दिल्ली हिंसा के छह साल: सरकार ने कोई कार्रवाई नहीं की और आपराधिक चुप्पी साध ली

2020 में उत्तर-पूर्वी दिल्ली में हुए दंगों के छह साल बाद अगर पीछे मुड़कर देखा जाए, तो यह सांप्रदायिक नरसंहार सबसे अलग है. केंद्र और प्रदेश सरकारों ने अपने नागरिकों को हिंसा से बचाने, उनकी ज़िंदगी फिर से पटरी पर लाने और न्याय दिलाने में मदद करने की अपनी ज़िम्मेदारियों से ख़ुद को अलग कर लिया.

फरवरी 2020 में उत्तर-पूर्वी दिल्ली में हुई हिंसा. (फाइल फोटो: पीटीआई)

2020 में दिल्ली में हुए सांप्रदायिक दंगों की छठी बरसी पर मैं दुख और आक्रोश के साथ लिख रहा हूं कि सरकार ने हिंसा के शिकार लोगों की किन-किन तरीक़ों से मदद नहीं की.

दुख की बात है कि आज़ादी के बाद 1961 में जबलपुर में हुए पहले बड़े दंगे के बाद से ही कुछ अपवादों को छोड़कर, बड़े पैमाने पर हुई सांप्रदायिक हिंसा के पीड़ितों को न्याय और मुआवज़ा दिलाने में भारतीय सरकार का रिकॉर्ड बहुत ख़राब रहा है.

लेकिन इस शर्मनाक रिकॉर्ड को देखते हुए भी 2020 में उत्तर-पूर्वी दिल्ली में हुआ सांप्रदायिक नरसंहार सबसे अलग है. सरकार ने अपने नागरिकों को हिंसा से बचाने, उनकी ज़िंदगी फिर से पटरी पर लाने और न्याय दिलाने में मदद करने की अपनी ज़िम्मेदारियों से ख़ुद को अलग कर लिया. इस तरह दिल्ली में शासन कर रही केंद्र और राज्य सरकार ने गिरावट का एक नया आयाम स्थापित किया. यह मोदी के राज के सबसे शर्मनाक अध्याय में से एक है.

नागरिकता संशोधन क़ानून, 2019 के ख़िलाफ़ देश भर में हुए अहिंसक विरोध प्रदर्शनों के बाद राष्ट्रीय राजधानी के इस इलाक़े में सांप्रदायिक आग फैली.

2019-20 की सर्दियों में पूरे भारत में इस क़ानून के ख़िलाफ़ आम लोगों का स्वत: स्फूर्त आंदोलन शुरू हुआ क्योंकि यह माना जा रहा था कि यह क़ानून मुसलमानों की धार्मिक पहचान को निशाना बनाकर उनके साथ भेदभाव करता है.

इसे भारत के संविधान पर सीधा हमला माना गया. यह तेज़ी से भारतीय गणराज्य का सबसे बड़ा अहिंसक आंदोलन बन गया, जो 1970 के दशक के मध्य में इमरजेंसी के ख़िलाफ़ जनता की बग़ावत से भी बड़ा था, जिसे मैंने अपनी जवानी के दिनों में देखा था.

आज़ादी की लड़ाई के आदर्शों की झलक और सभी धर्मों, जातियों तथा नस्लों के लोगों की एकता और एकजुटता का शानदार प्रदर्शन करने वाला ऐसा आंदोलन पहले कभी नहीं हुआ था जिसने ख़ास तौर पर भारतीय संविधान को अपना आइकॉन चुना.

हालांकि, 1.4 अरब लोगों के देश में एकजुटता का यह अनोखा आंदोलन अचानक ख़त्म हो गया. पहला झटका 23 फरवरी, 2020 को उत्तर-पूर्वी दिल्ली ज़िले में अचानक भड़की सांप्रदायिक हिंसा की आग से लगा, जहां अधिकतर मज़दूर वर्ग के लोग रहते हैं.

एक तरफ था बहुसंख्यक हिंदू समुदाय था जिनकी मदद के लिए पुलिस उनके साथ थी और दूसरी तरफ उनके मुस्लिम पड़ोसी थे, जिनके बीच चार दिनों तक लड़ाई चलती रही. इसमें कम से कम 53 जानें चली गईं, संपत्तियों को बहुत ज़्यादा नुक़सान हुआ और अलग-अलग मोहल्लों में रहने वाले दोनों धर्मों के हज़ारों लोग बेघर हो गए.

नए नागरिकता क़ानून के ख़िलाफ़ लोगों के विद्रोह को दूसरा बड़ा झटका इस सांप्रदायिक हिंसा के एक महीने बाद लगा जब केंद्र सरकार ने सख़्त देशव्यापी लॉकडाउन लगाया था, जिससे देश के 1.4 अरब लोग कई महीनों तक घरों के अंदर रहने को मजबूर हो गए.

जब 3 करोड़ भूखे और हताश प्रवासी मज़दूर पुलिस के डंडों और लॉकअप से बेपरवाह होकर हाईवे पर उतर आए, वैसे में भारतीय मुसलमानों के साथ भेदभाव करने वाले नागरिकता क़ानून के ख़िलाफ़ बढ़ता सामूहिक जन विरोध जल्द ही बीते कल की बात हो गई.

2020 में जफराबाद में हुई आगजनी. (फाइल फोटो: पीटीआई)

हिंसा को नियंत्रित करने और जान बचाने में नाकामी

सबसे पहले, यह दोहराना ज़रूरी है कि जहां यह हिंसा हुई वह जगह भारतीय गणराज्य की राष्ट्रीय राजधानी थी. यहां केंद्र सरकार और दिल्ली की राज्य सरकार दोनों का शासन है. दिल्ली में तीनों सेनाओं और ज़्यादातर पैरामिलिट्री फ़ोर्स का केंद्रीय हेडक्वार्टर भी है. अगर इच्छाशक्ति होती तो सचमुच कुछ ही घंटों में इस हिंसा को नियंत्रित किया जा सकता था क्योंकि राजधानी क्षेत्र के एक मज़दूर वर्ग के इलाक़े में एक छोटी-सी झड़प से इसकी शुरुआत हुई थी. बिना किसी रोक-टोक के चार दिनों तक हिंसा होती रही, जो सिर्फ़ सरकार की नाकामी को नहीं दिखाता.

यह सरकार की मिलीभगत का साफ़ सबूत है. मैंने एक सिविल सेवा अधिकारी के तौर पर काफ़ी समय तक सांप्रदायिक झगड़ों की रोक-थाम करने और उन पर नज़र रखने का काम किया है, और यह समझ पाया हूं कि सांप्रदायिक हिंसा कुछ घंटों से ज़्यादा तभी चल सकती है जब सरकार चाहे कि यह जारी रहे.

दिल्ली में सांप्रदायिक हिंसा की शुरुआत कुछ हद तक भाजपा के बड़े नेताओं के नफ़रत भरे भाषणों से हुई, जिनमें खुलेआम हिंसा को बढ़ावा दिया गया था. दिल्ली उच्च न्यायालय में याचिका दायर की गई, याचिकाकर्ताओं में यह लेखक भी शामिल था, जिसमें मांग की गई थी कि नफ़रत भरी हिंसा भड़काने के दोषियों के ख़िलाफ़ तुरंत कार्रवाई की जाए, और एक्टिंग चीफ जस्टिस एस. मुरलीधर की कड़ी फटकार के बावजूद पुलिस ने उनमें से किसी के भी ख़िलाफ़ केस दर्ज करने से इनकार कर दिया.

‘देश के ग़द्दारों’ और भारतीय मुसलमानों को गोली मारने का आह्वान करने वालों में से एक को केंद्रीय कैबिनेट मंत्री बना दिया गया. दूसरा आज दिल्ली सरकार की कैबिनेट में क़ानून और न्याय मंत्री है. उस याचिका का क्या हश्र हुआ इसके बारे में लेख के अगले हिस्से में चर्चा करूंगा.

राज्य का पहला कर्तव्य हिंसा को रोकना और नियंत्रित करना था. इसमें वह बुरी तरह फेल हो गया. वह अपना अगला ज़रूरी कर्तव्य भी पूरा नहीं कर पाया, वह उन लोगों को बचाने में भी फेल हो गया जिनकी जान, घर और संपत्ति को दंगाई भीड़ से ख़तरा था. इसके बजाय पुलिस ने उन 13,000 से ज़्यादा फोन कॉल पर ध्यान नहीं दिया, जो उन परेशान लोगों ने किया था जिनके जान और माल को दंगाई भीड़ से ख़तरा था.

सरकार को झकझोरने की जब मेरी ख़ुद की कोशिश नाकाम हुई, तब मैंने कारवां-ए-मोहब्बत की ओर से एक सिटीज़न्स कंट्रोल रूम बनाने के लिए वॉलंटियर्स से सार्वजनिक अपील की. ​​मेरी अपील के कुछ ही घंटों के भीतर, 40 से ज़्यादा नौजवान मेरे ऑफ़िस में जमा हो गए, और फिर पांच दिनों तक वहीं जमे रहे.

मैंने शशिकांत सेंथिल, जिन्होंने हाल ही में भारतीय प्रशासनिक सेवा से इस्तीफ़ा दिया था और अब लोकसभा सांसद हैं, और कन्नन गोपीनाथ से सिटीज़न्स कंट्रोल रूम को हेड करने का आग्रह किया. वे दोनों दिल्ली आए और सिटीज़न्स कंट्रोल रूम को संभाल लिया.

जैसे ही हमारा कंट्रोल रूम शुरू हुआ, बहुत सारे परेशान लोगों के फोन आने लगे. एक ख़ास फोन का ज़िक्र करना चाहूंगा, जो उस इलाक़े की एक क्लीनिक से आया जो सांप्रदायिक हिंसा से तबाह हो गया था. क्लीनिक के डॉक्टर ने उन लड़कों और आदमियों की बुरी हालत के बारे में बताया जिन्हें गोली लगी थी और जिन्हें अस्पताल ले जाया जा सकता था. लेकिन भीड़ और पुलिस ने एम्बुलेंस को भी आगे नहीं बढ़ने दिया.

उनके क्लीनिक में दो लोगों की मौत हो गई थी और कम से कम बीस लोगों की हालत ऐसी थी कि अगर उन्हें बिना देर किए अस्पताल नहीं पहुंचाया गया तो उनकी मौत हो सकती थी. युद्ध के समय के नियम भी घायल लोगों को अस्पताल ले जाने की आज़ादी देते हैं. लेकिन दिल्ली के युद्ध के मैदान में ऐसी आज़ादी नहीं थी.

कारवां-ए-मोहब्बत के वॉलंटियर वकीलों- सुरूर मंदर और चिरायु ने एक बार फिर आधी रात को दिल्ली उच्च न्यायालय के जस्टिस मुरलीधर से इस मामले में दख़ल देने की अपील की, तब जाकर कोर्ट ने पुलिस को एम्बुलेंस की सुरक्षित आवाजाही पक्का करने का निर्देश दिया.

इस आदेश ने न सिर्फ़ इन बीस लोगों की बल्कि सैकड़ों दूसरे घायल और ख़तरे में पड़े लोगों की जान बचाई, क्योंकि इसके बाद पुलिस ने सिटीज़न्स कंट्रोल रूम से हमारी फोन का जवाब दिया ताकि हिंसा से भड़के इलाक़े में एम्बुलेंस और रेस्क्यू वैन की सुरक्षित आवाजाही को सुनिश्चित किया जा सके.

लेकिन यह शर्म की बात है कि इसकेलिए उच्च न्यायालय को पुलिस को यह निर्देश देना पड़ा कि वह सांप्रदायिक नफ़रत की आग के बीच लोगों की जान बचाने की अपनी सबसे बुनियादी ज़िम्मेदारी पूरी करे.

उत्तर-पूर्वी दिल्ली दंगा के दौरान आग बुझाते पुलिसकर्मी. (फोटो: पीटीआई)

राहत-कार्य की नाकामी

राज्य सरकार ने शुरू में राहत कैंप बनाने के लिए कोई क़दम नहीं उठाया. इस मामले में उसने 2002 में गुजरात सरकार द्वारा की गई कार्रवाई का अनुसरण करना शुरू किया. 2002 में मुझे लगा था कि कोई भी सरकार राहत और पुनर्वास की अपनी ज़िम्मेदारियों से इतनी शर्मनाक तरीक़े से पीछे नहीं हट सकती, जैसा कि नरेंद्र मोदी की गुजरात सरकार ने किया था. दिल्ली सरकार ने मुझे गलत साबित कर दिया. उसने तो हद ही कर दी.

जब राहत कैंप बनाने से मना करने के लिए उसकी बहुत आलोचना हुई, तो दिल्ली सरकार ने नौ बेघर आश्रय गृहों को राहत कैंप में बदल दिया. इस तरह हिंसा में बेघर हुए हज़ारों लोगों को बहुत बुरी तरह से अपमानित करने के अलावा और कुछ नहीं किया गया था.

बेघर आश्रय गृह  टिन के शेड के बने होते हैं जिनमें बेघर लोगों को रखा जाता है, ख़ासकर सर्दियों के महीनों में. एक गंदी-सी जगह में और बेइज़्ज़ती वाली हालत में किसी तरह उन्हें ठूंस दिया जाता है. सांप्रदायिक हिंसा से बेघर हुए हज़ारों लोगों के लिए ये सुरक्षा और आराम की जगह कैसे हो सकती है?

जिस भारतीय प्रशासनिक सेवा में मैंने काम किया, वहां अधिकारियों को प्राकृतिक और मानव निर्मित आपदाओं के तुरंत बाद राहत कैंप लगाने की ट्रेनिंग दी जाती है, यहां तक कि दूर-दराज़ और पिछड़े इलाक़ों में भी, जहां बहुत ज़्यादा तबाही होती है.

दिल्ली, जो देश की राजधानी है, वहां स्टेडियम, कॉलेज की इमारतें, सिविल वॉलंटियर ग्रुप, एनसीसी, एनएसएस और बहुत सारे प्रोफ़ेशनल ग्रुप जैसे बहुत से संसाधन थे. सरकार अच्छे राहत कैंप लगाने के लिए आसानी से इनका इस्तेमाल कर सकती थी. मगर राज्य सरकार ने सांप्रदायिक हिंसा में मारे गए लोगों को राहत देने के लिए कुछ नहीं किया.

मुआवज़े से इनकार

मुआवज़े की कहानी तो और भी दुखद रही. जिसके बारे में कारवां-ए-मोहब्बत की रिपोर्ट The Absent State: Denial of Reparation & Recompense to the Survivors of the 2020 Delhi Pogrom में विस्तार से बताया गया है. केंद्र सरकार ने मुआवज़े की किसी योजना की घोषणा नहीं. हिंसा को हुए छह साल बीत चुके हैं, मगर हिंसा के पीड़ितों को एक भी रुपया नहीं दिया है.

राज्य सरकार ने बेहतर शुरुआत की, लेकिन अनुग्रह और मृतक मुआवज़ा राशि देने का सिलसिला कुछ हफ़्तों तक ही चला. राज्य सरकार ने कम से कम एक मुआवज़ा स्कीम की घोषणा तो की, हालांकि इसका दायरा 1984 के सिख विरोधी दंगे से बहुत सीमित था, जो राष्ट्रीय राजधानी में ही हुआ था.

2020 में दिल्ली राज्य सरकार के अधिकारियों ने नरसंहार के तुरंत बाद के दिनों में अनुग्रह राशि और मौत तथा चोट के मुआवज़े को असरदार तरीक़े से बांटा था. लेकिन फिर आश्चर्यजनक ढंग से इसे बंद कर दिया गया.

मार्च में ही नरसंहार के मुश्किल से एक महीने बाद, ऐसे समय में जब पीड़ित लोग दंगे के साथ-साथ कोविड लॉकडाउन के भयानक नतीजों से जूझ रहे थे, दिल्ली सरकार ने बिना किसी सार्वजनिक स्पष्टीकरण के नरसंहार के पीड़ित लोगों की मदद करने की अपनी ज़िम्मेदारी से हाथ खींच लिया. जिस सरकारी मदद से वे अपनी ज़िंदगी फिर से शुरू कर पाते, वो मदद उन्हें नहीं मिली. बजाय इसके दिल्ली सरकार ने मुआवज़े का आकलन करने और बांटने के लिए एक अलग एजेंसी बनाने के लिए दिल्ली उच्च न्यायालय का दरवाज़ा खटखटाया.

यह अकल्पनीय और अक्षम्य था. न सिर्फ़ मानवीय शासन के शुरुआती एथिक्स के हिसाब से यह गलत था; बल्कि यह क़ानून की नज़र में भी गलत था. सांप्रदायिक और जातिगत हिंसा से प्रभावित लोगों को बचाना, राहत देना, मुआवज़ा देना और उनका पुनर्वास करना आख़िरकार राज्य का एक बुनियादी कर्तव्य है. यह कर्तव्य सीधे तौर पर हिंसा में मारे गए लोगों के जीने के संवैधानिक मौलिक अधिकार से जुड़ता है.

मुस्तफाबाद में दंगा पीड़ितों के लिए बना राहत शिविर. (फोटो: पीटीआई)

अपने कर्तव्य को किसी बाहरी संस्था को सौंपने की मांग करने का कोई तर्क नहीं था, अपने आप में यह काफ़ी समस्याग्रस्त बात थी. उस एजेंसी की वजह से राज्य सरकार का अपने संवैधानिक कर्तव्य से पीछे हटना और भी मुश्किल हो गया जिसे उच्च न्यायालय ने इस काम के लिए नियुक्त किया था.

यह एक ऐसा कमीशन था जिसे असल में सांप्रदायिक हिंसा के पीड़ितों की मदद करने के मक़सद से नहीं बल्कि इससे उलट किसी और मक़सद के लिए बनाया गया था. इसका मक़सद सार्वजनिक संपत्ति को हुए नुक़सान का आकलन करना था, जिसका ख़र्च दंगाइयों से वसूला जाना था. इस मक़सद का सांप्रदायिक हिंसा में बचे हुए लोगों के नुक़सान की भरपाई करने के मकसद से कोई लेना-देना नहीं है.

सांप्रदायिक हिंसा के पीड़ितों को सही मुआवज़ा देने की इस भारी और पूरी तरह से अलग ज़िम्मेदारी के साथ, कमीशन ने पहले तो अपना काम शुरू करने में ही सात महीने लगा दिए. ऐसा लगता है कि उसे उन पीड़ितों की बुरी हालत का कोई अंदाज़ा ही नहीं था जो दंगों और लॉकडाउन की वजह से बिना किसी सरकारी मदद के बहुत लकलीफ़ में थे और अपनी रोज़ी-रोटी की समस्या से जूझ रहे थे. फिर कमीशन ने पीड़ितों को हुए नुक़सान का आकलन करने के लिए प्राइवेट इवैल्यूएटर नियुक्त किया.

यह साफ़ तौर पर एक सरकारी ज़िम्मेदारी थी. इन प्राइवेट इवैल्यूएटर द्वारा अपनाई गई प्रक्रिया और नियम को सार्वजनिक नहीं किया गया. न तो इवैल्यूएटर और न ही कमीशन ने उन लोगों की बात सुनी जिन्हें नुक़सान हुआ था. वे आम तौर पर अपने मूल्यांकन का कोई कारण नहीं बताते थे. और कमीशन ने मूल्यांकन के ख़िलाफ़ अपील का कोई प्रावधान नहीं किया.

हिंसा के पीड़ितों के बुनियादी अधिकारों पर हमला यहीं ख़त्म नहीं हुआ. जिन कुछ अर्ज़ियों पर कमीशन ने आदेश पारित किया, उनमें मुआवज़े की इतनी कम राशि तय की गई जो असल नुक़सान का एक बहुत छोटा हिस्सा था. यह सब कुछ प्राकृतिक न्याय के सभी सिद्धांतों के ख़िलाफ़ था.

लेकिन इनकार यहीं ख़त्म नहीं हुआ. ये थोड़ी-सी रकम भी असल में पीड़ितों तक नहीं पहुंची. कमीशन ने घोषणा की कि असल में राज्य सरकार ने उसे मुआवज़े की तय की गई छोटी रक़म देने के लिए भी कोई फ़ंड नहीं दिया है. राज्य सरकार के बजट की जांच करने पर पता चलता है कि 2020 और उसके बाद के सभी सालों के लिए भी मुआवज़े के भुगतान के लिए बजट में कोई प्रावधान नहीं किया गया था.

अगर राज्य सरकार ने पीड़ितों को मुआवज़ा देने के लिए सरकारी बजट में राशि का अलग से प्रावधान नहीं किया तो वह कैसे उम्मीद कर सकती है कि जिस कमीशन को उसने अपनी ज़िम्मेदारी सौंपी है वह पीड़ितों को उनकी ज़िंदगी फिर से शुरू करने के लिए तय की गई रक़म दे पाएगी?

दिल्ली सरकार के क़रीब 75,000 करोड़ रुपये के कुल बजट में, मुआवज़े का अधिकतम प्रावधान भी कुल बजट का 1%-2% से ज़्यादा नहीं होता. ज़ाहिर है, 2020 की दिल्ली सांप्रदायिक हिंसा के पीड़ितों को मुआवज़ा देने से मना करना कोई छोटी-मोटी चूक नहीं है जो फ़ंड की कमी की वजह से हुई. बल्कि इसके निहितार्थ कुछ और थे.

मेरे पास यह नतीजा निकालने के अलावा कोई चारा नहीं बचा है कि हिंसा के छह साल बाद भी पीड़ितों को मुआवज़ा देने से मना करना जानबूझकर किया गया इनकार है जो एक लोकतांत्रिक सरकार के लिए गलत है जिसने संविधान के तहत अपनी ज़िम्मेदारियों को निभाने का वादा किया है.

हिंसा को रोकने की कोशिश करना, दंगाई भीड़ से लोगों के जान माल को बचाना, और जो बेघर हो गए लोगों को राहत देना ऐसी ही ज़िम्मेदारी का काम था, जिसमें यह सरकार पूरी तरह से विफल रही.

(फाइल फोटो: पीटीआई)

इंसाफ़ नहीं मिल सका

दिल्ली पुलिस का इंसाफ़ में पूरी तरह से दख़ल देना भी कम चौंकाने वाला नहीं है. जो कुछ हुआ है, उसे बस दख़ल देना कहना काफ़ी नहीं है. असल में, यह हिंसा से बचे लोगों को इंसाफ़ मिलने की किसी भी संभावना को जानबूझकर ख़त्म करना है.

कई स्वतंत्र मीडिया और सिटीज़न रिपोर्ट और यहां तक कि कोर्ट के फ़ैसलों से पता चलता है कि दिल्ली पुलिस लगातार गलत दिशा में कोशिश करती रही हैं. वह हिंसा करने वालों को बचाने और सज़ा देने तथा बेगुनाह पीड़ितों को अपराधी बनाने में लगी रही. 2020 की दिल्ली सांप्रदायिक हिंसा के बाद, पुलिस ने 758 एफ़आईआर दर्ज की, जिसमें एक में यह दावा किया गया था कि नागरिकता संशोधन क़ानून 2019 के ख़िलाफ़ प्रदर्शन करने वाले और राहत के काम में लगे लोग असल में साज़िशकर्ता थे जिन्होंने सांप्रदायिक हिंसा की योजना बनाई थी.

जिसे ‘दिल्ली दंगा साज़िश केस’ के नाम से जाना गया, उसमें दिल्ली पुलिस ने दावा किया कि नागरिकता संशोधन के ख़िलाफ़ प्रदर्शन करने वालों ने असल में सरकार बदलने के लिए आतंकी कार्रवाई के तौर पर दंगों की साज़िश रची थी. इस आरोप में 18 छात्र नेता, एक्टिविस्ट और एक नेता कई साल जेल में रहे, और सांप्रदायिक हिंसा के छह साल बाद भी उनके केस की कोई ट्रायल शुरू नहीं हुई. उनमें से पांंच अभी भी जेल की सलाख़ों के पीछे हैं.

बीबीसी हिंदी द्वारा 2025 में की गई एक ज़रूरी इन्वेस्टिगेशन में बताया गया कि ख़तरनाक सांप्रदायिक दंगों के पांंच साल बाद भी, इसमें शामिल लोगों को कोई क़ानूनी सज़ा मिलती नहीं दिख रही थी. बीबीसी हिंदी ने फ़ाइल किए गए सभी 758 केस का स्टेटस चेक किया और उन 126 केस का विश्लेषण किया जिनमें दिल्ली की कड़कड़डूमा कोर्ट ने फ़ैसले दिए थे.

इसमें चौंकाने वाली बात यह पाई गई कि 126 केस में से 80% से ज़्यादा में गवाहों के मुकर जाने या अभियोजन पक्ष द्वारा केस को मज़बूती से नहीं रखने की वजह से उन्हें बरी कर दिया गया. इनमें से सिर्फ़ 20 केस में ही सज़ा हुई. कई केस में, कोर्ट ने यह कहते हुए पुलिस की जांच की ईमानदारी पर गंभीर चिंता जताई कि उन्होंने बेगुनाह लोगों को फंसाया और गुनहगारों को उनके जुर्म से बरी कर दिया. जिन पुलिस अधिकारियों ने जानबूझकर इंसाफ़ में रुकावट डाली, उन्हें भी शायद ही कभी सज़ा मिली.

इन 126 फ़ैसलों के विस्तृत विश्लेषण से यह भी पता चला कि इनमें से कई केस में जांच में कमी के कारण कोर्ट द्वारा दिल्ली पुलिस की कड़ी आलोचना की गई. कुछ मामलों में, पुलिस ने आरोपियों को ‘गलत तरीक़े से फंसाने’ के लिए ‘पहले से तय चार्जशीट’ फ़ाइल की थीं. इन 126 मामलों में से ज़्यादातर में पुलिस अधिकारियों को गवाह के तौर पर पेश किया गया था, लेकिन कोर्ट को उनकी गवाही भरोसेमंद नहीं लगी.

पुलिस के बयानों में काफ़ी विरोधाभास था, पुलिस ने आरोपियों की पहचान में देरी की और कुछ मामलों में तो इस बात पर शक था कि हिंसा शुरू होने के समय पुलिसवाले वहां मौजूद भी थे या नहीं.

जिन मामलों में ट्रायल हुआ, उनमें हत्या से जुड़े मामलों में सज़ा मिलने की दर सबसे ख़राब थी. फ़ाइल किए गए 758 मामलों में से ऐसे 62 मामले थे. इनमें से सिर्फ़ एक में सज़ा हुई और चार बरी हुए.

द इंडियन एक्सप्रेस के इसी तरह के एक विश्लेषण में, रिपोर्टरों ने दंगों के उन 116 मामलों को ध्यान से देखा जिनमें फ़ैसले सुनाए जा चुके थे. इनमें सभी 116 मामलों से 97 मामलों में आरोपियों को बरी कर दिया गया. लगभग हर पांंच में से एक मामले में जजों ने दिल्ली पुलिस की गंभीर गलतियों, जैसे ‘गढ़े हुए’ सबूत, ‘काल्पनिक’ गवाह, और ‘थोपे हुए’ मामलों की वजह से कड़ी आलोचना की. 12 फ़ैसलों में कोर्ट ने पाया कि पुलिस ‘नक़ली’ गवाह लाई थी और कई तरह के ‘मनगढंत’ सबूत पेश किए थे.

दो मामलों में गवाहों ने ख़ुद गवाही दी कि पुलिस अधिकारियों ने उनके बयान ख़ुद से लिखवाए थे. एक बरी किए गए मामले में जज ने कहा, ‘जांच अधिकारी (IO) ने सबूतों में बहुत ज़्यादा हेराफेरी की है. ऐसे मामलों से जांच प्रक्रिया और क़ानून के राज में लोगों का भरोसा गंभीर रूप से कम होता है.’

द इंडियन एक्सप्रेस ने पाया कि कई कोर्ट आदेशों में अभियोजन पक्ष के बनाए केस में कमियां निकाली गई हैं. एक जज ने कहा कि एक अहम गवाह का होना ‘शक के घेरे में है, और इस संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता कि वह व्यक्ति असल में हो ही नहीं.’ लगभग एक जैसे दो आदेश में, एक कोर्ट ने तो यह भी मान लिया कि पुलिस जानती थी कि उनका केस ‘फ़र्ज़ी’ है क्योंकि वे पहचान के लिए आरोपियों की परेड नहीं करा पाए.

(फाइल फोटो: पीटीआई)

एक अन्य कोर्ट की बातें जो पुलिस को जानबूझकर इंसाफ़ के ख़िलाफ़ काम करने का बहुत बड़ा दोषी ठहराती हैं, उनमें ‘केस डायरी में संभावित हेरफेर’ और एक पुलिस कांस्टेबल का ‘बनावटी दावा’ शामिल है.

पुलिस की शर्मनाक भूमिका के लिए कोर्ट द्वारा बार-बार लगाए जाने वाले ये आरोप आपराधिक न्याय व्यवस्था में गहरी व्यवस्थागत सड़न की ओर इशारा करते हैं. इसमें कोई शक नहीं कि उसने सत्ताधारी दल के ग़ैर-संवैधानिक और ग़ैर-क़ानूनी राजनैतिक प्रोजेक्ट के आगे पूरी तरह से सरेंडर कर दिया है, और नफ़रत से हुई हत्याओं, चोटों, लूट और आगजनी के दोषी बहुसंख्यक हिंदू समुदाय के लोगों को बचाने की वजह से ख़ुद को बदनाम भी किया है.

कपिल मिश्रा को सज़ा से बरी कर देना

मैं इंसाफ़ की नाकामियों की इस कहानी को कपिल मिश्रा पर वापस लाकर ख़त्म कर रहा हूं, जिसके बारे में मैंने पहले बात की है. कई लोगों का मानना ​​है कि उनकी हेट स्पीच ही वह चिंगारी थी जिसने सांप्रदायिक हिंसा को भड़काया. फरवरी 2023 में, एक सीनियर पुलिस अधिकारी की मौजूदगी में, इस एमएलए ने दिल्ली पुलिस को सड़कों से सीएए विरोधी प्रदर्शनकारियों को हटाने का अल्टीमेटम दिया, और धमकी दी कि अगर पुलिस ऐसा नहीं करती है तो वह और उसके लोग मामले को अपने हाथ में ले लेंगे.

जब हिंसा अभी भी सुलग रही थी, जस्टिस एस मुरलीधर और तलवंत सिंह की एक डिवीज़न बेंच ने तीन दिन बाद मेरी अर्जेंट पिटीशन पर सुनवाई की, जिसमें मिश्रा और दूसरे सीनियर नेताओं के ख़िलाफ़ तुरंत एफ़आईआर दर्ज करने की मांग की गई थी, जिनके हेट स्पीच की वजह से हिंसा भड़की थी. जस्टिस एस मुरलीधर ने कोर्ट में मिश्रा और भाजपा के दूसरे सीनियर नेताओं के हेट स्पीच वाले वीडियो चलाने का आदेश दिया.

दो जजों की बेंच ने पाया कि उनके बयान ‘हेट स्पीच’ से भरे हुए थे और दिल्ली पुलिस से उनके ख़िलाफ़ एफ़आईआर दर्ज करने की ज़ोरदार अपील की. सॉलिसिटर जनरल ने कोर्ट को बताया कि पुलिस एफ़आईआर दर्ज करने के लिए ‘सही समय’ तय करेगी.

जस्टिस मुरलीधर ने कपिल मिश्रा के बयान के लिए उनके ख़िलाफ़ एफ़आईआर दर्ज करने के बारे में दिल्ली पुलिस को 24 घंटे में फ़ैसला लेने का निर्देश दिया. लेकिन उसी आधी रात को जस्टिस मुरलीधर को तुरंत अपना चार्ज किसी और को सौंपने का निर्देश दिया गया.

सीनियर वकील इंदिरा जयसिंह ने कहा कि कपिल मिश्रा के मामले में पुलिस द्वारा केस रजिस्टर न करना ‘सेलेक्टिव एमनेस्टी’ है. उन्होंने कहा कि सुप्रीम कोर्ट ने साफ़ कहा है कि पुलिस को किसी गंभीर अपराध के बारे में जानकारी मिलने पर एफ़आईआर रजिस्टर करनी चाहिए. जयसिंह ने कहा, ‘यह ऐसा है जैसे आपने जांच शुरू भी नहीं की हो और किसी को माफ़ी दे दी जाए. आप इसे सेलेक्टिव एमनेस्टी या सज़ा से छूट कह सकते हैं.’

उत्तर-पूर्वी दिल्ली के रहने वाले मोहम्मद इलियास ने भी दंगों में कपिल मिश्रा की भूमिका की जांच के लिए मजिस्ट्रेट से संपर्क किया. दिल्ली पुलिस ने कोर्ट में मिश्रा का मज़बूती से बचाव करते हुए कहा कि बड़ी साज़िश के मामले में उनकी पहले ही ‘जांच’ हो चुकी है और दंगों को भड़काने में उनका कोई रोल नहीं पाया गया है. पुलिस यहीं नहीं रुकी. उन्होंने आगे आरोप लगाया कि मिश्रा का नाम लेने की कोशिशें उन्हें बदनाम करने के लिए चलाए गए ‘झूठे प्रोपेगैंडा’ कैंपेन का हिस्सा थीं.

न्यायिक स्वतंत्रता की अद्वितीय मिसाल पेश करते हुए एडिशनल चीफ़ ज्यूडिशियल मजिस्ट्रेट वैभव चौरसिया ने इन दोनों दावों को ख़ारिज कर दिया. उन्होंने पूछताछ के दौरान मिश्रा की भाषा में सांप्रदायिक रंग देखा. मिश्रा मुसलमानों को ‘वो’ और ‘उस तरफ’ कह रहे थे, जिससे सांप्रदायिक सोच का पता चलता है. साथ ही मिश्रा ने ख़ुद कोर्ट में माना कि जब उन्होंने अपना विवादित भाषण दिया, तो उनके साथ प्रदर्शन स्थल पर 50-60 समर्थकों का एक ग्रुप था, और यह एक गंभीर अपराध था.

भाजपा नेता कपिल मिश्रा 23 फरवरी 2020 को जाफराबाद में समर्थकों को संबोधित करते हुए. (फोटो साभार: एक्स)

उन्होंने माना कि उन्होंने अपने भाषण में ‘जगह ख़ाली करवाने’ की पब्लिक अपील की थी. जज ने यह भी कहा कि जब मिश्रा ने अपना भाषण दिया, तो डीसीपी वेद प्रकाश सूर्या मौक़े पर मौजूद थे, लेकिन उनकी जांच नहीं की गई.

हालांकि, अपने ज़मीर की आवाज़ सुनने वाले जज के शानदार फ़ैसले के बावजूद क़ानून का मक़सद अभी भी पूरा नहीं हुआ था. दिल्ली पुलिस ने एडिशनल सेशंस जज कावेरी बावेजा की कोर्ट में इस आदेश को चुनौती दी, जिन्होंने आगे की जांच पर रोक लगा दी. क़ानूनी विशेषज्ञों ने फ़्रंटलाइन को बताया कि जज बावेजा का यह ऑर्डर बहुत ही अजीब था, शायद ग़ैर-क़ानूनी भी, क्योंकि कोर्ट शायद ही कभी चलती हुई जांच पर रोक लगाती है.

छह साल बाद भी कपिल मिश्रा के ख़िलाफ़ कोई एफ़आईआर दर्ज नहीं हुई है. एफ़आईआर दर्ज करने का ‘सही समय’ अब तक नहीं तक नहीं आया है. दिल्ली उच्च न्यायालय में मिश्रा के ख़िलाफ़ एफ़आईआर की मांग वाली मेरी पिटीशन पर सुनवाई के दौरान सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने ‘सही समय’ का उल्लेख किया था.

इसके उलट दिल्ली पुलिस ने आतंकवादी विरोधी क़ानून यूएपीए के तहत केस दर्ज किया, जिसमें 18 एक्टिविस्ट और छात्र नेता पर साज़िश रचने का आरोप लगाया गया, जिनमें से ज़्यादातर मुस्लिम थे. जिसके बारे में मैंने ऊपर उल्लेख किया था कि इस एफ़आईआर का उद्देश्य नागरिकता क़ानून के ख़िलाफ़ होने वाले अहिंसक आंदोलन को सरकार बदलने की साज़िश के रूप में पेश करना था.

ये लोग एक ऐसे क़ानून के विरोध में भाषण दे रहे थे जिसे देश भर में कई लोग संविधान के प्रावधानों का उल्लंघन मानते थे. वे नफ़रत भरे भाषण नहीं थे. इस बीच कपिल मिश्रा 2025 में दिल्ली चुनाव में भाजपा के टिकट पर चुनकर असेंबली में पहुंचे, और उन्हें कैबिनेट में शामिल किया गया. वह भी क़ानून और न्याय मंत्री के तौर पर.

 जब इतिहास दिल्ली के सांप्रदायिक दंगों को देखता है

सुप्रीम कोर्ट के एक जाने-माने रिटायर्ड जज मदन लोकुर ने बीबीसी हिंदी से कहा, ‘अगर अभियोजन पक्ष (बेगुनाह) लोगों को सिर्फ़ इसलिए जेल में डालता है क्योंकि उनके पास ऐसा करने की शक्ति है, तो उन्हें ऐसा करने की इजाज़त नहीं मिलनी चाहिए. अगर जेल भेजना गलत या ग़ैर-ज़रूरी पाया जाता है – लोग बेल मिलने से पहले कई साल जेल में रहते हैं – तो उन्हें झूठे केस में फंसाने वाले लोगों को सज़ा मिलनी चाहिए.’

इतने सारे लोगों के बरी होने के बाद उन्होंने कहा कि अभियोजन पक्ष और पुलिस को ‘बैठकर सोचना चाहिए कि उन्होंने पांंच साल में क्या हासिल किया है’. उन्होंने कहा कि ‘अगर गिरफ़्तारी ग़ैर-क़ानूनी या ग़ैर-ज़रूरी पाई जाती है तो अभियोजन पक्ष की भी जवाबदेही तय होनी चाहिए.’

जज को यह कहना ज़रूरी लगा कि ‘जब इतिहास दिल्ली दंगों को देखेगा, तो एक बात जो (लोगों की अंतरात्मा को) चुभेगी, वह यह है कि दिल्ली पुलिस ने दंगों के अपराधों की सही तरीक़े से जांच नहीं की. यह नाकामी निश्चित रूप से लोकतंत्र के रक्षकों को परेशान करेगी.’

राष्ट्रीय राजधानी में हज़ारों मज़दूर परिवारों की ज़िंदगी, रोज़ी-रोटी, घर, सामाजिक रिश्ते और भरोसे को तबाह करने वाले सांप्रदायिक दंगों के छह साल बाद भी, सरकार साफ़ तौर पर, बेशर्मी से अपराधिक चुप्पी साधे हुए है और किसी तरह की कोई कार्रवाई नहीं कर रही है.

(शोध सहयोग के लिए सुमैया फ़ातिमा का आभार)

 (हर्ष मंदर शांति तथा न्याय कार्यकर्ता और लेखक हैं. वह यूनिवर्सिटी ऑफ हाइडलबर्ग में साउथ एशिया इंस्टिट्यूट में विज़िटिंग फ़ैकल्टी हैं.)

 (मूल अंग्रेज़ी से ज़फ़र इक़बाल द्वारा अनूदित. ज़फ़र भागलपुर में हैंडलूम बुनकरों की कोलिका नामक संस्था से जुड़े हैं.)