नागपुर: छह साल बाद बरी हुई आदिवासी महिला, जेल से निकलते ही पुलिस ने बिना नोटिस फिर पकड़ा

30 वर्षीय पार्वती संडमेक कथित माओवादी संबंध के मामले में छह साल जेल में बिताने और पांच केसों में बरी होने के बाद 30 अक्टूबर नागपुर केंद्रीय कारागार से रिहा हुई थीं. जैसे ही वह जेल से बाहर निकलीं, पुलिस की एक टीम बिना किसी वॉरंट या नोटिस के उन्हें अपने साथ ले गई.

नागपुर केंद्रीय कारागार. (फाइल फोटो: home.maharashtra.gov.in.)

मुंबई: छह साल जेल में बिताने और पांच मामलों में बरी होने के बाद 30 वर्षीय पार्वती संडमेक को 30 अक्टूबर नागपुर केंद्रीय कारागार से रिहा होना था. उनके पति बिरजू पोंगोटी जेल के गेट पर खड़े होकर उनका स्वागत करने और गढ़चिरौली के अंदरूनी इलाके में स्थित अपने गृहनगर लौटने का इंतज़ार कर रहे थे.

दोपहर करीब 2:30 बजे जैसे ही संडमेक जेल से बाहर निकलीं, सादे कपड़ों में खड़ी पुलिस की एक टीम उन्हें पुलिस जीप में बिठाकर ले गई. कोई वॉरंट नहीं, कोई नोटिस नहीं, और न ही पोंगोटी या उनके परिवार के किसी अन्य सदस्य को कोई जानकारी दी गई.

गढ़चिरौली के भामरागढ़ तालुका के मदवेली नामक एक गुमनाम गांव की रहने वाली और माडिया समुदाय से ताल्लुक रखने वाली संडमेक को 2018 में कथित माओवादी संबंधों के आरोप में गिरफ्तार किया गया था. पुलिस का दावा था कि वह प्रतिबंधित भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी) की भामरागढ़ इकाई से जुड़ी थी.

उन पर पांच मामलों में मुकदमा चला. निचली अदालत ने उन्हें चार मामलों में बरी कर दिया और एक मामले में उन्हें दोषी ठहराया गया और दस साल की सज़ा सुनाई गई. हालांकि बाद में इस साल की शुरुआत में बॉम्बे हाईकोर्ट की नागपुर पीठ ने उन्हें बरी कर दिया.

पोंगोटी, जो सुबह से नागपुर केंद्रीय कारागार में पत्नी के बाहर आने का इंतज़ार कर रहे थे, ने द वायर को बताया कि जैसे ही संडमेक बाहर निकलीं, कुछ पुरुषों और एक महिला ने उन्हें एक वैन में डाल दिया और कहा कि वे उन्हें गढ़चिरौली ले जा रहे हैं.

पोंगोटी ने दावा किया, ‘मैंने ज़ोर देकर कहा कि वे मुझे कोई कानूनी दस्तावेज़ दिखाएं जिससे यह साबित हो सके कि वे वास्तव में पुलिस हैं और मेरी पत्नी को वैध रूप से पुलिस स्टेशन ले जाया जा रहा है. लेकिन उन्होंने इनकार कर दिया.’

पोंगोटी को भी लगभग 13 साल की कैद हुई और उन पर 50 से ज़्यादा मामले दर्ज थे. इस साल अगस्त में एक मामले को छोड़कर बाकी सभी में बरी होने के बाद उन्हें रिहा कर दिया गया. उन्होंने बताया, ‘मेरे ख़िलाफ़ एक मामला लंबित है, लेकिन अदालत ने मुझे ज़मानत दे दी.’

ये दोनों एक दशक से भी ज़्यादा समय बाद पहली बार साथ रहने वाले थे.

जैसे ही संडमेक को ले जाया गया, उनके वकील आकाश सोर्डे ने स्थानीय धंतोली थाने का रुख किया, जिसके अंतर्गत नागपुर सेंट्रल जेल आती है. सोर्डे ने द वायर को बताया कि पुलिस ने संडमेक के ‘अपहरण’ की एफआईआर दर्ज करने से इनकार कर दिया.

उन्होंने कहा, ‘संडमेक को जेल से रिहा कर दिया गया और यह आधिकारिक तौर पर दर्ज है. उन्हें एक जीप में ले जाया गया जो पुलिस की लग रही थी. लेकिन उनका ठिकाना पता नहीं था. इसलिए, हमने उनके अपहरण की एफआईआर तुरंत दर्ज करने की मांग की. लेकिन पुलिस ने इनकार कर दिया.’

सोर्डे का दावा है कि उन्होंने नागपुर पुलिस और गढ़चिरौली के भामरागढ़ तालुका के उप-विभागीय पुलिस अधिकारी अमर मोहिते को सूचित किया था कि अगर संडमेक शाम तक परिवार के पास नहीं लौटी, तो वह हाईकोर्ट में बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका दायर करेंगे.

सोर्डे ने दावा किया, ‘इसके तुरंत बाद मुझे फोन आने लगे कि संडमेक को केवल भविष्य में किसी भी नक्सली (माओवादी के लिए इस्तेमाल होने वाला शब्द) गतिविधियों में शामिल न होने की चेतावनी देने के लिए ले जाया गया है.’

पुलिस संडमेक को गढ़चिरौली ले जाने वाली थी, लेकिन सोर्डे द्वारा धंतोली थाने में दी गई आधिकारिक शिकायत और पुलिस को यह कहने कि वह जल्द ही बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका दायर करेंगे, भामरागढ़ पुलिस ने संडमेक को छोड़ने का फैसला किया.

पोंगोटी ने दावा किया कि शाम तक पुलिस बार-बार उन्हें फोन करके संडमेक को ले जाने के लिए कहने लगी. रात करीब 10:30 बजे, पोंगोटी नागपुर जेल से लगभग 151 किलोमीटर दूर चंद्रपुर जिले के बंगाली कैंप पहुंचे, जहां पुलिस संडमेक के साथ इंतज़ार कर रही थी.

उन्होंने रात करीब 10:30 बजे द वायर को बताया, ‘मेरी पत्नी यहां है और पुलिस उनका बयान दर्ज कर रही है. वे चाहते हैं कि मैं उन्हें अपने साथ ले जाऊं.’

जब द वायर ने मोहिते से संपर्क किया, तो उन्होंने पोंगोटी और उनके वकील सोर्डे दोनों के दावों का खंडन किया.

मोहिते ने पहले दावा किया, ‘संडमेक के खिलाफ कई मामले लंबित हैं. उन्हें दूसरे जिले में ले जाने की हमारी कोई योजना नहीं थी.’

यह पूछे जाने पर कि क्या संडमेक को हिरासत में लेने से पहले कोई वॉरंट जारी किया गया था या कोई नोटिस दिया गया था, मोहिते ने दावा किया, ‘हमने उसे गिरफ्तार नहीं किया था, और सिर्फ़ पूछताछ के लिए उसे हिरासत में लेने के लिए किसी कानूनी दस्तावेज़ की ज़रूरत नहीं होती.’

कानून का उल्लंघन

मोहिते के दावे न केवल क़ानून के तहत अनिवार्य प्रक्रिया के विपरीत हैं, बल्कि सुप्रीम कोर्ट द्वारा बार-बार दिए गए फ़ैसलों और सख़्तियों का भी उल्लंघन करते हैं.

यह पहली बार नहीं है कि कथित माओवादी संबंधों के आरोप में किसी व्यक्ति को जेल से रिहा किया गया हो और पुलिस उसे तुरंत अपने साथ ले गई हो.

2011 में जब मानवाधिकार कार्यकर्ता और वकील अरुण फरेरा चार साल की कैद के बाद नागपुर जेल से रिहा हुए, तो उन्हें पुलिस के एक अन्य समूह ने उठा लिया.

हालांकि, मोहिते ने दावा किया कि संडमेक की हिरासत ज़रूरी थी क्योंकि एक पुराने मामले में उनके खिलाफ गैर-जमानती वॉरंट लंबित था.

जब उनसे पूछा गया कि जब वह न्यायिक हिरासत में थीं और यह बात पुलिस और अदालतों दोनों को अच्छी तरह पता थी, तब भी उनके खिलाफ गैर-जमानती वॉरंट क्यों जारी किया गया, तो मोहिते ने रिपोर्टर से इस खबर को प्रकाशित न करने का आग्रह किया.

उन्होंने दावा किया, ‘इन लोगों के ख़िलाफ़ कई मामले लंबित हैं. कई बार गैर-ज़मानती वॉरंट जारी हो जाता है और वह लंबित ही रहता है, और हमसे अपेक्षा की जाती है कि जैसे ही व्यक्ति जेल से बाहर आए, हम गैर-ज़मानती वॉरंट की तामील कर दें.’

(इस रिपोर्ट को अंग्रेजी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें.)