अस्सी के हुए नंद किशोर आचार्य: समाजवादी दृष्टि के कवि

कभी-कभार | अशोक वाजपेयी: हिंदी में एक ध्रुवीकरण प्रगतिशीलता-जनवाद बरक़्स कलावाद के रूप में बन गया है. इस पर ध्यान नहीं गया कि इस ध्रुवीकरण ने उस बड़ी जगह को हिसाब में ही नहीं लिया जिसमें समाजवादी दृष्टि से प्रेरित अनेक लेखक सक्रिय थे और हैं. नंद किशोर आचार्य इसी धारा के लेखक हैं.

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नंदकिशोर आचार्य उत्तर के नहीं, प्रश्न के कवि हैं. (फोटो साभार: सोशल मीडिया)

नंदकिशोर आचार्य मेरे पुराने मित्र, सहचर और सहयोगी रहे हैं. वे इधर अस्सी के हो गए और ग्वालियर के अत्यन्त सुरम्य और शिल्प-बहुल परिसर में, आईटीएम विश्वविद्यालय के एक आयोजन में भाग लेने का सुयोग हुआ जो आचार्य जी पर केंद्रित था. उसमें महेश कटारे, पवन करण, वंदना राग, सुप्रिया पाठक आदि ने भी उनके बारे में कई दिलचस्प बातें कहीं. यह देखकर अच्छा लगा कि उनके लिए व्यापक हिंदी समाज में सद्भाव है.

आचार्य जी ने मेरी कविता और आलोचना आदि पर गंभीरता से लिखा है. इस कारण, और उनके लिखे का वितान इतना विपुल-विशद है कि कुछ कहने में मुझे संकोच होता है. फिर भी, उनके कुछ पक्षों पर ध्यान देना ज़रूरी लगा.

हिंदी में पिछले चार-पांच दशकों से एक ध्रुवीकरण प्रगतिशीलता-जनवाद बरक़्स कलावाद के रूप में रूढ़ और लोकप्रिय है. इस पर ध्यान नहीं गया कि इस ध्रुवीकरण ने उस बड़ी जगह को हिसाब में ही नहीं लिया जिसमें समाजवादी दृष्टि से प्रेरित अनेक लेखक सक्रिय थे और हैं. आचार्य जी इसी धारा के एक लेखक हैं और उन्होंने कई तरह से इस समाजधर्मी चिंतन, उसके प्रतिफल, उसकी स्थिति-नियति पर गहन विचार किया है. बहुत सारे लेखक, जिन्हें कलावादी कहकर लांछित किया जाता रहा है, इसी धारा में या उसके निकट रहे हैं.

आचार्य जी के बारे में मुझे तीन अवधारणात्मक त्रयियां सूझती हैं: पहली, समय-सौंदर्य-संघर्ष की, दूसरी आत्म-अंतर्लोक-अध्यात्म की और तीसरी, परंपरा-आधुनिकता-विवेक की. उनका रचनात्मक साहित्य और उससे अलग बौद्धिक चिंतन और मीमांसा इन्हीं अवधारणाओं से समझा-सराहा जा सकता है.

उनके यहां समय की भंगुरता और सनातनता; सौंदर्य की कोमलता-लालित्य; प्रकृति से संवाद और क्षरण; सामाजिक संघर्ष और अंतसंघर्ष; आत्म के आवास, तनाव और मुक्ति के प्रसंग; अंतर्लोक की सूक्ष्मता और जटिलता; उससे बहिर्लोक के संबंध-संवाद-तनाव; अध्यात्म में मानवीय स्थिति-नियति और बृहत् के स्पन्दन; परंपरा में बहुलता, जिज्ञासा और प्रश्नाकुलता, असहमति और अंतर्विरोध; आधुनिकता की अनिवार्यता, विकल्प की खोज, विफलता और संभावनाएं और बुद्धि-विवेक, काव्य-विवेक और सांस्कृतिक विवेक आदि सभी किसी न किसी रूपायन में मौजूद हैं.

आजकल कविता में बहुत शोरगुल, चीख़-पुकार और आत्मरति है- नंदकिशोर जी मंद स्वर के, आत्मान्वेषण के कवि हैं. उनके एक संग्रह का नाम है ‘रेतराग’. वे मिट्टी के धनधान्य के नहीं, रेत और मरुस्थल के कवि हैं- उसकी भंगुरता लेकिन ऊष्मा और आर्द्रता के कवि. उनकी अनेक कविताएं प्रश्न में समाप्त होती हैं: वे उत्तर के नहीं, प्रश्न के कवि हैं.

उन्हें किसी धार्मिक नहीं बल्कि वैचारिक अर्थ में आस्था का कवि भी कहा जा सकता है. उनकी धार्मिक नहीं, वैचारिक आस्था है. वे भौतिक-सामाजिक जीवन, उसकी परिवर्तनशीलता और संभावना पर भरोसा करते हैं. वे मानते हैं कि हमारा अंतर्लोक उतना ही सच है जितना हमारा बर्हिलोक. स्वतंत्रता-समता-न्याय उनके वरेण्य और प्रेरक मूल्य हैं.

आचार्य जी के कृतित्व और सक्रियता का एक मूल्यवान् पक्ष उनका अहिंसा पर काम है. अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय में, उसके संस्कृति विद्यापीठ के अंतर्गत, अहिंसा पर एक पूरा विस्तृत पाठ्यक्रम उन्होंने बनाया और बरसों उसे पढ़ाया. अहिंसा का संभवतः एकमात्र विश्वकोष उन्होंने ही बनाया है.

पारंपरिक और आधुनिक विचार को निरंतरता में देखते हुए आचार्य जी ने भारत की ज्ञान परंपरा का प्रामाणिक अवगाहन किया है. इस ज्ञान परंपरा को संकीर्ण बनाने-पढ़ाने का जो व्यापक दुष्चक्र इस समय चल रहा है, यह प्रयत्न उसका सशक्त वैचारिक प्रतिरोध है.

कला और जीवन

आइटीएम विश्वविद्यालय के परिसर में एक ग्लोबल स्कूल भी है. वह इस मायने में अनोखा है कि उसमें हर छात्र को किसी न किसी कला का प्रशिक्षण लेना अनिवार्य है. अनेक राष्ट्रीय और विदेशी मूर्तिकारों द्वारा बनाए गए शिल्पों से सुशोभित परिसर में इस स्कूल में विभिन्न कलाओं में सीखने के लिए अनेक स्टूडियो हैं जिनमें कई बच्चे कुछ करते-सीखते-रचते नज़र आए. उसके अपेक्षाकृत अधिक परिपक्व बच्चों से कला और जीवन पर मैंने बात की.

विषय तो घोषित था ‘कला और जीवन’ पर मैंने शुरू से ही यह स्पष्ट किया जीवन पहले होता है, कला बाद में. बिना जीवन के कला संभव नहीं: कला मनुष्य की अनोखी रचना है. प्रकृति, पशु-पक्षी, वनस्पति आदि में कुछ कलात्मक लग सकता है पर वे कला नहीं रचते- वैसा करना तो सिर्फ़ मनुष्य के जिम्मे है.

कला जीवन पर इसरार करती है, वह खोज भी है और अभिव्यक्ति भी. वह जीवन का विस्तार भी होती है. कला हमें ध्यान से, समझ और संवेदना से देखना-सुनना-समझना सिखाती है. ऐसा बहुत सा हमारे इर्दगिर्द होता है, लगातार घटता रहता है जिसे हम नोटिस में नहीं लेते. कला इस अलक्षित को हमारे देखने-सुनने के अहाते में लाती है.

हमें समझ में आता है कि प्रकृति का, पेड़-पौधों-फूलों-पक्षियों-प्राणियों, चीज़ों का अपना जीवन और अस्तित्व है और हमारा मानवीय जीवन उन पर बहुत निर्भर है.

दूसरे हैं और हम जैसे ही हैं. कला हम और वे का द्वैत ध्वस्त करती है.

कला हमें याद दिलाती है- वह जिसे हम भूल गए हैं. वह कई बार भूलने के विरुद्ध कार्रवाई होती है. कोई जीवनदृश्य या प्रसंग, कोई घटना या अनुभव, कोई संबंध या उपस्थिति, कोई रंग या रंगत, कोई मर्म या घाव जो हम भूल चुके हैं, कला हमारे लिए सहेजती और हमें उनके पास लाती है. कला स्मृति का कर्म होती है.

बिना कल्पना के कला संभव नहीं. वैसे ही जैसे बिना स्वप्न के सचाई संभव नहीं. कला हमें विकल्प खोजने-पाने में मदद करती है. कला सिर्फ़ सचाई का अन्वेषण या खोज पर नहीं होती, वह सचाई में कुछ न कुछ जोड़ती भी है: वह सचाई का विस्तार, उसमें इजाफ़ा होती है.

कला धीरज का मामला होती है: उसमें हड़बड़ी या भागदौड़ की जगह नहीं होती. वह हमें भावावेग में होते हुए भी ठिठकाती है; हमारी तेज़ी-तुर्शी को मंद रहती है; हमें धीरज और संयम का पाठ सिखाती है.

जैसे जीवन अपर्याप्त होता है, समय अपर्याप्त होता है, कला भी अपर्याप्त होती है. वह हमारे चाहे-अनचाहे, हमें अपनी अपर्याप्तता का गहरा बोध कराती है. वह हमें सिखाती-जताती है कि अपर्याप्त और आधे-अधूरे होने के बावजूद जीवन में अर्थ और गरिमा संभव हैं. जो है उसमें धंसे रहकर भी जो नहीं है उसका सपना देखा जा सकता है.

अगर अपने से कहीं अलग हमें अपनी मानवीयता का सत्यापन दरकार है, तो वह सहज ही हमें कला से मिल सकता है. कला, प्रथमतः और अंततः, जीवन का, हमारी मनुष्यता का सत्यापन होती है.

(लेखक वरिष्ठ साहित्यकार हैं.)