नई दिल्ली: नगालैंड विधानसभा ने मंगलवार (3 मार्च) को गृह मंत्रालय के उस आदेश, जिसमें आधिकारिक अवसरों पर वंदे मातरम गाना या बजाना अनिवार्य किया गया है, को इसकी राज्य में लागू होने की संभावना की जांच के लिए सदन की एक चयन समिति को भेज दिया.
द हिंदू की रिपोर्ट के मुताबिक, यह निर्णय विधानसभा अध्यक्ष शारिंगैन लॉन्गकुमेर ने उस समय घोषित किया, जब 2 मार्च को राज्यपाल के अभिभाषण पर धन्यवाद प्रस्ताव पर चर्चा के दौरान भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के विधायकों को छोड़कर लगभग सभी दलों के सदस्यों ने राष्ट्रीय गान जन गण मन से पहले वंदे मातरम् बजाने या गाने को लेकर आपत्ति जताई थी.
केंद्रीय गृह मंत्रालय ने 28 जनवरी को दस पन्नों का एक निर्देश जारी किया था. इसमें कहा गया था कि वंदे मातरम के छह छंदों वाला, तीन मिनट दस सेकेंड का संस्करण आधिकारिक अवसरों पर बजाया या गाया जाना अनिवार्य होगा. इसमें भारतीय ध्वज फहराने के समय, कार्यक्रमों में राष्ट्रपति के आगमन पर, उनके भाषणों से पहले और बाद में, राष्ट्र के नाम उनके संबोधन के पहले और बाद में, तथा राज्यपालों के आगमन और भाषणों से पहले और बाद में इसे बजाने या गाने की बात कही गई है.
द हिंदू के अनुसार, इस निर्देश के बाद सोमवार (2 फरवरी) को बजट सत्र के पहले दिन नगालैंड विधानसभा में पहली बार राष्ट्रीय गीत वंदे मातरम बजाया गया.
ईस्टर्न मिरर की रिपोर्ट के मुताबिक, कई विधायकों ने राष्ट्रीय गीत के बजाए जाने और गाए जाने पर नाराज़गी जताई. उनका कहना था कि ईसाई बहुल राज्य नगालैंड के लिए इस गीत को गाना ‘अनुचित’ है.
2011 की जनगणना के अनुसार, नगालैंड की कुल आबादी में 87.93 प्रतिशत लोग ईसाई हैं.
धन्यवाद प्रस्ताव पर चर्चा की शुरुआत करते हुए नगा पीपुल्स फ्रंट के विधायक कुझोलुज़ो नीनु ने कहा कि राज्य विधानसभा की कार्यवाही में वंदे मातरम् को शामिल करना ‘पूरी तरह अनावश्यक’ है. उन्होंने कहा कि ईसाई बहुल राज्य के लिए यह उचित नहीं है.
रिपब्लिकन पार्टी ऑफ इंडिया (अठावले) के विधायक लीमा ओनेन चांग ने कहा कि उनकी अंतरात्मा उन्हें इसे स्वीकार करने की अनुमति नहीं देती. उन्होंने इसे अपने धर्म के खिलाफ और मौलिक अधिकारों का उल्लंघन बताया.
नेशनलिस्ट कांग्रेस पार्टी के विधायक पी. लोंगोन ने कहा कि राष्ट्रीय गान से पहले राष्ट्रीय गीत सुनना ‘असामान्य और आश्चर्यजनक’ है और इसे उन्होंने थोपने जैसा बताया.
द हिंदू के अनुसार नेशनल पीपुल्स पार्टी (एनपीपी) के विधायक त्सेइलहौतुओ रुत्सो ने भी इस गीत को गाने पर आपत्ति जताई और इसे ‘संवैधानिक तथा अंतरात्मा से जुड़े सवाल’ बताया. उल्लेखनीय है कि एनपीपी, भाजपा के नेतृत्व वाले राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) का हिस्सा है.
उन्होंने कहा कि भारत के स्वतंत्रता आंदोलन में वंदे मातरम् का ऐतिहासिक और भावनात्मक महत्व है, लेकिन नगालैंड जैसे मुख्यतः ईसाई राज्य में इसके अनिवार्य किए जाने पर सवाल उठता है, खासकर जब राज्य को विशेष संवैधानिक प्रावधानों के तहत संरक्षण प्राप्त है.
रिपोर्ट के अनुसार उन्होंने तर्क दिया कि राष्ट्रीय गीत को अनिवार्य बनाने से देशभक्ति को एकरूपता के साथ जोड़ने का खतरा पैदा होता है, जिससे भारतीय संविधान के अनुच्छेद 25 और 29 का उल्लंघन हो सकता है. उन्होंने अनुच्छेद 371ए का भी उल्लेख किया, जो नगालैंड की धार्मिक और पारंपरिक प्रथाओं की रक्षा करता है.
कई अन्य विधायकों ने भी इस निर्देश के खिलाफ इसी तरह के विचार व्यक्त किए.
बहस का जवाब देते हुए नगालैंड के मुख्यमंत्री नेफ्यू रियो ने सुझाव दिया कि राष्ट्रीय गीत के उपयोग की समीक्षा के लिए राज्य विधानसभा की एक चयन समिति गठित की जाए. उन्होंने इस मुद्दे को संवेदनशील और राष्ट्रीय महत्व का बताया.
चयन समिति विधानसभा की एक अस्थायी समिति होती है, जिसे किसी विशेष विधेयक या विषय की जांच करने के लिए बनाया जाता है और अपनी रिपोर्ट या सिफारिशें पेश करने के बाद इसे भंग कर दिया जाता है.
मुख्यमंत्री की टिप्पणी के बाद विधानसभा अध्यक्ष लॉन्गकुमेर ने सदस्यों की भावनाओं को स्वीकार करते हुए इस मामले को चयन समिति को भेजने का निर्णय लिया.
इससे पहले पूर्वोत्तर के प्रभावशाली छात्र संगठन नगा स्टूडेंट्स फेडरेशन (एनएसएफ) ने कड़ा विरोध किया है.
एनएसएफ ने 20 फरवरी को जारी बयान में कहा था, ‘यह निर्देश एक सख्त प्राथमिकता क्रम निर्धारित करता है और सबसे जरूरी बात इसे स्कूलों पर लागू करता है. ऐसा निर्देश थोपना नगा समाज की ऐतिहासिक, राजनीतिक और सांस्कृतिक वास्तविकताओं की अनदेखी करता है. हम भारतीय संविधान के ढांचे, जिसमें अनुच्छेद 51A(क) भी शामिल है, से अवगत हैं, लेकिन हम स्पष्ट रूप से कहते हैं कि कोई भी प्राधिकरण नगा मातृभूमि पर इस तरह से सांस्कृतिक या विचारधारा के हिसाब से चलने के लिए मजबूर नहीं कर सकती जो हमारे खास इतिहास और पहचान की अनदेखी करे.’
