नई दिल्ली: केंद्र सरकार द्वारा प्रस्तावित परिसीमन (डिलिमिटेशन) कवायद पर मंगलवार (14 अप्रैल) को तीखी राजनीतिक प्रतिक्रियाएं सामने आईं. विपक्षी नेताओं और दक्षिणी राज्यों के मुख्यमंत्रियों ने चेतावनी दी कि जनसंख्या-आधारित लोकसभा सीटों का विस्तार देश के संघीय संतुलन को मूल रूप से बदल सकता है.
ये प्रतिक्रियाएं 16 और 17 अप्रैल को निर्धारित संसद के विशेष सत्र से पहले आई हैं, जिसमें केंद्र सरकार तीन विवादास्पद विधायी प्रस्तावों को पारित कराने की कोशिश कर रही है, जिनके लिए संविधान संशोधन आवश्यक है. इन विधेयकों का उद्देश्य लोकसभा की सीटों को बढ़ाकर 815 करना, महिलाओं के लिए आरक्षण लागू करना और इस विस्तार के दायरे में केंद्र शासित प्रदेशों को शामिल करना है.
ये तीन विधेयक हैं – संविधान (131वां संशोधन) विधेयक, 2026, परिसीमन विधेयक, 2026, और केंद्र शासित प्रदेश कानून (संशोधन) विधेयक, 2026.
तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एमके स्टालिन ने अब तक सबसे कड़ा रुख अपनाया है. उन्होंने मंगलवार (14 अप्रैल) को चेतावनी दी कि यदि तमिलनाडु की चिंताओं को दूर किए बिना परिसीमन को आगे बढ़ाया गया, तो 1960 के दशक के हिंदी-विरोधी आंदोलनों जैसी व्यापक जन-आंदोलन की स्थिति पैदा हो सकती है.
उन्होंने जोर देकर कहा कि तमिल पार्टियों के लिए यह मुद्दा केवल राजनीतिक शक्ति का नहीं, बल्कि पहचान और सम्मान का है. उन्होंने यह बात उस संदर्भ में कही जब मोदी सरकार 2026 की जारी जनगणना का इंतजार करने के बजाय 2011 की जनगणना के आधार पर संसद की एक-तिहाई सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित करने हेतु विशेष सत्र बुला रही है.
केंद्र सरकार महिलाओं के लिए आरक्षण लागू करने के लिए एक परिसीमन आयोग भी गठित कर रही है, जबकि कई विशेषज्ञों और राज्य नेताओं ने कहा है कि इन दोनों मुद्दों को आपस में जोड़ने की जरूरत नहीं है.
स्टालिन ने यह भी कहा कि यह विशेष सत्र ऐसे समय में बुलाया गया है जब तमिलनाडु में आगामी विधानसभा चुनावों की तैयारी सभी राजनीतिक दलों द्वारा जोर-शोर से की जा रही है. उन्होंने कहा कि यदि केंद्र सरकार इसके बावजूद सत्र जारी रखने पर अड़ी रहती है, तो राज्य सरकार चुनावों में उलझने के बजाय यह ध्यान देगी कि परिसीमन का तमिलनाडु पर क्या प्रभाव पड़ेगा.
उन्होंने एक्स (पूर्व में ट्विटर) पर साझा किए गए अपने वीडियो संदेश को केंद्र सरकार के लिए ‘अंतिम चेतावनी’ बताया और कहा कि विधायी एजेंडा आगे बढ़ाते समय विपक्ष के विचारों को ध्यान में रखा जाए. उन्होंने यह भी कहा कि इस मुद्दे पर केंद्र सरकार ने राज्य की बात नहीं सुनी, इसलिए उन्हें जनता को संबोधित करना पड़ा.
Hon’ble Prime Minister, this is Tamil Nadu’s final warning.
மாண்புமிகு பிரதமர் அவர்களே, இது தமிழ்நாட்டின் இறுதி எச்சரிக்கை!#TNwillFightTNwillWin pic.twitter.com/v9wkYYM6MO
— M.K.Stalin – தமிழ்நாட்டை தலைகுனிய விடமாட்டேன் (@mkstalin) April 14, 2026
डीएमके सांसद पी. विल्सन ने स्टालिन की बात का समर्थन करते हुए भाजपा पर आरोप लगाया कि वह दक्षिणी राज्यों को कमजोर करने के लिए लंबे समय से चली आ रही वैचारिक योजना को आगे बढ़ा रही है. उन्होंने कहा कि भले ही सरकार सभी निर्वाचन क्षेत्रों में 50% वृद्धि का प्रस्ताव दे रही है, लेकिन प्रस्तावित तंत्र के तहत अंतिम निर्णय का अधिकार केंद्र द्वारा नियुक्त परिसीमन आयोग को दिया गया है, जो जनसंख्या के आधार पर काम करेगा.
विल्सन के अनुसार, इससे अधिक जनसंख्या वृद्धि वाले उत्तरी राज्यों को असमान रूप से लाभ मिलेगा, जबकि तमिलनाडु और केरल जैसे राज्यों को नुकसान होगा, जिन्होंने सफलतापूर्वक जनसंख्या नियंत्रण नीतियां लागू की हैं.
उन्होंने 1971 (जिसकी जनगणना पिछली परिसीमन प्रक्रिया में आधार बनी थी) और 2026 के बीच जनसांख्यिकीय अंतर का उल्लेख करते हुए कहा कि बिहार, राजस्थान और उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों में जनसंख्या वृद्धि दक्षिणी राज्यों की तुलना में कहीं अधिक रही है. यदि परिसीमन केवल इसी आधार पर किया गया, तो दक्षिणी राज्यों को राजनीतिक प्रतिनिधित्व और वित्तीय निर्णयों में प्रभाव – दोनों में कमी का सामना करना पड़ सकता है, जबकि वे राष्ट्रीय राजस्व में महत्वपूर्ण योगदान देते हैं.
इन चिंताओं को दोहराते हुए माकपा के राज्यसभा सांसद जॉन ब्रिट्टास ने संबंधित विधेयकों को संघीय भारत के लिए ‘डेथ वारंट’ बताया.
उन्होंने व्यापक परामर्श की मांग को खारिज करने के लिए केंद्र सरकार की आलोचना की और चेतावनी दी कि केवल अनुपातिक रूप से सीटों की वृद्धि भी मूल असंतुलन को दूर नहीं करेगी. उन्होंने कहा कि संसदीय राजनीति में शक्ति का निर्धारण अनुपात से नहीं, बल्कि कुल संख्या से होता है.
तेलंगाना के मुख्यमंत्री ए. रेवंत रेड्डी ने एक वैकल्पिक ‘हाइब्रिड’ मॉडल पेश किया है, जिसमें अतिरिक्त सीटों को जनसंख्या-आधारित आवंटन और आर्थिक प्रदर्शन (सकल राज्य घरेलू उत्पाद – जीएसडीपी) के आधार पर विभाजित करने की बात कही गई है.
उनका प्रस्ताव उन राज्यों को प्रोत्साहित करने का प्रयास है जो राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था में अधिक योगदान देते हैं, साथ ही दक्षिण को होने वाले डेमोग्राफिक नुकसान को कम करना है. इस प्रस्ताव ने संवैधानिक व्यवहार्यता को लेकर बहस छेड़ दी है – कुछ आलोचकों का कहना है कि आर्थिक मानकों का संसदीय प्रतिनिधित्व तय करने में कोई स्थान नहीं होना चाहिए, जबकि अन्य का मानना है कि केंद्र सरकार के प्रस्ताव के संभावित प्रभावों को देखते हुए इसे तुरंत खारिज नहीं किया जाना चाहिए.
Dear Shri @narendramodi Ji
I am writing this open letter to you in response to the latest proposal to increase Lok Sabha seats to 850.#LokSabhaDelimitation pic.twitter.com/4M566g78kU
— Revanth Reddy (@revanth_anumula) April 14, 2026
रेड्डी ने परिसीमन को महिला आरक्षण से जोड़ने का भी विरोध किया और कहा कि ये दोनों अलग-अलग संवैधानिक मुद्दे हैं. उन्होंने दक्षिणी राज्यों के मुख्यमंत्रियों से इस मुद्दे पर एकजुट होने की अपील की.
कर्नाटक के मुख्यमंत्री सिद्धारमैया ने भी यह मुद्दा उठाते हुए चेतावनी दी कि जो राज्य जनसंख्या नियंत्रण को प्राथमिकता देते हैं, उन्हें इस प्रस्ताव के तहत अन्याय का सामना करना पड़ेगा. उन्होंने जोर दिया कि संसद में दक्षिणी राज्यों की आवाज कमजोर नहीं होने दी जानी चाहिए.
भारत राष्ट्र समिति (बीआरएस) के कार्यकारी अध्यक्ष केटी रामाराव ने 2023 में एक्स पर किए गए अपने पोस्ट को साझा करते हुए कहा कि परिसीमन पूरे दक्षिण भारत में एक मजबूत जन आंदोलन को जन्म देगा, और इस मुद्दे पर उनकी पार्टी का रुख अब भी वही है.
पंजाब सहित कई राज्यों के मुख्यमंत्रियों ने बैठक कर सरकार के प्रस्तावों के प्रभाव और इससे निपटने के तरीकों पर चर्चा की. उनका मुख्य तर्क है कि प्रस्तावित परिसीमन के दौरान जिन राज्यों में नए निर्वाचन क्षेत्रों का असमान रूप से अधिक आवंटन होगा, वहां प्रत्येक वोट का मूल्य बढ़ जाएगा, जबकि बेहतर प्रदर्शन करने वाले राज्यों के मतदाताओं को जनसंख्या वृद्धि दर कम रखने के कारण नुकसान उठाना पड़ेगा.
