अभी हाल में हिंदी के उपन्यासकार मनोज रूपड़ा को बिलासपुर के गुरु घासीदास केंद्रीय विश्वविद्यालय में हिंदी कहानी पर विचार-विमर्श के लिए आमंत्रित किया गया था. इस विश्वविद्यालय के कुलपति (जिन्हें आजकल कुलगुरु कहा जाता है, क्यों न कहा जाए, जिस देश में शिक्षा का स्तर गिरता चला जा रहा हो, वहां गुरुओं की भरमार आखिर क्यों न हो!) इस गोष्ठी में अपना व्याख्यान दे रहे थे.
संयोग से इस व्याख्यान का हिंदी कहानी पर विमर्श से कोई संबंध नहीं था. आखिर कुलगुरु विषय से संबद्ध क्यों बोलें, इससे उनकी वैचारिक स्वतंत्रता बाधित होती! हम यह क्यों भूल जाते हैं कि 2014 में भारत में आई नई स्वतंत्रता को अबोध-ग़ैर जिम्मेदार जनता से लेकर गुरुओं, कुलगुरुओं, राजगुरुओं, सरकारी गुरुओं को सौंप दी गई हैं, जिससे उसका दुरुपयोग न हो पाये और वह इन सक्षम महानुभावों के हाथों सदियों तक सुरक्षित रही आएगी.
ज़ाहिर है राजकोट के प्रबंधन और वाणिज्य विभाग से पधारे कुलगुरु आचार्य आलोक कुमार चक्रवाल बिना किसी तैयारी के ही हिंदी कहानी के कई महत्वपूर्ण कहानीकारों और युवा शोधकर्मियों के समक्ष अपने विचार रख रहे थे. कुछ लोग उनका व्याख्यान सुन रहे होंगे, कुछ वैसा करने का स्वांग कर रहे होंगे.
जब भी कोई व्यक्ति, वह कुलगुरु हो या कुल-शिष्य एक लोकतांत्रिक परिवेश में बोलता है, वह यह शर्त किसी पर कैसे लगा सकता कि उसे सुना ही जाए. आप बोलिए, लेकिन सुनने का अधिकार आपके सामने बैठे संभावित श्रोताओं के पास सुरक्षित रहता है: वे आपको सुनें या न सुनें. अगर कोई संभावित श्रोता आपको नहीं सुन रहा है, वह अपने न सुनने के इसी अधिकार का उपयोग कर रहा है. यह अधिकार संवैधानिक है.
न सुनना भी हमारी इक तरह की अभिव्यक्ति ही है. मनोज रूपड़ा भी कुलगुरु के विषय से भटके हुए भाषण को न सुनकर अपनी अभिव्यक्ति के अधिकार का ही उपयोग कर रहे थे.
कुलगुरु को यह अपेक्षा नहीं थी कि उपन्यासकार मनोज सच बोल देंगे
कुलगुरु आचार्य आलोक कुमार चक्रवाल को उनका इस अधिकार का प्रयोग अनुचित जान पड़ा. बात यहां तक भी होती, तब भी ठीक था. क्योंकि तब श्री चक्रवाल नापसंदगी के अपने लोकतांत्रिक अधिकार का प्रयोग कर रहे होते. लेकिन वे अपनी नापसंदगी पर रुके नहीं. उन्होंने मनोज रूपड़ा से यह पूछ लिया कि क्या उन्हें उनका यानी कुलगुरु का व्याख्यान पसंद नहीं आ रहा या ऐसा ही कुछ.
यह पूछने के पीछे कुलगुरु का छिपा हुआ आशय यह था कि मनोज रूपड़ा उनके इस औचक सवाल से हड़बड़ाकर उनके व्याख्यान के श्रेष्ठ होने की उद्घोषणा कर देंगे. यानी झूठ बोल देंगे. संभवत: कुलगुरु को यह अपेक्षा नहीं थी कि उपन्यासकार मनोज सच बोल देंगे. मनोज के सच बोलने पर सर्वशक्ति-संपन्न कुलगुरु उखड़ गए.
एक लोकतांत्रिक सभा में अपने व्याख्यान पर सामने बैठे श्रोता के सच बोलने से किसी भी लोकतांत्रिक वक्ता को वैसा व्यवहार नहीं करना चाहिए था जैसा कि कुलगुरु होने के मद में चूर कुलगुरु कर गए. उन्होंने पहले विश्वविद्यालय के उस शिक्षक को पेश होने का आदेश दिया जिन्होंने मनोज रूपड़ा जैसे सच बोलने की हिम्मत रखने वाले प्रतिभागी को आमंत्रित कर लिया है.
इसके बाद उन्होंने मनोज के सभागार से बाहर चले जाने का इंतज़ाम किया. कुलगुरु के इस व्यवहार से उनका कुलगुरु होना तो निरस्त हुआ ही, साथ ही उस समूची सभा से लोकतांत्रिक मूल्यों का भी निष्कासन हो गया.
कुलगुरु समाज में सम्मानित पद हुआ करता है. किसी भी राजसत्ता की व्यवस्था में राज्यपाल के बाद सबसे महत्वपूर्ण पद कुलगुरु का हुआ करता है. यह आचार्य आलोक कुमार को पता होगा कि राजसत्ता में कुलगुरु होने के नाते उनका मुख्यमंत्री से भी ऊंचा ओहदा है.
यह ओहदा इसलिए ऊंचा रखा गया है क्योंकि संविधान में ज्ञान के प्रतिनिधि का स्थान शक्ति के प्रतिनिधि से ऊंचा होता है. लेकिन समाज में किसी भी लेखक का ओहदा समूची राजसत्ता से ऊपर होता है. राजसत्ताएं आती हैं, जाती हैं. लेकिन सर्जनशीलता जिसका प्रतिनिधित्व लेखक और कलाकार करते हैं, समाज के नैतिक (जिसे हम धर्म या एथिक्स भी कह सकते हैं) स्तर को बनाए रखने का काम निरंतर किया करते हैं. बिना कला और साहित्य के कोई भी समाज नैतिकता से स्खलित हो जाता है.
दूसरे शब्दों में धर्मच्युत हो जाता है. कुलगुरु के मनोज रूपड़ा को अपमानित करने के दोष का पहला हिस्सा उनका अलोकतांत्रिक होना है. उन्होंने एक लोकतांत्रिक सभा में एक विवेकसंपन्न, नैतिकबोध के संबोधक सृजनशील मनोज रूपड़ा को उनके न सुनने के अधिकार से च्युत किया.
अगर वे व्याख्यान देते समय सब पर यह बंदिश लगा देते कि उन्हें उनका व्याख्यान सुनना ही होगा तो शायद उनके मातहतों के सिवा उनका व्याख्यान सुनने कोई नहीं आता. दोष का दूसरा हिस्सा यह है कि कुलगुरु होते हुए भी आचार्य आलोक कुमार चक्रवाल ने समाज में लेखक के स्थान को कमतर करके आंका और इस तरह समाज का आंशिक ही सही, अहित किया.
एक आमंत्रित लेखक को शब्द से और उच्चारण की भंगिमा से अपमानित करना
दोष का तीसरा हिस्सा उनके बोलने का ढंग था. वे बोल नहीं रहे थे, एक आमंत्रित लेखक को शब्द से और उच्चारण की भंगिमा से अपमानित कर रहे थे. वे यह भूल रहे थे कि समाज में लेखक का स्थान उनके अपने स्थान से कहीं ऊंचा है. यह इसलिए तो ऊंचा है ही कि लेखक और कलाकार ही वे लोग हैं जिनके कारण समाज में नैतिक बोध जागृत रहता है, वह इसलिए भी ऊंचा है क्योंकि अगर लेखक, कलाकार, वैज्ञानिक, समाजशास्त्री, इतिहासकार आदि अपना सृजन बंद कर दें, विश्वविद्यालयों के पास पढ़ाने को कुछ नहीं रहेगा.
यानी मनोज रूपड़ा उस समुदाय का हिस्सा हैं जिसके सृजनशील होने के कारण ही विश्वविद्यालयों का अस्तित्व है. अगर विश्वविद्यालय न रहे, कुलगुरु कहां रहेंगे. इसका अर्थ यह है कि मनोज रूपड़ा और उनके जैसे ही सृजनशील लोगों के कारण ही आचार्य आलोक को कुलगुरु का पद और उस पद का नियमित वेतन मिल रहा है.
कुलगुरु आपको यह तो सोचना चाहिए था कि अपने जीविकोपार्जन के एकमात्र न सही, एक कारण को कौन अवमानित करता है. चूंकि आचार्य वाणिज्य के अध्यापक हैं, क्यों न उन्हें बाज़ार की भाषा में यह बात बताई जाए. अगर सारे विश्वविद्यालय विशाल कॉरपोरेट कंपनी है तो उसके शेयर धारक, जिनके कारण वह कंपनी बनी है और चल रही है, वे सारे सृजनशील लोग हैं जो अपना जीवन सृजन और शोध में लगाए हुए हैं.
यह बात समझ में नहीं आती कि इस विश्वविद्यालय नाम की विराट कॉरपोरेट कंपनी का एक कर्मचारी शेयरधारक का अपमान कैसे कर सकता है? यह आश्चर्य की बात है कि इस घटना पर जिन लोगों ने विरोध दर्ज किया है, उनमें से अधिकांश लेखक ही हैं. व्यापक समाज को इस घटना से कोई खास फर्क पड़ा हो, ऐसा लगता नहीं है.
व्यापक समाज की लेखक के सार्वजनिक अपमान पर यह चुप्पी यह बताती है कि हमारा समाज कैसे धीरे-धीरे संस्कृति-विहीन होता चला जा रहा है. इससे बड़ा दुख और क्या हो सकता है?
(उदयन वाजपेयी कवि-कथाकार और विचारक हैं.)
