विनोद कुमार शुक्ल, कुंवर नारायण और केदारनाथ सिंह की तरह, लगभग निर्विवाद रहे आए हैं: तीनों में एक समानता यह ही है कि उनकी भलमनसाहत अचूक रही और उन्होंने किसी के बारे में कोई कड़ी बात कभी नहीं कही. विनोद जी ने तो दूसरों पर लगभग कभी कुछ लिखा ही नहीं: वे सद्भाव के लेखक हैं और उन्हें ऐसा सद्भाव लेखक-समाज से भी मिलता रहा है. पर जब वे उन्हें ज्ञानपीठ पुरस्कार मिला है, उन्हें विवादों में घेरा जा रहा है अपने स्वभाव के अनुकूल वे उन पर लग रहे आरोपों का कोई उत्तर देंगे या प्रत्याख्यान करेंगे नहीं और इस तरह घेरे में आने से इनकार भी कर देंगे.
जितना मैं देख पाया उतने से मुझे लगा कि जो आपत्तियां उठाई जा रही हैं उनमें से अधिकांश में उनके लिखे की उत्कृष्टता को प्रश्नांकित नहीं किया गया है. एक वरिष्ठ कथाकार और एक वयोवृद्ध आलोचक ने उनकी रचनाओं को अपठनीय पाया है, पर इस पर ज़ाहिर तौर पर इसरार नहीं किया है कि तथाकथित अपठनीयता उत्कृष्टता तय करने का कोई निकष हो सकती है.
एक समय में विनोद जी के पहले प्रस्तोता मुक्तिबोध को भी बहुतों ने अपठनीय और जटिल माना था. पर इस आपत्ति की व्यापकता के बावजूद मुक्तिबोध की उत्कृष्टता व्यापक रूप से बरक़रार और मान्य है.
दूसरी आपत्ति उनके ज्ञानपीठ पुरस्कार को स्वीकार करने को लेकर की गई है. ज्ञानपीठ पुरस्कार देश का दशकों से सबसे प्रतिष्ठित पुरस्कार रहा और माना जाता रहा है. पिछले वर्ष जब यह पुरस्कार एक अज्ञातकुलशील संस्कृत कवि रामभद्राचार्य और औसत दर्जे के उर्दू कवि गुलज़ार को दिया गया तो दशकों से अर्जित प्रतिष्ठा ज्ञानपीठ ने गंवा दी. रामभद्राचार्य का नाम हममें से किसी ने संस्कृत कवि के रूप में नहीं सुना था, भले उनके बहुत सारे ग्रंथ प्रकाशित बताए गए. उन्हें हम हिंदुत्व के मुखर समर्थक, धर्म के बजाय सत्ता के चाटुकार और मुसलमानों के प्रति घृणा फैलाने के अभद्राचारी के रूप में ही जानते रहे हैं.
उस समय यह कहा गया था कि ज्ञानपीठ ने उनका चुनाव सत्ता और हिंदुत्व के दुहरे दबाव में किया है. इसने ज्ञानपीठ की सार्वजनिक छवि को सिरे से ध्वस्त कर दिया. अगर इसे ध्यान में रखते हुए और स्वयं अपनी दृष्टि को हिसाब में लेते हुए विनोद जी यह पुरस्कार अस्वीकार कर देते तो उनका नैतिक क़द बहुत ऊंचा हो जाता और वे एक पतनशील संस्थान को वैधता देने के लांछन से बच जाते.
तीसरी आपत्ति कुछ इस तरह की है कि छत्तीसगढ़ के इलाके में आदिवासियों के साथ भयानक अत्याचार, उनका अमानवीय शोषण आदि हो रहे हैं और वहीं बसे विनोद जी का साहित्य इस सबसे उदासीन है. यह आपत्ति तथ्यपुष्ट न होने के अलावा हिंदी में उस लोकप्रिय प्रवृत्ति से उपजी है जिसमें किसी रचना या लेखक में जो है उसके आधार पर नहीं, जो नहीं है उसके आधार पर जांचा-परखा जाता है.
सच तो यह है कि विनोद जी की कविता में, उनके उत्तरकाल में, आदिवासी संकट के प्रति सजगता और उनके शोषण, पर्यावरण की क्षति आदि को लेकर बखान है और गहरी सहानुभूति भी. याद आता है कि बंटवारे जैसी बड़ी ट्रैजेडी को लेकर बड़े प्रगतिशील कवियों ने एक पंक्ति भी नहीं लिखी थी पर इस अभाव ने उनकी उपलब्धि को अवमूल्यित और उनकी कीर्ति को कम नहीं किया.
‘आस्था की विडंबनाएं’
देवीशंकर अवस्थी सम्मान सुप्रतिष्ठित है और उसके अंतर्गत अब तक 29 युवा आलोचकों को पुरस्कृत किया जा चुका है. 29वां सम्मान पिछले सप्ताह युवा विद्वान् दलपत सिंह राजपुरोहित को उनकी पुस्तक ‘सुन्दर के स्वप्न’ के लिए दिया गया. इस सम्मान की संस्थापक और लगभग तीस वर्षों से उसकी अथक संचालक कमलेश अवस्थी का हाल में देहावसान हो गया. इस बार सामारोह में ‘आस्था की विडंबनाएं’ विषय पर परिचर्चा हुई जिसमें पुरुषोत्तम अग्रवाल, सुधा रंजनी और रमाशंकर सिंह ने भाग लिया.
याद आता है कि लगभग छह दशकों पहले अमृतराय और बालकृष्ण राव के संपादन में तबके ‘हंस’ का एक पुस्तकाकार विशेषांक निकला था जिसमें ‘साहित्यकार की आस्था’ विषय पर परिसंवाद प्रकाशित हुआ था. उसी के आसपास आस्था शब्द के बजाय प्रतिबद्धता शब्द चलन में आया था. आस्था का संबंध अक्सर धर्म और अध्यात्म से होता था, प्रतिबद्धता का विचारधारा से. यह धार्मिक संवेदना के विचारधारात्मक संवेदना द्वारा अपदस्थ किए जाने के लंबे दौर की शुरुआत थी.
आज भारतीय लोकतंत्र में एक क्रूर विचाराधारात्मक राजनीति और सत्ता का वर्चस्व और आतंक है जोकि साथ-साथ धर्म और विचार का भयानक विद्रूप भी है. आक्रामक-हिंसक भक्ति दृश्य पर बहुत छायी हुई है. यह भक्ति, जिसे उचित ही अंधभक्ति कहा जाता है, बाज़ार, धर्म और मीडिया पर हावी है. आस्था में पहले भी प्रशंसा, अनुकरण स्तुति, अतिरेक के तत्व शामिल होते थे- आज उनकी अतिशयता है. आस्था के अनुष्ठान, कर्मकांड आदि होते थे और प्रतिबद्धता के भी. उनका विरोध करने या उनसे विपथ होने पर दंड व्यवस्था भी थी. आज तो सामाजिक जीवन में वह बेहद उत्पातकारी हो गई है.
आस्था प्रायः विडंबना-ग्रस्त होती है. उसकी अस्तिमूलक विडंबना यह है कि प्रायः आस्था सर्वग्रासिता की ओर बढ़ती है और वह अन्य दृष्टियों और अनुभवों पर कब्ज़ा कर लेती है और कई बार उन्हें लील तक जाती है. समावेशी और उदार होने के बजाय वह अक्सर कट्टर और अपवर्जनकारी होती जाती है. उसकी सार्वजनिक विडंबना यह होती है कि उसका अन्य आस्थाओं से साबिका पड़ता है; उनसे कभी-कभार संवाद, अक्सर द्वंद्व होता है. आस्थाओं के बीच होड़ और स्पर्धा भी होने लगती है.
कई बार किसी और आस्था की कट्टरता से मुठभेड़ करने की युयुत्सा से वह स्वयं कट्टर होती जाती है. आस्था के लोकप्रिय अनुष्ठान और कर्मकांड उसके सत्व को ही नष्ट या धूमिल कर देते हैं. अगर हम अपने समय का साक्ष्य देखें तो लगता है कि आस्था में, अंधभक्ति में किसी तरह की भद्रता, शालीनता, नागरिकता बची ही नहीं है. आस्था अब दूसरी आस्थाओं पर प्रहार करने का हथियार हो गई हैं. यह भी याद रखना चाहिए कि आज से चार-पांच दशक पहले हिंदी साहित्य में आग्रह आस्था पर नहीं, अनास्था पर हो गया था.
दूसरी ओर यह भी सही है कि इतिहास में आस्था की उर्वरता का बहुत अकाट्य साक्ष्य मौजूद है- महान् साहित्य, महान् कलाएं और कलाकृतियां, स्थापत्य, संगीत, रंगमंच, नृत्य, लोक सम्पदा आदि हैं जिन्हें आस्था ने उत्प्रेरित किया है. विपुल दर्शन और अध्यात्म-चिंतन आस्था से उपजा और अनुप्राणित हुआ है. न सिर्फ़ आस्था से सर्जनात्मकता का उद्दीपन हुआ बल्कि आस्था में आयी दरारों से भी श्रेष्ठ सर्जनात्मकता सम्भव हुई है. आस्था की अपनी प्रश्नाकुलता ने स्वयं उसके अंतर्गत दार्शनिक और अध्यात्मिक बहुलता सम्भव की है. उसके विवेक के साथ गठबंधन ने हमारे भक्तिकाल में उसे प्रतिरोधात्मक तक बनाया है.
पिछली अधसदी साहित्य में तो धार्मिक आस्था की क्षीणता की और वैचारिक आस्था की व्याप्ति की रही है. इस दौरान अनास्था ने भी व्यापक होना शुरू किया. यह सवाल उठता है कि हमारे संविधान ने एक नया सामाजिक धर्म प्रस्तावित किया जिसके बुनियादी मूल्य स्वतंत्रता-समता-न्याय-बंधुता के थे. क्या साहित्य में इन मूल्यों में आस्था प्रगट या चरितार्थ हुई?
यों भी, साहित्य सिर्फ़ आस्था-अनास्था, विचार या दृष्टि का मामला नहीं होता- इन सबके रहते हुए भी कुछ और है जो साहित्य को साहित्य बनाता है. साहित्य आस्था, अनास्था, विचार या दृष्टि का उपनिवेश नहीं होता, न अपने श्रेष्ठ क्षणों में कभी हुआ है.
(लेखक वरिष्ठ साहित्यकार हैं.)
