नई दिल्ली: संभल ज़िले के चंदौसी स्थित एक न्यायालय ने वर्ष 2024 में हुई संभल हिंसा मामले में पुलिस अधिकारियों की भूमिका को लेकर अहम आदेश दिया है.
मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट विभांशु सुधीर ने पूर्व संभल सर्किल ऑफिसर (सीओ) अनुज चौधरी, तत्कालीन संभल कोतवाली प्रभारी अनुज तोमर और 10 अज्ञात पुलिसकर्मियों के खिलाफ एफआईआर दर्ज करने का आदेश दिया है.
हालांकि संभल पुलिस ने एफआईआर दर्ज करने से इनकार करते हुए कहा है कि वह कोर्ट के इस आदेश के विरुद्ध अपील करेगी.
मा0 न्यायालय द्वारा दिये गए आदेश के विरुद्ध सक्षम न्यायालय में अपील की जाएगी ।
— SAMBHAL POLICE (@sambhalpolice) January 13, 2026
संभल के पुलिस अधीक्षक (एसपी) कृष्ण कुमार बिश्नोई ने टाइम्स ऑफ इंडिया से कहा है कि यह एक अवैध आदेश है और अदालत के निर्देश पर हम कोई एफआईआर दर्ज नहीं करेंगे. संभल हिंसा को लेकर पहले ही एक न्यायिक जांच पूरी हो चुकी है, जिसमें पुलिस की कार्रवाई को सही ठहराया गया है. हम इस आदेश के खिलाफ उचित मंच पर अपील दाखिल करेंगे.
कोर्ट का यह आदेश 9 जनवरी को यामीन नामक एक शख्स द्वारा दाखिल अर्जी पर सुनवाई के बाद पारित किया गया. यामीन का आरोप है कि 24 नवंबर 2024 को संभल में हुई हिंसा के दौरान उनके 24 वर्षीय बेटे आलम को पुलिस फायरिंग में गोली लगी थी. यामीन के मुताबिक, उनका बेटा उस दिन सुबह अपने घर से ठेले पर पापड़ और बिस्कुट बेचने निकला था. सुबह करीब 8:45 बजे जब वह शाही जामा मस्जिद इलाके के पास पहुंचा, तब वहां पहले से ही भारी भीड़ मौजूद थी.
प्रार्थना पत्र में आरोप लगाया गया है कि मौके पर मौजूद तत्कालीन सीओ अनुज चौधरी, कोतवाली प्रभारी अनुज तोमर और 15-20 अन्य पुलिसकर्मियों ने भीड़ को तितर-बितर करने के दौरान गोलीबारी शुरू कर दी. इसी दौरान आलम को पीठ में दो और हाथ में एक गोली लगी, जिससे वह मौके पर ही गिर पड़ा.
यामीन का कहना है कि गोली लगने के बाद उनके बेटे को स्थानीय लोगों ने गंभीर हालत में घर पहुंचाया. उन्होंने यह भी कहा कि वे अपने बेटे को इलाज के लिए संभल के कई अस्पतालों में ले गए, लेकिन सभी ने इलाज करने से मना कर दिया.
यामीन ने पुलिस पर गंभीर आरोप लगाते हुए अदालत को बताया कि पुलिस के डर के कारण वह अपने बेटे को तीन दिनों तक घर में ही रखे रहे. इसके बाद वे उसे इलाज के लिए मुरादाबाद और अलीगढ़ के कई अस्पतालों में ले गए, लेकिन कथित तौर पर पुलिस दबाव के चलते उसे कहीं भी भर्ती नहीं किया गया. यामीन के अनुसार, अस्पतालों ने उनसे कहा कि पुलिस प्रशासन ने संभल हिंसा के घायलों को भर्ती करने से मना कर दिया है. अंततः मेरठ के एक निजी अस्पताल में पहचान छिपाकर आलम को भर्ती कराया गया, जहां उसका ऑपरेशन हुआ और शरीर से गोली निकाली गई.
प्रार्थना पत्र के अनुसार, यामीन ने इस घटना को लेकर 31 दिसंबर 2024 और 1 जनवरी 2025 को मुख्यमंत्री, पुलिस महानिदेशक, डीआईजी और पुलिस अधीक्षक समेत कई अधिकारियों को शिकायतें भेजीं, लेकिन कोई एफआईआर दर्ज नहीं की गई. इसके बाद उन्होंने अदालत की शरण ली.
आलम को ही आरोपी नामजद किया गया
आलम के पिता ने यह याचिका 4 फरवरी 2025 को दायर की थी. इसके बाद आलम को दंगों के मामले में आरोपी के तौर पर नामजद किया गया. आलम के बहनोई शाहनवाज़ ने द वायर हिंदी को बताया कि उनके परिवार द्वारा याचिका दायर किए जाने के बाद ही आलम को दंगा मामलों में आरोपी बनाया गया.
संभल दंगों के मामलों में आरोपी बनाए गए कई लोगों का केस लड़ रहे अधिवक्ता क़मर हुसैन ने द वायर हिंदी को बताया कि आलम मुकदमा संख्या 333/24 में नामज़द हैं, जो संभल हिंसा से संबंधित है.
मामले की सुनवाई के दौरान अदालत ने पुलिस द्वारा दाखिल रिपोर्ट, चिकित्सीय दस्तावेजों और फॉरेंसिक रिपोर्ट का अवलोकन किया. पुलिस की ओर से अदालत को बताया गया कि आलम के शरीर से निकली गोली .32 बोर की थी, जिसे पुलिस हथियारों से प्रयुक्त नहीं किया जाता. हालांकि, अदालत ने यह भी रेखांकित किया कि चिकित्सीय रिकॉर्ड में चोट को ‘गन शॉट वुंड’ और ‘दंगे के दौरान पुलिस फायरिंग’ से जुड़ा बताया गया है, जिससे मामला संदिग्ध प्रतीत होता है.
अदालत ने अपने आदेश में सुप्रीम कोर्ट के कई महत्वपूर्ण फैसलों और दिशानिर्देशों का हवाला दिया, जिनमें कहा गया है कि यदि किसी संज्ञेय अपराध की सूचना मिलती है तब पुलिस एफआईआर दर्ज करने के लिए बाध्य है.
न्यायालय ने यह भी स्पष्ट किया कि पुलिसकर्मियों द्वारा कथित अवैध कृत्य को आधिकारिक कर्तव्य का हिस्सा नहीं माना जा सकता और ऐसे मामलों में दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 197 के तहत पूर्व अनुमति की आवश्यकता नहीं होती.
मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट ने कहा कि प्रथमदृष्टया यह मामला गंभीर संज्ञेय अपराध का प्रतीत होता है और इसकी निष्पक्ष जांच आवश्यक है. इसी आधार पर अदालत ने संभल कोतवाली को प्रार्थना पत्र में बताए गए घटना के संबंध में मामला दर्ज कर नियमानुसार जांच करने का आदेश दिया. साथ ही, सात दिनों के भीतर एफआईआर दर्ज होने की सूचना अदालत के समक्ष प्रस्तुत करने का निर्देश भी दिया गया है.
आलम के परिवार का कहना है कि 24 नवंबर को लगी गोलियों की चोट से वह अभी तक उबर नहीं पाए हैं और उनका इलाज जारी है.
ज्ञात हो कि ज्ञात हो कि 24 नवंबर 2024 को कोर्ट के आदेश पर संभल स्थित मुग़लकालीन शाही जामा मस्जिद के सर्वेक्षण के दूसरे दिन हिंसा भड़क उठी थी, जिसमें 5 लोग मारे गए थे. तब से संभल सुर्खियों में है.
19 नवंबर 2024 को मस्जिद के सर्वे के लिए याचिका दायर की गई, उसी दिन अदालत ने सर्वे की अनुमति भी दे दी और रात के अंधेरे में मस्जिद का पहला सर्वे भी कर लिया गया था. लेकिन 24 नवंबर को सर्वे के दूसरे दिन, सर्वेक्षण का विरोध कर रहे प्रदर्शनकारियों और पुलिस के बीच हिंसक झड़प हो गई. हालांकि पुलिस इस बात से इनकार करती है कि किसी भी शख्स की मौत उनकी गोलियों से हुई थी.
याचिकाकर्ताओं का दावा है कि शाही जामा मस्जिद को मुग़ल काल के दौरान ‘हरिहर मंदिर को तोड़कर बनाया’ गया था. हिंदू पक्ष की मांग है कि उस स्थान पर फिर से मंदिर बनवाया जाए.
उल्लेखनीय है कि हिंसा के बाद तत्कालीन सीओ अनुज चौधरी को एक ‘सख्त’ और ‘सुपर कॉप’ के रूप में भी पेश किया जाता रहा है. बीते वर्ष होली के दौरान भी वह सुर्खियों में रहे थे, जब होली और जुमे की नमाज़ एक दिन होने पर उन्होंने मुसलमानों को घर के अंदर रहने की सलाह देते हुए कहा था कि जुमा साल में 52 बार आता है और होली एक बार. और अगर किसी को होली से तकलीफ़ है तो वह उस दिन अपने घर पर ही रहे.
पेशेवर पहलवान रह चुके चौधरी फ़िलहाल फिरोजाबाद के एएसपी (ग्रामीण) हैं. संभल हिंसा मामले के बाद उनकी पदोनत्ति की गई थी.

अधिवक्ता क़मर हुसैन ने द वायर हिंदी से बातचीत में अदालत के फ़ैसले का स्वागत करते हुए कहा कि इस मामले में एक साल से अधिक समय बीत जाने के बाद न्याय की उम्मीद जगी है.
संभल के एसपी द्वारा एफआईआर दर्ज करने से इनकार किए जाने पर प्रतिक्रिया देते हुए उन्होंने कहा, ‘पुलिस ऐसा नहीं कर सकती. उसे मामला दर्ज करना ही होगा. अदालत द्वारा पारित यह एक इंटरलोक्यूटरी ऑर्डर है, यानी कोर्ट ने फिलहाल केवल जांच के आदेश दिए हैं. यह मामले में अंतिम फ़ैसला नहीं है.’
उन्होंने आगे कहा, ‘अगर एफआईआर दर्ज नहीं की जाती है, तो इसे अदालत की अवमानना माना जाएगा. यह कहना कि हिंसा को लेकर पहले ही एक न्यायिक जांच पूरी हो चुकी है, जिसमें पुलिस की कार्रवाई को सही ठहराया गया है, इसलिए एफआईआर दर्ज नहीं की जाएगी, ऐसा तर्क कानूनी तौर पर मान्य नहीं है.’
