई के लिए राज्य स्तर पर लॉ सीईटी परीक्षा आयोजित की जाती है. इसके जरिए सरकारी और अन्य मान्यता प्राप्त कॉलेजों में दाखिला होता है. लॉ कॉलेजों को मान्यता बीसीआई से मिलती है. इसके लिए कॉलेजों को तय मानकों को पूरा करना होता है, जिनमें पर्याप्त बुनियादी ढांचा और छात्रों के अनुपात में शिक्षकों की उपलब्धता शामिल है. कॉलेजों को हर साल निर्धारित शुल्क भी जमा करना होता है. इन मानकों का पालन नहीं होने पर बीसीआई कॉलेज की मान्यता या अप्रूवल पर रोक लगा सकती है.
इस पूरे मामले में छात्रों को किन परेशानियों का सामना करना पड़ा, यह जानने के लिए हमने कुछ छात्रों से बात की.
‘पसंद के कॉलेज ही सूची में नहीं थे’
महाराष्ट्र के जलगांव जिले के छात्र मोहम्मद ज़य्यान ने इसी साल लॉ सीईटी की परीक्षा दी है. वह बताते हैं कि पहले कैप राउंड की शुरुआत के बाद जब वह अपने साथियों के साथ दाखिले के लिए फॉर्म भर रहे थे, तब उन्हें पता चला कि पूरे महाराष्ट्र में तीन वर्षीय और पांच वर्षीय एलएलबी को मिलाकर 235 से अधिक लॉ कॉलेज हैं.
ज़य्यान आगे बताते हैं कि कैप राउंड के दौरान छात्रों को अपनी पसंद के कॉलेजों की प्राथमिकता देनी होती है. इसके बाद उनके अंकों के आधार पर उन्हें कॉलेज आवंटित किया जाता है. इस बार पहले कैप राउंड की शुरुआत के बाद 5 अगस्त को छात्रों को अपनी कॉलेज प्राथमिकताएं भरनी थीं. लेकिन जब उन्होंने अपनी पसंद के कॉलेज चुनने की कोशिश की, तो उनमें से कई कॉलेज सूची में थे ही नहीं.
वह उदाहरण देते हुए कहते हैं कि नॉर्थ महाराष्ट्र यूनिवर्सिटी (एनएमयू) के तहत तीन-चार जिलों के कॉलेज आते हैं, लेकिन इनमें से सिर्फ दो कॉलेजों के नाम सूची में शामिल थे.
ज़य्यान के मुताबिक, एसएस मनियार लॉ कॉलेज छात्रों की पसंद में प्रमुख था, लेकिन उसे भी उस समय बीसीआई की मंजूरी नहीं मिली थी. उनका कहना है कि उत्तर महाराष्ट्र क्षेत्र में इस वजह से बड़ी संख्या में छात्र प्रभावित हुए.
इसके उलट मुंबई और पुणे जैसे बड़े शहरों में एक विश्वविद्यालय के तहत कई लॉ कॉलेज आते हैं. ऐसे में कुछ कॉलेज सूची में शामिल होने से रह भी जाएं तो छात्रों के पास विकल्प होते हैं. लेकिन ग्रामीण क्षेत्रों में, खासकर विश्वविद्यालयों से संबद्ध सरकारी लॉ कॉलेजों की संख्या पहले ही कम है और उनमें से भी कई को बीसीआई की मंजूरी नहीं मिली है.
महाराष्ट्र के लातूर जिले की एक अन्य छात्रा माही बियानी बताती हैं कि जुलाई के मध्य में शुरू हुई कैप राउंड प्रक्रिया के दौरान बार-बार दस्तावेज सत्यापन की तारीखें बढ़ाई गईं. अगस्त की शुरुआत में जब कॉलेजों की प्राथमिकता सूची भरने का विकल्प आया, तो उसमें जीएलसी (मुंबई), रिज़वी कॉलेज और लातूर के दयानंद लॉ कॉलेज जैसे प्रमुख कॉलेज शामिल नहीं थे.
माही बताती हैं कि कम कॉलेज उपलब्ध होने के कारण उन्होंने यह सोचकर उपलब्ध विकल्पों में से 14 कॉलेज चुने कि कम सीटों की वजह से आईएलएस (पुणे) में दाखिले के लिए प्रतिस्पर्धा और कट-ऑफ बढ़ सकती है. उन्होंने फॉर्म लॉक कर दिया. हालांकि, बाद में सिस्टम में सभी प्रमुख कॉलेज अचानक जोड़ दिए गए और लॉक किया हुआ फॉर्म अपने आप अनलॉक हो गया.
माही को अंतिम दिन सुबह एसएमएस के जरिए फॉर्म अनलॉक होने की जानकारी मिली. उनका कहना है कि अगर वह समय रहते दोबारा फॉर्म लॉक नहीं करतीं, तो वह पूरी दाखिला प्रक्रिया से बाहर हो सकती थीं.
सीईटी सेल की ‘अव्यवस्था’ से छात्रों का भविष्य प्रभावित होने का आरोप
लातूर में ‘लॉ ट्यूटर अकेडमी’ नाम से कोचिंग चलाने वाले अधिवक्ता अजिंक्य निकम के अनुसार, सीईटी सेल पिछले कुछ वर्षों से परीक्षा की तारीखों, परीक्षा केंद्रों और बीसीआई की मंजूरी के बीच समन्वय को लेकर लगातार अक्षम साबित हुआ है. उनका कहना है कि इस साल बीसीआई की मंजूरी में देरी के कारण लातूर के दयानंद लॉ कॉलेज जैसे कई प्रमुख जिला स्तर के कॉलेज पहले दिन कैप पोर्टल पर शामिल नहीं हो सके. इससे छात्रों में घबराहट और मानसिक तनाव बढ़ा.
निकम बताते हैं कि बॉम्बे हाईकोर्ट के हस्तक्षेप के बाद आवेदन की तारीखें कई बार बढ़ाई गईं और कुछ कॉलेजों को पोर्टल पर जोड़ा गया. हालांकि, 9 अगस्त या उससे पहले जिन छात्रों ने अपने फॉर्म लॉक कर दिए थे, सीईटी सेल ने उन्हें बिना किसी पूर्व सूचना के सिस्टम में अनलॉक कर दिया. छात्रों को इसकी जानकारी सिर्फ एक सामान्य एसएमएस के जरिए दी गई. उनका कहना है कि अगर कोई छात्र समय रहते दोबारा फॉर्म लॉक नहीं करता, तो वह पूरी दाखिला प्रक्रिया से बाहर हो सकता था.
निकम के मुताबिक, सीईटी सेल की इस अव्यवस्था से छात्रों का भविष्य प्रभावित हो रहा है. उनका कहना है कि इससे आगे भी कानूनी याचिकाएं दायर होने की स्थिति बन सकती है और शैक्षणिक सत्र में और देरी हो सकती है.
बता दें कि 3 अगस्त को बॉम्बे हाईकोर्ट ने कुछ लॉ कॉलेजों की ओर से दायर याचिका पर सुनवाई करते हुए सीईटी सेल को निर्देश दिया था कि बार काउंसिल की फीस जमा करने के बावजूद पोर्टल से बाहर रखे गए कॉलेजों और उनके डिवीजनों को अंतरिम आधार पर तुरंत कैप पोर्टल में शामिल किया जाए, ताकि छात्रों की दाखिला प्रक्रिया प्रभावित न हो.
कोर्ट के इस निर्देश के बाद सीईटी सेल ने कॉलेजों की प्राथमिकता सूची भरने की अंतिम तारीख 5 अगस्त से बढ़ाकर 7 अगस्त कर दी थी. इसे बाद में 9 अगस्त और फिर 11 अगस्त तक बढ़ाया गया. हाईकोर्ट के निर्देश का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना था कि बार काउंसिल की मंजूरी में हुई प्रशासनिक देरी के कारण किसी छात्र का शैक्षणिक वर्ष या भविष्य प्रभावित न हो.
इस पूरे मामले में बीसीआई का पक्ष जानने के लिए उनसे संपर्क करने की कोशिश की. हालांकि, कई बार फोन करने के बावजूद कोई जवाब नहीं मिला.
वहीं, महाराष्ट्र राज्य सीईटी सेल से संपर्क करने पर जनसंपर्क अधिकारी वीएम मलाले से बात हुई. उनके अनुसार, सीईटी सेल ने अपनी आधिकारिक वेबसाइट पर सभी जरूरी नोटिस पहले ही जारी कर दिए थे. उन्होंने कहा कि दाखिला प्रक्रिया में देरी की मुख्य वजह यह है कि लॉ कॉलेजों को हर साल बीसीआई को निर्धारित फीस जमा कर मंजूरी लेनी होती है, लेकिन कई कॉलेजों ने समय पर फीस जमा नहीं की.
मलाले के मुताबिक, नियम के तहत बीसीआई से मंजूरी मिलने के बाद संबंधित कॉलेज की फाइल विश्वविद्यालय और फिर उच्च शिक्षा निदेशालय (डीएचई) से मंजूर होकर सीईटी सेल के पास आती है. इसके बाद ही कॉलेज को दाखिला प्रक्रिया में शामिल किया जाता है.
उन्होंने बताया कि जैसे-जैसे कॉलेजों ने बीसीआई की फीस जमा कर मंजूरी हासिल की, उन्हें कैप पोर्टल की सूची में शामिल किया गया. उनके अनुसार, 5 अगस्त से 11 अगस्त के बीच करीब 130 नए कॉलेज कैप सेक्शन में जोड़े गए. इनमें तीन वर्षीय एलएलबी के 70 और पांच वर्षीय एलएलबी के 60 कॉलेज शामिल हैं.
जिन कॉलेजों को पहले कैप राउंड में शामिल नहीं किया गया था, यानी जिन्हें उस समय बीसीआई की मंजूरी नहीं मिली थी, उनका पक्ष जानने के लिए भी हमने संपर्क किया.
जलगांव के एसएस मनियार लॉ कॉलेज के जनसंपर्क विभाग के एक अधिकारी ने बताया कि शुरुआत में उनके कॉलेज को बीसीआई की मंजूरी नहीं मिली थी, हालांकि अब उसका नाम सूची में शामिल है. जब उनसे पूछा कि पहले कॉलेज का नाम सूची में क्यों नहीं था और इसके पीछे क्या वजह थी, तो उन्होंने इस मामले पर टिप्पणी करने से इनकार कर दिया.
बीसीआई की मंजूरी में देरी का नुकसान छात्रों को न हो: हाईकोर्ट
फिलहाल, बॉम्बे हाईकोर्ट ने अपने आदेश में कहा है कि बीसीआई और लॉ कॉलेजों के बीच मंजूरी से जुड़े विवाद या प्रक्रिया की देरी का नुकसान किसी छात्र को नहीं होना चाहिए.
यह आदेश बॉम्बे हाईकोर्ट की औरंगाबाद पीठ के जस्टिस नितिन बी. सूर्यवंशी और जस्टिस आबासाहेब डी. शिंदे की पीठ ने दिया है. यह याचिका ‘पीपल एजुकेशन सोसाइटी, मुंबई’ के अध्यक्ष आनंदराज वाई. आंबेडकर की ओर से बीसीआई, महाराष्ट्र सीईटी सेल और अन्य प्रतिवादियों के खिलाफ दायर की गई थी.
मामला यह था कि बीसीआई की ओर से समय पर निरीक्षण और संबद्धता से जुड़ी प्रक्रिया पूरी नहीं होने के कारण सीईटी सेल ने संबंधित लॉ कॉलेज का नाम दाखिले के लिए सेंट्रलाइज्ड एडमिशन प्रोसेस (कैप) पोर्टल पर शामिल नहीं किया था.
अदालत ने मामले पर विचार करते हुए कॉलेज को अंतरिम राहत दी और बीसीआई तथा सीईटी सेल को निर्देश दिया कि चालू कैप राउंड में कॉलेज का नाम अनंतिम आधार पर तुरंत पोर्टल पर शामिल किया जाए, ताकि छात्र उसे अपनी पसंद के विकल्प के तौर पर चुन सकें.
अदालत ने मामले में नोटिस जारी करते हुए अगली सुनवाई के लिए 31 अगस्त 2026 की तारीख तय की है. साथ ही, कॉलेज को चार सप्ताह के भीतर बीसीआई के नियमों का पालन करने और इसके बाद बीसीआई को तीन महीने के भीतर निरीक्षण की प्रक्रिया पूरी करने का निर्देश दिया गया है.
(लेखक स्वतंत्र पत्रकार हैं.)
