कविता और सत्ता का सहकार

कभी-कभार | अशोक वाजपेयी: आज की भारतीय सत्ता को कविता की कोई ख़बर ही नहीं है. शायद उसे पता है कि आज की अधिकांश कविता इस सत्ता द्वारा फैलाए जा रहे झूठों-घृणा-हिंसा आदि से सहमत नहीं और ज़्यादातर उसके विरोध में है. कवि अल्पसंख्यक भी हैं. इसलिए उनकी उपेक्षा इस सत्ता के अल्पसंख्यक विरोधी रुख़ का भी नतीजा है.

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(इलस्ट्रेशन: परिप्लब चक्रवर्ती/द वायर)

कविता और सत्ता के बीच क्या संबंध, सहकार, संवाद-विसंवाद आदि होते हैं या होने चाहिए इस पर दशकों से चर्चा होती रही है. हाल ही में अमेरिकी कवि रॉबर्ट फ्रॉस्ट और अमेरिकी राष्ट्रपति जॉन कैनेडी को लेकर एक प्रसंग विस्तार से जानने का मौक़ा मिला, एक कवि-आलोचक जॉन बर्नसाइड की पुस्तक ‘द म्यूज़िक ऑफ टाइम’ से.

मोटे तौर पर यह तो पहले से पता था कि अमेरिकी राष्ट्रपति के चुनाव में जीतने के बाद शपथ-ग्रहण समारोह में एक प्रतिष्ठित कवि द्वारा उसमें विशेष रूप से रचित कविता के पाठ की प्रथा कैनेडी ने ही शुरू की थी. बर्नसाइड ने बताया है कि जॉन कैनेडी ने एक वक्तव्य में कहा था: ‘अगर ज़्यादा राजनेता कविता जानते होते और ज़्यादा कवि राजनीति जानते होते तो मैं आश्वस्त हूं कि दुनिया थोड़ी बेहतर जगह होती रहने के लिए.

कैनेडी ने फ्रॉस्ट को अपने प्रशासन के उद्घाटन के अवसर पर कविता पढ़ने के लिए आमंत्रित किया जिसे स्वीकार करते हुए फ्रॉस्ट ने लिखा कि भले वे पूरी तरह से पात्र न हों पर वे कलाओं, कविता और अब पहली बार उन्हें राजनेताओं के सरोकारों में शामिल किये जाने के अपने लक्ष्य के कारण स्वीकार कर रहे हैं.

कैनेडी ने उनसे फोन पर एक नई कविता लिखने का आग्रह किया जिसे कवि ने नहीं माना, तो कैनेडी उनसे अपनी पहले की एक कविता में अंत की पंक्ति में कुछ परिवर्तन के साथ पढ़ने का अनुरोध किया जिसे कवि ने मान लिया. पर, उन्होंने एक नई कविता लिखना भी शुरू कर दिया. कविता लिख ली गई पर उद्घाटन के अवसर पर आंखों में तकलीफ़ के कारण अंततः फ्रॉस्ट को अपनी वही किंचित् परिवर्तित पुरानी कविता पढ़नी पड़ी, जिसका आग्रह कैनेडी ने शुरू में ही किया था.

सत्ता और कविता का फ्रॉस्ट के यहां दूसरा चरण तब हुआ जब वे सोवियत संघ की यात्रा पर गए. वे वहां अन्ना अख़्मोतोवा से मिले- उस समय ऐसी अफ़वाहें थीं कि दोनों ही नोबेल पुरस्कार की दौड़ में शामिल हैं. उनकी बातचीत का कोई विवरण उपलब्ध नहीं है पर हमें मालूम है कि उससे पहले इस दुस्साहसिक कवयित्री ने बहुत कठिन जीवन सोवियत व्यवस्था में बिताया था. सोवियत व्यवस्था के विस्टालिनीकरण के दौरान उन्हें कुछ राहत और आज़ादी मिली थाी.

फ्रॉस्ट उस समय सोवियत संघ के सर्वेसर्वा निकीता ख्रुश्चोव से मिलने पर बहुत इसरार कर रहे थे. अंततः यह मुलाक़ात ख्रुश्चोव के ग्रीष्मकालीन आवास क्रीमिया में हुई. तब तक फ्रॉस्ट की स्वास्थ्य संबंध कठिनाइयां बढ़ गई थीं और मिलते समय उन्हें 101 डिग्री बुखार था. ख्रुश्चोव ने उन्हें अपने स्वास्थ्य की उपेक्षा करने के लिए थोड़ा झिड़का-सा भी. दूसरी ओर, फ्रॉस्ट ने ख्रुश्चोव से कहा कि अमेरिका और सोवियत संघ के बीच स्वस्थ समझ, सद्भाव और स्पर्धा होना चाहिए जो दोनों देशों के लिए हितकर होंगे. वे यह कहने के पहले राजनेता से उनके द्वारा दी गई लेखकों की स्वतंत्रता का उल्लेख कर चुके थे. उन्होंने यह भी जोड़ा, जो उनकी पहले से प्रसिद्ध उक्ति थी, कि ‘महान् राष्ट्र महान् कविता संभव करता है और महान् कविता महान् राष्ट्र संभव करती है’.

यह दर्ज है कि इस मुलाक़ात के दौरान राजनेता स्वयं बहुत कम बोले पर कवि को ध्यान से सुनते रहे. जब फ्रॉस्ट स्वदेश लौटे तो लंबी यात्रा में अस्वस्थ ही रहे. फ्रॉस्ट ने बर्लिन दीवार का मसला उठाया था पर राजनेता ने उसे लेकर कुछ नहीं कहा. कवि के अनुसार उन्होंने, अलबत्ता, यह कहा कि अमेरिका अधिक उदारपंथी होने के कारण अपना बचाव नहीं कर पाएगा. आगे यह भी कि अमेरिकी उदार होने के कारण लड़ नहीं पाएंगे. बाद में, इन वक्तव्यों को लेकर विवाद हुआ और यह कहा गया कि राजनेता ने ऐसा कुछ नहीं कहा था.

दो व्यवस्थाओं के बीच समझ और सहअस्तित्व का कवि प्रयत्न विफल होने को अभिशप्त था. सत्ता कभी-कभार कवि को सुन भले ले, वह अंततः उससे अप्रभावित और अद्रवित ही रहती है.

भारत में आज जो सत्ता है उसे तो कविता की कोई ख़बर ही नहीं है. शायद उसे पता है कि आज की अधिकांश कविता इस सत्ता द्वारा फैलाए जा रहे झूठों-घृणा-हिंसा आदि से सहमत नहीं और ज़्यादातर उसके विरोध में है. कवि अल्पसंख्यक भी हैं. इसलिए उनकी उपेक्षा इस सत्ता के अल्पसंख्यक विरोधी रुख़ का भी नतीजा है. वैसे उसने अनेक संगठन बनाए हैं, सार्वजनिक संगठनों पर विचारधारात्मक कब्जा कर उन्हें पालतू और आज्ञापालक बनाने का सफल ओर सुनियोजित प्रयत्न किया है.

पर कविता, सच्ची और सार्थक कविता, इन घेरों से बाहर है और अब तक दबाई नहीं जा सकी है. थोड़ी बहुत शोभा के लिए छोड़कर सत्ता को कविता की ख़ास ज़रूरत भी नहीं है: उसके निष्करुण-क्रूर-हिंसक स्वभाव में कविता की कोई जगह नहीं है. नारे-जयकार-विज्ञापन उसके लिए पर्याप्त कविता हैं. बाद में, जब इस समय का इतिहास लिखा जाएगा तब कविता की वीरगाथा की उसमें उपयुक्त जगह होगी. कई बार इतिहास बनाने या उसमें जाने वाले वर्तमान में अलक्षित ही होते हैं.

बचे बिना रचना

श्रीकान्त वर्मा के देहावसान को इस सप्ताह चार दशक हो गए. उन्हें कई रूपों में याद किया, समझा जा सकता है. मेरे लिए, जैसे के उस समय सागर में सक्रिय कई तरुण कवियों आग्नेय, रमेशदत्त दुबे, जितेन्द्र कुमार के लिए, वे एक प्रेरक, प्रोत्साहक और समर्थक कवि थे. बाद में, दिल्ली में उनकी मित्र मंडली में कमलेश, अशोक सेकसरिया, महेन्द्र भल्ला, प्रयाग शुक्ल आदि भी उनकी मित्रता और प्रोत्साहन में सक्रिय रहे. उनके संपादन में ‘कृति’ पत्रिका उस समय की शीर्ष पत्रिकाओं में अपने पहले अंक से ही बन गई थी और उसने उस समय के साहित्यिक शक्ति-संतुलन में कुछ विचलन किया था.

वे एक लड़ाकू लेखक थे, झगड़ालू नहीं. उनकी कविता में अप्रत्याशित का रमणीय शुरू से लेकर अंत तक बना रहा. उनके अनेक बिंब, तुकें, लयें आदि अप्रत्याशित होती थीं. उन्होंने अपने समय के नरक की गाथा लिखने की कोशिश की. उनके यहां लगभग शुरू से अंधेरा है जो आगे चलकर बीसवीं शताब्दी और सत्ता के अंधेरे में विस्तार पाता है. वे हिंदी के लगभग पहले नाराज़ कवि थे- बेरहम, बेराहत, बेबाक, बेपरवाह, बेबस. उन्होंने अद्भुत कहानियां लिखीं- उनमें तीख़ा विट था और हिंदी में आधुनिक कला की संवेदनशील कलालोचना के वे लगभग संस्थापक थे. सत्ता के शीर्ष मंडल में पहुंचने के बाद उन्होंने साहित्य और लेखकों का संग-साथ बनाए रखा. वे हमारे समय में सत्ता की अंततः व्यर्थता और विफलता के अप्रतिम कवि बने.

वे एक छोटे शहर बिलासपुर से दिल्ली आए थे और अपने जीवन के अंतिम चरण में उन्होंने ‘मगध’ के रूप में नया लोक कविता में बसाया. वे मुक्तिबोध के साथ आधुनिक हिंदी कविता के सबसे आत्माभियोगी कवि हैं. ‘अंधेरे’ के लिए मुक्तिबोध की उचित ही ख्याति है पर अंधेरा श्रीकान्त वर्मा के यहां कम नहीं है.

बिलासपुर में रहते उन्होंने लिखा था: ‘जो तुमसे यह कहा गया अभी/सन्नाटे में रहने वालो/तुम भी केवल सन्नाटा हो,/वह कोई और नहीं/केवल सन्नाटा हो’. यह कि ‘एक बड़ी नीले कुहरेवाली खाई है/जिसके सन्नाटे के रूख़ पर/बैठा हुआ अंधकार जमुहाई लेता है’. वहीं उन्होंने यह बिंब रचा: ‘मैं घाटी का गिद्ध तीन युगों के कंकालों का प्रहरी हूँ/तीनों युग की हड्डी चाँपे/इस घाटी में बैठा हूँ. यहीं उनकी जीवन-भर चली प्रश्नाकुलता ने जन्म लिया: ‘क्या मैं तुम्हारे मरने का एक लंबा सिलसिला हूँ?/तुम सबकी कुंठा के आहटहीन, अँधेरे, जर्जर दुर्ग द्वार पर/एक कुद्ध अंधड़ सा रूककर/पैर पटककर बोल रहा हूँ.

बाद में वे यहीं लौटना चाहते थे: ‘मैं महुए के वन में/एक कंडे सा सुलगना, गुँगवाना, धुँधुवाना चाहता हूँ/मैं अब घर जाना चाहता हूँ.’ शायद ही किसी और हिंदी कवि ने अपनी कविता को अपराध बताया हो जैसा कि श्रीकान्त वर्मा ने बताया: ‘मैं अपनी करतूतों का दरोग़ा हूँ/नहीं एक रोज़नामचा हूँ/मुझमें मेरे अपराध/हू-बहू कविताओं से दर्ज हैं’.

वे यह भी कहते हैं कि ‘मैं एक ग़लत बीवी का नेपालियन था./मैं एक ग़लत जनता का शहीद था.’ वे ताक़ीद करते हैं: ‘मगर ख़बरदार. मुझे कवि मत कहो/मैं बकता नहीं हूँ कविताएँ/ईज़ाद करता हूँ गाली/फिर उसे बुदबुदाता हूँ.’ उनका इसरार था कि ‘जो मुझसे नहीं हुआ वह मेरा संसार नहीं./कोई लाचार नहीं जो वह नहीं है वह होने को.’ लेकिन वे यह भी देख पाते थे: ‘हरेक की नियति यही है/कि कोई और उसे ख़र्च करे/एक आदमी दूसरे का और दूसरा तीसरे का/दहेज है?

उन्हें यह कहने में कोई संकोच नहीं हुआ कि ‘हम लोग/एक दूसरे के घरों की दीवारों पर लिखी हुई गालियां हैं/एक दूसरे को पढ़ रहे हैं’.

उनकी एक प्रसिद्ध कविता का समापन होता था इन पंक्तियों से: ‘चेचक और हैज़े से मरती है हस्तियां,/कैंसर से हस्तियां,/वकील रक्तचाप से/कोई नहीं मरता अपने पाप से’. वे पूरी बेबाकी से कह सकते थे: ‘तुम जाओ अपने बहिश्त में मैं जाता हूँ अपने जहन्नुम में.

वे पूछते हैं: ‘किसको दूँ अपना बयान? हलफ़नामा उठाऊँ/किसके सामने? कोई है या केवल/बियाबान है?’ अपनी आत्मलिप्ति को स्वीकार करते हुए उन्होंने लिखा: मैं क्या कर रहा था/जब सब जयकार कर रहे थे? मैं भी जयकार कर रहा था- डर रहा था जिस तरह, सब डर रहे थे.’

‘मगध’ कविता संग्रह में इतिहास-पुराण-सत्ता-यथार्थ-धर्म-स्मृति सब आपस में घुलमिल जाते हैं और श्रीकान्त कहते हैं: ‘यह वह मगध नहीं/तुमने जिसे पढ़ा है किताबों में/यह वह मगध जिसे तुम मेरी तरह गँवा चुके हो.’ तब तक ‘कोसल मेरी कल्पना में गणराज्य है’ की परिणति हो चुकी थी. वे देख सकते थे कि ‘माथे पर रक्त का टीका है/राज्याभिषेक का यही तरीका है’.

वे गणराज्य के खोखलेपन को दर्ज कर रहे थे यह इसरार कर कि ‘कोसल अधिक दिन टिक नहीं सकता/कोसल में विचारों की कमी है.’ अपने समय से इस कवि ने बचने-भागने की कोशिश नहीं की बल्कि इस पर इसरार किया कि ‘चाहता तो बच सकता था/मगर कैसे बच सकता था? जो बचेगा कैसे रचेगा?

यह सवाल उठ सकता है कि अपने समय के विध्वंस और विपर्यास से किसी कवि ने अलग रास्ता क्या सुझाया? श्रीकान्‍त ने कहा: ‘मित्रो, तीसरा रास्ता भी है/मगर वह मगध, अवन्ती, कोसल या विदर्भ होकर नहीं जाता.’ शायद यह रास्ता कविता का है या हो सकता है. इसका एहतराम कर कि ‘निहत्थों पर उठने के लिए ही बने हैं हथियार’ श्रीकान्त जी यह भी कहते हैं: ‘कब कहा व्यास ने/जो लिखता है महाभारत/पक्षधर नहीं होता.’

इन दिनों फिर निजी मुक्ति और निपट स्वार्थ को याराना पूंजीवाद, पूरी बेशर्मी से, बढ़ावा दे रहा है, याद आता है कि 1973 में भोपाल में श्रीकान्त वर्मा ने कहा था कि भारतीय परंपरा में मोक्ष और निर्वाण की अवधारणाओं को, जो निजी मुक्ति की अवधारणाएं थीं, महात्मा गांधी ने सामूहिक मुक्ति में यानी स्वतंत्रता में बदलकर एक वैचारिक क्रांति की शुरुआत की थी.

(लेखक वरिष्ठ साहित्यकार हैं.)