जब राम-लखन, सीता और गीता फिल्म के नाम हो सकते हैं, तो जानकी वर्सेज़ केरल क्यों नहीं: हाईकोर्ट

केरल उच्च न्यायालय ने केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड (सीबीएफसी) से पूछा कि मलयालम फिल्म 'जानकी वर्सेज़ केरल स्टेट' के नाम में क्या समस्या है. सुनवाई के दौरान जस्टिस एन. नागरेश ने कहा कि ऐसी कई फ़िल्में बनी हैं, जिनके शीर्षक में भगवान के नाम हैं और अब तक कोई समस्या नहीं आई है.

(फोटो साभार: swarajyamag.com)

नई दिल्ली: केरल उच्च न्यायालय ने शुक्रवार (27 जून) को केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड (सीबीएफसी) से पूछा कि मलयालम फिल्म ‘जानकी बनाम केरल राज्य’ के नाम में क्या समस्या है.

इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक, केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड ने निर्माताओं से इस फिल्म के नाम को बदलने की मांग की है. इस फिल्म में अभिनेता और केंद्रीय मंत्री सुरेश गोपी ने अभिनय किया है, जो इस शुक्रवार (27 जून) को रिलीज होने वाली थी.

मालूम हो कि फिल्म निर्माताओं ने सीबीएफसी द्वारा प्रमाणन में देरी के खिलाफ उच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाया है.

उल्लेखनीय है कि फिल्म के शीर्षक में बदलाव की सीबीएफसी की पहली मांग को बोर्ड की रिवाइजिंग कमेटी ने भी बरकरार रखा था. इस फिल्म में सीबीएफसी जिस शब्द को बदलना चाहता है, वह जानकी है, जो सीता का दूसरा नाम है, जो फिल्म में मुख्य किरदार का नाम भी है.

हाईकोर्ट में मामले की सुनवाई के दौरान जस्टिस एन. नागरेश ने बताया कि ऐसी कई फ़िल्में बनी हैं, जिनके शीर्षक में भगवान के नाम हैं और अब तक कोई समस्या नहीं आई है. ऐसे में फिर जानकी के मामले में शिकायत कैसे हो सकती है?

कोर्ट ने पाया कि सीता और गीता (1972) और राम लखन (1989) जैसी फ़िल्में बनी हैं.

सीबीएफसी ने अदालत को कहा कि उसने निर्माताओं को नोटिस जारी किया है, जिसमें कहा गया है कि अगर वे फिल्म के शीर्षक और संवाद से मुख्य किरदार जानकी के नाम में बदलाव करते हैं तो फिल्म को सार्वजनिक प्रदर्शन के लिए मंजूरी दी जा सकती है.

नोटिस में यह भी कहा गया है कि संशोधन समिति इस निष्कर्ष पर पहुंची है.

बोर्ड के अनुसार, इस फिल्म में वयस्क विषय-वस्तु है, जिसमें महिलाओं के खिलाफ यौन अपराध, कठोर यौन भाषा/शब्द, ड्रग्स, धूम्रपान और शराब के सेवन का संदर्भ शामिल है. इसे ध्यान में रखते हुए संशोधन समिति ने सर्वसम्मति से संशोधनों के साथ ‘यूए 16+’ देने की सिफारिश की.

इसके बाद अदालत ने सीबीएफसी से संशोधन समिति के निर्णय को अगली सुनवाई  30 जून को लिखित रूप में प्रस्तुत करने का निर्देश दिया.

अदालत ने फिल्म निर्माताओं से भी कहा कि वे या तो नोटिस का जवाब दें या इसके खिलाफ अपील करें.

निर्माता कॉसमॉस एंटरटेनमेंट की ओर से पेश हुए सुप्रीम कोर्ट के अधिवक्ता और राज्यसभा सदस्य हारिस बीरन ने कहा कि बोर्ड को इस तरह का नोटिस जारी करने का कोई अधिकार नहीं है. सिनेमैटोग्राफ प्रमाणन नियमों के तहत यह उचित नहीं है.

उन्होंने कहा, ‘हम नोटिस को चुनौती देने जा रहे हैं क्योंकि जवाब दाखिल करने से फिल्म की रिलीज में और देरी होगी.’