नई दिल्ली: उत्तर प्रदेश में गोहत्या पर सख्त रूख अपनाने वाले भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) शासित राज्य के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने हाल ही में मुस्लिम धर्मगुरुओं द्वारा गाय को राष्ट्रीय पशु घोषित करने की मांग पर प्रतिक्रिया देते हुए इसे उनका ‘दोहरा मापदंड’ बताया है.
सीएम योगी ने कहा कि एक तरफ तो मौलवी गोहत्या को बढ़ावा देते हैं और दूसरी तरफ मांग करते हैं कि गाय को राष्ट्रीय पशु घोषित किया जाए. उन्होंने कहा कि गो माता तो स्वघोषित राष्ट्रमाता है और उसे राष्ट्रमाता घोषित करने की आवश्यकता नहीं है.
डेक्कन हेराल्ड की ख़बर के अनुसार, सोमवार (1 जून) को उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने बिजनौर में एक कार्यक्रम के दौरान कहा था कि ‘गाय हमारी माता है और क्या मां और पुत्र के बीच कुछ घोषित करने की ज़रूरत पड़ती है?’
उन्होंने आगे कहा, ‘मैं इस समय एक चलन देख रहा हूं. तमाम मौलवी और मौलाना यह बयान दे रहे हैं कि गाय को राष्ट्रीय पशु घोषित करो. हमने कहा कि गो हमारी माता है और जन्म-जन्मांतर का हमारा नाता है. क्या मां और पुत्र के बीच कुछ घोषित करने की ज़रूरत पड़ती है? यह हमारे संस्कार हैं. अपनी मां के बारे में जो सम्मान का भाव रखते हैं, वही भाव हमारा भी है, हमने गाय को माता माना है.’
इंडियन एक्सप्रेस के अनुसार, उन्होंने इस बात पर भी आपत्ति जताई कि मुस्लिम धर्मगुरुओं ने गाय को एक ‘पशु’ कहा, और दावा किया कि ‘जो लोग गाय को जानवर कहते हैं, वे गोहत्या का भी समर्थन करते हैं.’
इस संबंध में सीएम योगी ने कहा, ‘गाय हमारे लिए माता है, पशु तो तुम्हारी बुद्धि है. तुम्हारी सोच पशुवत है, जो गाय माता को पशु बोल रहे हो. जैसे हमारी माता के बारे में किसी को परिचय देने की ज़रूरत नहीं होती, वैसे ही गो माता के बारे में भी किसी घोषणा की आवश्यकता नहीं है.’
इस दौरान योगी आदित्यनाथ ने धर्मगुरुओं को आगाह किया और उनसे अपने समुदाय के भीतर गोहत्या को हतोत्साहित करने को कहा.
उन्होंने यह भी कहा कि उत्तर प्रदेश में गोहत्या के खिलाफ सख्त कार्रवाई की जाएगी.
इस पूरे मामले को लेकर एमनेस्टी इंटरनेशनल इंडिया के पूर्व अध्यक्ष और लेखक आकार पटेल ने डेक्कन क्रॉनिकल में एक कॉलम लिखा है, जिसमें वे सीएम योगी आदित्यनाथ की इन टिप्पणियों को ‘ढोंग’ बताते हैं.
पटेल कहते हैं कि उलेमाओं की सबसे बड़ी संस्था, जमीयत उलेमा-ए-हिंद के अध्यक्ष अरशद मदनी ने कहा है कि मुसलमानों को इस पर कोई आपत्ति नहीं होगी, क्योंकि इससे भीड़ द्वारा की जाने वाली लिंचिंग और गाय के नाम पर होने वाला राजनीतिक शोषण रुक जाएगा.
मदनी ने यह भी कहा कि कानून सिर्फ एक ही होना चाहिए. उन्होंने इस बात का ज़िक्र किया कि जानवरों की हत्या से जुड़े कानून सभी राज्यों में एक समान रूप से लागू नहीं होते हैं.
मदनी के अनुसार, ‘गाय के नाम पर होने वाली मॉब लिंचिंग, बेगुनाह इंसानों की हत्या, नफ़रत की राजनीति और मुसलमानों को बदनाम करने का यह खेल अब बंद होना चाहिए. हमें ख़ुशी होगी अगर गाय को ‘राष्ट्रीय पशु’ घोषित कर इस समस्या का स्थाई समाधान निकाला जाए, ताकि न किसी इंसान की जान जाए और न धर्म के नाम पर राजनीति हो.’
पूर्व उपराष्ट्रपति हामिद अंसारी ने भी इस मांग का समर्थन करते हुए कहा था कि अगर गाय को राष्ट्रीय पशु का दर्जा देने से गोहत्या से जुड़े बार-बार होने वाले झगड़ों को सुलझाने में मदद मिल सकती है, तो इस पर विचार किया जाना चाहिए.
अंसारी ने मुसलमानों से बकरीद पर गाय की क़ुर्बानी न देने की भी अपील की थी. साथ ही उन्होंने यह भी कहा था कि इस्लाम किसी ख़ास जानवर की क़ुर्बानी को ज़रूरी नहीं मानता.
अंसारी ने इस हफ़्ते की शुरुआत में इंडियन एक्सप्रेस को बताया था, ‘मैंने ख़बरों में पढ़ा कि कुछ लोग यह मांग कर रहे थे कि गाय को राष्ट्रीय पशु घोषित किया जाए. मुझे लगा कि यह एक बहुत ही तर्कसंगत मांग है. क्योंकि अगर आप समस्या की जड़ ही खत्म कर सकते हैं, तो ऐसा किया जाना चाहिए.’
उल्लेखनीय है कि ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के वरिष्ठ कार्यकारी सदस्य और इस्लामिक सेंटर ऑफ इंडिया के चेयरमैन मौलाना खालिद रशीद फिरंगी महली ने भी इस बात का समर्थन किया था.
पटेल अपने कॉलम में लिखते हैं कि हालांकि संविधान का अनुच्छेद 48 राज्यों को गायों की हत्या पर रोक लगाने के लिए प्रोत्साहित करता है, लेकिन यह केवल एक मार्गदर्शक सिद्धांत है, कोई बाध्यकारी कानून नहीं; और इसके अलावा यह प्रोत्साहन धार्मिक आधार पर नहीं, बल्कि आर्थिक आधार पर दिया गया है.
इस लेख में बताया गया है कि इतिहास में मुसलमानों ने उन पाबंदियों को स्वीकार किया है, जिन्हें खुले तौर पर धार्मिक पाबंदी के तौर पर पेश किया गया था.
संविधान सभा में मुसलमानों ने हिंदुओं से अनुरोध किया था कि वे इस प्रतिबंध को लागू करें, लेकिन इसके पीछे के अपने धार्मिक कारणों को पूरी तरह से स्पष्ट रूप से सामने रखें.
यूपी के ज़ाहिर-उल-हसन लारी ने तब कहा था: ‘अगर सदन की यह राय है कि गायों की हत्या पर रोक लगनी चाहिए, तो इसे स्पष्ट, निश्चित और बिना किसी दुविधा वाले शब्दों में प्रतिबंधित किया जाना चाहिए.’
हिंदुस्तान टाइम्स की एक रिपोर्ट बताती है कि इस चर्चा के दौरान सादुल्ला ने कुरान के एक सिद्धांत ‘ला इकराहा फ़िद्दीन’ का ज़िक्र किया था, जिसका अर्थ है कि धर्म के मामले में किसी भी तरह की ज़बरदस्ती नहीं होनी चाहिए.
उन्होंने कहा था, ‘हम यहां उस रवैये में रुकावट डालने के लिए नहीं हैं जिसे बहुसंख्यक समुदाय अपनाने जा रहा है. लेकिन मुस्लिम जनता के मन में यह विचार नहीं रहना चाहिए कि वे कोई ऐसा काम कर सकते हैं, जबकि असल में उनसे ऐसा करने की उम्मीद नहीं की जाती.’
पटेल का तर्क है कि अलग-अलग राज्यों के कानून हिंसा और राजनीतिक ध्रुवीकरण को बढ़ावा देते हैं. वे कहते हैं कि अब केंद्र सरकार के लिए यह साफ़ करने का सही समय आ गया है कि भारत का नज़रिया धर्मनिरपेक्ष सिद्धांतों पर आधारित है या धार्मिक विचारों पर.
वे लिखते हैं, ‘हो सकता है कि इससे बीफ के नाम पर होने वाली लिंचिंग खत्म हो या न हो, लेकिन इससे पाखंड ज़रूर खत्म हो जाएगा.’
