अमूर्तन दृष्टि का स्वयंप्रतिष्ठ रूपायन होता है, उसे सिर्फ़ कौशल से समझाया नहीं जा सकता

कभी-कभार | अशोक वाजपेयी: कई बार लगता है कि अति उत्साह या कि उत्तेजना में कलाकार, जैसे कि बहुतेरे कवि भी, ज़रूरत से ज़्यादा कह जाते हैं. असल कौशल या सूझ तो इस बात में होती है कि कितना विन्यस्त किया जाए और कितना अविवक्षित रहने दिया जाए. देखने-पढ़ने वाले को यह महसूस होना चाहिए कि ‘है अभी कुछ और जो कहा नहीं गया’.

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बिना दृष्टि के निरी डिज़ाइन कितनी भी मोहक क्यों न लगे, अमूर्तन नहीं कही जा सकती. (पेंटिंग: एसएच रज़ा की 'विलेज, साभार- साउथ एशियन आर्ट गैलरी)

हर बरस की तरह, ‘इंडिया आर्ट फेयर’ पिछले दिनों दिल्ली में चल रहा था- पूरी धूमधाम और चहल-पहल से. हर बरस वह सिर्फ़ आयु में नहीं, अपने रूपाकार में बड़ा होता जाता है. पहले दो दिन काफ़ी समय वहां बिताया- बहुत सारे कलाकारों और कलाविदों से मुलाक़ात हो गई. दूसरे शहरों से इस दौरान यह मेला देखने के लिए बड़ी संख्या में कलाकार आते हैं.

कुछ बातें नोट कीं: इस बार आधुनिक कहे जाने वाले कलाकारों के काम समकालीन माने जाने वाले कलाकारों से बहुत कम हैं. कई गैलरियां अब विश्वासपूर्वक कई नए समकालीन कलाकारों के काम प्रदर्शित कर रही हैं. फोटो और सेल्फी लेने की आदत और बढ़ गई है जो अनेक दर्शकों के कलाकृतियां देखने के आड़े आती है. इस बार लगा कि समकालीन भारतीय कला में बहुत सारे नए-युवा कलाकार डिज़ाइन की तरफ़ मुड़ रहे हैं- कई तरह की अप्रत्याशित सामग्री से कलावस्तु रची जा रही है.

यह भी नज़र आया कि बहुत सारी कृतियों में कागज़ का बहुत कल्पनाशील इस्तेमाल हुआ है. कागज़ पर कलाकृतियां नहीं बनाई जा रही हैं- कागज़ को तरह-तरह से काटकर उसका इस्तेमाल रंग की तरह अभिव्यक्ति के लिए किया जा रहा है. कम से कम मुझे अचरज हुआ यह देखकर कि इतने तरह के कागज़ हैं और उनको इतने नवाचार से कलावस्तु बनाया जा सकता है. कागज़ नए-नए रूप धर रहा है.

एक सवाल जिसने मुझे परेशान करना शुरू किया वह यह है कि आजकल की कला में कला, डिज़ाइन और अमूर्तन के बीच किस तरह का रिश्ता बन रहा है. यह तो सही कि कला में डिज़ाइन यानी संरचना महत्वपूर्ण तत्व होती है. पर वह क्या है जो उसे निरे डिज़ाइन से ऊपर उठाकर कलाकृति में बदल देता है?

मेरी समझ से वह कलाकार की दृष्टि है, जिसमें विचार-संवेदना-अनुभूति शामिल होते हैं. कला जितनी कौशल से रची जाती है, उतनी दृष्टि से भी. शक होता है कि बहुत सारी कला, इन दिनों, कौशल से बनाई जा रही है; उसमें दृष्टि का रचाव या भूमिका बहुत कम है.

कलाकृति सुंदर और परिष्कृत तो लगती है पर वह सजावट ज़्यादा लगती है. उसमें शोभा अधिक, तत्व कम नज़र आता है. फिर यह जिज्ञासा भी जागती है कि क्या डिज़ाइन को हम अमूर्तन की तरह देख-समझ सकते हैं?

यहां भी दृष्टि की बात उठती है. बिना दृष्टि के निरी डिज़ाइन कितनी भी मोहक क्यों न लगे, अमूर्तन नहीं कही जा सकती. अमूर्तन दृष्टि का स्वयंप्रतिष्ठ रूपायन होता है, उसे सिर्फ़ कौशल से उद्बुद्ध या समझाया नहीं जा सकता.

ऐसी कलाकृतियां नज़र आईं जो अल्पभाषी हैं, वे अर्थ या कथ्य में संकुचित नहीं हैं और उनका अल्पकथन अर्थसमृद्ध संयम है. ऐसी तो बहुत थीं ही जो बिंब-बहुल और विपुल, कुछ ख़ासी बड़बोली.

कई बार लगता है कि अति उत्साह या कि उत्तेजना में कलाकार, जैसे कि बहुतेरे कवि भी, ज़रूरत से ज़्यादा कह जाते हैं. असल कौशल या सूझ तो इस बात में होती है कि कितना विन्यस्त किया जाए और कितना अविवक्षित रहने दिया जाए. देखने-पढ़ने वाले को यह महसूस होना चाहिए कि ‘है अभी कुछ और जो कहा नहीं गया’. यह ‘न कहने’ में ‘कहना’ है.

लिटफ़ेस्ट अधिक लोकतांत्रिक होते हैं क्योंकि उनमें से अधिकांश में प्रवेश के लिए टिकट नहीं लगते. आर्ट फेयर अधिक संभ्रांत होते हैं- उनमें जिनकी जेब भारी हो वही आ पाते हैं. कलाकृतियों के दाम, इन दिनों, बहुत ऊंचे हैं. जो उसे देखने आत हैं उनमें से अधिकांश कुछ ख़रीद नहीं सकते, नयनसुख ही पाते हैं.

दो कथाकार

हाल ही में पेंगुइन से हिंदी के दो प्रसिद्ध कथाकारों राजेंद्र यादव और मन्नू भंडारी के आत्मवृत्तांतपरक गद्य के अंग्रेज़ी अनुवाद की दो पुस्तकें ‘ईकोज़ ऑफ माई पास्ट’ और ‘दिस टू इज़ ए स्टोरी’ शीर्षक से प्रकाशित हुई हैं. अनुवाद पूनम सक्सेना ने बहुत सावधानी-परिश्रम-संवेदनशीलता से किया है. उसके लोकार्पण में मृणाल पाण्डे और मैं शामिल हुए. काफ़ी देर तक हमारी चर्चा चली. जो लोग आए उनमें अधिकांश अंग्रेज़ी में दीक्षित लोग थे. हमारी चर्चा भी अंग्रेज़ी में हुई.

कथा साहित्य के बारे में मेरी समझ अपर्याप्त है- थोड़ी बहुत समझ कविता की है. शायद कुछ व्यापक साहित्य और संस्कृति की भी है. पर कथा के बारे में मेरी विशेषज्ञता बहुत कम है. फिर भी दोनों ही कथाकारों का यह गद्य मूल हिंदी में पहले पढ़ चुका था. इस अवसर पर कुछ कह पाना इसलिए बहुत अटपटा नहीं लगा.

आत्मवृत्तांत के साथ कई कठिनाइयां होती हैं. अक्सर वे याद से लिखे जाते हैं और याद, कभी अनायास, कभी चतुराई से, जो हुआ उसे जस का तस नहीं रहने देती, बदल देती है. कई बार तो यह भी हो सकता है कि जो नहीं हुआ उसे हुआ बता दे. यह बेइमानी नहीं, याद की स्वाभाविक विवशता है. यह भी है कि याद सब कुछ याद नहीं करती: वह कुछ तो बटोर लेती है, कुछ बिखेर देती है और कुछ को चुपचाप नबेर कर बाहर कर देती है. याद की पकड़ से जो छूट जाता है वह काफ़ी होता है.

जैसे सारा साहित्य अंततः जीवन ओर सचाई की पूरी जटिलता-सूक्ष्मता-विपुलता को समेट नहीं पाता और अपर्याप्त होने को अभिशप्त है वैसे ही आत्मवृत्तांत भी. यह, जैसा कि कवि ने कहा है, ‘सच लिखकर सब झूठा’ करना नहीं है: यह, जैसा बहुत पहले तुलसीदास ने कहा है, सत्य और झूठ का ‘जुगल प्रबल’ है- न सच, न झूठ बल्कि सचझूठ.

दोनों पुस्तकें एक साथ पढ़ने पर, क्योंकि वे एक साथ प्रकाशित हुई हैं, यह प्रभाव पड़ता है कि राजेंद्र यादव बुद्धिमान है और मन्नू भंडारी विवेकशील. राजेंद्र थोड़े बड़बोले हैं, उग्र और विवादप्रिय हैं. मन्नू शांत-सम्यक्, धैर्यशील. राजेंद्र अपने जीवन के उत्तरार्द्ध में, ख़ासकर बहुत सार्वजनिक सक्रियता में हैं तो मन्नू अपने साहित्य के अलावा कहीं और सामाजिक होने से विरत हैं. राजेंद्र में अपराधबोध है, भले वह मन्नू को अपर्याप्त लगता है. मन्नू में विफलताबोध है जिसकी लगता है राजेंद्र को कभी ज़्यादा ख़बर ही नहीं लगी. राजेंद्र उत्तेजक हैं, मन्नू विश्वसनीय.

सही है कि दोनों लंबे समय तक पति-पत्नी रहे और उनका लंबा वैवाहिक-पारिवारिक जीवन रहा. उसके दोनों के कई साझा अनुभव हैं तो भिन्न अनुभव भी. दोनों अपनी विडंबना को समझते हैं क्योंकि पति-पत्नी के संबंध से अलग दोनों लेखक भी हैं, बल्कि लेखक के रूप में ही पहले-पहल एक-दूसरे के नज़दीक आए थे. यह अनुभव करना दिलचस्प है कि दोनों के अलग-अलग अनुभव और दृष्टि कभी संवादरत हैं और कभी एक-दूसरे से मुक्त भी. धीरे-धीरे समापन एक तरह की मार्मिक विसंवादिता में होता है.

मार्सेल प्रूस्त ने कभी कहा था कि साहित्य में भाषा जीवन से आलोकित होती है. आत्मवृत्तांत में जीवन भाषा से आलोकित होता है और भाषा में आकर अनिवार्यतः संशोधित हो जाता है. ऐसे वृत्तांत हमारी वेध्य मानवीयता को चाहे-अनचाहे प्रकाश में लाते हैं और फिर रेखांकित करते हैं कि लेखक भी अंततः मिट्टी के माधव होते हैं. ऐसा मटमैलापन ही साहित्य और लेखकों, दोनों को, मानवीय बनाता है.

(लेखक वरिष्ठ साहित्यकार हैं.)