ईरान पर हमला हमारे सभ्यतामूलक सहचर देश पर हमला है

कभी-कभार | अशोक वाजपेयी: ईरान में दशकों से एक आततायी धार्मिक तानाशाही थी जिससे निजात पाने की ज़िम्मेदारी ईरानी जनता की है. अमेरिका-इज़रायल उसके सर्वोच्च शासक की हत्या कर दें यह किसी भी तरह से उचित नहीं समझा जा सकता. कल को कोई और देश हमारे यहां सत्ता-परिवर्तन करने के लिए हमला कर दे तो क्या इसे हम स्वीकार कर लेंगे?

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दिल्ली स्थित ईरान के दूतावास में ईरान के सुप्रीम लीडर आयतुल्लाह अली खामेनेई की हत्या के बाद शोक पुस्तिका पर दस्तख़त करते भारत के विदेश सचिव विक्रम मिस्री. (फोटो साभार: विदेश मंत्रालय)

ईरान पर अमेरिकी-इज़रायली हमले से शुरू हुआ युद्ध अपनी बर्बादी, नृशंसता, अनैतिकता में लगातार फैल रहा है. बमबारी में मारी गई डेढ़ सौ बच्चियों के लिए क़ब्रों की तस्वीरें अख़बार के पहले पृष्ठ पर आई थीं. सारे अंतरराष्ट्रीय क़ानूनों और समझौतों का दिनदहाड़े उल्लंघन करते हुए ईरान पर किया गया हमला दुनिया के अधिकांश देश निष्क्रिय रहकर हताश देख रहे हैं. दो सिरफिरे राजनेताओं के पागल व्यवहार और बेहद हिंसक युयुत्सा ने सारी दुनिया को स्तब्ध कर दिया है. ऐसे युद्ध सिर्फ़ मुहावरे में मानवता के विरुद्ध नहीं होते: वे मानवता के बड़े हिस्से को घायल, क्षत-विक्षत, विकलांग करते हैं.

भारत में हम, दुर्भाग्य से, ऐसे मुक़ाम पर हैं कि हमारी सरकार इस युद्ध के विरुद्ध कुछ नहीं कह पा रही है. यह राजनयिक निरूपायता, व्यापारिक और सैन्य समझौतों से नीति का लोप समझ में अपना मुश्किल है. इन दिनों हमारे सार्वजनिक जीवन में सत्तारूढ़ राजनीति ने इतिहास और परंपरा को लेकर बहुत शोर मचा रखा है. तो यह याद करने का मुकाम है कि भारतीय सर्जनात्मक, बौद्धिक और सामान्य जीवन में ईरान की भूमिका रही है.

हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत, ख़ासकर उसकी ख़याल परंपरा, अपने नाम, कई विधियों और अवधारणाओं में ईरानी संगीत की सदियों से ऋणी रही है. हमारा शास्त्रीय संगीत सारी दुनिया में हमारी अलग पहचान बनाता रहा है और वह पश्चिमी शास्त्रीय संगीत द्वारा सारे संगीतों को लील जाने की लिप्सा के विरुद्ध अडिग खड़ा रहा है. भारतीय मिनिएचर कला का उत्स ईरान है: वहीं के चित्रकारों से भारतीय चित्रकारों ने यह महान् कला सीखी, अपनी प्रतिभा और कौशल से विकसित की और भारतीय पौराणिक, धार्मिक, राजनीतिक, सामाजिक जीवन का अत्यंत मनोहारी विशद-विपुल चित्रांकन किया.

ईरान की भाषा फ़ारसी ने भारत में व्यापकता के अलावा अद्वितीय सर्जनात्मकता अर्जित की और फ़ारसी काव्य में भारतीयों द्वारा फ़ारसी कविता की अलग धारा की, ‘सबक-ए-हिंदी’ के रूप में, अलग मान्यता है. 19वीं और 20 शताब्दी के आरंभ में भारत में 2000 से अधिक पुस्तकें फ़ारसी में प्रकाशित हुई जो उस दौरान ईरान में प्रकाशित पुस्तकों से अधिक थीं.

भारत के अनेक महाकवियों ने फ़ारसी में लिखा है जिनमें बेदिल के अलावा ग़ालिब भी हैं जिनके लिखे का जितना हिस्सा उर्दू में है, उसका चौगुना हिस्सा फ़ारसी में है. भारत की एक महान् भाषा उर्दू में बहुत बड़ा हिस्सा फ़ारसी से आया है. हिंदी और कई भारतीय भाषाओं में बहुत सारे फ़ारसी शब्द घुले-मिले हैं. कई पकवान जैसे समोसा, बर्फ़ी, हलवा आदि मूलत: ईरान के हैं.

इसलिए ईरान पर हमला, एक तरह से, भारत पर भी हमला है. हमारे सभ्यतामूलक सहचर देश पर हमला है. वहां दशकों से एक आततायी धार्मिक तानाशाही थी जिससे निजात पाने की ज़िम्मेदारी ईरानी जनता की है और अमेरिका-इज़रायल उसके सर्वोच्च शासक की हत्या कर दें यह किसी भी तरह से उचित नहीं कहा- समझा जा सकता. कल को कोई और देश हमारे यहां सत्ता-परिवर्तन करने के लिए भारत पर हमला कर दे तो क्या इसे हम स्वीकार कर लेंगे?

कई संसार

आधुनिकता की एक विडंबना यह है कि उसने हमें किसी एक संसार में रहने देने के बजाय कई संसारों में और वह भी एक साथ रहने को विवश-सा कर दिया है. हमारे अनुभव, कर्म और संवेदना में ये कई संसार गड्डमड्ड होते रहते हैं. हम एक में दाख़िल होते हैं तो दूसरों की उपस्थिति छाया की तरह हमें पछियाती रहती है. एक दूसरे से हिलगा है, भले अलग भी है. एक में दूसरे की घुसपैठ है, अंतर्ध्वनि है: एक दूसरे बल्कि दूसरों के बिना संभव ही नहीं है. समय भी शायद कई हैं- उनमें, कई बार, हमें लेकर रस्साक़शी सी रही है.

हम सचाई के संसार में रहते हुए कल्पना के संसार में भी रहते हैं: कल्पना के संसार में रहते हुए हम फिसलकर स्मृति के संसार में चले जाते हैं. हम संस्कृति, अध्यात्म, सूचना, ज्ञान, इतिहास, राजनीति, बाज़ार आदि के संसारों में विचरते हैं, भटकते और रमते रहते हैं- कई बार तो इतना कि हमें ख़बर ही नहीं लग पाती कि हम कहां हैं, कहां नहीं हैं. होना, न होना हमारी सांसारिकता को रूपायित करता रहता है.

ग़ालिब का मिसरा है: ‘हरचंद कहें कि है, नहीं है!’

कविता और साहित्य का एक काम हमारी इस जटिल बहुसांसारिकता को दर्ज करना, खोजना और विन्यस्त करना है. जो साहित्य किसी एकतान संसार या समय तक अपने को महदूद रखता है वह कभी पूरी तरह से मानवीय और महत्वपूर्ण नहीं हो सकता.

हमारी यह बहुलौकिकता अलौकिक है. यह दिव्य नहीं, मानवीय चमत्कार है. यह किसी व्योम से नहीं टपकता. यह धरती पर उसकी भाषाओं में घटता है: अपनी तमाम ध्वनियों-अंतर्ध्वनियों, रूपकों-बिम्बों, प्रसंगों-वृत्तान्तों, संवेदना और मर्म, अपने विचार और सूझों के साथ. हम उसे घटते हुए देखते-सुनते-पढ़ते-समझते हैं. हम विस्मय में डूब जाते हैं, हम संसार के रहस्य को मानो छूने सा लगते हैं.

यह सब हमारे सामान्य जीवन के रोज़मर्रापन के पड़ोस में घटता है- यह हमें कहीं दूर नहीं, ‘इतने पास अपने’ ले आता है. हमारी कल्पना, संवेदना, यथार्थ की समझ और पहचान, जिजीविषा सब एक साथ उद्दीप्त होते हैं. दूरदराज़ भी पास आ जाता है; नक्षत्र पड़ोस में टिमटिमाने लगते हैं, दूसरे इतने अपने हो जाते हैं- हम अपनी खिड़की से हाथ बढ़ाकर आकाश को छू सकते हैं ऐसा भाव जागता है. हम सिर्फ़ संसार या संसारों में नहीं रहते- हम एक समवाय में शामिल हो जाते हैं जिसमें हरेक के पास हरेक दूसरे के लिए पाथेय है.

हाल ही में दिल्ली में आयोजित अंतरराष्ट्रीय कविता समारोह ‘संसार’ में बैठे हुए ये अनुभव लगातार घेरते-गहराते रहे. सभी कवि दूर से आए थे, उन भाषाओं और देशों से जिनकी कविता के बारे में हम ज़्यादा नहीं जानते. उन्होंने अपनी कविताओं से, हिंदी के कई कवियों ने अपने अनुवादों से और कई चित्रकारों ने कविताओं से प्रेरित चित्रांकनों से जो ‘समवाय’ गठित किया उसमें हम सहज शामिल हो गए.

यह बढ़ते अंधेरों के बरक़्स टिमटिमाती रोशनियों का एक काफ़िला था (और है) जिसमें शिरकत कर हम शायद मनुष्यतर लौटे: अपनी मनुष्यता में सत्यापित और ऊर्जस्वित.

कविता में संसार

संसार’ में पढ़ी गई कुछ कविताओं के अंश, हिंदी अनुवाद में:

एक मां राख में तब्दील हो रही है,
अपने दो बच्चों को गले लगाए हुए.
एक मां अपने बच्चे को गिरते मलबे से बचाने,
कंक्रीट के तख़्ते को थामे हुए है.
एक मां अपनी नस काटकर अपने एक बच्चे को खून पिला रही है, क्योंकि
अब और कुछ नहीं बचा है,
क्योंकि अब कोई और बचा ही नहीं है.

( कैटरीना कैलिट्को, यूक्रेन. अनु: तेजी ग्रोवर)

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मां कहती है कि प्रेम निगल जाता है ऐसे बचाता है हमें
और इस तरह एक-एक करके हम ग़ायब होते चले गए.
अपने बीच बचाए रखना चाहता हूं सच,
और भागे बिना प्रेम में जीवित रहना चाहता हूं.

( के. एल्टिनाए, सूडान. अनुः अम्बर पाण्डे)

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वे वहीं रहे, हमेशा की तरह मुस्कुराते हुए,
उस जगह को ख़ाली करके जिसमें वे थोड़ी-सी
जगह के साथ रहते थे-
बस एक जगह,
जो अब खून से सने तकिये की तरह गोद में है

( अकरम अलकात्रेब, सीरिया. अनुः निधीश त्यागी)

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पूरा ज़ोर लगाकर थामे रहते हैं
उस चीज़ को जिसे हम जीवन कहते हैं
ख़ासकर इसलिए कि मेरे परिवार में कोई बीमार नहीं है
और इस समय हमारे देश में कोई युद्ध नहीं है
जैसे ही ताज़ी हवा मेरे फेफड़ों को सहलाती है
मैं हर सुबह अपने आप से दोहराती हूं
जीवन के गौरव को न माना पाप होगा.

(आंद्रे वेलांतिनेत, लिथुआनिया. अनुः पूनम अरोड़ा)

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एक चट्टान-सा आसमान, मशाल-सा समन्दर, धुआं
और धरती अपने बूढ़े फेफड़ों को उठाती और गिराती है
कोई राष्ट्र नहीं कोई हवा नहीं, कोई जगह नहीं,
कोई अवधारणा नहीं
कोई ख़ामोशी नहीं, जो जल न रही हो
हर जगह आग, हर जगह धूल
और फिर भी इमारतें नम हैं, लोग कहानियां सुनाते हैं
भीड़ में लोग और एक ही बिंदु में भीड़
यहां तक कि ख़ालीपन भी जलता है
और इस आग में एक बूंद जीवित है

( ग्लोरयाना वेबर, स्लोवीनिया. अनुः निधीश त्यागी)

(लेखक वरिष्ठ साहित्यकार हैं.)