नई दिल्ली: भारतीय निर्वाचन आयोग द्वारा बिहार में विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) के जरिए मतदाता सूची संशोधन की विवादास्पद कवायद के बीच भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) की प्रमुख सहयोगी और सत्तारूढ़ राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) सरकार की दूसरी सबसे बड़ी घटक तेलुगु देशम पार्टी (तेदेपा) ने चुनाव आयोग को पत्र लिखकर यह सुनिश्चित करने की मांग कि है कि एसआईआर मतदाता सूची सुधार से संबंधित मामलों तक ही सीमित रहे और यह यह स्पष्ट किया जाए कि यह प्रक्रिया नागरिकता सत्यापन से संबंधित नहीं है.
द वायर द्वारा देखे गए इस पत्र में तेदेपा ने कहा है, ‘एसआईआर को उद्देश्य स्पष्ट रूप से परिभाषित किया जाना चाहिए और ये मतदाता सूची सुधार तक ही सीमित होना चाहिए. इस प्रक्रिया को लेकर यह स्पष्ट रूप से सूचित किया जाना चाहिए कि यह अभ्यास नागरिकता सत्यापन से संबंधित नहीं है.’
बता दें कि मंगलवार (15 जुलाई) को तेदेपा प्रतिनिधिमंडल द्वारा चुनाव आयोग से मुलाकात के बाद यह पत्र आयोग को सौंपा गया था.
नवीनतम प्रमाणित मतदाता सूची में जिनके नाम हैं, उन्हें दोबारा पात्रता साबित करने की जरूरत नहीं होनी चाहिए
पत्र में कहा गया है कि एसआईआर यह सुनिश्चित करने का एक मूल्यवान अवसर प्रदान करता है कि मतदाता सूची निष्पक्ष, समावेशी और पारदर्शी तरीके से अपडेट की जाए.
पत्र में आगे कहा गया है कि जो मतदाता पहले से ही नवीनतम प्रमाणित मतदाता सूची में नामांकित हैं, उन्हें अपनी पात्रता पुनः स्थापित करने की आवश्यकता नहीं होनी चाहिए, जब तक कि विशिष्ट और सत्यापन योग्य कारण दर्ज न किए जाएं.
इसमें लाल बाबू हुसैन बनाम निर्वाचक पंजीयन अधिकारी मामले में माननीय सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय का जिक्र करते हुए कहा गया है कि पूर्व समावेशन वैधता की धारणा बनाता है, और किसी भी विलोपन से पहले एक वैध जांच होनी चाहिए.
वहीं, प्रमाण प्रस्तुत करने का दायित्व ईआरओ या आपत्तिकर्ता का है, मतदाता का नहीं. खासकर तब जब नाम आधिकारिक सूची में मौजूद हो.
इस पत्र में यह भी कहा गया है कि ‘एसआईआर प्रक्रिया पर्याप्त समय सीमा के भीतर पूरी की जानी चाहिए, आदर्श रूप से किसी भी बड़े चुनाव से छह महीने के भीतर नहीं.’
उल्लेखनीय है कि यह पत्र ऐसे समय में आया है जब बिहार में एसआईआर की प्रक्रिया पर सवाल उठ रहे हैं. इसके तहत उन सभी मौजूदा मतदाताओं को, जो 2003 में मतदाता सूची में शामिल नहीं थे, अपनी और अपने माता-पिता की नागरिकता का प्रमाण देना अनिवार्य है.
मालूम हो कि बिहार विधानसभा चुनाव से कुछ महीने पहले इस प्रक्रिया की व्यावहारिकता पर सवाल उठाए गए हैं. इसमें बड़े पैमाने पर मताधिकार से वंचित होने और बहिष्कृत होने के डर के साथ ही यह चिंता पैदा हो गई है कि क्या चुनाव आयोग का इस्तेमाल राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर (एनआरसी) लागू करने के लिए किया जा रहा है.
प्रवासी मज़दूरों और विस्थापित परिवारों को सूची से बाहर रखे जाने को लेकर चिंता
आयोग को लिख अपने पत्र में तेदेपा ने प्रवासी मज़दूरों और विस्थापित परिवारों को सूची से बाहर रखे जाने को लेकर भी चिंता जताई है.
तेदेपा का कहना है कि आंध्र प्रदेश में मौसमी प्रवासन का स्तर काफ़ी ज़्यादा है, ख़ासकर ग्रामीण और तटीय क्षेत्रों से. इसलिए पत्र में सुझाव दिया गया है कि इस प्रक्रिया में ‘मोबाइल बीएलओ (ब्लॉक-स्तरीय अधिकारी) इकाइयां तैनात की जानी चाहिए और प्रवासी मज़दूरों और विस्थापित परिवारों को सूची से बाहर रखे जाने से रोकने के लिए अस्थायी पते की घोषणाएं स्वीकार की जानी चाहिए.’
इसमें यह भी कहा गया है कि आयोग को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि मतदाताओं के नाम हटाने की प्रक्रिया ‘उचित सूचना के साथ तर्कसंगत क्रम में हो और चरणबद्ध सत्यापन की अनुमति हो.’
तेदेपा सांसद और लोकसभा में सदन के नेता लावु श्री कृष्ण देवरायलु द्वारा लिखे गए इस पत्र पर सांसद बायरेड्डी शबरी और डी प्रसाद राव, तेदेपा आंध्र प्रदेश के प्रदेश अध्यक्ष पल्ला श्रीनिवास राव और राष्ट्रीय प्रवक्ता ज्योत्सना तिरुनागरी के भी हस्ताक्षर हैं.
द वायर से बात करते हुए तिरुनागरी ने कहा कि पार्टी प्रतिनिधिमंडल ने एसआईआर पर अपने विचार व्यक्त करने के लिए चुनाव आयोग से मुलाकात की. इसे लेकर चुनाव आयोग सभी पंजीकृत दलों से विचार ले रहा है.
उन्होंने कहा, ‘हमने अपने विचार, सुझाव और चिंताएं व्यक्त की हैं. हम तकनीकी प्रगति और बीएलओ के लिए उचित प्रशिक्षण की अपेक्षा करते हैं. कुछ छोटी-मोटी खामियां सामने आई हैं. हमने कहा है कि मतदान को नागरिकता से नहीं जोड़ा जा सकता. आपको वैकल्पिक उपाय तलाशने होंगे. एक निवारण तंत्र होना चाहिए. इसके अलावा हमने सामान्य सुझाव दिए हैं और आयोग ने हमारी चिंताओं का समाधान किया है.’
पत्र में मतदाता सूची सत्यापन में विसंगतियों की पहचान करने के लिए नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (सीएजी) के अधीन वार्षिक तृतीय-पक्ष ऑडिट कराने, वास्तविक समय में दोहराव, स्थानांतरण और मृत प्रविष्टियों को चिह्नित करने के लिए एआई-संचालित उपकरणों का उपयोग करने, गलत बहिष्करणों को तुरंत ठीक करने के लिए बीएलओ/ईआरओ (ब्लॉक-स्तरीय अधिकारी/निर्वाचन पंजीकरण अधिकारी) के स्तर पर समयबद्ध शिकायत निवारण तंत्र सुनिश्चित करने का भी आह्वान किया गया है.
हालांकि, बिहार में एसआईआर के लिए प्रदान किए जाने वाले 11 दस्तावेजों में चुनाव आयोग द्वारा आधार कार्ड को शामिल नहीं किया गया था, लेकिन तेदेपा ने अपने पत्र में आधार की मदद से डुप्लिकेट ईपीआईसी नंबरों को ठीक करने का आह्वान किया है.
‘मोबाइल आबादी को मताधिकार से वंचित होने से रोकें’
पत्र में कहा गया है, ‘देश भर में अद्वितीय, गैर-प्रतिकृति EPIC नंबर जारी करने में तेज़ी लाएं. मज़बूत डेटा गोपनीयता सुरक्षा के साथ आधार-आधारित क्रॉस-सत्यापन की अनुमति दें. स्याही-आधारित सत्यापन प्रक्रिया के स्थान पर बायोमेट्रिक सत्यापन प्रक्रिया अपनाएं.’
इसके साथ ही पार्टी ने अपने पत्र में संशोधन प्रक्रिया के दौरान सभी राजनीतिक दलों के बूथ स्तरीय एजेंटों (बीएलए) की अनिवार्य भागीदारी की भी मांग की है, और सुझाव दिया है कि मतदाताओं की शिकायतों पर नज़र रखने और उनके समाधान के लिए एक रीयल-टाइम सार्वजनिक डैशबोर्ड लागू करने के साथ-साथ मतदाता सूची में शामिल और हटाए गए मतदाताओं का ज़िलावार डेटा स्पष्टीकरण सहित ईसीआई पोर्टल पर प्रकाशित किया जाए.
अन्य सिफारिशों में ईआरओएस (निर्वाचन पंजीकरण अधिकारी) और डीईओ (जिला चुनाव अधिकारी) द्वारा निष्क्रियता के लिए दंड, अनसुलझे शिकायतों के समाधान के लिए चुनाव आयोग के अधीन राज्य-स्तरीय लोकपाल, प्रवासी श्रमिकों, आदिवासी समूहों और बुजुर्गों के लिए लक्षित पुनः नामांकन अभियान, स्थानीय प्रभाव या पक्षपातपूर्ण दुरुपयोग को रोकने के लिए बीएलओ और ईआरओ का रोटेशन शामिल हैं.
इसमें कहा गया है, ‘इधर-उधर जाने वाली आबादी को मताधिकार से वंचित होने से बचाने के लिए बुनियादी दस्तावेजों के साथ अस्थायी पते की घोषणा की अनुमति दी जाए. डीईओ/ईआरओ स्तर पर मान्यता प्राप्त राजनीतिक दलों के साथ मासिक परामर्श बैठकें आयोजित की जाएं.’
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