अयोध्या के राम मंदिर में चोरी: क्या अब फल देने लगा है घृणा का बीज?

सत्य धर्म संवाद के संयोजक स्वामी राघवेंद्र का तर्क है कि राम मंदिर के चढ़ावे से करोड़ों रुपये की कथित चोरी कोई अलग घटना नहीं, बल्कि उस राजनीतिक प्रक्रिया का परिणाम है जिसकी शुरुआत अयोध्या आंदोलन से हुई थी. उनका यह आलेख मंदिर, राजनीति, चंदा प्रबंधन और जवाबदेही से जुड़े सवालों को सामने रखता है.

(फोटो साभार: फेसबुक/@champatraiji)

बीज का कभी नाश नहीं होता, वह समय की अनुकूलता पाते ही पौधे का रूप ले लेता है. अयोध्या के श्रीराम जन्मभूमि मंदिर के दान-पात्र से हाल ही में हुई सात करोड़ रुपये के कैश की गबन की घटना को देखकर यह धारणा और पुष्ट हो जाती है. गुणात्मक रूप से मंदिर करुणा, दया, प्रेम और सद्भावना का केंद्र होता है; यह अलग बात है कि इस आदर्श सिद्धांत पर. कितने मंदिर खरे उतरते हैं. दुर्भाग्यवश, यह आदर्श इस मंदिर के आंदोलन से लेकर इसकी स्थापना तक में कहीं दिखाई नहीं देता.

इस आंदोलन की बुनियाद में ही घृणा और एक निर्मल हृदय साधु ‘बाबा लाल दास’ की हत्या छिड़ी हुई है. यदि आपने आनंद पटवर्द्धन की डॉक्यूमेंट्री ‘राम के नाम पर’ देखी हो, तो उसमें बाबा लाल दास का बयान दर्ज है. 1980 के दशक की शुरुआत में लखनऊ उच्च न्यायालय द्वारा उन्हें बाबरी मस्जिद परिसर में रामलला की मूर्तियों का मुख्य महंत नियुक्त किया गया था. लेकिन 16 नवंबर 1993 को रानीपुर छत्तर गांव में उनकी गोली मारकर हत्या कर दी गई. वे राम मंदिर आंदोलन के मुखर आलोचक थे और उन्होंने विश्व हिंदू परिषद (विहिप), राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) तथा भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) की राजनीति का कड़ा विरोध किया था. उन्होंने लालकृष्ण आडवाणी की रथ यात्रा का भी विरोध किया था, जिसके कारण तत्कालीन कल्याण सिंह सरकार ने उन्हें मुख्य पुजारी के पद से हटा दिया था.

मेरे कहने का ध्येय यह है कि एक साधु की हत्या से लेकर पूरे देश में इस मंदिर के नाम पर सामासिक एकता का जो विखंडन हुआ, उसे पाटने में सदियों लगेंगे. इसकी कीमत अंततः हिंदुओं को ही चुकानी पड़ रही है और आगे भी चुकानी पड़ेगी. धर्म के नाम पर जिस तरह से ध्रुवीकरण कर मंदिरों को व्यावसायिक केंद्रों में बदल दिया गया है, उससे प्रत्यक्ष रूप से किसी अन्य समुदाय का नहीं, बल्कि खुद हिंदुओं का ही ह्रास हो रहा है.

हाल ही में दान-पात्र से हुई चोरी की घटना पर मंदिर के पूर्व लेखा अधिकारी महिपाल सिंह का बयान इस मंदिर के व्यावसायिक केंद्र में बदलने के दावे की पुष्टि करता है. चंदा संग्रहण और प्रबंधन की प्रक्रिया में शुरुआत से ही सुनियोजित तरीके से गबन किया गया. आरोपों के अनुसार, बैंक कर्मचारियों और ट्रस्ट से जुड़े कुछ लोगों की मिलीभगत से यह खेल खेला गया. शिकायत करने वाले महिपाल सिंह को पद से हटाया जाना ही इस मामले में उनकी संलिप्तता की ओर संकेत करता है.

सिंह ने मीडिया घरानों से बात करते हुए कहा कि ‘बैंक में जमा की जाने वाली नकदी की गड्डियों में हेराफेरी की गई, जहां वास्तविक संख्या से कम नोटों के बंडल दर्ज किए गए. इन दावों की निष्पक्ष जांच आवश्यक है. यह पता लगाना ज़रूरी है कि पिछले चार वर्षों में ट्रस्ट और बैंक द्वारा किन लोगों की नियुक्तियां हुईं, वे किसकी सिफारिश पर रखे गए और कितने कर्मचारियों को हटाया गया? साथ ही, बैंक बक्सों में प्राप्त नकदी और रिकॉर्ड में दर्ज राशि के बीच के अंतर का क्या कारण है? मंदिर में चोरी कोई नई बात नहीं है, यह रोज़ाना होती थी. मैंने खुद चोरी पकड़ी थी और इसकी शिकायत चंपत राय तथा गोपाल जी से की थी. लेकिन अगले ही दिन चंपत राय ने मुझे पद से हटा दिया. मंदिर में लगे सीसीटीवी (सीसीटीवी) कैमरों की आठ महीने पुरानी फुटेज भी डिलीट करवा दी गई. चंपत राय अव्यवस्था पसंद व्यक्ति हैं और मंदिर परिसर की व्यवस्थाओं में अपनी मनमर्जी चलाते हैं. अगर कोई विरोध करता है, तो उसे हटा दिया जाता है.’

भाजपा नेता और बजरंग दल के संस्थापक विनय कटियार ने भी कहा है कि इस मामले की जांच होनी चाहिए, क्योंकि यह करोड़ों लोगों की श्रद्धा और विश्वास से जुड़ा विषय है.

ध्यान देने योग्य बात यह है कि मंदिर बनने से पूर्व, राम मंदिर आंदोलन के दौरान भी समय-समय पर चंदे के गबन की बातें सामने आती रही थीं. सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद जब पांच हज़ार करोड़ रुपये से अधिक का चंदा प्राप्त हुआ, तब भी अनियमितताओं की खबरें आईं, पर बार-बार इन मुद्दों को दबा दिया गया और कोई व्यापक चर्चा या समाधान नहीं होने दिया गया.

यहां तक कि जब राम मंदिर प्रशासन अयोध्या के प्राचीन मंदिरों को जन्मभूमि परिसर में विलय करने के लिए वहां के महंतों को सहजता से राजी नहीं कर पाया, तो उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा उन्हें नज़ूल और खादर भूमि का डर दिखाया गया और इस तरह कई मंदिरों का विलय हुआ. अयोध्या के कई महंत आज भी इस बात की पुष्टि प्रामाणिक दस्तावेज़ों के साथ करते हैं.

राम मंदिर प्रशासन की ताकत का अंदाज़ा एक सामान्य हिंदू इस बात से लगा सकता है कि जन्मभूमि मंदिर के सरकारी ट्रस्ट के अध्यक्ष महंत नृत्यगोपाल दास के उत्तराधिकारी शिष्य महंत कमलनयन दास ने खुद कहा, ‘अगर कहीं कोई गड़बड़ी हुई है, तो उसकी जांच अवश्य होनी चाहिए. लेकिन जांच करेगा कौन? जांच करने वाले खुद बेईमान हैं. जो हल्ला मचा रहे हैं, वे भी दूध के धुले नहीं हैं. जो कभी साइकिल पर चलते थे, आज बड़ी-बड़ी गाड़ियों में घूम रहे हैं और आलीशान भवनों में रह रहे हैं. आखिर यह सब कैसे हुआ, इसका जवाब भी समाज को मिलना चाहिए. जो जैसा करेगा, भगवान उसे वैसा फल देंगे.’

इसी तरह, जब मीडिया ने चर्चित भाजपा नेता और पूर्व भारतीय कुश्ती संघ के अध्यक्ष बृजभूषण शरण सिंह से इस चोरी के संबंध में पूछा, तो उन्होंने कहा, ‘वे बड़े लोग हैं, उनके विषय में मैं कुछ बोलूंगा तो मुझे दिक्कत हो जाएगी.’

हाथ में तुलसी की सुमिरनी लेने वाले, साधु भेष धारण करने वाले और राजनीतिक हिंदू धर्म की वकालत करने वाले बाहुबली नेता की मंदिर की इस लूट पर चुप्पी बहुत कुछ बयां करती है. सामान्य हिंदुओं को यह समझना होगा कि जहां बड़े-बड़ों का ‘दबदबा’ गायब हो जाता है, वहां क्या वे अपने पसीने की गाढ़ी कमाई आरएसएस या अन्य नेताओं की जेबें भरने के लिए दे रहे हैं?

जब स्थानीय समाजवादी पार्टी के नेता पवन पांडेय ने इस मामले को उठाया, और बाद में सपा प्रमुख अखिलेश यादव तथा स्थानीय भाजपा नेता व प्रवक्ता रजनीश सिंह ने पीएमओ को पत्र लिखा, तब जाकर समाचार पत्रों में रिटायर्ड जस्टिस से जांच कराए जाने की खबर छपी. इस पूरे प्रकरण को दबाने के लिए अखिलेश यादव की बेटी के विषय में जिस स्तर की अमर्यादित बातें की गईं, उन्हें यहां लिखना भी मैं उचित नहीं समझता.

इससे सामान्य हिंदुओं को यह सीखने की ज़रूरत है कि अपनी चोरी छिपाने के लिए ये लोग किसी भी हद तक जा सकते हैं. इनके घृणा के एजेंडे को जब एक सच्चे साधु (बाबा लाल दास) ने चुनौती दी, तो उनकी गोली मारकर हत्या कर दी गई. आज भी जब अयोध्या के कुछ साधु-महंत इनके इस राजनीतिक-व्यावसायिक एजेंडे का मुखर विरोध करते हैं, तो उन्हें बुरी तरह अपमानित किया जाता है. क्या वे हिंदू नहीं हैं?

हम सभी हिंदुओं को यह समझना होगा कि बोया गया बीज एक दिन अवश्य फलित होता है. वह बीज अब पौधे का रूप ले चुका है. राजनीतिक हिंदुत्व का यह पौधा करुणा, सामासिक एकता और सौहार्द का शोषक है. इसकी बुनियाद में ही घृणा है और इसका अंतिम ध्येय केवल सत्ता पाना है. यदि इनका धर्म से थोड़ा भी सरोकार होता, तो चंदे से लेकर ज़मीन घोटाले और अब दान-पात्र से इतनी बड़ी रकम की चोरी जैसी घटनाएं कभी सामने नहीं आतीं.

(लेखक सत्य धर्म संवाद के संयोजक हैं.)