नई दिल्ली: झारखंड के सरकारी प्राथमिक विद्यालयों में शिक्षा की बदहाल स्थिति पर नरेगा सहायता केंद्र, मनिका (लातेहार) द्वारा जारी एक ताजा रिपोर्ट ने गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं.
‘एकल शिक्षक स्कूलों का संकट’ नामक इस रिपोर्ट में खुलासा हुआ है कि राज्य के 8,000 से अधिक एकल-शिक्षक विद्यालय शिक्षा के अधिकार (राइट टू एजुकेशन) अधिनियम के मानदंडों का खुला उल्लंघन कर रहे हैं. ध्यान रहे, झारखंड में 2016 से अब तक किसी भी नए शिक्षक की नियुक्ति नहीं हुई है.
हैरान करने वाले आंकड़े
मनिका ब्लॉक के 40 स्कूलों में किए गए सर्वेक्षण के दौरान हैरान कर देने वाला नजारा देखने को मिला जहां 87.5 प्रतिशत स्कूलों में कोई शिक्षण गतिविधि नहीं चल रही थी, जबकि 82.5 प्रतिशत स्कूलों में बच्चों के लिए शौचालय तक की व्यवस्था नहीं थी.
रिपोर्ट के अनुसार, इन स्कूलों में औसतन 59 छात्रों की पढ़ाई की जिम्मेदारी सिर्फ एक ही शिक्षक के कंधों पर है, जबकि राइट टू एजुकेशन के मानदंडों के अनुसार इन 40 स्कूलों में कम से कम 99 शिक्षक होने चाहिए. बिचलीडाग गांव के एक स्कूल की स्थिति सबसे ज्यादा चिंताजनक है जहां 144 छात्रों को मात्र एक शिक्षक के भरोसे छोड़ दिया गया है.
इन स्कूलों में पढ़ने वाले 84 प्रतिशत बच्चे अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति समुदाय से आते हैं, जिनके पास निजी शिक्षण संस्थानों का विकल्प नहीं है. रिपोर्ट में चौंकाने वाला तथ्य यह सामने आया कि इन स्कूलों में कार्यरत 77.5 प्रतिशत शिक्षक 40 वर्ष से अधिक उम्र के हैं, जबकि महिला शिक्षकों का प्रतिशत मात्र 15 है.
शिक्षकों पर गैर-शैक्षणिक कार्यों का बोझ लगातार बढ़ता जा रहा है. APAAR ID बनाने जैसे प्रशासनिक कार्यों में उलझे शिक्षकों के पास पढ़ाने का समय ही नहीं बचता. सर्वे के दौरान एक ग्रामीण ने बताया कि ‘कक्षा 5 के बच्चे अभी तक ठीक से पढ़-लिख नहीं पाते’, जो शिक्षा की गुणवत्ता पर गंभीर सवाल खड़ा करता है.
33 में से सिर्फ 7 स्कूलों में ही शौचालय की व्यवस्था
बुनियादी सुविधाओं की बात करें तो राज्य सरकार के UDISE+ (यूनिफाइड डिस्ट्रिक्ट इन्फॉर्मेशन सिस्टम फॉर एजुकेशन प्लस) डेटा के अनुसार झारखंड के 98 प्रतिशत स्कूलों में शौचालय की सुविधा होने का दावा किया जाता है, लेकिन मनिका ब्लॉक की हकीकत इससे बिल्कुल उलट है. यहां 33 में से सिर्फ 7 स्कूलों में ही शौचालय की व्यवस्था है.
इसी तरह कई स्कूलों में बिजली, पेयजल और बैठने की उचित व्यवस्था तक नहीं है, जिसके चलते बच्चों को फर्श पर बैठकर पढ़ाई करनी पड़ती है.
मध्याह्न भोजन योजना की हालत भी कोई बेहतर नहीं है. पौष्टिक आहार और अंडे के नियमित वितरण के बजाय बच्चों को मात्र दिखावे के लिए भोजन परोसा जा रहा है. रसोइयों की दुर्दशा और भी बदतर है जिन्हें अक्टूबर 2024 से उनका वेतन तक नहीं मिला है.
सबसे चौंकाने वाला मामला तो 4 स्कूलों में सामने आया जहां शिक्षक कक्षा के समय शराब के नशे की हालत में पाए गए. यूपीजी-पीएस बेटला, पीएस एजामार, यूपीएस बखरटोला और यूपीजी-पीएस रखत में यह स्थिति देखी गई, जो शिक्षा व्यवस्था में गिरावट की पराकाष्ठा को दर्शाता है.
शिक्षकों के 95,897 पद रिक्त
झारखंड उच्च न्यायालय ने हाल ही में इस गंभीर मामले पर संज्ञान लेते हुए शिक्षकों की तत्काल नियुक्ति का निर्देश दिया था. इसके जवाब में राज्य सरकार ने सितंबर 2025 तक 26,000 शिक्षकों की भर्ती का वादा किया है. हालांकि, शिक्षा मंत्रालय के 2020-21 के आँकड़े बताते हैं कि राज्य में 95,897 शिक्षक पद रिक्त हैं, जिससे स्पष्ट है कि यह संख्या भी अपर्याप्त होगी.
रिपोर्ट की सह-लेखिका पल्लवी कुमारी ने कहा, ‘जब तक शिक्षक स्कूलों में पढ़ाने के बजाय रिपोर्ट लिखने और दिवाली पूजा में 15,000 रुपये खर्च करने में लगे हैं, तब तक बदलाव की उम्मीद बेमानी है.’ उनके सहयोगी सारंग गायकवाड़ ने इस सर्वे को शिक्षा के अधिकार की पूरी तरह विफलता बताते हुए कहा कि एससी/एसटी समुदाय के बच्चे इस व्यवस्था की सबसे बड़ी कीमत चुका रहे हैं.
रिपोर्ट के निष्कर्ष बताते हैं कि सिर्फ शिक्षक भर्ती से यह गहरा संकट हल नहीं होगा. बुनियादी ढांचे में सुधार, शिक्षकों के कार्यभार में कमी और सामाजिक भेदभाव को खत्म करने के लिए समग्र नीति बनाने की आवश्यकता है. जब तक शिक्षा व्यवस्था में यह बुनियादी बदलाव नहीं होते, तब तक झारखंड के इन ग्रामीण इलाकों के बच्चों का भविष्य अंधकारमय ही रहेगा. तत्काल हस्तक्षेप के तौर पर स्थायी शिक्षकों की भर्ती, शौचालयों का निर्माण, और मध्याह्न भोजन योजना की गुणवत्ता सुनिश्चित करना अहम है.
