बंगनामा: वाराणसी की गंगा में हुगली की याद…

बनारस के घाटों पर समय बिताकर कलकत्ता के घाटों का ध्यान आना स्वाभाविक था. वाराणसी के घाटों का अध्यात्म और परलोक से संबंध अधिक है और कलकत्ता के घाटों का ज़्यादा सरोकार है इस लोक में जीवनयापन से. बंगनामा की चालीसवीं क़िस्त.

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(फोटो साभार: Wikimedia Commons/Staphylococcus93)

कुछ सप्ताह पूर्व बनारस साहित्यिक उत्सव में भाग लेने के सिलसिले में मैं वाराणसी गया था. जाते वक्त मैं शिक्षा, साहित्य तथा सर्वांग संस्कृति के महा केंद्र में आयोजित इस उत्सव में हिस्सा लेने तथा साहित्य साधकों को सुनने तथा उनसे मिलने की प्रत्याशा से प्रफुल्लित था और साथ ही एक गहरी जिज्ञासा भी थी. तीन हज़ार साल पुराना यह शहर पचास साल के बाद कैसा दिखेगा?

पहली बार मैं काशी 1976 की जनवरी में अपने माता-पिता और बहन के साथ गया था. उसके बाद मुझे वहां जाने का मौक़ा नहीं मिला. उस समय की कई यादें मेरे मन में स्पष्ट थीं, विशेषकर वहां की जीवंत गलियों में रंग भरी दुकानें, चाट और मिठाई का स्वाद, दोपहर बाद विश्वनाथ मंदिर की निर्जनता, मणिकर्णिका घाट पर जलती-धुंधुआती दो-तीन चिताएं, सूर्य अस्त होने पर नाव से लक्ष्य गंगा के प्राचीन घाटों की दोनों ओर दौड़ती लकीरें, इत्यादि.

पिछले कुछ सालों में वाराणसी के विकास एवं पुनरुद्धार को लेकर समाचार माध्यमों में बहुत कुछ आ रहा था इसलिए भी देखने की इच्छा थी कि वहां क्या कुछ नया हुआ है. बनारस का नाम सुनते ही मेरे मन में चित्र आता है वहां के घाटों का. वाराणसी पहुंच कर पहली संध्या ही मैं अस्सी घाट पहुंच गया. मुझे बताया गया था कि गंगा आरती देखे बग़ैर बनारस जाना अधूरा है. घाट पर पहुंचने तक आरती का भव्य समारोह आरंभ हो चुका था. बिजली के बल्बों तथा पीले-लाल गेंदे के फूलों की लड़ियों से सजे चौड़े नवनिर्मित घाट पर सात अस्थायी चबूतरों के ऊपर अगरबत्तियों और धूप के सुगंधित धुंध और घंटियों की झंकार के मध्य सात नवयुवा पुजारी आरती दे रहे थे.

घाट के ऊपर नई बनी सीढ़ियों पर हज़ारों की संख्या में आए दर्शक साथ-साथ आरती गा रहे थे, गंगा की पृष्ठभूमि में इस मोहक दृश्य का आनंद ले रहे थे, वीडियो बना रहे थे या फोटो ले रहे थे. यह विपुल जगमगाता, संगीतमय संस्कार नवनिर्मित घाट की तरह ही मुझे नया जान पड़ा. बीच-बीच में ऐसा भी लगा कि अस्सी घाट एक विशाल मंच बन गया है और हम दर्शक.

गंगा तट पर लोगों को व्यक्तिगत या पारिवारिक स्तर पर संध्या अर्चना देकर दीप जलाकर नदी में प्रवाहित करते हुए मैंने पटना, हरिद्वार और कलकत्ता में कइयों बार देखा था किंतु सामूहिक स्तर पर नहीं. इसलिए यह अनुभव अनूठा था. उस समय तो मैंने आरती का आनंद लिया. बाद में स्थानीय कुछ विज्ञजनों से पूछने पर पता चला कि इस गंगा आरती का आरंभ 1990 के दशक की शुरुआत में दशाश्वमेध घाट पर हुआ था और धीरे-धीरे यह अत्यंत लोकप्रिय हो गया. अब कुछ सालों से इसका आयोजन अस्सी घाट पर भी किया जा रहा है.

एक व्यक्तिगत धार्मिक क्रिया ने धीरे-धीरे विशाल सार्वजनिक और सामुदायिक रूप धारण कर लिया है.

(इलस्ट्रेशन: परिप्लब चक्रवर्ती/द वायर)

अगले दो दिनों में मैं वाराणसी में कुछ और जगहों पर भी गया जिसमें विश्वनाथ मंदिर तथा कुछ घाट भी शामिल थे. विश्वनाथ दर्शन के लिए जाते वक्त ही मुझे एक बड़ा भारी अंतर दिखने लगा. 1976 में जिस भीड़ भरी गली से हो कर बचते-बचाते मंदिर गया था वह अब इतनी चौड़ी हो चुकी थी कि किसी को किसी से टकराने की आवश्यकता न थी. दोनों तरफ़ की दुकानें भी बदली लगीं, कुछ फीकी लगीं, और उस गली में बाहर के सैलानी अधिक दिखे.

दर्शनार्थी इस बात से ख़ुश थे कि मंदिर परिसर साफ़ सुथरा है एवं दर्शन की व्यवस्था सुचारू है. मंदिर के पास के घाट भी पूरी तरह पुनः निर्मित लगते हैं और हैं भी. घाटों पर सेल्फ़ी लेते सजे संवरे सैलानियों के उमड़ते जनसमूह के बावजूद मुझे एक ख़ालीपन महसूस हुआ जिसे उस वक्त मैं पहचान नहीं पाया. लेकिन उसी साहित्य उत्सव की एक समीक्षा सत्र में साथ बैठी एक काशी-प्रेमी लेखिका ने इस अभाव को उजागर किया – संतों की इस नगरी में अधिकतर घाटों पर अब साधु-संयासी धूनी रमाए नहीं दिखते.

बनारस के घाटों पर समय बिताकर मुझे कलकत्ता के घाटों का ध्यान आना स्वाभाविक था. वहां गंगा की शाखा, जो मुर्शिदाबाद में पहले भागीरथी का नाम अपनाती है, हुगली बन चुकी होती है. परंतु वाराणसी और कलकत्ता के घाटों में उतना ही अंतर है जितना कि दोनों शहरों में. काशी की उम्र कम से कम तीन हज़ार वर्ष है और कलकत्ता को सांस लेते महज़ तीन सौ साल हुए हैं.

कहा जाता है कि काशी के सबसे पुरातन व पवित्र दशाश्वमेध घाट के नाम का कारण है स्वयं ब्रह्मा का वहां पर दस अश्वों का यज्ञ करना. यहां के घाटों का उल्लेख पुराणों, जातक कथाओं, शिलालेखों और अभिलेखों में मिलता है. हिंदुओं के लिए वाराणसी के घाट मनुष्य जीवन के भिन्न चरणों, मुंडन से मृत्यु तक, जुड़े हुए हैं. मणिकर्णिका घाट तो मोक्ष का द्वार ही माना जाता है.

बनारस में 84 से 88 घाट नदी के किनारे क़रीब-क़रीब लगातार बने हुए हैं. चूंकि वाराणसी में नदी तट का ढलान तीव्र है, यहां के घाटों की सीढ़ियों को सदैव ही जल तक उतरने की जल्दी रहती है. इनमें से अधिकतर घाटों का उद्धार या निर्माण 17वीं से 19वीं सदी के बीच मराठों, राजपूतों और पेशवाओं द्वारा किया गया था. आमेर के महाराजा मान सिंह ने सन 1600 मन मंदिर घाट बनवाया और दशाश्वमेध घाट को पेशवाओं ने यह भव्य वर्तमान रूप इसके पुनः निर्माण के उपरांत 18वीं ईस्वी में दिया था और इसी तरह बने हैं हरिश्चंद्र घाट, राजा घाट और दरभंगा घाट. राजा-महाराजाओं के बनवाए घाटों की स्थापत्य शैली में मंदिर और क्षेत्रीय महलों की वास्तुकला झलकती है.

कलकत्ता में हुगली पर क़रीब पचास घाट हैं जो अलग-अलग ही बने खड़े हैं और क्योंकि तट की ढलान हल्की है यहां के घाटों की सीढ़ियां भी आहिस्ता-आहिस्ता पानी से मिलने उतरती हैं. ज्वार-भाटा का चक्र नित दिन हुगली नदी में जल बढ़ाता घटाता घाटों की सीढ़ियों से छुआ-छुई खेलता रहता है. काशी से एक बड़ी भिन्नता यह भी है कि यहां के अधिकतर घाटों का निर्माण किया गया था व्यापार और संचार की सुविधाओं को बढ़ाने के लिए.

जगन्नाथ घाट और अरमेनियन घाट यहां के दो सबसे पुराने घाट बताए जाते हैं जिन्हें 18वीं सदी के मध्य में बनवाया गया था. यहां के घाटों पर पश्चिमी विशेषतः क्लासिकल यूनानी वास्तु शैली की छाप साफ़ झलकती है.

आज़ादी से पहले कलकत्ता के घाट बनवाने में चार मुख्य किरदारों का योगदान था- स्वदेशी व्यवसायियों का – जगन्नाथ और बाग़बाज़ार घाट, विदेशी व्यापारियों का – अरमेनियन घाट और सुरिनाम घाट, स्थानीय ज़मींदारों और रजवाड़ों का – मल्लिक घाट और बाबू घाट, तथा अंग्रेज़ी हुकूमत का – आउट्रम घाट और प्रिंसेप घाट. हरेक घाट इतिहास के किसी पक्ष पर प्रकाश डालता है, चाहे वह बाबू घाट के निर्माण में रानी राश्मोनी की सहृदयता हो या गिरमिटिया मज़दूरों का अज्ञात भू भाग के लिए सुरिनाम घाट से प्रस्थान.

कुछ औपनिवेशिक पूंजी और शक्ति तथा स्थानीय व्यापार के विकास की कहानी सुनाते हैं तो कुछ और यहां के बदलते सामाजिक और सांस्कृतिक चित्र को अंकित करते हैं. चूंकि हुगली के दोनों किनारों पर घनी आबादी वाले शहर हैं, वाराणसी के घाटों से यहां एक और बड़ा अंतर यह है कि कलकत्ता के घाट यहां के परिवहन व्यवस्था में एक बड़ी भूमिका अदा करते हैं. कुछ घाट अपने इर्द-गिर्द छोटे-बड़े बाज़ार और व्यवसाय के लिए भी जाने जाते हैं, जैसे फूलों के लिए मल्लिक घाट.

यह कहना ग़लत न होगा कि वाराणसी के घाटों का अध्यात्म और परलोक से संबंध अधिक है और कलकत्ता के घाटों का ज़्यादा सरोकार है इस लोक में जीवनयापन से.

2009 से 2014 तक मैं पश्चिम बंगाल के राज्यपाल के सचिव के पद पर कार्यरत था और मेरा आवास हुगली नदी के तट से बस 250 मीटर दूर था. गंगा के छोर से कुछ दूर रहने वाले भी बहुत देर तक इस जीवन स्रोत की मोहकता से दूर नहीं रह पाते हैं और मैं तो इसके तीर पर रह रहा था. मैं भी आए दिन टहलता-घूमता मेरे निवास से निकटतम घाट, बाबू घाट, पर चंद मिनटों के लिए रुक जाता था.

वहां हमेशा लोगों का आना जाना लगा रहता था, चहल पहल रहती थी. चुपचाप खड़ा मैं गंगा की हवा और घाट पर चल रहे लोगों के नित्यकर्मों के ड्रामा का आनंद उठाता रहता था. अरसों बाद पता चला कि गंगा दर्शन के इस रूप का कलकत्ता में एक नाम है, ‘बाबू घाटेर हावा खेते जावा (बाबू घाट के हवा का सेवन करने जाना).’

(चन्दन सिन्हा पूर्व भारतीय प्रशासनिक सेवा अधिकारी, लेखक और अनुवादक हैं.)

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