नई दिल्ली: दिल्ली की एक अदालत ने शुक्रवार (27 फरवरी) को जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय छात्र संघ (जेएनयूएसयू) के तीन पदाधिकारियों सहित सभी 14 छात्रों को ज़मानत दे दी.
इन छात्रों को गुरुवार को प्रदर्शन के बाद गिरफ्तार किया गया था. इस दौरान पुलिस ने छात्रों को शिक्षा मंत्रालय तक मार्च निकालने से रोकने के लिए लाठी चार्ज का भी प्रयोग किया था, जिसमें कई छात्र घायल हो गए थे.
न्यू इंडियन एक्सप्रेस के अनुसार, आदालत ने प्रत्येक छात्र को 25,000 रुपये के मुचलके पर ज़मानत दी और पुलिस द्वारा उन्हें न्यायिक हिरासत में भेजने के अनुरोध को खारिज कर दिया.
न्यायाधीश ने कहा कि हालांकि पुलिसकर्मियों पर कोई भी हमला एक गंभीर मामला है और इसे शांतिपूर्ण विरोध के नाम पर उचित नहीं ठहराया जा सकता, फिर भी ‘आरोपित अपराधों के लिए अधिकतम पांच वर्ष की सजा का प्रावधान है और आरोपी न तो पेशेवर अपराधी हैं और न ही आदतन अपराधी.’
सुनवाई के दौरान पुलिस ने तर्क दिया कि इस बात की प्रबल संभावना है कि वे फिर से हिंसा का सहारा ले सकते हैं.
अदालत ने आरोपियों को मामले की चल रही जांच में सहयोग करने का निर्देश दिया. पुलिसकर्मियों ने बताया कि गिरफ्तार किए गए लोगों में जेएनयूएसयू अध्यक्ष अदिति मिश्रा, सचिव गोपिका बाबू, महासचिव दानिश अली और जेएनयूएसयू के पूर्व अध्यक्ष नीतीश कुमार शामिल हैं.
हालांकि, एक असामान्य निर्देश में अदालत ने दिल्ली पुलिस को हिरासत में लिए गए जेएनयू छात्रों के पते सत्यापित करने के लिए भी कहा है, और जोड़ा कि इसके पहले उन्हें रिहा नहीं किया जा सकता है.
द वायर से बात करते हुए अदालत में मौजूद कुछ छात्रों ने इस तरह के निर्देश पर अपनी नाराजगी व्यक्त की, क्योंकि ज्यादातर आरोपी छात्र दिल्ली के बाहर के राज्यों से हैं, और उन्हें संदेह है कि पुलिस उनकी रिहाई में देरी करने के लिए सत्यापन प्रक्रिया में जानबूझकर देरी कर सकती है.
एक छात्र ने द वायर से कहा, ‘अदालत ने बेल भी दी है और जेल भी.’
पुलिस कार्रवाई में महिलाओं समेत कई छात्र घायल हुए
द वायर से बात करते हुए जेएनयूएसयू के पदाधिकारियों ने कहा कि पुलिस कार्रवाई में महिलाओं समेत कई छात्र घायल हुए हैं. कई छात्रों को हिरासत में लेकर कापसहेड़ा और सागरपुर थाने में ले जाया गया.
उल्लेखनीय है कि जेएनयू कैंपस में दिल्ली पुलिस सहित सुरक्षा बलों की भारी तैनाती के बीच छात्रों का यह मार्च दोपहर करीब 3 बजे कैंपस के अंदर स्थित साबरमती ढाबा से शुरू हुआ था, इस रैली में बड़ी संख्या में छात्रों के साथ जेएनयूएसयू, अखिल भारतीय छात्र संघ (एआईएसए), छात्र संघ (एसएफआई), लोकतांत्रिक छात्र संघ (डीएसएफ), राष्ट्रीय छात्र संघ (एनएसयूआई), अखिल भारतीय छात्र संघ (एआईएसएफ) और अन्य छात्र संगठनों के सदस्य शामिल थे.
इस दौरान पुलिस ने छात्रों को आगे बढ़ने से रोकने के लिए मुख्य द्वार को पूरी तरह से बंद कर दिया गया था.
मार्च शुरू होने से पहले जेएनयूएसयू अध्यक्ष अदिति मिश्रा ने द वायर को बताया था, ‘हम मांग कर रहे हैं कि यूजीसी के समानता नियमों को रोहित अधिनियम की तर्ज पर लागू किया जाए. हम कुलपति शांतिश्री धुलिपुडी पंडित के इस्तीफे की भी मांग कर रहे हैं, क्योंकि उन्होंने टिप्पणी की थी कि ‘काले और दलित हमेशा पीड़ित होने के नशे में चूर रहते हैं.’ हमारा मानना है कि ऐसा बयान अस्वीकार्य है. हम जेएनयू और अन्य विश्वविद्यालयों के लिए निधि बहाल करने की भी मांग कर रहे हैं, क्योंकि लगातार वित्तीय कटौती से सार्वजनिक विश्वविद्यालय कमजोर हो रहे हैं और छात्रों पर सीधा असर पड़ रहा है.’
पुलिस के अनुसार, यह मार्च विश्वविद्यालय के कुलपति द्वारा हाल ही में एक पॉडकास्ट पर दिए गए बयान, यूजीसी के मानदंडों के कार्यान्वयन पर चिंता, जेएनयूएसयू पदाधिकारियों के निष्कासन और प्रस्तावित रोहित अधिनियम के विरोध में जारी प्रदर्शनों का हिस्सा था.
मालूम हो कि हाल ही में जेएनयू की कुलपति प्रोफेसर शांतिश्री धूलिपुड़ी पंडित अपने विवादित बयान को लेकर सुर्खियों में रही थीं. सोशल मीडिया पर वायरल एक वीडियो में कुलपति एक साक्षात्कार के दौरान यह कहती हुईं नज़र आईं कि दलित और अश्वेत समुदाय (ब्लैक) ‘विक्टिमहुड यानी पीड़ित मानसिकता’ से ग्रस्त हैं.
उन्होंने आगे यह भी कहा था कि आप स्थायी रूप से पीड़ित बनकर या विक्टिम कार्ड खेलकर तरक्की नहीं कर सकते.
इस विवाद के बाद कुलपति की सफाई भी सामने आई थी. उनका कहना था कि उन्होंने ऐसा कोई शब्द इस्तेमाल नहीं किया, जिससे किसी समुदाय का अपमान हो.
एसएफआई ने वीसी से इस्तीफे की मांग की थी
उस समय स्टूडेंट्स फेडरेशन ऑफ इंडिया (एसएफआई) ने वीसी के इस्तीफे की मांग करते हुए कहा था, ‘जेएनयू की वीसी अब वही बातें सबके सामने दोहरा रहे हैं जो आरक्षण विरोधी आंदोलन को समर्थन देने वाले लोग करते रहे हैं. यह बहुत शर्मनाक है और जिस कैंपस की वह मुखिया हैं, वहां विद्यार्थी सुरक्षित नहीं हैं. इससे यह भी पता चलता है कि भारत के कैंपस को तुरंत एक मज़बूत भेदभाव-रोधी फ्रेमवर्क की ज़रूरत क्यों है. जेएनयू की वीसी को तुरंत इस्तीफ़ा दे देना चाहिए!’
जेएनयू छात्रसंघ ने भी उनकी टिप्पणी की आलोचना करते हुए उनके इस्तीफे की मांग की है.
उल्लेखनीय है कि इस संबंध में वसंत कुंज (नॉर्थ) थाने में भारतीय न्याय संहिता (बीएनएस) की कई धाराओं के तहत एफआईआर दर्ज की गई है, जिनमें लोक सेवकों को उनके कर्तव्यों के निर्वहन में बाधा डालना, अधिकारियों को कर्तव्य से रोकने के लिए जानबूझकर चोट पहुंचाना और लोक सेवकों के खिलाफ मारपीट या आपराधिक बल का प्रयोग करना शामिल है.
पुलिस ने दावा किया कि जेएनयू प्रशासन ने छात्रों को सूचित किया था कि परिसर के बाहर प्रदर्शन की अनुमति नहीं दी गई है और उन्हें विश्वविद्यालय परिसर के भीतर ही अपना विरोध प्रदर्शन करने की सलाह दी थी. इसके बावजूद, लगभग 400 से 500 छात्र इकट्ठा हुए और शहर की ओर मार्च करने लगे.
पुलिस ने आगे दावा किया कि प्रदर्शनकारियों ने बैनर, लाठियां और जूते फेंके, मारपीट भी की. एक अधिकारी ने अखबार से कहा, ‘झड़प के दौरान कुछ पुलिसकर्मियों को छात्रों द्वारा दांत से काटा गया और कई अधिकारी घायल हो गए.’
पुलिस ने कहा कि उन्होंने जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के उत्तरी गेट के पास प्रदर्शनकारियों को रोका और स्थिति को और बिगड़ने से रोकने के लिए धीरे-धीरे उन्हें परिसर के अंदर धकेल दिया.
अधिकारियों ने यह भी कहा कि आगे की जांच जारी है, जबकि छात्र समूह प्रशासन की कार्रवाई और पुलिस की प्रतिक्रिया का विरोध करते रहे हैं.
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