नई दिल्ली: गुजरात के सूरत में महात्मा गांधी की हत्या पर लिखी एक किताब को लेकर होने वाली चर्चा आखिरी वक्त पर रद्द कर दी गई. पुलिस ने आशंका जताई कि इससे ‘कानून-व्यवस्था की समस्या’ खड़ी हो सकती है. कार्यक्रम का आयोजन दो स्थानीय संस्थाओं – प्रार्थना संघ और मैत्री ट्रस्ट – ने मिलकर किया था.
कार्यक्रम का नाम था ‘गोडसे ने गांधी को क्यों मारा’, जो लेखक अशोक कुमार पांडेय की किताब ‘उसने गांधी को क्यों मारा’ पर आधारित था. इसे गुरुवार (1 मई, 2025) को सूरत के नानपुरा इलाके में स्थित जीवन भारती ट्रस्ट के रोटरी हॉल में किया जाना था.
इंडियन एक्सप्रेस के मुताबिक, अठवालाइंस पुलिस थाने के निरीक्षक एचके सोलंकी ने कहा है, ‘नियमों के मुताबिक, हमने हॉल प्रशासन से कहा कि वे आयोजकों को पुलिस अनुमति लेने को कहें. अभी तक हमें इसकी कोई औपचारिक अनुमति के लिए आवेदन नहीं मिला है. पुलिस को यह जानकारी होनी चाहिए कि कौन बोलने वाला है, विषय क्या है और इसके क्या असर हो सकते हैं. अगर यह भाषण रिकॉर्ड हो जाए और सोशल मीडिया पर वायरल हो जाए, तो इससे कानून-व्यवस्था की समस्या खड़ी हो सकती है. इसलिए हमने आयोजकों से अनुमति लेने को कहा था. अब चूंकि उनके पास समय नहीं बचा था, इसलिए उन्होंने कार्यक्रम रद्द कर दिया.’
इस विवाद पर द वायर हिंदी ने अशोक कुमार पांडे से बातचीत की है.
सूरत में कार्यक्रम रद्द किए जाने की घटना को आप कैसे देखते हैं—एक प्रशासनिक फैसला, सेंसरशिप या वैचारिक असहिष्णुता?
वडोदरा के एक सेवानिवृत प्रोफेसर हैं- हेमंत शाह (यह और इनके बेटे प्रोफेसर आत्मन शाह, कार्यक्रम में मुख्य प्रस्तोता थे). उन्होंने मेरी किताब ‘उसने गांधी को क्यों मारा’ का गुजराती में अनुवाद किया है. इसके अलावा उन्होंने वाचिका में एक शैली डेवलप की है, जिसमें पिता-पुत्र मिलकर बात करते है और बीच-बीच में संगीत आता है. बेहद खूबसूरत प्रस्तुति होती है. यही कार्यक्रम सूरत में होने वाला था. सूरत से पहले यह अहमदाबाद और वडोदरा में हो चुका है, अहमदाबाद में दो और वडोदरा में एक कार्यक्रम. लोगों ने बहुत पसंद भी किया. लेकिन सूरत के शो से तुरंत पहले, उस ट्रस्ट के लोगों को कहा गया कि आप ये कार्यक्रम करेंगे तो ये हो जाएगा-वो हो जाएगा. बाद में पुलिस ने कहा कि इसके लिए अनुमति नहीं ली गई थी. परमिशन के सवाल पर ट्रस्टियों का कहना है कि वहां वर्षों से कार्यक्रम हो रहे हैं और उन्होंने कभी किसी तरह की परमिशन नहीं ली और कभी कोई दिक़्क़त आई भी नहीं. ऐसे में जब कैंसिल कराने की बात की जाती है तो प्रशासनिक मामला भी है और वैचारिक मामला भी है. गांधी के राज्य में गांधी के हत्यारों के बारे में बात करना और वो हत्यारे जिन्हें कोर्ट ने सजा दी है, भारतीय संविधान के हिसाब से सजा मिली है, उनके बारे में बात करना सांप्रदायिक सद्भाव की बात करना, गांधी के बारे में बात करना, अगर ये अपराध है तो आप समझ सकते है कि ये वैचारिक और प्रशासनिक, दोनों मामला है.
पुलिस का यह कहना कि कार्यक्रम का भाषण सोशल मीडिया पर वायरल होकर ‘कानून-व्यवस्था’ बिगाड़ सकता है—क्या आपको लगता है यह तर्कसंगत है या डर फैलाने की रणनीति?
गांधी जी की बात से कौन-सा तनाव फैल सकता है? गांधी के हत्यारों के बारे में बात करने से कौन-सा तनाव फैल सकता है? पुलिस जानती है कि कौन से लोग ये तनाव फैला सकते है. जाहिर सी बात है गोडसे के समर्थक ये तनाव फैला सकते हैं और पुलिस यह भी मान रही है कि गोडसे के समर्थक तनाव फैलायेंगे तो वे उसे रोकने में सक्षम नहीं है. कहने का तो मतलब यही हुआ न.
दूसरी बात कि तीन कार्यक्रम हो चुके थे. अहमदाबाद, बड़ोदरा में हो चुका था उसका वीडियो ऑनलाइन भी उपलब्ध है. आप बताइए कौन सा तनाव फैल गया, दोनों जगह कौन-सी घटना हो गई. ये तो बेकार की बात है बिलकुल.
इस तरह के विवाद को देखने के बाद क्या लगता है कि आज भारत में गांधी के ख़िलाफ़ अनर्गल बोलना स्वीकार्य है, लेकिन गोडसे की आलोचना स्वीकार्य नहीं है?
आतंकवाद के मामले में प्रज्ञा ठाकुर की जांच चल रही है. एनआईए ने उनके लिए फांसी की मांग की है. इसका मतलब वो आतंकवाद के मामले में थीं. एनआईए गृह मंत्रालय के तहत काम करता है. वही प्रज्ञा ठाकुर सांसद बनती हैं और गोडसे की तारीफ करती हैं, जिसके बाद प्रधानमंत्री महोदय ने कहा था कि ‘मैं दिल से कभी माफ नहीं कर पाऊंगा.’ इतने लोग गोडसे को लेकर तमाम बयान देते है.
मैं एक सीधा सवाल पूछता हूं कि जिसको कोर्ट से सजा मिली हो, उसे आप हीरो बना रहे हैं? जिसने राष्ट्रपिता की हत्या की, उसे आप हीरो बना रहे हैं? और किसी को कोई दिक्कत नहीं होती है?
गांधी की हत्या के पीछे की विचारधारा को आज के भारत में कैसे देख रहे हैं? क्या उसका पुनरुत्थान हो रहा है?
गांधी जी के शहादत दिवस (30 जनवरी) पर गोडसे ट्रेंड करने लगता है, तो ऐसे बहुत सारे लोग हैं जो गोडसे को हीरो बनाने में लगे हुए हैं. दुर्भाग्य यह है कि इसमें से बहुत सारे लोग ऐसे भी हैं, जो सत्ता में है या सत्ता के करीब हैं. प्रज्ञा ठाकुर तो सत्तापक्ष की सांसद थीं. और इस तरह की बात बोलने वालों के ऊपर कोई कार्रवाई भी नहीं हो रही है. बहुत सीधी सी बात है कि कहीं न कहीं समर्थन तो है.
