एल्गार परिषद केस: बिना ट्रायल के जेल में पांच साल से अधिक रहने के बाद हेनी बाबू को ज़मानत मिली

बॉम्बे हाईकोर्ट ने एल्गार परिषद केस में गिरफ़्तार किए गए दिल्ली यूनिवर्सिटी के एसोसिएट प्रोफेसर हेनी बाबू को मुकदमे में देरी के आधार पर ज़मानत दे दी. वह 28 जुलाई 2020 से मुंबई के तलोजा जेल में बंद हैं. एनआईए ने उनके ज़मानत का विरोध करते हुए आदेश पर रोक लगाने की मांग की. अदालत ने अनुरोध को ख़ारिज कर दिया.

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हेनी बाबू. (फोटो साभार: ट्विटर)

मुंबई: बॉम्बे हाईकोर्ट ने गुरुवर (4 दिसंबर) दिल्ली यूनिवर्सिटी के एसोसिएट प्रोफेसर हेनी बाबू को बिना ट्रायल के पांच साल चार महीने जेल में रखने को ‘बहुत ज़्यादा देरी’ बताया और जमानत दे दी. उन्हें एल्गार परिषद केस में गिरफ्तार किया गया था.

इस साल की शुरुआत में दी गई जमानत अर्जी पर 3 अक्टूबर को बहस पूरी होने के बाद फैसला सुरक्षित रख लिया गया था, जिस पर गुरुवार को जस्टिस अजय एस. गडकरी और जस्टिस रंजीतसिंह आर. भोंसले की पीठ ने फैसला सुनाया.

अदालत द्वारा उन्हें जमानत दिए जाने के तुरंत बाद मामले की जांच कर रही राष्ट्रीय जांच एजेंसी (एनआईए) ने आदेश पर रोक लगाने का अनुरोध किया, ताकि वह इसके खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में अपील कर सके.

बॉम्बे हाईकोर्ट ने इस अनुरोध को खारिज कर दिया. अदालत ने कहा, ‘आवेदक पहले ही पांच से अधिक वर्ष जेल में बिता चुका है.’

बाबू को एक लाख रुपये के निजी मुचलके और उतनी ही राशि की जमानतदारों पर जमानत दी गई.

जमानत आवेदन पर बहस करते हुए बाबू के वकील युग मोहित चौधरी ने उनके सह-आरोपियों रोना विल्सन और सुधीर धावले को मिली जमानत का हवाला दिया. अदालत ने इस वर्ष 8 जनवरी को उन्हें जमानत देते समय निचली अदालत को नौ महीनों के भीतर मुकदमे की कार्यवाही पूरी करने का निर्देश दिया था. इस दिशा में अब तक कोई प्रगति नहीं हुई है.

एनआईए की ओर से बाबू की जमानत का विरोध करते हुए अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल अनिल सिंह और अधिवक्ता चिंतन शाह ने तर्क दिया कि बाबू की कारावास अवधि अन्य सह-आरोपियों की तुलना में कम है. बाबू, जिन्हें 28 जुलाई 2020 को गिरफ्तार किया गया था, तब से मुंबई के उपनगरीय इलाके में स्थित तिहाड़ा (तलोजा) केंद्रीय जेल में बंद हैं.

जेल में रहते हुए बाबू कई बार बीमार पड़े और कोविड-19 महामारी के दौरान गंभीर आंख के संक्रमण के बाद उन्हें अस्पताल में भर्ती कराना पड़ा था. कानून की डिग्री रखने वाले बाबू ने जेल में रहते हुए भी कई महत्वपूर्ण और अकादमिक लेख लिखे हैं. उनके कुछ लेख द वायर में प्रकाशित भी हुए हैं.

बाबू की पत्नी, जेनी रोवेना, जो दिल्ली यूनिवर्सिटी में अकादमिक हैं और उनकी गिरफ्तारी के बाद से लगातार दिल्ली और मुंबई के बीच यात्रा कर रही हैं, ने कहा कि उनके पास शब्द नहीं हैं. उन्होंने द वायर को फोन पर बताया, ‘हमने उनकी रिहाई के लिए बहुत लंबा इंतज़ार किया है, और अब जब यह सच में हो रहा है, तो मैं अपने आंसू रोक नहीं पा रही हूं.’

इस जमानत आवेदन से पहले बाबू के वकील ने कई आवेदन दायर किए थे, जिनमें केस से उन्हें बरी करने का आवेदन भी शामिल था.

इस वर्ष मई में एएसजी सिंह और शाह ने बाबू की याचिका का विरोध किया, यह कहते हुए कि 2024 में दायर उनकी अपील – जो कि दो साल से भी अधिक देरी से दायर की गई – फरवरी 2022 में ट्रायल कोर्ट द्वारा जमानत खारिज करने के आदेश को चुनौती दी गई थी, स्वकार्य नहीं है. सिंह का तर्क था कि ट्रायल कोर्ट के आदेश को बाबू ने पहले ही हाईकोर्ट में चुनौती दी थी और हाईकोर्ट की समन्वित पीठ ने सितंबर 2022 में उसे खारिज कर दिया था.

पिछले वर्ष मई में सुप्रीम कोर्ट ने उनकी अपील इस आधार पर खारिज कर दी थी कि उन्होंने उसे आगे नहीं बढ़ाया. सिंह ने जोड़ा कि सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट के आदेश में हस्तक्षेप नहीं किया, इसलिए बाबू को ट्रायल कोर्ट में एक नई याचिका दायर करनी चाहिए थी.

उनके इस तर्क पर बाबू के वकील चौधरी ने अदालत से कहा कि वह फरवरी 2022 के ट्रायल कोर्ट आदेश को चुनौती देने वाली अपनी अर्जी हटाने को तैयार हैं, और हाईकोर्ट उनकी याचिका को मुकदमे में अत्यधिक देरी के आधार पर नियमित जमानत आवेदन की तरह विचार कर सकता है.

गुरुवार का आदेश मुकदमे में देरी के आधार पर दिया गया है, न कि मामले के गुण-दोष पर.

उल्लेखनीय है कि 2018 में दर्ज किए गए एल्गार परिषद मामले में 16 लोगों को गिफ्तार किया गया था. इनमें से झारखंड के 84 वर्षीय पादरी और आदिवासी अधिकार कार्यकर्ता फादर स्टेन स्वामी की जुलाई 2021 में हिरासत में मृत्यु हो गई. उनके वकील और समर्थकों ने जेल अधिकारियों पर चिकित्सीय लापरवाही का आरोप लगाया है.

अन्य जिन लोगों को गिरफ्तार किया गया, उनमें प्रमुख वकील, कार्यकर्ता और शिक्षाविद शामिल थे, जिन्हें राज्य पुलिस और बाद में एनआईए ने प्रतिबंधित भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी) का सदस्य बताया है.

कुल 10 आरोपियों—वरवरा राव, सुधा भारद्वाज, आनंद तेलतुंबडे, वर्णन गोंजाल्विस, अरुण फरेरा, शोमा सेन, गौतम नवलखा, सुधीर धवले और रोना विल्सन – को जमानत मिल चुकी है और वे रिहा हो चुके हैं. पिछले महीने सुप्रीम कोर्ट ने ज्योति जगताप को अंतरिम जमानत दी. आरोपी महेश राउत को भी सुप्रीम कोर्ट ने छह हफ्ते की मेडिकल जमानत पर रिहा किया था, जिसे बाद में बढ़ाया गया.

वकील सुरेंद्र गाडलिंग और सांस्कृतिक कलाकार तथा कार्यकर्ता सागर गोरखे और रमेश गायचोर को अभी नियमित जमानत नहीं मिली है.

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