नई दिल्ली: वनाधिकार अधिनियम, 2006 के क्रियान्वयन में सहायता के लिए वनाधिकार अधिनियम प्रकोष्ठ (एफआरए सेल) को वित्तीय सहायता देने का कार्यक्रम शुरू करने के एक वर्ष बाद जनजातीय कार्य मंत्रालय ने राज्य और केंद्र शासित प्रदेश स्तर पर इन प्रकोष्ठों के दायरे का विस्तार करने का निर्णय लिया है.
द हिंदू की रिपोर्ट के मुताबिक, एफआरए सेल को वित्तपोषित करने की व्यवस्था मंत्रालय के डीएजेजीयूए कार्यक्रम के तहत शुरू की गई थी, ताकि राज्यों को अतिरिक्त मानव संसाधन उपलब्ध कराए जा सकें और वनाधिकार दावों के निपटारे की प्रक्रिया तेज हो सके.
इसके अलावा इनका उद्देश्य अभिलेखों का रखरखाव और वनाधिकार पट्टों से जुड़े मौजूदा रिकॉर्ड का डिजिटलीकरण भी था. पिछले वर्ष जून तक मंत्रालय ने 18 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में जिला स्तर पर 324 प्रकोष्ठों तथा राज्य स्तर पर 17 प्रकोष्ठों को मंजूरी दी थी.
अखबार के अनुसार, अधिकारियों ने बताया कि 4 फरवरी को राज्यों के साथ हुई समीक्षा बैठक में मंत्रालय ने ‘वन-स्टॉप’ परियोजना निगरानी इकाइयां (पीएमयू) बनाने का प्रस्ताव रखा, जो सभी नीतिगत मामलों में समन्वय का कार्य करेंगी.
इस कदम से उन कई राज्यों में भ्रम की स्थिति पैदा हो गई है जो पहले से ही एफआरए सेल गठित कर चुके हैं. पिछले सप्ताह ओडिशा सरकार ने 50 उप-संभागों में मौजूदा एफआरए सेल बंद करने का आदेश जारी किया, जिसे एक अधिकारी ने मंत्रालय की पुनर्गठन योजना का हिस्सा बताया.
छत्तीसगढ़ के अधिकारियों ने कहा कि राज्य फिलहाल पीएमयू बनाने की प्रक्रिया पर विचार कर रहा है और यह भी देख रहा है कि क्या मौजूदा एफआरए सेल वनाधिकार अधिनियम से बाहर के कार्यों का दायरा भी संभाल सकते हैं. हालांकि, मंत्रालय की ओर से अभी तक कोई लिखित निर्देश प्राप्त नहीं हुए हैं.
मंत्रालय के एक अधिकारी ने कहा कि केवल एफआरए के क्रियान्वयन के लिए अलग-अलग प्रकोष्ठों को वित्तपोषित करने से ‘खर्च बढ़ रहा था’ और नीतियों के क्रियान्वयन को लेकर राज्यों के साथ संवाद करना भी चुनौतीपूर्ण हो रहा था.
नई नीति के तहत प्रत्येक राज्य और केंद्र शासित प्रदेश में चार अधिकारियों वाली एक पीएमयू बनाई जाएगी – जिसमें एफआरए सहायता, आजीविका सहायता, आईटी और एमआईएस विशेषज्ञता तथा एक अन्य सहायक या टीम लीडर शामिल होगा. पीएमयू के अंतर्गत प्रत्येक जिले में दो विशेषज्ञ होंगे – एक एफआरए सहायता के लिए और एक एमआईएस विशेषज्ञ समन्वय के लिए.
अधिकारी ने कहा, ‘हर नीति के लिए अलग-अलग प्रकोष्ठ होने से काम के समन्वय में कठिनाइयां आ रही थीं, इसलिए यह सोचा गया कि यदि सभी नीतियों के समन्वय के लिए एक इकाई बनाई जाए तो नीतियों का क्रियान्वयन अधिक सरल और तेज हो सकेगा. उन्होंने बताया कि राज्यों को 4 फरवरी की बैठक में ही इस बारे में जानकारी दे दी गई थी ताकि उन्हें समायोजन के लिए समय मिल सके.
अधिकारियों के अनुसार कई राज्यों ने मौजूदा एफआरए सेल बंद करने को लेकर आशंकाएं जताईं, लेकिन उन्हें बताया गया कि ये अस्थायी प्रकृति के थे. अधिकारी ने कहा, ‘मंत्रालय ने राज्यों को नीति में बदलाव की जानकारी इसलिए भी दी है ताकि वे आवश्यकता के अनुसार एफआरए सेल के कर्मचारियों को अन्य कार्यों में समायोजित कर सकें या उन्हें मुक्त कर सकें.
छत्तीसगढ़ के एक अधिकारी ने कहा कि एफआरए सेल के कर्मियों की नियुक्ति विशेष रूप से वनाधिकार अधिनियम के क्रियान्वयन के लिए की गई थी और अब यह देखना होगा कि वे अन्य क्षेत्रों की जिम्मेदारियां संभाल पाने में सक्षम हैं या नहीं.
