जजों को आस्था से जुड़े मामलों में धार्मिक मान्यताओं से ऊपर उठकर फैसले लेने चाहिए: सुप्रीम कोर्ट

सबरीमला पुनर्विचार याचिका पर सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट की नौ जजों की संविधान पीठ ने बेहद महत्वपूर्ण टिप्पणी की. शीर्ष अदालत ने कहा कि जजों को किसी भी मामले पर फैसला सुनाते समय अपनी व्यक्तिगत धार्मिक मान्यताओं को किनारे रखकर केवल 'अंतरात्मा की स्वतंत्रता' और 'सांविधानिक ढांचे' का पालन करना चाहिए.

(फाइल फोटो: पीटीआई)

नई दिल्ली: सबरीमाला पुनर्विचार याचिका मामले की सुनवाई के पांचवें दिन शुक्रवार (17 अप्रैल) को सर्वोच्च न्यायालय की नौ न्यायाधीशों की संविधान पीठ ने एक महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए कहा कि ‘धर्म’ और ‘अंतरात्मा की स्वतंत्रता’ (freedom of conscience) को एक ही दायरे में सीमित नहीं किया जा सकता.

न्यू इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक, अदालत ने स्पष्ट किया कि आस्था से जुड़े मामलों का फैसला करते समय, संविधान को व्यक्तिगत धार्मिक मान्यताओं से ऊपर रखना चाहिए.

इस संबंध में पीठ की एकमात्र महिला न्यायाधीश, जस्टिस बीवी नागरत्ना ने वरिष्ठ अधिवक्ता राजीव धवन से पूछा कि क्या अंतरात्मा धर्म से व्यापक अवधारणा है और क्या इसे धर्म का रंग देना चाहिए?

वहीं, जस्टिस अहसानुद्दीन अमानुल्लाह ने कहा कि संवैधानिक अदालतों को धार्मिक चेतना से ऊपर उठकर व्यापक संवैधानिक संतुलन पर विचार करना होगा.

उन्होंने सवाल किया कि क्या एक जज के तौर पर हम धर्म और अंतरात्मा को एक ही तराजू पर तौल सकते हैं? उनका मानना था कि भले ही धर्म एक व्यक्तिगत विषय हो, लेकिन जब न्यायिक फैसले की बारी आती है, तो एक जज को उस धार्मिक चेतना से ऊपर उठकर व्यापक सांविधानिक परिप्रेक्ष्य और संतुलन पर ध्यान देना चाहिए.

याचिकाकर्ताओं में से एक की ओर से पेश हुए अधिवक्ता धवन ने कहा कि अदालत को मामलों का अलग-अलग फैसला करने के बजाय व्यापक सिद्धांत निर्धारित करने चाहिए, क्योंकि इस मामले में बनाया गया कानून केवल सबरीमाला तक ही सीमित नहीं रहेगा, बल्कि हर धर्म, हर संप्रदाय और यहां तक ​​कि जनजातीय धर्मों को भी प्रभावित करेगा.

अदालत ने कहा कि धार्मिक रीति-रिवाजों की न्यायिक जांच की जा सकती है, और न्यायाधीशों को व्यक्तिगत धार्मिक मान्यताओं से ऊपर उठकर अंतरात्मा की स्वतंत्रता और व्यापक संवैधानिक ढांचे के मार्गदर्शन में धार्मिक मामलों का फैसला करना चाहिए.

मालूम हो कि सुप्रीम कोर्ट सबरीमाला मंदिर में महिलाओं के प्रवेश से संबंधित पुनर्विचार याचिकाओं के एक समूह की सुनवाई कर रहा है. अदालत अनुच्छेद 25 और 26 के दायरे, आवश्यक धार्मिक प्रथाओं के सिद्धांत और आस्था से जुड़े मामलों में न्यायिक समीक्षा की सीमा की जांच कर रही है.

सुनवाई के दौरान अधिवक्ता धवन ने कहा कि अनुच्छेद 25(1) अंतरात्मा की स्वतंत्रता का अलग से प्रावधान करता है, जिसका अर्थ है कि यह केवल धर्म का पालन करने की स्वतंत्रता के बारे में नहीं है, बल्कि राज्य, धर्म और प्रथाओं पर सम्मानजनक और प्रामाणिक तरीके से सवाल उठाने के अधिकार के बारे में भी है.

उन्होंने कहा कि अनुच्छेद 17, जो अस्पृश्यता को समाप्त करता है, एक स्वतंत्र संवैधानिक आदेश है जिसे कोई न्यायालय या धर्म रद्द नहीं कर सकता.

हालांकि, उन्होंने स्पष्ट किया कि सबरीमाला मामले में जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ की वह राय, जिसमें महिलाओं के बहिष्कार को अनुच्छेद 17 से जोड़ा गया था, बहुमत की राय नहीं थी.

पीठ ने यह प्रश्न भी उठाया कि क्या किसी विशेष व्याख्या से समाज में विभाजन उत्पन्न हो सकता है. इसके जवाब में अधिवक्ता धवन ने कहा कि विविधतापूर्ण भारत को ‘सही रखने’ की जिम्मेदारी काफी हद तक न्यायालय की है और यह इस बात पर निर्भर करती है कि अनुच्छेद 25 और 26 की व्याख्या कैसे की जाती है.

धवन ने 2018 के सबरीमाला फैसले में मौजूद मतभेदों की ओर भी इशारा करते हुए कहा कि न्यायाधीशों के बीच मूलभूत धार्मिक प्रथाओं, संवैधानिक नैतिकता और अनुच्छेद 26 की व्याख्या को लेकर मतभेद थे. उनके अनुसार, किसी धार्मिक प्रथा का मूल्यांकन केवल इस आधार पर नहीं किया जा सकता कि उसे हटाने से धर्म की पहचान बदल जाएगी या नहीं.

उन्होंने आगे कहा कि आस्था समय के साथ बदलती है और सामाजिक सुधार केवल कानून के माध्यम से ही नहीं, बल्कि समाज की स्वीकृति से भी संभव है.

इससे पहले, आत्मन ट्रस्ट की ओर से पेश हुए वरिष्ठ अधिवक्ता एमआर वेंकटेश ने तर्क दिया कि अनुच्छेद 25(2)(क) के तहत, राज्य केवल धर्म से जुड़े धर्मनिरपेक्ष पहलुओं को ही विनियमित कर सकता है और उसके मूल में हस्तक्षेप नहीं कर सकता.

उन्होंने कहा कि न्यायालयों ने धार्मिक प्रथाओं को ‘अनिवार्य’ और ‘गैर-अनिवार्य’ में विभाजित करके इसके विपरीत दृष्टिकोण अपनाया है, जिससे उनके अनुसार धार्मिक स्वतंत्रता और चयन सीमित हो गया है.

वेंकटेश ने आगे तर्क दिया कि महिलाओं द्वारा मासिक धर्म के दौरान स्वेच्छा से मंदिरों या पूजा कक्षों में प्रवेश न करने की प्रथा अनुशासन और आस्था पर आधारित है, न कि भेदभाव पर. उन्होंने कहा कि दक्षिण भारत में महिलाएं धार्मिक अनुशासन के हिस्से के रूप में मासिक धर्म के दौरान पारंपरिक रूप से स्वयं पर लगाए गए प्रतिबंधों का पालन करती हैं.

गौरतलब है कि मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत के अलावा इस संविधान पीठ में जस्टिस नागरत्ना, जस्टिस अहसानुद्दीन अमानुल्लाह, जस्टिस एमएम सुंदरेश, जस्टिस अरविंद कुमार, जस्टिस ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह, जस्टिस प्रसन्ना बी. वराले, जस्टिस आर. महादेवन और जस्टिस जॉयमाल्या बागची भी शामिल हैं.