नई दिल्ली: ग्रेट निकोबार ट्राइबल काउंसिल के सदस्यों ने आरोप लगाया है कि 7 जनवरी को ज़िला प्रशासन के साथ हुई एक बैठक में उनसे अपनी पैतृक ज़मीन सरकार को सौंपने के लिए ‘सरेंडर सर्टिफिकेट’ पर हस्ताक्षर करने को कहा गया. आदिवासी नेताओं का कहना है कि यह दबाव ग्रेट निकोबार प्रोजेक्ट को आगे बढ़ाने के उद्देश्य से बनाया गया.
मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक, गुरुवार को हुई एक वर्चुअल प्रेस कॉन्फ़्रेंस में आदिवासी समुदायों के मुखियाओं ने बताया कि यह मांग बैठक के दौरान मौखिक रूप से रखी गई थी. बैठक ग्रेट निकोबार के कैंपबेल बे गांव में हुई थी, जिसमें ज़िला आयुक्त कार्यालय और अंडमान आदिम जनजाति विकास समिति के अधिकारी भी मौजूद थे.
ज्ञात हो कि अंडमान आदिम जनजाति विकास समिति एक स्वायत्त संस्था है, जो संवेदनशील आदिवासी समुदायों के संरक्षण और कल्याण के लिए काम करती है.
ग्रेट निकोबार प्रोजेक्ट के तहत एक नया टाउनशिप, पावर प्लांट, ग्रीनफ़ील्ड अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डा और ट्रांसशिपमेंट पोर्ट बनाने की योजना है. इस परियोजना के लिए द्वीप के लगभग 166 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र का उपयोग प्रस्तावित है, जिसमें करीब 27 तटीय गांव भी शामिल हैं. ये वही गांव हैं, जहां निकोबारी आदिवासी समुदाय पीढ़ियों से रहते आए हैं और अपनी आजीविका के लिए इन्हीं इलाकों पर निर्भर रहे हैं.
काउंसिल के एक सदस्य ने नाम न छापने की शर्त पर कहा, ‘हम ऐसे किसी सर्टिफिकेट के ख़िलाफ़ हैं. इसका मतलब होगा कि हमने अपनी ज़मीन हमेशा के लिए प्रशासन के हाथों सौंप दी. यह हमारे बच्चों के भविष्य और सुरक्षा से जुड़ा सवाल है.’
आदिवासी सदस्यों ने साफ़ किया कि उन्होंने इन सर्टिफिकेट्स पर हस्ताक्षर नहीं किए हैं और कहा है कि इस मसले पर आपस में विचार-विमर्श के लिए उन्हें समय चाहिए. दूसरी ओर, निकोबार के सहायक आयुक्त ने इस पूरे मामले पर टिप्पणी करने से इनकार करते हुए कहा कि उन्हें इस विषय पर बोलने की अनुमति नहीं है.
निकोबारी आदिवासी लंबे समय से यह मांग करते आ रहे हैं कि उन्हें उनके पैतृक गांवों में वापस लौटने दिया जाए. 2004 में आए विनाशकारी सुनामी के बाद ज़िला प्रशासन ने जीवित बचे लोगों को कैंपबेल बे की दो बस्तियों (न्यू चिंगेनह और राजीव नगर) में बसाया था. वहां उन्हें खंभों पर बने लकड़ी के घर दिए गए थे, जिनकी छत टिन की थी और फ़र्श प्लाईवुड का था.
एक अन्य आदिवासी सदस्य ने बताया, ‘हमें बसाते समय कहा गया था कि यह अस्थायी व्यवस्था है. अब 21 साल हो चुके हैं. हमारी आबादी धीरे-धीरे बढ़ रही है, लेकिन यहां न तो घर फैलाने की जगह है और न ही खेती करने की.’
द्वीप के पश्चिमी तट पर स्थित अपनी पैतृक ज़मीनों पर ये समुदाय पहले नारियल के बागान और केवड़ा (पैंडनस) के पेड़ उगाते थे और मछली पकड़ने के लिए समुद्र पर निर्भर रहते थे. आज भी समुदाय के कई सदस्य थोड़े समय के लिए उन गांवों में जाकर अपने नारियल के पेड़ों की देखभाल करते हैं.
आदिवासी नेताओं का कहना है कि उन्होंने प्रशासन को कई बार पत्र लिखकर अपने गांवों में लौटने की मांग की है, लेकिन अब तक कोई जवाब नहीं मिला. एक सदस्य ने कहा, ‘हम यहां असहज महसूस करते हैं.’
अगस्त में ट्राइबल काउंसिल ने केंद्रीय जनजातीय कार्य मंत्री को पत्र लिखकर आरोप लगाया था कि द्वीप प्रशासन ने 2022 में जारी एक सर्टिफिकेट के ज़रिए केंद्र सरकार को ग़लत जानकारी दी. पत्र में कहा गया था कि प्रशासन ने यह दर्शाया कि ग्रेट निकोबार प्रोजेक्ट के लिए वन भूमि के उपयोग से पहले 2006 के वन अधिकार अधिनियम के तहत सभी अधिकारों की पहचान और निपटारा कर लिया गया है.
एक आदिवासी मुखिया ने सवाल उठाया, ‘अगर प्रशासन यह कह रहा है कि वन अधिकार अधिनियम के तहत सभी अधिकार पहले ही तय हो चुके हैं, तो फिर हमसे ऐसे ‘सरेंडर सर्टिफिकेट’ क्यों मांगे जा रहे हैं?’
उन्होंने कहा, ‘हमारी बस यही मांग है कि अगर सरकार यह परियोजना करना चाहती है, तो उसे गैर-आदिवासी ज़मीनों पर किया जाए.’
