सुप्रीम कोर्ट ने सरकार से पूछा- ‘मणिपुर टेप्स’ की पूरी क्लिप फॉरेंसिक जांच को क्यों नहीं भेजी गई?

सुप्रीम कोर्ट ने सरकार से पूछा कि 2023 की जातीय हिंसा में मणिपुर के पूर्व मुख्यमंत्री एन. बीरेन सिंह की भूमिका की ओर इशारा करने वाली लीक हुई पूरी ऑडियो क्लिप को फॉरेंसिक जांच के लिए क्यों भेजा गया. इससे पहले भी सुप्रीम कोर्ट केंद्रीय फॉरेंसिक विज्ञान प्रयोगशाला द्वारा लीक हुई पूर्व मुख्यमंत्री एन. बीरेन सिंह के कथित ऑडियो टेप की जांच के तरीके पर कड़ी नाराजगी जताई थी.

कुकी ऑर्गनाइज़ेशन फॉर ह्यूमन राइट्स (कोहूर) ने एक हलफनामा में आरोप लगाया है कि मणिपुर पुलिस ने पूरी 48 मिनट 46 सेकंड की रिकॉर्डिंग के बजाय बहुत ज़्यादा काटे गए ऑडियो क्लिप्स फोरेंसिक जांच के लिए भेजे. (फोटो: पीटीआई और एक्स)

नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार (15 दिसंबर) को सरकार से पूछा कि 2023 की जातीय हिंसा में मणिपुर के पूर्व मुख्यमंत्री एन. बीरेन सिंह की भूमिका की ओर इशारा करने वाली लीक हुई पूरी ऑडियो क्लिप को फॉरेंसिक जांच के लिए क्यों भेजा गया.

द हिंदू की रिपोर्ट के मुताबिक, सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि 20 नवंबर को याचिकाकर्ताओं की ओर से दायर हलफनामे से वह ‘थोड़ा परेशान’ है, जिसमें कहा गया है कि फॉरेंसिक जांच के लिए ‘केवल चुनिंदा क्लिपिंग ही भेजी गई थीं.’

गुजरात के नेशनल फॉरेंसिक साइंस लेबोरेटरी (एनएफएसएल) ने पहले लगभग क्लीन चिट देते हुए कहा था कि उसे भेजी गई लीक हुई ऑडियो क्लिप के साथ ‘छेड़छाड़ की गई थी.’

द टेलीग्राफ के अनुसार, जस्टिस संजय कुमार और आलोक अराधे की पीठ ने मणिपुर सरकार का प्रतिनिधित्व कर रही एडिशनल सॉलिसिटर-जनरल ऐश्वर्या भाटी से पूछा, ‘कृपया हमें बताएं कि जब पूरी टेप आपके पास उपलब्ध थी, तो पूरी टेप एनएफएसएल को भेजी जानी चाहिए थी…. आपने यह चुनिंदा हिस्सा क्यों भेजा?’

याचिकाकर्ताओं की ओर से पेश हुए वकील प्रशांत भूषण ने कहा कि शायद उनके द्वारा दायर की गई सभी ऑडियो क्लिप एनएफएसएल को नहीं भेजी गईं. उन्होंने कहा कि टेप लगभग 56 मिनट लंबे थे और याचिकाकर्ताओं ने कोर्ट में 48 मिनट की क्लिप दायर की थी.

उन्होंने कहा कि बाकी हिस्से में रिकॉर्डिंग करने वाले व्यक्ति की पहचान है और अगर उनकी पहचान बताई गई, तो उसकी जान को खतरा हो सकता है.

कोहूर डॉक्यूमेंट के मुताबिक, मणिपुर के साइबर क्राइम्स के पुलिस सुपरिटेंडेंट के ऑफिस ने फॉरेंसिक लैब को सिर्फ़ चार क्लिप भेजीं, जो 30 सेकेंड, 36 सेकेंड, 1 मिनट 28 सेकेंड और 1 मिनट 47 सेकेंड की थीं. इसमें कहा गया कि पूरी रिकॉर्डिंग रोककर, अधिकारियों ने एक्सपर्ट्स को इसकी असलियत की जांच करने से रोका, जिससे नेशनल फॉरेंसिक साइंसेज यूनिवर्सिटी और सेंट्रल फॉरेंसिक साइंस लैबोरेटरी को कोई नतीजा नहीं मिला.

इस मामले में पेश हुईं एडिशनल सॉलिसिटर जनरल ऐश्वर्या भाटी ने हलफनामे का जवाब देने के लिए एक हफ्ते का समय मांगा. पीठ ने याचिकाकर्ता के दावे पर जवाबी हलफनामा दाखिल करने के लिए राज्य को एक और हफ़्ते का समय देते हुए पूछा, ‘हम इस पर अपना समय फिर से क्यों बर्बाद करें?’

कोर्ट ने मामले की अगली सुनवाई के लिए 7 जनवरी की तारीख तय की.

बता दें कि 5 मई, 2025 की तारीख वाली टेप पर सीएफएसएल की पहली रिपोर्ट को कोर्ट ने ठीक नहीं पाया और नई जांच का आदेश दिया, फिर भी यह पक्का नहीं हो सका कि आवाज़ बीरेन सिंह से मेल खाती है या नहीं. इसके बाद गांधीनगर की नेशनल फॉरेंसिक साइंस यूनिवर्सिटी (एनएफएसयू) ने ऑडियो की जांच की. खबर है कि इसमें एडिटिंग और हेरफेर के निशान मिले और कहा गया कि टेप भरोसेमंद आवाज़ की तुलना के लिए सही नहीं हैं.

दूसरी ओर, कोहूर ने ट्रुथ लैब्स नाम की एक प्राइवेट फॉरेंसिक एजेंसी के फॉरेंसिक असेसमेंट पर भरोसा किया, जिसे 48 मिनट और 46 सेकेंड की रिकॉर्डिंग और यूट्यूब और दूसरे सोर्स से कई आवाज़ के सैंपल दिए गए थे. ट्रुथ लैब्स ने यह नतीजा निकाला कि 93% संभावना है कि आवाज़ मुख्यमंत्री से मेल खाती है.

इस आधार पर कोहूर ने आरोप लगाया है कि सरकारी फॉरेंसिक एजेंसियों के नतीजे पक्के नहीं हैं क्योंकि राज्य ने एनालिसिस के लिए सिर्फ़ थोड़ा और एडिट किया हुआ ऑडियो मटीरियल दिया था.

ज्ञात हो कि पिछली सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने 19 अगस्त को केंद्रीय फॉरेंसिक विज्ञान प्रयोगशाला (सीएफएसएल) द्वारा लीक हुई पूर्व मुख्यमंत्री एन. बीरेन सिंह के कथित ऑडियो टेप की जांच के तरीके पर कड़ी नाराजगी जताई थी.

इससे पहले 4 जुलाई को सुप्रीम कोर्ट ने फॉरेंसिक रिपोर्ट जमा करने में देरी को लेकर केंद्र सरकार से सवाल किए थे. रिपोर्ट अदालत द्वारा मांगे जाने के तीन महीने बाद भी क्यों नहीं जमा की गई थी.

उससे पहले की सुनवाई में 5 मई को तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश संजीव खन्ना और जस्टिस कुमार की पीठ ने मेहता से कहा था कि अगर कोई व्यक्ति उत्तर-पूर्वी सीमावर्ती राज्य में कुकी-मेईतेई जातीय हिंसा से संबंधित किसी भी गलत काम में शामिल पाया जाता है, तो उसे संरक्षण देने की कोई आवश्यकता नहीं है.

अदालत की यह टिप्पणी मेहता द्वारा याचिकाकर्ता, कुकी ऑर्गनाइजेशन फॉर ह्यूमन राइट्स ट्रस्ट (कोहूर) की विश्वसनीयता पर सवाल उठाने के बाद आई थी.

कोहूर ने ऑडियो टेप की जांच के लिए सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की थी, जिसमें एन. बीरेन सिंह जैसी आवाज़ सुनाई दे रही थी और दावा किया था कि जातीय हिंसा भड़कने के पीछे उनका हाथ है.

इस हिंसा में कम से कम 250 से अधिक लोग मारे गए और कई घायल हुए, साथ ही दोनों समुदायों के 50,000 से ज़्यादा लोग विस्थापित हुए, जिनमें से ज़्यादातर अभी भी राज्य भर के विभिन्न राहत शिविरों में शरण लिए हुए हैं. इसी फरवरी में केंद्र सरकार ने राज्य में छह महीने के लिए राष्ट्रपति शासन लागू किया था और इस महीने इसे छह महीने के लिए और बढ़ा दिया है.

बीरेन सिंह के कार्यालय ने तब दावा किया था कि ऑडियो टेप प्रामाणिक नहीं हैं और उनका उपयोग करने वाले मीडिया संगठनों और अन्य लोगों के खिलाफ कार्रवाई की धमकी दी थी.

हालांकि, कोहूर की याचिका पर कार्रवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने नवंबर 2024 में टेपों की जांच करने पर सहमति जताई थी. तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश डीवाई चंद्रचूड़ की अध्यक्षता वाली पीठ ने याचिकाकर्ता से टेपों की प्रामाणिकता प्रमाणित करने को कहा था.

उल्लेखनीय है कि मणिपुर में हिंसा पर केंद्रीय गृह मंत्रालय द्वारा गठित जांच आयोग को सौंपी गई ऑडियो रिकॉर्डिंग– जो 2023 में बीरेन के आधिकारिक आवास पर हुई एक बैठक की है- के बारे में पिछले साल की शुरुआत में द वायर की संगीता बरुआ पिशारोती ने रिपोर्ट की एक श्रृंखला लिखी थी.

हालांकि द वायर यह स्वतंत्र तौर पर रिकॉर्डिंग में आ रही आवाज के वास्तव में बीरेन सिंह के होने की पुष्टि नहीं कर पाया था, लेकिन उस मीटिंग में शामिल कुछ लोगों से स्वतंत्र तौर पर इस मीटिंग की तारीख, इसके विषय और इसमें की गई बातों पुष्टि की है. उनमें से कोई भी अपनी सुरक्षा पर खतरे के डर से पहचान को उजागर नहीं करना चाहता था.

इस संवाददाता को यह ऑडियो रिकॉर्डिंग कुछ लोगों ने दी थी, जिन्होंने बताया था कि उन्होंने सिंह से जुड़े आधिकारिक परिसर में इसे रिकॉर्ड किया था. उन्होंने बताया था कि इसकी एक प्रति सेवानिवृत्त जस्टिस अजय लांबा को सौंपी गई थी, जो मणिपुर हिंसा पर न्यायिक आयोग के अध्यक्ष हैं. आयोग का गठन गृह मंत्रालय ने 3 मई, 2024 से शुरू हुई हिंसा की जांच के लिए किया था.

इसके तुरंत बाद कुकी ऑर्गनाइजेशन फॉर ह्यूमन राइट्स ट्रस्ट ने सर्वोच्च न्यायालय में याचिका दायर कर ऑडियो टेप की अदालत की निगरानी में जांच की मांग की थी.