दिनेश श्रीनेत की पांच कहानियों का संग्रह ‘विज्ञापन वाली लड़की’ बीते दिनों भावना प्रकाशन से आया है. ये पांचों कहानियां एक-दूसरे से भिन्न हैं, मगर जिन धागों से ये बुनी हुई हैं, वे लगभग एक ऐसे लगते हैं. ये सब कहानियां बेहद संवेदनशील चरित्रों की कहानियां हैं- ऐसे चरित्रों की जो अपने अतीत में बार-बार लौटते हैं- बल्कि उसी में जीते हैं- और उसे वर्तमान पर इस कदर हावी हो जाने देते हैं कि उनका सहज ढंग से जीना संभव नहीं रहता- कभी वे काल्पनिक स्थितियों में जीने लगते हैं जो जानलेवा हदों तक चली जाती हैं, कभी आत्महत्या की ओर बढ़ते दिखाई देते हैं और कभी विखंडित व्यक्तित्वों की तरह सामने आते हैं.
कहीं उन पर सपने हावी होते हैं, कहीं उन पर कविता तारी होती है, कभी वे एक अनकहे प्रेम का पीछा करते मिलते हैं. जाहिर है, ये सामान्य चरित्र नहीं हैं. कहीं मां की याद, कहीं पिता की स्मृति, कहीं प्रेमिका का खयाल- इन्हीं के बीच के द्वंद्व से बनती हैं ये कहानियां.
बल्कि यह खयाल भी आता है कि इन कहानियों के चरित्र समाज में घूमते तो हैं लेकिन समाज से उठाए हुए नहीं हैं- या अगर उठाए हुए भी हैं तो लेखक का ध्यान उनके बाहरी स्वरूप तय करने से ज़्यादा उनकी अंदरूनी बुनावट को पकड़ने में लगा रहता है. इन कहानियों में आने वाले ज़्यादातर चरित्र ‘वह’, ‘तुम’ या ‘मैं’ जैसे सर्वनामों से बनते हैं, उनकी व्यक्तिवाचक संज्ञाएं या तो बहुत धुंधली हैं और अगर कहीं हैं भी तो इस तरह कि उन पर ध्यान नहीं जाता.
इसी तरह इन कहानियों का देशकाल भी नहीं मिलता. कुछ कहानियों में मेट्रो का ज़िक्र है, यमुना है और कुछ इशारे हैं जिनसे पता चलता है कि यह दिल्ली है. एक कहानी में एनएच-24 चला आता है जिससे फिर दिल्ली-नोएडा या ग़ाज़ियाबाद वाले मान सकते हैं कि यह उनके इलाक़े की पृष्ठभूमि है. लेकिन ज़्यादातर कहानियां ‘तेज़ी से बदलते शहर’, ‘मॉल’, ‘जीने’, ‘बरसाती’, ‘बालकनी’, ‘ढलुआं छत’ जैसी जगहों पर घटती हैं.
यह भी साफ नहीं है कि ये कहानियां किस दौर की हैं. एक कहानी में साल 1978 का ज़िक्र ज़रूर आता है, लेकिन ज़्यादातर कहानियां बदलते मौसम, उड़ती धूल, घनघोर बारिश के बीच घटती हैं. बस हम कहानी के माहौल से मान लेते हैं कि सब इसी दौर की- बीते बीस-तीस वर्षों के बीच की कहानियां हैं.
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यह स्पष्ट है कि दिनेश श्रीनेत ने जानबूझकर अपने चरित्रों को एक धुंधली छाया में रखा है- और उनकी स्थानिकता या सामयिकता को भी उनकी निजता के दायरे से बाहर जाने नहीं दिया है. ये कहानियां और उनके किरदार मन की ग्रंथियों की परिक्रमा के बीच बने हैं- उन्हें बाहर देखा तो जा सकता है, समझने के लिए उनके भीतर उतरना पड़ता है.
यहां यह भी जोड़ना ज़रूरी है कि कहानियों में ठोस किरदारों या नियत समय-स्थानों की कोई शर्त नहीं होती. दुनिया की बहुत सारी कहानियां अमूर्तनों के बीच बनती हैं और पाठकों और आलोचकों के बीच बहुप्रशंसित होती हैं. निस्संदेह ऐसी कहानियों के पाठ की कसौटी सामाजिक माहौल में लिखी जाने वाली कहानियों से अलग होगी.
तो दिनेश श्रीनेत की ये कहानियां हम क्यों पढ़ें? या इस सवाल को कुछ दूसरे ढंग से पूछना लेखक के साथ ज़्यादा न्याय करना होगा. आख़िर जिन कहानियों में हमें ठोस किरदार नहीं मिल रहे, उनका पता नहीं मिल रहा, उनका समय नहीं मिल रहा, उन्हें फिर भी हम क्यों पढ़ते चले जाते हैं? प्रारंभिक कुछ पंक्तियां या पन्ने पढ़ कर छोड़ क्यों नहीं देते?
क्योंकि इन्हें पढ़ते हुए ही ये एहसास होता है कि इनमें कुछ है जो मूल्यवान है, इनमें वह संवेदना, वह धुकधुकी मिल रही है जो अन्यथा हमारे नितांत यांत्रिक होते समय में लगभग गुम हो चुकी है- बल्कि मार दी गई है. इन चरित्रों में हमारे खोए हुए एहसास मिलते हैं, हमारी उचटी हुई नींदें, हमारे पीछा करते स्वप्न, हमारी छूटी हुई कविताएं और वह बेचैनी मिलती है जो दरअसल जीवन को जीने के आस्वाद से जोड़ती है. बल्कि यहीं से इन चरित्रों की त्रासदी भी शुरू होती है- वे इस नए तेज़ाबी समंदर में पुराने फूलों से बने ऐसे टापू हैं जिन्हें नष्ट हो जाना है- चाहे जान देकर चाहे व्यक्तित्व खोकर.
और अगर हम कुछ संवेदनशीलता के साथ इन कहानियों को पढ़ें तो पाते हैं कि असली त्रासदी इन किरदारों के साथ नहीं, हमारे साथ घट रही है जो बिल्कुल एक संवेदनहीन जीवन जिए जा रहे हैं, कि दरअसल मृत्यु हमारी है, इन चरित्रों की नहीं.
दूसरी बात यह कि दिनेश श्रीनेत के पास बहुत सक्षम भाषा है- एक चाक्षुष भाषा- जिसमें दृश्य को बहुत गहनता से पकड़ना उन्हें आता है. यह खयाल आता है कि कहानियां लिखने से पहले या इन्हीं के बीच और इनसे ज़्यादा दिनेश फिल्मों पर बहुत संवेदनशील टिप्पणियां लिखते रहे हैं- बल्कि इनकी प्रारंभिक कीर्ति उनकी सिने-आलोचना से बनी है. इस ओर ध्यान दिलाने का मक़सद यह बताना है कि दृश्यों के प्रति दिनेश बहुत संवेदनशील हैं. ऐसा नहीं कि वे किसी ‘सुंदर’ भाषा में बाहर के माहौल का वर्णन करते हैं, बल्कि वे बिंबों के सहारे उस कविता तक पहुंचना चाहते हैं जो किसी दृश्य से बन रही है और जो मन को इस तरह मथ रही है कि बाहर-भीतर एकाकार हुए जा रहे हैं.
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लेकिन इसी मोड़ पर एक और बात का खयाल आता है. दिनेश बहुपठित भी हैं और शायद निर्मल वर्मा के गहरे असर में हैं. पहली कहानी ‘उड़न खटोला’ में आए कई टुकड़े बिल्कुल निर्मल वर्मा के गद्य की याद दिलाते हैं- सिर्फ वाक्य रचना नहीं, मनोभूमि के स्तर पर भी यह दिखता है- अतीत का वही तनाव, नींद और जागरण के बीच की वैसी ही गुत्थियां, बुखार का वैसा ही एहसास और मां-पिता से जुड़ी स्मृतियों का वैसा ही स्पंदन. यहां कुछ उदाहरण रखे जा सकते हैं-
‘तुम जब हड़बड़ा कर उठते तो खिड़की के बाहर झरती चांदनी और मां और पिता की सांसों की आवाज़ भर सुनाई देती. दोबारा सोने की कोशिश करने पर आंखों के आगे वह नन्हा परिंदा फड़फड़ाने लगता जो उस दिन भी उड़ने की कई असफल कोशिशों के बाद सीढ़ियों पर सिमटा बैठा था. शायद घोंसले से नीचे गिर गया था. हाथ बढ़ा कर उस भूरे-कत्थई परिंदे को हटाना चाहा था तो हथेली को सिर्फ पक्षी की धड़कन, नुकीले पंजे और पंखों की फड़फड़ाहट से उपजा प्रतिरोध ही हासिल हुआ था. तुम चुपचाप घर लौट आए थे.’
‘अनिश्चय एक बाघ बन कर तुम्हारी नींद में दाख़िल होता था. अपनी आंखों में एक निर्विकार हिंसा लिए. टूटे हुए खंडहरों या खाली फैली छतों पर टहलता हुआ. तुम जंगले से उसे देखते और दरवाज़े बंद करना शुरू कर देते थे.’
बहरहाल, निर्मल के प्रभाव की यह बात छोड़ दें तो इस कहानी में बहुत मार्मिक टुकड़े हैं. यह एक बहुत अच्छी कहानी हो सकती थी, मगर हो नहीं पाती. क्योंकि यह खंडित प्रभावों तक सीमित रह जाती है, वह संपूर्णता नहीं पैदा कर पाती जिससे हम बहुत देर तक बंधे रहें और आसानी से निकल न पाएं.
दूसरी कहानी ‘विज्ञापन वाली लड़की’ का नायक भी अपने मनोभावों में वही पिछली कहानी वाला किरदार है- लेकिन यहां उसकी कल्पना के केंद्र में एक होर्डिंग पर लगी एक लड़की की तस्वीर है. यह विज्ञापन वाली लड़की उसके भीतर जैसे कोई तार छू देती है और एक विद्युत धारा जैसे उसके पूरे जीवन में प्रवाहित होने लगती है. इसके बाद जो कुछ होता है, वह भयावह अकेलेपन को काटती एक जादुई लगती लेकिन बेबस कल्पना से बनता है और अंततः जानलेवा साबित होता है.
पाठ के लिहाज से संग्रह की तीसरी कहानी ‘मत्र्योश्का’ पाठक को बांधे रखती है. यह जीवन के यथार्थ से कुछ हटकर रिश्तों की प्रेम कविता खोजती हुई कहानी है. एक मेट्रो स्टेशन पर अनायास मिली एक लड़की के साथ आने वाले दिनों की कई मुलाकातें जीवन को जैसे नए पंख दे जाती हैं. रिश्तों की, रास्तों की और प्रेम की जैसे नई पहचान होती है, लेकिन फिर अचानक एक ऐसा यथार्थ सामने आता है जो नायक को स्तब्ध छोड़ जाता है, जो बताता है कि यह रोज़मर्रा का नज़र आने वाला जो प्यारा सा सच है, उसके समानांतर या विपरीत बहुत सारे छुपे हुए सच ऐसे होते हैं जिनकी शिनाख़्त और तलाश तक असंभव हो जाती है.
चौथी कहानी ‘उजाले के द्वीप’ में फिर एक पिता-पुत्री हैं- रोमैंटिक कवि एसटी कोलरीज़ के प्रेम में खोया लेकिन बेहद ज़िद्दी पिता जीवन के हादसे में काफी कुछ खो चुका है- ख़ुद अपनी दैहिक गतिशीलता भी- बेटी पिता का ध्यान रखती है, और बार-बार उसे पिता का कविता-प्रेम याद आता है- उसके पाठ के नए अर्थ भी खुलते हैं. यह भी एक जटिल लेकिन प्यारी कहानी है- करीने से लिखी हुई, हालांकि अंत में यह समझ में नहीं आता कि अचानक वह कौन सा उत्प्रेरक तत्व है जो लड़की को छत की मुंडेर पर लगभग ख़ुदकुशी की हालत में छोड़ देता है.
एक व्याख्या यह संभव है कि लगातार एक सी एकरसता के बीच अंतत: वह मोड़ चला आता है जहां नायिका आत्महत्या के बारे में सोचने लगती है. कोलरीज की कविता ऐंशिएंट मैरिनर में अल्बेट्रॉस नाम के पक्षी के मारे जाने का बिंब भी कहानी से एक हद से ज़्यादा नहीं जुड़ पाता. वैसे इस कहानी में एक छोटी सी तथ्यात्मक चूक यह है कि बायरन, पुश्किन, शेली, कोलरीज को सत्रहवीं सदी का बताया गया है जबकि वे अठारहवीं सदी के उत्तरार्ध और उन्नीसवीं सदी के शुरू में पड़ते हैं. पुश्किन भी इस सूची में कुछ अजीब लगता है.
बहरहाल, यह छोटी-सी बात है, मूल बात कहानी का कुल असर है.
संग्रह की आख़िरी कहानी ‘नीलोफ़र’ दिलचस्प है. कथावाचक अपने मित्र का तोहफा नीलोफ़र को अपना तोहफ़ा बताकर सौंपता है- यह सोचते हुए कि अगली सुबह वह उसे सच बता देगा. लेकिन एक हादसे ने नीलोफर को छीन लिया है और उस सच की संभावना भी ख़त्म कर दी है. हालांकि इस स्थूल व्याख्या के समानांतर कहानी के दो मूल किरदार अपनी नाटकीयता में कथा में काफी कुछ जोड़ते हैं.
दरअसल दिनेश श्रीनेत कहानी की प्रविधि में कुछ नया करना-जोड़ना चाहते हैं. इससे कहानियों के अंश ख़ूबसूरत भी बन पड़ते हैं. बीच-बीच में पैदा होने वाले नाटकीय तनाव कथारस बढ़ाते हैं. वे मूलतः व्यक्तित्वों की जटिलता और रिश्तों के तनाव की कहानियां कहते हैं जिनमें स्मृति, द्वंद्व, प्रेम, टूटन सबकी भूमिका रहती है. लेकिन कहीं समग्रता में वह प्रभाव खंडित होता है जो इन कहानियों से अपेक्षित होता है.
उनको पढ़ते हुए कई जगह निर्मल वर्मा की याद आती है, कहीं-कहीं कृष्ण बलदेव बैद की भी, कभी-कभी नीलाक्षी सिंह और अनिरुद्ध उमठ की भी. कहने का अर्थ यह नहीं कि दिनेश इन सबसे प्रभावित हैं- बस यह कि कथा लेखन की जो एक अलग-सी धारा है, दिनेश की जगह वहीं बनती है. निश्चय ही यह अच्छे लेखकों की धारा है. हालांकि हिंदी में जिस तरह की कहानियां लिखी जा रही हैं और तारीफ़ पा रही हैं, उसे देखते हुए संवेदना और स्मृति के रसायन से बनी इस संग्रह की कहानियां मूल्यवान जान पड़ती हैं.
(प्रियदर्शन वरिष्ठ पत्रकार हैं.)
