भीलवाड़ा/अलवर: राजस्थान के भीलवाड़ा के बेदी का बाडिया गांव में दृष्टिबाधित सांगरी देवी चुप बैठी थीं. उन्होंने अपने बेटे दाऊ राम गुर्जर की बात सुनते हुए ऊपर देखा और धीरे से पलकें झपकाईं. काफी वृद्ध होने और गरीबी रेखा से नीचे जीवनयापन करने के बावजूद, उन्हें सामाजिक सुरक्षा पेंशन 2014 में जाकर मिल पायी थी.
लेकिन 750 रुपये का मासिक भुगतान 2022 में अचानक बंद हो गया. दाऊ राम ने कहा अब जाकर ‘हमें पता चला है कि उनकी पेंशन क्यों बंद कर दी गई थी: सरकारी रिकॉर्ड में लिखा है कि ये गुजर गई हैं.’
पिछले ढाई वर्षों में किसी भी अधिकारी ने नहीं बताया, कोई सूचना नहीं मिली कि उनकी पेंशन क्यों बंद कर दी गई थी.
परिवार भेड़ें चराता है जो इस रात झोपड़ी के आंगन में आ ठहरी थी. 81 साल की सांगरी देवी अपनी झोपड़ी के दरवाज़े पर अंधेरे में अपनी कोहनी घुटने पर टिकाए बैठी थीं. उनके बगल में, मानवाधिकार कार्यकर्ता बालू सिंह अपने मोबाइल फ़ोन की स्क्रीन पर नज़र गड़ाए हुए थे. एक पेंशन ऐप पर लिखा था, ‘वर्तमान स्थिति: रद्द, और कारण: मृत्यु.’
बालू सिंह ने पाया कि देवी के आधार कार्ड में उनका जन्म जनवरी 1944 में दर्ज था, जिससे उनकी उम्र 81 साल हो गई, जबकि उनके पेंशन रिकॉर्ड में उनकी जन्मतिथि फरवरी 1953 दर्ज थी, जिससे उनकी उम्र 72 साल हो गई.
उल्लेखनीय है कि वृद्धावस्था पेंशन योजना के दो मुख्य मानदंड हैं – परिवार की वार्षिक आय 48,000 रुपये से कम हो और महिला की उम्र 55 साल से ज़्यादा हो. इस विसंगति ने उन्हें अयोग्य ठहरा दिया.
राजस्थान में कार्यरत मज़दूर किसान शक्ति संगठन (एमकेएसएस) के सचिव बालू सिंह ने सिर हिलाते हुए कहा, ‘गांव-गांव में हम इसी तरह का डिजिटल आतंक देख रहे हैं.’
‘पहले डाकिया मनीऑर्डर लेकर आता था और 500-750 रुपये की मासिक पेंशन नकद देता था. अगर डाकिया 10-20 रुपये की रिश्वत मांगता था तो उसे पकड़ भी लेते थे.’ उन्होंने आगे कहा, ‘ जब से यह डिजिटल हो गया है, पेंशनभोगी का नाम काट दिया जाता है.’
मालूम हो कि राजस्थान में 90 लाख से ज़्यादा पेंशनर हैं. 2023-2024 में, लगभग 13 लाख के भुगतान उनकी मृत्यु या प्रवास का हवाला देते हुए ‘रद्द’ कर दिए गए, लेकिन इनमें कई ऐसे थे जिन्हें ग़लती से ‘मृत’ घोषित कर दिया गया था, जबकि वे इतने बूढ़े और कमज़ोर थे कि वह बिस्तर पर थे या अपने घरों से बाहर भी नहीं निकल सकते थे.
जयपुर में अधिकारियों ने बताया कि जिन लोगों को ‘मृत’ घोषित किया गया था, उनमें से 95% फ़ैसले ऑटोमैटेड या स्वचालित प्रक्रियाओं के ज़रिए लिए गए.

सार्वभौमिक पेंशन की वकालत करने वाले संगठनों के समूह ‘पेंशन परिषद’ के एक कार्यकर्ता रिज़वान अहमद ने कहा कि हज़ारों लोगों को लिंग, या नाम व वर्तनी में विसंगतियों के कारण समस्याओं का सामना करना पड़ा. जब स्थानीय पंचायत स्तर पर इन त्रुटियों की पहचान की गई, तब भी अधिकारियों ने पीड़ितों को राजधानी जयपुर में इसे ठीक कराने के लिए कहा. राजस्थान भारत का सबसे बड़ा राज्य है. ग्रामीणों के लिए राजधानी आने का मतलब है 200 किलोमीटर से ज़्यादा की यात्रा.
स्पष्ट है कि डिजिटल तकनीक से पारदर्शिता में कोई खास सुधार नहीं हुआ.
अहमद कहते हैं, ‘इतनी गंभीर समस्याओं के बावजूद, इतने लोग महीनों या सालों तक बिना किसी सहायता के रह जाते हैं, किसी को भी ज़िम्मेदार नहीं ठहराया जाता. असली पेंशनर रजिस्ट्री में वापस आने के लिए काफ़ी मेहनत करते हैं, लेकिन उन्हें कोई मुआवज़ा नहीं मिलता.
सांगरी देवी को जिस स्थिति का सामना करना पड़ा, वह गरीबों की पेंशन योजना पर चल रहे डिजिटल प्रयोगों की श्रृंखला में एक कड़ी था.
‘मैं उन लोगों को कोसती हूं जिन्होंने मेरी पेंशन छीन ली’
राष्ट्रीय सामाजिक सहायता कार्यक्रम के अंतर्गत राजस्थान सरकार गरीबी रेखा से नीचे रहने वाले निवासियों, वृद्धों, एकल महिलाओं और गंभीर विकलांगता वाले लोगों को 1,150 रुपये की मासिक पेंशन देती है.
बुज़ुर्ग, ख़ासकर विधवा स्त्रियां, अक्सर बिगड़ती सेहत से जूझते हैं. हाशियाग्रस्त जातियों के ज़्यादातर लोग खेतों, खदानों या निर्माण कार्यों में काम करते हैं. पेंशन की राशि छोटी होती है, फिर भी उनके लिए जीविका का एक अहम ज़रिया है.
सांगरी देवी के लिए पेंशन उनके नियमित खर्चे का एकमात्र स्रोत थी और उन्होंने इसे बहाल करवाने के लिए बहुत कोशिश की. उनके बेटे गुज्जर ने बताया कि उन्होंने ई-मित्र या ग्राहक सेवा केंद्र से वार्षिक ऑनलाइन सत्यापन करवाने के लिए 260 रुपये का भुगतान किया था. वह देवी को बड़ी मुश्किल से स्थानीय पंचायत कार्यालय ले गए थे. फिर भी काम नहीं हुआ.
राज्य के रिकॉर्ड के अनुसार, उन्होंने पेंशन रजिस्ट्री में पात्र बने रहने के लिए खुद को जीवित नहीं बताया था, जबकि ऐसा करना ज़रूरी था.
पिछले साल दिसंबर से मई 2025 के बीच, मध्य राजस्थान में जिन नौ पेंशनभोगियों से द वायर ने मुलाकात की और उनका साक्षात्कार लिया, उनमें से दो – दपू देवी और अमरी देवी – का निधन हो गया. अपने जीवन के अंतिम हफ्तों में, वे अपनी आय के एकमात्र साधन से कट गए थे. एक अन्य पेंशनभोगी हंजा भील, जिनकी अब मृत्यु हो चुकी है, अपनी विधवा बहू की पेंशन बंद होने से बहुत चिंतित थीं, और दोनों में से किसी को भी यह समझ नहीं आ रहा था कि इसे कैसे ठीक किया जाए.
दलित, भील, पशुपालक गुज्जर, और अकेली बुजुर्ग स्त्रियां सबसे अधिक त्रस्त थीं. पिछले नवंबर में, कई पेंशनभोगियों ने दिल्ली में प्रेस वार्ता कर यह साबित करने की कोशिश की कि वे जीवित हैं.
मध्य राजस्थान के गांवों में, जहां एमकेएसएस संघ के कार्यरत हैं, और जिन्होंने पेंशनभोगियों के साथ मिलकर इन मामलों को आगे बढ़ाया, कुछ लोग अपनी पेंशन बहाल करवाने में कामयाब रहे. लेकिन कई पेंशनभोगी अपने नाम बहाल होने के बाद भी मुआवज़े का इंतज़ार कर रहे थे.
दूसरी जगहों पर, कई बुज़ुर्ग छह महीने बाद भी अपने रिकॉर्ड दुरुस्त नहीं करवा पाए हैं. मिसाल के तौर पर, उत्तरी राजस्थान के अलवर के तुलेहरा गांव में परभो देवी गुजरी को गलती से ‘राज्य से बाहर’ या यहां की निवासी न होने के रूप में दर्ज कर दिया गया था.
गुजरी को ‘डिमेंशिया’ है यानी उनकी यादाश्त ठीक नहीं, उनकी उम्र 80 साल से ज़्यादा है और वे पिछले तीन सालों से बिस्तर पर हैं. उनकी पेंशन जनवरी 2024 में बंद हो गई थी. उनके पोते जयसिंह और विजय गुजर ने बताया कि अब उनके बायोमेट्रिक्स आधार में उनके मूल नामांकन डेटा से मेल नहीं खाते, उनके उंगलियों के निशान भी मेल नहीं खाएंगे.
गुजरी बिस्तर पर बैठे-बैठे बुदबुदाईं, ‘मैं उन लोगों को कोसती हूं जिन्होंने मेरी पेंशन छीन ली- कुएं में गिर जाएं जाकर!’
जब अपनी उपस्थिति साबित करने के लिए उनका परिवार उन्हें मोटरसाइकिल पर पीछे बिठाकर अलग-अलग दफ्तरों में ले गया, उनके लिए गहरी त्रासदी का सबब बन गया.

250 किलोमीटर दूर, राज्य की राजधानी जयपुर में, पेंशन विभाग के अधिकारियों ने बताया कि 1 नवंबर, 2024 से 30 अप्रैल, 2025 के बीच 77,57,888 से ज़्यादा पेंशनर ने विभिन्न डिजिटल माध्यमों से अपनी पात्रता सत्यापित की है और उन्होंने स्वीकार किया कि 13 लाख से ज़्यादा पेंशनर अभी भी बचे हुए हैं.
सामाजिक कल्याण विभाग के एक अधिकारी ने कहा, ‘जब कोई सत्यापन के लिए नहीं आता है, तो हम पेंशन रोक देते हैं. पेंशनभोगी आकर सत्यापन करा सकता है और पेंशन ले सकता है,’ उन्होंने नाम न बताने की शर्त पर कहा कि उन्हें पत्रकारों से बात करने के अनुमति नहीं है.
ढेर सारी शिकायतों और समाचार रिपोर्ट्स के बाद सामाजिक न्याय विभाग के अतिरिक्त निदेशक हरि सिंह मीणा ने 2024 के अंत में कार्यकर्ताओं के साथ एक बैठक में लिखित आश्वासन दिया: विभाग भविष्य में पेंशन रद्द करने से पहले स्पष्ट कारण बताएगा. आंकड़ों में गड़बड़ी होने पर, पेंशन रोक दी जाएगी, लेकिन क्षेत्रीय अधिकारियों द्वारा सत्यापन के बिना उसे ‘रद्द’ नहीं किया जाएगा. 12 महीनों के बजाय गलती से बंद हुई पेंशन के 36 महीनों तक का बकाया दिया जा सकता है.
‘हमने ग्राम और प्रखंड विकास अधिकारियों को रद्द पेंशन को ‘फिर से खोलने’ का अधिकार दिया. हमने कहा कि स्थानीय कर्मचारी ग्राम सभा में ‘मृत्यु’ की पुष्टि कर सकते हैं,’ सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता विभाग के पूर्व निदेशक बीके अग्रवाल ने कहा, जिन्होंने पिछले साल पेंशन वितरण की देखरेख की थी.

‘आप के जन्म से कब्र तक’
राजस्थान के सबसे गरीब लोगों के लिए डिजिटल माध्यम के अभाव में कागज़ों में मृत्यु कोई नई बात नहीं है.
कांग्रेस सरकार और उसके बाद मोदी सरकार ने आधार को राष्ट्रीय स्तर पर एक डिजिटल पहचान पत्र के रूप में आगे बढ़ाया, यह तर्क देते हुए कि इससे कल्याणकारी योजनाएं उन लोगों तक पहुंचेंगी जिन्हें वास्तव में इसकी ज़रूरत है. लेकिन बायोमेट्रिक फिंगरप्रिंट स्कैनर अक्सर उम्र, मौसम या शारीरिक श्रम के कारण हुई खुरदुरी या उंगलियों की बदलती त्वचा को ठीक जांच नहीं पाते.
2015 में आधार के तहत नागरिकों की अधिकार क्या होंगे स्पष्ट करने वाला कानून अभी तक पारित नहीं हुआ था. फिर भी, राजस्थान सरकार ने आधार-आधारित भुगतान के तहत पेंशन भुगतान को डाकघरों से बैंकों में स्थानांतरित कर दिया. इसने उन हज़ारों लोगों के नाम काट दिए जिन्होंने आधार में नामांकन नहीं कराया था या बैंक खाता नहीं खुलवाया था.
अन्य लोगों को अयोग्य घोषित कर दिया गया क्योंकि ई-मित्र (ई-गवर्नेंस सेवा प्रदाता) ने लाभार्थियों के विवरण को उनके आधार नंबरों से जोड़ते समय गलतियां कीं.
नाम हटाने का दबाव
2015 और 2016 के बीच, राज्य सरकार ने बड़ी संख्या में – 2.9 लाख पेंशनभोगियों को – मृत घोषित कर दिया. जब समाचार दैनिक भास्कर के ज़िला पत्रकारों ने राज्य के 33 ज़िलों में से 28 के कई गांवों में घर-घर जाकर परिवारों का सर्वेक्षण किया, तो पाया कि उस समय मृत घोषित किए गए ज़्यादातर लोग अभी भी जीवित थे. लेकिन जून 2016 तक, राज्य सरकार ने दावा किया कि उसने 600 करोड़ रुपये बचा लिए हैं.
तब से, यह साबित करने का प्रशासनिक दबाव बढ़ा है कि डिजिटल तकनीकों ने धोखाधड़ी का पता लगाकर सार्वजनिक धन की बचत की है.
आईटी विभाग के एक वरिष्ठ अधिकारी ने बताया, ‘हर महीने की दस तारीख को भारत-प्रत्यक्ष लाभ अंतरण (डीबीटी) मिशन (केंद्रीय कैबिनेट सचिवालय के अधीन सीधे कार्यरत एक कार्यालय) जानकारी मांगता है, ‘आपने कितने फर्जी लाभार्थियों को हटाया?’ उन्होंने आगे बताया कि हर दूसरे कार्यालय पर ऐसा ही दबाव है.
पेंशन योजनाओं को मृत्यु रजिस्ट्री के साथ एकीकृत करके, राजस्थान के अधिकारी यह पता लगाने की कोशिश कर रहे हैं कि कौन मर चुका है और इसलिए अब पात्र नहीं है.
2018 में, मुंबई स्थित प्रौद्योगिकी निगम ऑरियनप्रो को राजस्थान के ‘सात शहरों के लिए सिटी सर्विलांस प्रोजेक्ट्स’ के लिए70 करोड़ रुपये का ठेका मिला था. 2022 में इसे शहरी नियोजन के लिए ‘देश का पहला 3-डी मॉडल’, या राजस्थान की राजधानी जयपुर का एक डिजिटल ट्विन बनाने के लिए 180 करोड़ रुपये का ठेका मिला.
राजस्थान के अलावा, इस आईटी कंपनी को पिछले छह वर्षों में मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र और दिल्ली सरकारों से कुल 400 करोड़ रुपये से अधिक मूल्य के निगरानी ठेके मिले हैं.
कंपनी ने 22 जुलाई को द वायर द्वारा ईमेल पर भेजे गए उन सवालों का जवाब नहीं दिया, जिनमें पूछा गया था कि वह सार्वजनिक योजनाओं और सार्वजनिक क्षेत्र से डेटा गोपनीयता, गुमनामी, डेटा और मेटाडेटा की सुरक्षा कैसे सुनिश्चित करती है.
राज्य के आईटी विभाग के अंतर्गत आने वाले जन आधार प्राधिकरण के अतिरिक्त निदेशक सीताराम स्वरूप ने कहा, ‘पहले हमारे पास यह जानने का कोई तरीका नहीं था कि कल्याणकारी सूची में शामिल किसी व्यक्ति की मृत्यु हुई है या नहीं.’
उन्होंने आगे जोड़ा, ‘अगर किसी परिवार के दो या तीन सदस्यों की मृत्यु भी हो जाती, तो भी परिवार को कुछ महीनों तक पांच किलो राशन या पेंशन मिलती रहती थी. जब हम आधार से प्रमाणीकरण करते हैं, तो डेटाबेस प्रमाणित और मज़बूत होता है. जैसे ही मृत्यु प्रमाण पत्र ऑनलाइन होता है, इसकी सूचना पेंशन पोर्टल पर तुरंत मिल जाती है.’

कोरोना महामारी के अंत तक राज्य ने डिजिटल परीक्षण को और कड़ा कर दिया. जिन लोगों के रिकॉर्ड में थोड़ी सी भी गड़बड़ी थी, उन्हें समस्याओं का सामना करना पड़ा. अधूरे आंकड़ों के कारण लोग या तो परेशान हो गए या उनकी पेंशन की पात्रता समाप्त हो गई.
अजमेर जिले के देवता पंचायत के नयागांव में, नेनी देवी जांगिड़ दो साल तक पेंशन से वंचित रहीं. उन्हें ‘राज्य से बाहर’ घोषित कर दिया गया क्योंकि वे खुद को डिजिटल रूप से प्रमाणित नहीं कर सकीं, क्योंकि उनके हाथ और चेहरा स्थिर नहीं रह पाते. उनकी उम्र 70 से ज़्यादा है. उनके पास पांच पहचान पत्र हैं, जहां उनकी जन्मतिथि 1944 और 1953 के बीच है.
उनके बेटे बालू सिंह जांगिड़ ई-रिक्शा चलाते हैं, जो उन्हें चार बार ई-मित्र और ब्लॉक कार्यालय ले गए. जब परिवार अपने संघर्ष के बारे में बता रहा था, तो जांगिड़ स्टील के कटोरे से चाय पीने की कोशिश कर रही थीं, लेकिन उनका चेहरा और दुबले हाथ लगातार कांप रहे थे.
वरिष्ठ कार्यकर्ता शंकर सिंह मध्य राजस्थान के गांवों में पले-बढ़े हैं. उन्होंने 2000 में राजस्थान सरकार द्वारा पारित एक अग्रणी पारदर्शिता कानून के विरोध में कई आंदोलनों का आयोजन और उनमें भाग लिया और एमकेएसएस के सह-संस्थापक भी रहे. उन्होंने कहा कि डिजिटल तकनीकों की ओर रुख जयपुर में सत्ता के केंद्रीकरण और असमानताओं को बढ़ाने वाला रहा है.
‘भील, गुज्जर, और अन्य पिछड़े वर्ग के परिवार गहरे संकट में जी रहे हैं. आप उनके खाली घरों और अक्सर कुपोषित बच्चों को देखकर ही यह अंदाजा लगा सकते हैं कि यह कितना कठिन है.’
‘उनके लिए यह पेंशन जीवन का सहारा है. लेकिन ‘ऑनलाइन’ के दौर में, कोई नहीं बताता कि इन खामियों को सुधारने की ज़िम्मेदारी किसके पास है?’

बढ़ता केंद्रीकरण
सामाजिक सुरक्षा और बेहतर करने की पैरवी करने वाली विकास अर्थशास्त्री दीपा सिन्हा ने कहा कि कि ऑटोमेशन ने उन लोगों के लिए अपने को जीवित साबित करना बहुत मुश्किल कर दिया है जो डिजिटल तकनीक तक पहुंच नहीं पा रहे है.
‘ऐसा लगता है, जैसे सरकार सिर्फ़ एक कंप्यूटर इंटरफ़ेस बन गई है. गांव और ब्लॉक स्तर के अधिकारी कहते हैं कि ‘वे कुछ नहीं कर सकते’ क्योंकि कोई सॉफ़्टवेयर काम नहीं कर रहा है, या कोई पोर्टल उस दिन काम नहीं कर रहा है.’
(अनुमेहा यादव स्वतंत्र पत्रकार हैं, श्रम और ग्रामीण नीति पर केंद्रित रिपोर्टिंग करती हैं.)
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(यह रिपोर्ट पुलित्जर सेंटर के सहयोग से की गई है. अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें.)
