नई दिल्ली: केंद्र सरकार ने गुरुवार (16 अप्रैल) को संसद के विशेष सत्र में पेश किए जाने से ठीक 48 घंटे पहले मंगलवार को सभी सांसदों को तीन विधेयक भेजे हैं- जिनका उद्देश्य लोकसभा की सीटों की संख्या बढ़ाना है.
हालांकि, सरकार का घोषित मकसद इन तीन विधेयकों के माध्यम से महिला आरक्षण को ‘अमल में लाना’ है, लेकिन प्रस्तावित कानूनों को पढ़ने से पता चलता है कि इनका इस्तेमाल महिलाओं के राजनीतिक प्रतिनिधित्व से परे व्यापक बदलाव लाने के लिए किया जा रहा है.
ऐसे में यदि यह विधेयक पारित हो जाते हैं, तो इससे संसदीय समीकरण, जनसंख्या आधारित प्रतिनिधित्व और केंद्र-राज्य संबंधों में महत्वपूर्ण परिवर्तन आएगा.
बिना किसी परामर्श के जल्दबाजी में उठाए गए इस कदम से उत्तर की ओर असमान रूप से सत्ता हस्तांतरित होने का प्रत्यक्ष लाभ उन राजनीतिक दलों को मिलेगा, जिन्होंने उत्तर और पश्चिम में लगातार जीत हासिल की है – यानी भाजपा और उसके सहयोगी दल.
2023 के महिला आरक्षण अधिनियम में लोकसभा और राज्य विधानसभाओं में महिलाओं के लिए 33% आरक्षण का प्रावधान था, लेकिन यह परिसीमन और जनगणना से जुड़ा हुआ था. तीनों विधेयकों को एक साथ पढ़ने पर पता चलता है कि 1971 के परिसीमन पर लगी रोक को हटाकर नए सिरे से परिसीमन किया जाएगा, जो ‘नवीनतम प्रकाशित जनगणना’ पर आधारित होगा, जिसका अर्थ है 2011 की जनगणना.
इससे दक्षिणी राज्यों को नुकसान होना तय है, जिन्होंने उत्तर के राज्यों की तुलना में अधिक प्रभावी जनसंख्या नियंत्रण उपाय लागू किए हैं. चूंकि किसी राज्य की जनसंख्या केंद्र सरकार के कोष आवंटन को काफी हद तक प्रभावित करती है, इसलिए इसका सीधा असर उसकी वित्तीय स्थिति पर भी पड़ेगा – यह एक ऐसा मुद्दा है जिस पर दक्षिणी राज्यों और केंद्र सरकार के बीच पहले से ही विवाद चल रहा है.
प्रस्तावित विधेयकों की संरचना और उनके समय को लेकर कई मूलभूत प्रश्न उठते हैं.
विधेयकों में क्या प्रस्ताव हैं?
संविधान (131वां संशोधन) विधेयक, 2026 अनुच्छेद 81 में संशोधन करके लोकसभा की सीटों को 543 से बढ़ाकर 850 करने का प्रस्ताव करता है. साथ ही यह अनुच्छेद 82 के खंड 3 को हटाकर उसमें संशोधन करने का भी प्रस्ताव करता है, जिसमें यह प्रावधान है कि अगला परिसीमन 2027 की जनगणना के बाद होगा.
इस विधेयक में अनुच्छेद 82 के उपशीर्षक ‘प्रत्येक जनगणना के बाद पुन: समायोजन (Readjustment)’ को बदलकर ‘निर्वाचन क्षेत्रों का पुन: समायोजन’ कर दिया गया है और प्रत्येक जनगणना के बाद राज्यों में लोकसभा सीटों की संख्या को फिर से व्यवस्थित करने की अनिवार्यता को समाप्त कर दिया गया है.
इसमें राज्य विधानसभाओं और अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति के लिए आरक्षण प्रदान करने वाले कानूनों से संबंधित अनुच्छेद 170 में भी संशोधन किया गया है, ताकि इनका आधार 2001 की जनगणना के बजाय ‘ऐसी जनगणना’ हो, जिसे संसद विधि द्वारा उपयोग करने का निर्णय ले.
इसका मतलब है कि इससे संसद को यह तय करने का अधिकार मिल जाएगा कि किस जनगणना का उपयोग किया जाए, बिना प्रस्तावित विधेयक में इसका उल्लेख किए.
वर्तमान में चल रही 2027 की जनगणना का क्या होगा?
विधेयकों को पढ़ने से एक जरूरी सवाल यह उठता है कि इनमें नवीनतम जनगणना के आंकड़ों का उल्लेख क्यों किया गया है. जबकि 2021 की जनगणना में पांच साल की देरी होने के बाद ‘जनगणना-2027 ‘ को अभी हाल ही में इसी महीने से शुरू किया गया है.
संविधान (131वां संशोधन) विधेयक, 2026 अनुच्छेद 82 में संशोधन करके इसके खंड 3 को हटाने का प्रयास करता है, जिसमें यह प्रावधान था कि अगली परिसीमन 2027 की जनगणना के बाद होगी.
यह अनुच्छेद 170 के प्रोविसो 3 को भी हटाता है, जिसमें यह प्रावधान था कि वर्ष 2026 के बाद होने वाली पहली जनगणना के संबंधित आंकड़े प्रकाशित होने तक, 2001 की जनगणना के आधार पर राज्य विधानसभाओं या निर्वाचन क्षेत्रों में सीटों का पुनर्निर्धारण करना आवश्यक नहीं होगा.
इसमें चल रही वर्तमान जनगणना के संबंध में कोई उल्लेख नहीं है.
इस संबंध में कांग्रेस सांसद और पार्टी के महासचिव केसी वेणुगोपाल ने भी सवाल उठाया है कि जब वर्तमान जनगणना चल रही है तो सरकार 15 साल पुरानी जनगणना का उपयोग करने के लिए इतनी उत्सुक क्यों है.
1971 के परिसीमन पर लगी रोक हटाई गई, नए परिसीमन को ‘नवीनतम प्रकाशित जनगणना’ से जोड़ा गया
2009 में परिसीमन के तहत राज्यों की सीमाओं में बदलाव किया गया, लेकिन इसका उद्देश्य राज्यों के भीतर संतुलन को पहले जैसा ही बनाए रखना था.
अपने उद्देश्यों और कारणों के विवरण में नए विधेयक में कहा गया है कि भले ही 1971 की जनसंख्या के आंकड़ों के आधार पर कुल सीटों की संख्या पर रोक लगाई गई थी, लेकिन देश की ‘जनसांख्यिकीय संरचना में तब से काफी बदलाव आए हैं, जैसा कि नवीनतम प्रकाशित जनगणना के जनसंख्या आंकड़ों में परिलक्षित होता है, जिसमें अंतर-राज्यीय और अंतर-राज्यीय जनसंख्या स्थानांतरण, तीव्र शहरीकरण और प्रवासन, और कुछ क्षेत्रों में असमान वृद्धि शामिल है, जिसके परिणामस्वरूप जनसंख्या और निर्वाचन क्षेत्रों में व्यापक असमानताएं उत्पन्न हुई हैं.’
इसके बाद इसमें यह प्रावधान किया गया है कि ‘प्रस्तावित विधेयक का उद्देश्य अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति सहित महिलाओं के लिए एक तिहाई आरक्षण को लागू करना है’, इसलिए परिसीमन नवीनतम प्रकाशित जनगणना के जनसंख्या आंकड़ों के आधार पर किया जाएगा.
इससे 1971 से जनसंख्या के आधार पर सीटों के पुनर्वितरण का रास्ता खुल जाता है.
वर्तमान में पांच दक्षिणी राज्यों के पास लोकसभा में कुल 129 सीटें हैं: तमिलनाडु (39), कर्नाटक (28), आंध्र प्रदेश (25), केरल (20) और तेलंगाना (17). पुदुचेरी और लक्षद्वीप केंद्र शासित प्रदेशों के पास एक-एक सीट है.
उत्तर भारत के तीन सबसे बड़े राज्य– उत्तर प्रदेश (80), बिहार (40) और राजस्थान (25) – अकेले 125 सीटें प्रदान करते हैं.
इससे पहले द वायर ने अपनी रिपोर्ट में बताया है कि जनसंख्या जनगणना के आंकड़ों की मानें, तो उत्तर भारतीय राज्यों में दक्षिणी राज्यों की तुलना में जनसंख्या वृद्धि दर कहीं अधिक रही है. दक्षिणी राज्यों ने परिवार नियोजन के उपाय अपनाए हैं और जनसंख्या वृद्धि को नियंत्रित किया है.
आंकड़ों के अनुसार, 1971 और 2011 की जनगणना के बीच उत्तर भारत के राजस्थान, बिहार, उत्तर प्रदेश, हरियाणा, मध्य प्रदेश और गुजरात की संयुक्त जनसंख्या में 150% से अधिक की वृद्धि हुई. इसके उलट, इसी अवधि में केरल, तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना और कर्नाटक जैसे दक्षिणी राज्यों में जनसंख्या वृद्धि 100% से काफी कम रही.
दक्षिण भारत में समग्र प्रजनन दर लगातार 2.1 के प्रतिस्थापन स्तर (replacement level) से नीचे गिर रही है, जबकि उत्तर भारतीय राज्यों में दक्षिणी राज्यों की तुलना में कुल प्रजनन दर काफी अधिक है, हालांकि समय के साथ इसमें गिरावट आ रही है.
इससे स्पष्ट है कि यदि 2011 की जनगणना को मानक माना जाए, तो दक्षिणी राज्यों की तुलना में उत्तरी राज्यों में सीटों की संख्या अधिक होगी.
वित्तीय निहितार्थ
इस प्रस्तावित परिसीमन के वित्तीय निहितार्थ भी होंगे. चूंकि केंद्र शासित प्रदेशों के कर आवंटन जनसंख्या के आकार से काफी प्रभावित होते हैं, इसलिए इस जनसांख्यिकीय परिवर्तन से संसाधनों का पुनर्वितरण हो सकता है.
तमिलनाडु और केरल जैसे विपक्षी दलों द्वारा शासित दक्षिणी राज्य पहले से ही केंद्र सरकार के साथ निधियों के हस्तांतरण को लेकर चल रहे टकराव में उलझे हुए हैं.
दक्षिण के इन जैसे आर्थिक रूप से उन्नत राज्य, केंद्र सरकार के कोष में शुद्ध योगदानकर्ता (net contributors) होने के बावजूद अनुपातहीन रूप से कम प्रतिफल (returns) प्राप्त करते हैं.
आंकड़ों से पता चलता है कि पांचों दक्षिणी राज्यों के साथ-साथ महाराष्ट्र को भी उनके योगदान से काफी कम प्रतिफल प्राप्त होता है. उनके प्रतिफल प्रति 1 रुपये के योगदान पर मात्र 0.08 रुपये (महाराष्ट्र) से लेकर 0.62 रुपये (केरल) तक हैं.
इस संबंध में राज्यसभा में केरल से भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी) के सांसद जॉन ब्रिटास ने कहा, ‘यदि परिसीमन 1971 की जनगणना के बजाय 2011 की जनगणना के आधार पर किया जाता है, तो उत्तरी राज्यों में सीटों की संख्या में भारी वृद्धि होगी, जबकि दक्षिणी राज्यों का प्रतिनिधित्व घट जाएगा या स्थिर रहेगा. इसका मतलब है कि ये विधेयक दक्षिण भारत को उत्तर की राजनीतिक कॉलोनी में बदलने की एक चालाक रणनीति को दर्शाते हैं.’
The bills being introduced in the name of implementing Women’s Reservation amount to a death warrant for federal India.
The accompanying Delimitation Bill, presented as part of this exercise, would strip southern states — which have successfully implemented population control… pic.twitter.com/b8TZvTiCHs— John Brittas (@JohnBrittas) April 14, 2026
वहीं, 23 अप्रैल को तमिलनाडु चुनावों से पहले मुख्यमंत्री एमके स्टालिन ने परिसीमन को संसद में केंद्र सरकार का ‘षड्यंत्र’ करार दिया है.
इस संबंध में तेलंगाना के मुख्यमंत्री रेवंत रेड्डी ने दक्षिणी राज्यों के अन्य मुख्यमंत्रियों और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को पत्र लिखकर एक मिश्रित मॉडल का प्रस्ताव रखा है, जिसमें सीटों में हुई वृद्धि का आधा हिस्सा आनुपातिक आधार पर और शेष हिस्सा राष्ट्रीय विकास के लिए आर्थिक रूप से सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन करने वाले राज्यों को प्राथमिकता के आधार पर दिया जाए.
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