नई दिल्ली: सरकार ने स्वीकार किया है कि उच्च शिक्षा में आरक्षित वर्गों के लिए आवंटित पदों को भरने में बहुत अधिक देरी हो रही है, जैसा कि संसद के 2006 के अधिनियम में अनिवार्य किया गया है.
प्रोफेसर के पद पर नज़र डालें तो यह देरी विशेष रूप से चौंकाने वाली है. सामान्य वर्ग के उम्मीदवारों की नियुक्तियां आरक्षित वर्गों के उम्मीदवारों से ज़्यादा हैं, जबकि अन्य पिछड़ी जाति (ओबीसी), दलित और आदिवासी समुदायों के उम्मीदवारों की नियुक्तियों में यह अंतर कहीं ज़्यादा है. उदाहरण के लिए, स्वीकृत 423 पदों में से ओबीसी समुदाय के केवल 84 प्रोफेसर ही नियुक्त किए गए हैं. यानी रिक्तियों की दर 80% है.
इस बीच, पिछले पांच सालों में दलित समुदाय के केवल 111 प्रोफ़ेसरों की नियुक्ति हुई है, जबकि कम से कम 308 नियुक्तियां होनी चाहिए थीं. यानी रिक्तियों की दर 64% है.

इसी तरह, आदिवासी समुदाय से 144 प्रोफेसरों की नियुक्ति होनी थी, लेकिन केवल 24 ही नियुक्त हो पाए. यानी रिक्तियों की दर 83% है.
30 जून, 2025 तक केंद्रीय विश्वविद्यालयों में सभी श्रेणियों में प्रोफेसर, एसोसिएट प्रोफेसर और असिस्टेंट प्रोफेसर के लिए स्वीकृत पदों की कुल संख्या 18,951 थी. इनमें से 14,062 पद भरे जा चुके हैं, जिससे 25% पद रिक्त रह गए हैं. सामान्य श्रेणी में केवल 15% सीटें खाली रह गई हैं, जबकि आरक्षित श्रेणियों में रिक्तियों की दर सबसे ज़्यादा है.
ओबीसी के लिए कुल 3,688 पद रिक्त थे, जिनमें से 2,197 पद भरे जा चुके हैं, यानी 40% रिक्तियां हैं.
इसी तरह, 2,310 पदों पर नियुक्ति के लिए निर्धारित पदों में से दलित समुदाय से केवल 1,599 नियुक्तियां की गईं. यानी लगभग 30% रिक्तियां.
अनुसूचित जनजाति (एसटी) समुदाय से की गई नियुक्तियों में यह अंतर सबसे ज़्यादा है. 1,155 स्वीकृत पदों में से केवल 727 पर ही नियुक्तियां की गईं. यानी 37% सीटें खाली रह गईं.
शिक्षा राज्य मंत्री सुकांत मजूमदार द्वारा राज्यसभा में दिए गए आंकड़ों के अनुसार, सामान्य श्रेणी के अंतर्गत सबसे अधिक सीटें भरी गईं. उन्होंने राष्ट्रीय जनता दल के प्रोफेसर मनोज कुमार झा द्वारा पिछले पांच वर्षों में पदों और रिक्तियों के आंकड़ों के बारे में पूछे गए प्रश्न के उत्तर में यह जानकारी दी.
