‘नवाब वाजिद अली शाह पकड़ लिए गए थे, …शहर में न कोई हलचल थी, न मारकाट…एक बूंद भी ख़ून नहीं गिरा था. आज तक किसी स्वाधीन देश के राजा की पराजय इतनी शांति से इस तरह खून बहे बिना न हुई होगी.’
कथासम्राट मुंशी प्रेमचंद ने 1924 में ‘शतरंज के खिलाड़ी’ नामक अपनी बहुचर्चित कहानी (प्रसिद्ध फिल्मकार सत्यजीत रे 1977 में इस पर इसी नाम की फिल्म भी बना चुके हैं) में फ़रवरी, 1856 में ईस्ट इंडिया कंपनी द्वारा अवध के नवाब वाजिद अली शाह को अपदस्थ व निर्वासित करने का इन्हीं शब्दों में वर्णन किया था. यह जोड़ते हुए कि ‘यह वह अहिंसा न थी, जिस पर देवगण प्रसन्न होते हैं. यह कायरपन था, जिस पर बड़े से बड़े कायर आंसू बहाते हैं.’
कहानी के अंत में उसके दोनों प्रमुख पात्र मीर और मिर्जा झगड़कर अपनी-अपनी तलवारें निकालकर एक दूजे पर पिल पड़े और कट मरे तो प्रेमचंद ने इसे उनके राजनीतिक भावों के अध:पतन की संज्ञा देकर लिखा था : अपने बादशाह के लिए जिनकी आंखों से एक बूंद आंसू भी न निकला, उन्हीं दोनों प्राणियों ने शतरंज के वजीर की रक्षा में प्राण दे दिए.
निस्संदेह, वे यह कहते हुए पूरी तरह सही थे कि उस दिन एक बूंद भी ख़ून नहीं गिरा. लेकिन इस बाबत बहस की बहुत गुंजायश है कि इसके पीछे राजनीतिक भावों का अध:पतन ही एकमात्र कारण था या कुछ और कारण भी थे? मसलन, परिस्थितियों का दबाव, हालात की मजबूरियां और रणनीति के चुनाव में की गई ऐसी खता, जिसके बारे में कहा जा सके कि लम्हों ने खता की थी, सदियों ने सजा पाई?
तत्कालीन इतिहास के कई ज्ञात तथ्य बताते हैं कि वाजिद अली शाह ने किसी भी तरह के खून-खराबे, टकराव या प्रतिरोध के बगैर कंपनी के हाथों अपने राज्य का अपहरण और अपना निर्वासन सिर झुकाकर स्वीकार कर लिया तो इसके पीछे प्रतिकूल परिस्थितियों का दबाव तो था ही, उन्हें विरासत में मिली वे मजबूरियां भी थीं, जिनके बारे में कहा जाता है कि उनके राग-रंग व विलासिता में डूबे रहने के कारण वे लगातार बढ़ती गई थीं.
हालांकि, इसका एक पहलू यह भी है कि ईस्ट इंडिया कंपनी को जितनी शिकायत उनकी विलासिता से थी, उतनी ही इससे भी कि वे उससे किए गए उस करार का (जिसके तहत उनके राज्य की सुरक्षा कंपनी की फौजों की जिम्मेदारी हो गई थी) उल्लंघन कर रहे थे कि नवाबी फौज केवल उनके शासन व प्रशासन की चुस्ती के लिए होगी और वे उस पर साल भर में सोलह लाख रुपए से ज्यादा नहीं खर्च कर सकेंगे.
उनके ही खर्च पर लखनऊ में रह रहे अंग्रेज रेजीडेंट (जेम्स आउट्रम) की मानें तो वे अपनी फौज पर सोलह लाख के बजाय तिरासी लाख रुपए सालाना खर्च करने लगे थे और सूबे के बारह जिलों में और नेपाल से लगने वाली उसकी सीमा पर उनके कोई अस्सी हजार सैनिक तैनात थे.
इतनी सैन्य शक्ति के बावजूद उन्होंने बिना किसी प्रतिरोध के ‘आत्मसमर्पण’ कर दिया तो इसका एक कारण यह भी था कि उन्हें उम्मीद थी कि कंपनी के अफसरों ने उनके साथ जो बेईमानी, नाइंसाफी, कुटिलता और दगाबाजी की है, लंदन जाकर इंसाफपसंद क्वीन विक्टोरिया के दरबार में उसके खिलाफ आवाज उठाकर वे अपनी सल्तनत वापस हासिल कर लेंगे.
गलतफहमी में थे
कह सकते हैं कि उनकी यह उम्मीद, उम्मीद कम और गलतफहमी ज्यादा थी, जो इस कारण कुछ ज्यादा ही जोर पकड़ गई थी कि उस वक्त गवर्नर जनरल लार्ड डलहौजी भी उनसे टकराव या लड़ाई की नहीं, संधि व समझौते की ही भाषा बोल रहा था. कहते हैं कि उसे अंदेशा था कि टकराव हुआ तो लखनऊ के लोग अपने नवाब के पक्ष में उठ खड़े होंगे और उनके विरुद्ध कुशासन के उसके आरोप की हवा निकल जाएगी.
बहरहाल, क्वीन से फरियाद के लिए खुद लंदन जाने की वाजिद की योजना उनकी पेचिश की बीमारी के कारण खटाई में पड़ गई तो जनाब-ए-आलिया, मलिका-ए-किश्वर (राजमाता) व मरियम मकानी (विश्वमाता) कहलाने वाली उनकी मां सूबे के एक सौ चालीस जाने-माने लोगों के शिष्टमंडल के साथ क्वीन से कंपनी की शिकायत करने लंदन गईं.
वाजिद की ही तरह उनको भी विश्वास था कि जैसे ही क्वीन को पता चलेगा कि कंपनी ने कैसी-कैसी कुटिल चालें चलकर उनके बेटे वाजिद को बेहद असम्मानपूर्वक गद्दी से उतारा व निर्वासित किया है, वे न सिर्फ उसके फैसले को पलटकर उनका राजपाट उन्हें वापस लौटा देंगी, बल्कि नाइंसाफी बरतकर उनके साम्राज्य का नाम खराब करने वाले कंपनी के अफसरों को कड़ी से कड़ी सजा भी देंगी.
यह और बात है कि तब तक देश में छिड़ गए पहले स्वतंत्रता संग्राम ने परिस्थितियां बदल दी थीं, जिसके चलते उन्हें क्वीन की बेरुखी के अलावा कुछ भी हासिल नहीं हुआ और वे स्वदेश वापस भी नहीं आ पाईं. दि वायर हिंदी के पाठक एक जुलाई , 2023 को ‘जब क्वीन विक्टोरिया ने अवध की राजमाता से मिलना तक ज़रूरी नहीं समझा था…‘ शीर्षक रिपोर्ट में इस बाबत विस्तार से पढ़ चुके हैं.
आज की तारीख में वाजिद की गिरफ्तारी के वक्त लखनऊ के एक बूंद खून भी न गिराने की बात कुछ इस तरह कही जाती है, जैसे उस वक्त उसका खून पानी हो गया रहा हो! गौरतलब है कि यह वही लखनऊ था, जो इसके महज साल भर बाद 1857 में छिड़े स्वतंत्रता संग्राम में उनकी बेगम हजरतमहल और बेटे बिरजिस कदर के नेतृत्व में दिल्ली के पतन के अरसे बाद तक अंग्रेजों से लोहा लेता और उनको पानी पिलाता रहा था.
ऐसा कहते हुए भुला दिया जाता है कि कंपनी के अफसरों द्वारा कुटिलतापूर्वक वाजिद से सूबा-ए-अवध छीन लेने की अपनी कार्रवाई को सही ठहराने के लिए जानबूझकर लगातार प्रचारित किया जाता रहा था कि उनके कुशासन के चलते सूबे भर में लूटपाट व मारकाट मची हुई थी. राजधानी लखनऊ के लोगों ने तो, जो कुछ ज्यादा ही त्रस्त थे, उनके कुशासन से मुक्त होकर बड़ी राहत का अनुभव किया. फिर वे एक बूंद खून भी क्यों बहाते भला?
लेकिन लखनऊ के इतिहास के जानकार और उस पर कई पुस्तकें लिख चुके डॉ रौशन तकी की मानें तो ऐसा कतई नहीं था. वाजिद को खोकर लखनऊ रोया भी बहुत और कलपा भी बहुत था. उन्हें गद्दी से उतारा गया तब भी, गिरफ्तार किया गया तब भी और उसके दर-व-दीवार पर हसरत से नजर करते हुए वे मटियाबुर्ज (कोलकाता) जाने लगे तब भी.
लेकिन वह क्या करता, जब उन्हें लग रहा था कि वे कंपनी को शांतिपूर्वक सत्ता हस्तांतरित कर देंगे तो क्वीन के दरबार में सदाशयतापूर्वक सिर उठाकर जायेंगे और गवर्नरजनरल लार्ड डलहौजी समेत कंपनी के राज्य विस्तार के लिए किसी भी हद तक गिर सकने वाले सारे कुटिल अफसरों को नंगा कर देंगे.
उन्होंने उन्हें अपदस्थ करने आए रेजीडेंट जेम्स आउट्रम से कहा भी था कि आपने मेरा सब कुछ ले लिया है, मेरा राजपाट भी और सम्मान भी. अब मैं खुद ही बाकी बचा हूं. मुझे कोई पेंशन नहीं चाहिए, लेकिन मैं इंग्लैंड जाऊंगा और महारानी के चरणों में बिछ कर दया की प्रार्थना करूंगा.
ऐंठा था डलहौजी
ज्ञातव्य है कि डलहौजी के गवर्नर जनरल बनकर आने के बाद से बहुतेरी कोशिशें करके भी वाजिद उसको खुश नहीं कर पाए थे. 1850 में कानपुर में उसने उनसे मिलने से मनाकर दिया था और 1851 में लंदन में एक प्रदर्शनी में उनका मुकुट प्रदर्शित किया गया तो उसने उन्हें दुरात्मा कहकर उनके प्रति बेहद अपमानजनक टिप्पणी की थी. यह कि उन्हें मुकुट के साथ अपना सिर भी भेजना चाहिए था.
इसके बाद भी वाजिद ने उसकी प्रसन्नता के लिए 1852 में ड्यूक ऑफ वेलिंगटन के स्मारक के लिए दान और पचास साल पहले भारत में तैनात रहे गोरे सैनिकों की याद में कॉलेज बनाने के लिए भरपूर चंदा आदि दिया था. क्रीमिया में रूसी सेना पर मित्र देशों की विजय की खुशी भी मनाई थी. फिर भी 1853 में उनका दूत उसको यह बताने कलकत्ता गया कि सूबे की शासन व्यवस्था के खोट गिनाने वाली रेजीडेंट विलियम हेनरी स्लीमन की रिपोर्ट सही नहीं है और विस्काउंट हार्डिंग ने 1849 में शासन व्यवस्था सुधारने के लिए दो साल का जो वक्त दिया था, उन्होंने उसका भरपूर सदुपयोग किया है, तो डलहौजी ने उसे भी वापस कर दिया था. फिर तो दिसंबर, 1854 में स्लीमन की जगह आए जेम्स आउट्रम ने भी सूबे में कुशासन को बहुत शोचनीय बता डाला था.
इतिहास गवाह है कि क्वीन विक्टोरिया को लेकर अपने आकलन में वाजिद पूरी तरह गलत थे. उनकी इस गलती ने उन्हें न इधर का रहने दिया, न उधर का. इतना ही नहीं, लखनऊ पर यह तोहमत भी मढ़ दी कि जब उन पर वक्त आ पड़ा तो राग-रंग में डूबा वह उनकी सेवा के लिए एक अदद जूता पहनाने वाले का इंतजाम भी नहीं कर सका.
कोढ़ में खाज यह कि उन्हें ही नहीं, उनके अधीनस्थ राजे महाराजाओं, तालुकेदारों, सेनानियों और दरबारियों को भी मुगालता था कि क्वीन जल्दी ही उनकी नवाबी उनको वापस कर देंगी. उन दिनों सूबे की नई पुरानी दोनों राजधानियों (लखनऊ व फैजाबाद) में खबर गर्म थी कि बहुत हुआ तो कंपनी उनके बड़े भाई मुस्तफा अली खां को नवाब और अपने किसी अफसर को उनका वजारेआजम बना देगी.
इसके बावजूद ऐसा नहीं था कि लखनऊ ने उनकी बेदखली को ऐसे ही सह लिया हो. बेदखली के कुछ ही रोज बाद 15 फरवरी, 1856 को लगा कि उनसे धोखा किया गया है और उनका राज वापस नहीं होने वाला, तो उनकी फौज के हजारों सैनिकों ने (जो एक झटके में सड़क पर आ गए थे) लखनऊ में हंगामा बरपा दिया. वे छोटे-छोटे समूहों में शहर के विभिन्न क्षेत्रों से निकलकर कैसरबाग के उत्तरी फाटक पर पहुंचे तो अनेक हथियारबंद शहरियों के साथ फौज का तोपखाना भी उनसे आ जुड़ा. फिर तो खास बाजार से रमना मोती महल तक सैनिक ही सैनिक दिखने लगे.
नवाबी फौज बिफरी
कुछ जासूसों ने रेजीडेंट आउट्रम को बताया कि ‘अब किसी भी पल कुछ भी हो सकता है’ तो उनके हाथ पांव फूल गए. इस कारण और कि इन सैनिकों ने कंपनी के इस फरमान को मानने से पूरी तरह इनकार कर दिया था कि वे अपने हथियार डाल दें. सैनिकों का कहना था कि वे सुल्तान-ए-आलम (यानी नवाब वाजिद अली शाह) के प्रति वफादार हैं और महज उनका ही आदेश मानेंगे. उन्हें बताया गया कि सुल्तान-ए-आलम जंग न करने का हुक्म दे गए हैं तो उनका जवाब था कि हथियार डाल देने का हुक्म तो नहीं दे गए हैं.
उनका दावा था कि वे खुद तो अस्सी हजार हैं ही, पच्चीस हजार सैनिकों की गुप्त नवाबी फौज भी उनके साथ है. इसलिए कंपनी को किसी भ्रम में नहीं रहना चाहिए, दोनों मिलकर उसकी फौज को अरसे तक छकाते रह सकते हैं. सुल्तानपुर, जगदीशपुर और सलोन आदि तालुकों में तो नवाब के सैनिक अधिकारियों पर यह दबाव डालने पर भी उतर आए थे कि वे घोषणा करें कि अवध के राज्य के कंपनी के राज्य में विलय की सूचना सत्य नहीं है. तुलसीपुर की फौज अपने ‘कृष्ण कन्हैया’ (ज्ञातव्य है कि वाजिद ‘रहस’ के आयोजन में कन्हैया बना करते थे) के पक्ष में हद से गुजर जाने पर उतर आई तो कंपनी के अफसरों ने वहां के राजा को बातचीत के लिए लखनऊ बुलाकर कैद कर लिया और दो महीने बाद रिहा किया.
लखनऊ में कंपनी ने नवाबी फौज के कुछ कमांडेंटों को पटाकर उस फौज का गुस्सा ठंडा करने की कोशिश की तो अनेक सैनिकों ने साफ कह दिया कि उन्होंने नवाब का नमक खाया है और वे उनसे नमकहरामी नहीं करेंगे. इन सैनिकों का नेतृत्व आगा मिर्जा नामक एक कमांडेंट कर रहा था. उसने 6 मार्च, 1856 को गवर्नर जनरल लार्ड डलहौजी को पत्र लिखकर सूबे में कभी भी कुछ भी हो सकने की चेतावनी भी दी थी.
बाद में उसने कंपनी के प्रशासन में उसे असिस्टेंट कमिश्नर बनाने का प्रलोभन ठुकरा दिया और उसकी ईंट से ईंट बजाने में लग गया. तब उसकी गुप्त योजना के तहत नवाबी फौज के 1,367 सैनिकों ने कंपनी की फौज में नौकरी कर ली.
तय हुआ कि आगा मिर्जा दिन-रात एक करके अपने नेतृत्व में फौज जुटायेगा, फिर कंपनी की फौज पर हमला करेगा तो उसमें काम कर रहे नवाबी फौज के सैनिक भीतरघात करके आगा के साथ आ जाएंगे और कंपनी का राज खत्म किए बिना चैन नहीं लेंगे.
न होली, न नवरोज, न सावन मेला
21 मार्च, 1856 को एक ही दिन होली और नवरोज के त्योहार पड़े तो लखनऊ के लोगों ने वाजिद की बेदखली के दु:ख में उन्हें मनाया ही नहीं. यह कंपनी के अफसरों को उनका जवाब था, जो कहते थे कि वाजिद के कुशासन से लखनऊ लोग बहुत परेशान थे. इस दिन लग रहा था कि जैसे लखनऊ की रूह ही निकल गई हो. नमाज के बाद मस्जिदों से एलान कर दिया गया कि कंपनी का हर फरमान लखनवियों पर अत्याचार है और वे उसे मानने के बजाय उसपर आग लगा देंगे. कंपनी ने इसे बगावत के एलान के तौर पर देखा था.
बहरहाल, आगा मिर्जा ने बगावत की तैयारी के लिए सैनिक वर्दी त्याग दी, कंबलपोश का रूप धर लिया और सूबे के विभिन्न जिलों में घूम-घूमकर कंपनी के विरुद्ध फौज बनाने में लगा रहा. भरपूर तैयारियों के बाद उसने बगावत के लिए गुप्त रूप से मुहर्रम की शब-ए-शहादत (11 सितम्बर, 1856) का दिन चुना.
इससे पहले कंपनी की करतूतों से नाराज लखनऊ के लोगों ने ऐशबाग में हर साल लगने वाले सावन मेले में कतई दिलचस्पी नहीं ली, जिससे वह लगा ही नहीं.
मगर आगा मिर्जा की प्रस्तावित बगावत का राज, राज नहीं रह पाया और कंपनी की फौज के सतर्क होकर छापे मारने व गिरफ्तारियां करने लग जाने के कारण वह हो ही नहीं सकी.
सात फरवरी,1857 को वाजिद के राज्य के अपहरण का एक साल पूरा होने पर भी आगा की बगावत की कोशिश सफल नहीं ही हो पाई. लेकिन वह निराश नहीं हुआ. कुछ और शक्ति संचित करके उसने तीन मई, 1857 को कंपनी की फौजों की मड़ियांव छावनी पर हमला बोल दिया. इस हमले में उसने सातवीं नेटिव इन्फैंट्री के लेफ्टिनेंट ग्रांट को मार डाला. आगे कंपनी की सैन्य शक्ति से आमने-सामने मुकाबले की स्थिति न देख उसने गुरिल्ला युद्ध शुरू किया, लेकिन ऐशबाग में हुई भिड़ंत के बाद उसे हुसैनाबाद से पकड़ लिया गया और कुछ दिनों बाद मच्छी भवन के गेट पर फांसी पर लटका दिया गया. इतिहासकारों ने उसे लखनऊ के पहले क्रांतिवीर की संज्ञा दी. इसके बाद पहले स्वतंत्रता संग्राम में लखनऊ ने जिस तरह बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया, उसने 1856 में उसके एक बूंद खून भी न गिराने के कलंक को धो डालने में कोई कोर कसर नहीं रखी.
