‘निर्मल जी कभी नहीं चाहते थे कि कोई भी युवा लेखक उनके लेखन का अनुसरण करें’

साहित्यकार उदयन वाजपेयी निर्मल वर्मा को गुरु की पदवी देते हैं, पर मानते हैं कि उनका अपना लेखन निर्मल के प्रभाव से मुक्त है. मनोज मोहन को दिए एक साक्षात्कार में वे कहते हैं कि 'ज़्यादातर लेखक उनके पास जाकर उनसे चमत्कृत होकर लौट आते थे. संभवतः उन्होंने उनके भीतर बैठे उस अप्रतिम उस्ताद की झलक तक नहीं देखी, जिसके साथ बैठकर मैंने बहुत कुछ सीखा.'

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निर्मल वर्मा. (फोटो साभार: राजकमल प्रकाशन)

हिंदी के प्रख्यात साहित्यकार निर्मल वर्मा से लेखक उदयन वाजपेयी का सान्निध्य गहरा रहा है. अपने उस्ताद निर्मल के लेखन और विचारधारा से जुड़े कुछ ज़रूरी पहलुओं को उन्होंने मनोज मोहन को दिए एक साक्षात्कार में स्पष्ट किया है. पेश है उस साक्षात्कार के अंश. 

निर्मल वर्मा आपके उस्ताद रहे हैं. उनके द्वारा दो विपरीत धारा के कहानीकारों- योगेंद्र आहूजा और जयशंकर को लिखे पत्रों को मैंने पढ़ा… निर्मल जी उनसे अपने विचारों के रास्ते पर चलने का आग्रह नहीं करते… आप बताएं वे युवाओं से क्या चाहते थे…

निर्मल वर्मा शायद ऐसे अकेले हिंदी लेखक हैं, जिन्होंने हर उस लेखक-कवि-कलाकार या पाठक को जवाब दिया, जिसने भी उन्हें पत्र लिखा. वे इसे गांधी जी की तरह ही अपनी ज़िम्मेदारी मानते थे. वे अपने पत्र हाथ से लिखा करते थे और उनकी लिखाई आसानी से समझ में नहीं आती थी. उसे लगभग बूझना होता था. उनके हर पत्र के साथ जूझना बेहद आनंददायक होता था. मेरे पास उनके कई पत्र हैं.

निर्मल जी कभी नहीं चाहते थे कि कोई भी युवा लेखक उनके लेखन का अनुसरण करें. वे हमेशा चाहते रहे कि जो भी युवा लेखक उनके संपर्क में आया है, वह अपनी तरह से लिखने का रास्ता चुने. मैं सबके बारे में नहीं जानता पर मुझे निर्मल जी ने बाकायदा बैठाकर लेखकीय व्याकरण के कुछ अनिवार्य पहलुओं से अवगत कराया था. वे यह सब बताकर मेरी प्रतिक्रिया नहीं जानना चाहते थे. वे बस एक उस्ताद  की तरह कुछ बातें सूत्रों में कहते थे, जिन्हें मैं आज तक गुनता रहता हूं. एक उस्ताद और शिक्षक में यही फ़र्क है. उस्ताद चाहता है कि आप उसके दिए आलोक में अपने रास्ते पर चलकर अपना आलोक पा लें. जबकि शिक्षक चाहता है कि आप उसकी बातें दोहराते रहें.

प्रायः निर्मल जी पर दक्षिणपंथ की तरफ़ जाने का आरोप लगता है पर उनके साहित्य में यह कहीं नहीं दिखता. वे वाम में रहे, वाम से अलग रहे और अलग होने के जो कारण बताए, वे उनके तई सही थे…लोगों के आरोपों के पीछे कहीं उनके सही होने का कारण गिनाना तो नहीं है? क्या यह कहीं-न-कहीं एक सरलीकृत तरीक़े से उनका अवमूल्यन करना तो नहीं?

आपने भी मेरी ही तरह हिंदी साहित्य का वह समय देखा है, जब अगर आप वामपंथ से एक अंगूठा भी बाहर निकालते, आपको समाज-विरोधी पदवियों से विभूषित कर दिया जाता. हमारे कई ऐसे वामपंथी साहित्यकार भी हुए हैं जो अपनी विचारधारा के प्रति उतने सहज नहीं हो पाए. एक तरह की असुरक्षा महसूस करते रहे. ऐसे कुछ-एक साहित्यकार संभवतः यह नहीं चाहते थे कि कोई भी दूसरी विचार दृष्टि या दृष्टियां हिंदी साहित्य के परिदृश्य पर स्थान पा सकें.

निर्मल वर्मा अपने लेखन के शुरुआती दिनों में साम्यवादी पार्टी से जुड़े हुए थे. उनका पहला कहानी संग्रह भी सोवियत यूनियन के भारतीय संस्करण ‘रादुगा’ या ऐसे ही किसी नाम के प्रकाशन से छपा था. तब तक प्रगतिशील लेखकों के लिए वे ऐसे लेखक थे जिनके गद्य में ‘संगीत’ था. लेकिन जैसे ही उनका चेकोस्लोवाकिया में सोवियत फौज़ों के हस्तक्षेप को देखकर मार्क्सवाद से मोह भंग हुआ और वे इस विचारधारा पर नई तरह से सोचने लगे, वे तुरंत ही कई ऐसे साहित्यिक मठाधीशों की आंख की किरकिरी बन गए. तो इस तरह से निर्मल जी के साहित्य को बिना पढ़े ही, बिना उसका मूल्यांकन किए ही तिरस्कृत किया जाने लगा. उनकी कहानियों, उपन्यासों और निबंधों को गहराई से पढ़ने की ज़रूरत तक न समझी गई.

विदेश-प्रवास पर जाने से पहले वे ‘परिंदे’ लिख चुके थे. ‘थिगलियां’ के शुरुआती चार कहानियों को लें, तो निर्मल वर्मा के विदेश जाने से पहले उनकी कुल ग्यारह कहानियां प्रकाशित हो चुकी थी. इससे आलोचकों का यह आरोप स्वतः ही ढह जाता है कि निर्मल भारतीय चरित्रों को विदेशी परिवेश में रखकर लिखते हैं. मलयज जैसे आलोचक ने भी इस बात को लिखा…

आप ठीक कह रहे हैं कि निर्मल जी विदेश जाने से पहले काफ़ी कुछ लिख चुके थे. वे एक लेखक के तौर पर विदेश गए थे. वहां जाने के पीछे उनके मन में निश्चय ही यूरोप को साक्षात् जानने की इच्छा रही होगी. यूरोप के श्रेष्ठ लेखकों से मिलने की भी. यह बार-बार याद रखने की बात है कि वे वहां धन कमाने नहीं गए थे, अपनी यूरोप के प्रति जिज्ञासा को किसी हद तक शांत करने गए थे. उनकी उन दिनों लिखी कई कहानियों में विदेशी पात्र भी आते हैं. पर इसमें अचरज की बात नहीं होनी चाहिए क्योंकि किसी भी कहानीकार के चरित्र उसके जीवन से ही आते हैं.

यह अलग बात है कि कहानी में आने के लिए उन चरित्रों को स्मृति और कल्पना के दुर्गम मार्ग से गुज़रना होता है. निर्मल जी कहानियों में भी ऐसा ही हुआ है. उनके विदेशी पात्रों की उपस्थिति में हम यूरोपीय मनुष्य की मनःस्थिति और इतिहास से उसके संबंध को किसी इतिहास की पुस्तक पढ़ने की तुलना में कहीं बेहतर समझ सकते हैं. इन पात्रों के कारण भारतीयों की यूरोप की समझ में इजाफ़ा ही हुआ है. उन्हें प्रश्नांकित करने का अर्थ यह है कि हमें अपने देश से बाहर के किसी भी मनुष्य को समझने की कोई भी आवश्यकता नहीं है. लेकिन हम मानते हैं कि ऐसा संभव नहीं है और साथ ही इसके अभाव में हम भारतीय, अंतरराष्ट्रीय मंच पर उतने बेहतर ढंग से सक्रिय न हो सकेंगे जितने की आवश्यकता है.

यह आश्चर्य का विषय है कि विभाजन के बाद के उजाड़ पर लिखी कहानी ‘थिगलियां’ को उन्होंने अपने संग्रह में आने से क्यों रोक रखा था? निर्मल वर्मा के संवेदनशील मस्तिष्क पर विभाजन की काली छाया का असर 2002 में प्रकाशित उनकी एक अन्य कहानी ‘इशारे’ में भी देखा जा सकता है. आप इन कहानियों को कैसे देखते हैं?

‘थिगलियां’ कहानी को निर्मल जी ने अपने किसी कहानी संग्रह में संभवतः इसलिए नहीं लिया क्योंकि इस कहानी में सृजनात्मक संकेतन (जिसे आनंदवर्धन ने ‘ध्वनि’ कहा है) अपेक्षया कम है. इसे इस तरह भी कह सकते हैं कि इस कहानी में सृजनात्मक परिष्कार उस स्तर का नहीं है जिस स्तर की प्रत्याशा निर्मल जी अपनी कहानियों से करते होंगे और जिसे उनकी बाद की कहानियां हमारे सामने रखती हैं. इन कहानियों में उस स्तर की ऐन्द्रिकता नहीं है जिसकी हमें उनकी कहानियों में पाने की आदत हो गई है.

(फोटो साभार: राजकमल प्रकाशन)

निर्मल जी अपनी इन कहानियों में ऐन्द्रिकता का वह अभाव देख पाए होंगे. ये कहानियां लिखीं तो एक बड़े लेखक की हैं लेकिन उसके पूरे रचना कर्म की बड़ी कहानियां नहीं हैं. आपका कहना सच है कि भारत के विभाजन पर निर्मल जी ने साल 2002 में ‘इशारे’ लिखी थी. इस कहानी की विशेषता ठीक वही थी जिसका अभाव उन्हें ‘थिगलियां’ में महसूस हुआ होगा.

‘इशारे’ में विभाजन के त्रास को इतनी खूबसूरती से निर्मल वर्मा इंगित करते हैं कि वह विभाजन भारत भूमि का न रह जाकर पाठक के अपने हृदय का हो जाता है. लेकिन क्या विभाजन के असली मायने यही नहीं थे? या हैं ?

एक पारिवारिक व्यक्ति के रूप में निर्मल जी के बारे में बहुत कम लिखा मिलता है. निर्मल जी हिंदी के बड़े लेखक हैं, परिवार को लेकर उनके संवेदनशील पक्ष पर आप कुछ कहें, तो उनका प्रशंसक समृद्ध होगा.

निर्मल जी के कई उपन्यासों और कहानियों में परिवार केंद्र में है. मसलन लाल टीन की छत, एक चिथड़ा सुख, रात का रिपोर्टर और अंतिम अरण्य. बहुत-सी कहानियों के केंद्र में भी परिवार है. कहीं वह आख्याता का भाई है, कहीं बहन, कहीं पिता, कहीं कोई अन्य पारिवारिक व्यक्ति. उनकी एक कहानी ‘जाले’ में तो बहनों के बीच का इतना सुंदर विन्यास बना है जो पढ़ते ही बनता है. निर्मल जी का अपना परिवार उनके चारों ओर उतना नहीं था जितना कि वह उनके भीतर था.

यह सच है कि वे अपने अद्वितीय चित्रकार भाई रामकुमार से बेहद प्रेम करते थे. उनकी एक छोटी बहन दिल्ली में रहती थी और वे भाई-बहन एक-दूसरे से समय-समय पर मिलते भी थे. पर यह भी सच है कि निर्मल जी अपने परिवार के प्रिय सदस्य होते हुए भी, कम-से-कम मेरी समझ में उसके हाशिये पर ही रहते थे. यह शायद उनके लेखकीय जीवन के कारण हुआ होगा और उनकी एकांत प्रियता के कारण भी. इस बारे में मेरा कुछ भी कहना क़यास लगाने से अधिक कुछ नहीं.

मैं एक बार उनके साथ उनकी छोटी बहन के घर गया था. हम वहां इतालवी फ़िल्मकार एण्टोनियोनी की फ़िल्म ‘पैसेंजर’ टेलीविज़न पर देखने गए थे. फ़िल्म के दौरान शायद छोटी बहन को भूख लग आई. वे कुछ ऐसा खाने लगी जिससे आवाज़ हो रही थी. इस पर निर्मल जी ने उन्हें इतने स्नेह से झिड़की दी कि मैं समझ गया कि ये भाई-बहन आपस में बहुत प्रेम करते होंगे. दरअसल छोटी बहन इसलिए कुछ खा रही थी कि ऐसा करके भाई को भी खाने को प्रेरित कर सकें.

मैंने उनके बड़े भाई को भी करोल बाग के उनके घर में देखा है. निर्मल जी उन दिनों वहीं रहते थे और मैं भोपाल से जाकर उन्हीं के साथ रुकता था. मुझे याद है कि निर्मल जी ही सीढ़ियों से उतरकर अपने बड़े भाई के सो जाने पर उनके कमरे की बत्तियां बंद करते थे. अगर उन्हें देर हो जाती तो नीचे के कमरे से उनके फ़ौजी भाई की सख़्त आवाज़ ऊपर आती और निर्मल जी तेज़ी से सीढ़ियां उतरने लगते.

निर्मल जी के इतना क़रीब होने के बावजूद एक क़तरा प्रभाव भी आपकी कहानियों पर नहीं है, हालांकि पर्याप्त संख्या में ऐसे कथाकार हैं जिनकी कहानियों पर उनका प्रभाव झलकता है.

यह शायद इसलिए है क्योंकि मैंने लेखन-विद्या की बारीकियां उनकी कहानियों में केवल पढ़ी नहीं बल्कि उनके साथ बैठकर सीखी भी हैं. ज़्यादातर लेखक उनके पास जाकर उनसे चमत्कृत होकर लौट आते थे. संभवतः उन्होंने उनके भीतर बैठे उस अप्रतिम उस्ताद की झलक तक नहीं देखी, जिसके साथ बैठकर मैंने बहुत कुछ सीखा है. वे खुद ये मानते थे. यही उनकी कम-से-कम मेरे संदर्भ में कोशिश भी रहती थी.

हिंदी में आधुनिकता की ग़लत समझ के कारण ‘कवि-शिक्षा’ जैसे गहन कार्य को हाशिये पर डाल दिया गया है. पर मुझे न तो आधुनिक होने की पड़ी है और न ही आधुनिक दिखने की. मैं अपने तीनों उस्तादों- निर्मल वर्मा, मणि कौल, जगदीश स्वामीनाथन से जो भी हो सका सीखा. वे मेरे भीतर कभी भी लुप्त नहीं हो पाए.

(मनोज मोहन सीएसडीएस की शोधपरक पत्रिका ‘प्रतिमानः समय समाज संस्कृति’ के सहायक संपादक हैं.)