अमेरिकी सीनेटरों का सवाल: क्या अडानी के 10 अरब डॉलर निवेश प्रस्ताव से प्रभावित हुआ मुकदमा वापस लेने का फैसला?

दो अमेरिकी डेमोक्रेटिक सीनेटरों ने न्याय विभाग से पूछा है कि क्या गौतम अडानी के खिलाफ आपराधिक मुकदमा वापस लेने की कोशिश अमेरिका में 10 अरब डॉलर निवेश के कथित प्रस्ताव से प्रभावित है. उन्होंने ट्रंप प्रशासन की भूमिका, निर्णय प्रक्रिया और संभावित हितों के टकराव पर भी जवाब मांगा है.

अडानी समूह के चेयरमैन गौतम अडानी. (फोटो: @gautam_adani/X via PTI)

नई दिल्ली: अमेरिकी न्याय विभाग (डीओजे) द्वारा उद्योगपति गौतम अडानी के खिलाफ दर्ज आपराधिक मुकदमा वापस लेने की कोशिश पर सवाल लगातार गहराते जा रहे हैं. अब यह मामला अमेरिकी अदालत के साथ-साथ अमेरिकी संसद तक भी पहुंच गया है.

अमेरिकी संघीय अदालत द्वारा न्याय विभाग से इस फैसले का विस्तृत आधार मांगे जाने से दो सप्ताह पहले ही डेमोक्रेटिक पार्टी के दो वरिष्ठ सीनेटरों ने आशंका जताई थी कि कहीं यह फैसला अडानी समूह द्वारा अमेरिका में 10 अरब डॉलर निवेश करने के कथित प्रस्ताव से प्रभावित तो नहीं था.

11 जून को कार्यवाहक अटॉर्नी जनरल टॉड ब्लांश को भेजे पत्र में सीनेटर एलिज़ाबेथ वॉरेन और रिचर्ड ब्लूमेंथल ने कहा कि अडानी के खिलाफ अभियोजन वापस लेने की कोशिश राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के कार्यकाल में भ्रष्टाचार से जुड़े गंभीर सवाल खड़े करती है. उन्होंने यह भी पूछा कि इस फैसले में अडानी समूह के 10 अरब डॉलर निवेश के कथित प्रस्ताव की क्या भूमिका रही.

इस पत्र की अहमियत इसलिए और बढ़ गई है क्योंकि अमेरिकी जिला न्यायाधीश निकोलस गराउफिस ने शुक्रवार (26 जून) को न्याय विभाग की उस याचिका को तुरंत मंजूरी देने से इनकार कर दिया, जिसमें गौतम अडानी और सात अन्य आरोपियों के खिलाफ आरोपपत्र खारिज करने की मांग की गई थी.

न्यायाधीश ने न्याय विभाग को 13 जुलाई तक यह बताने का निर्देश दिया है कि वह किन कारणों से मुकदमा वापस लेना चाहता है और उन कारणों के समर्थन में पर्याप्त तथ्य भी अदालत के समक्ष रखे.

न्यूयॉर्क टाइम्स की रिपोर्ट के बाद उठे सवाल

दोनों सीनेटरों का पत्र न्यूयॉर्क टाइम्स में प्रकाशित एक रिपोर्ट के बाद लिखा गया था. रिपोर्ट में दावा किया गया था कि अप्रैल में न्याय विभाग के अधिकारियों के साथ हुई एक बैठक के दौरान गौतम अडानी के वकील रॉबर्ट जियुफ्रा जूनियर ने कहा था कि यदि आपराधिक मामला वापस ले लिया जाता है तो अडानी समूह अमेरिका में 10 अरब डॉलर का निवेश करेगा.

रॉबर्ट जियुफ्रा अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के भी निजी वकील हैं.

सीनेटरों ने अपने पत्र में न्याय विभाग से सीधा सवाल किया कि क्या गौतम अडानी या उनके किसी प्रतिनिधि ने प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से यह प्रस्ताव रखा था कि यदि उनके खिलाफ मुकदमा वापस लिया जाए तो वे अमेरिका में 10 अरब डॉलर का निवेश करेंगे?

यदि ऐसा प्रस्ताव दिया गया था, तो उन्होंने इसकी पूरी जानकारी मांगी. इसमें यह भी पूछा गया कि यह प्रस्ताव कब दिया गया, बैठक में कौन-कौन अधिकारी मौजूद थे, प्रस्ताव के शब्द क्या थे, अधिकारियों की प्रतिक्रिया क्या थी और अडानी पक्ष ने यह क्या कारण बताया कि मुकदमा वापस लिए बिना यह निवेश क्यों नहीं किया जा सकता था.

‘रिश्वत देकर बच निकलने का संदेश जाएगा’

दोनों सीनेटरों ने कहा कि यदि इस तरह का समझौता हुआ है तो इससे रिश्वतखोरी जैसे अपराधों के प्रति जवाबदेही कमजोर होगी और यह संदेश जाएगा कि राजनीतिक पहुंच और आर्थिक ताकत के जरिए कानून से बचा जा सकता है.

पत्र में कहा गया कि न्याय विभाग की कार्रवाई से ऐसा प्रतीत होता है मानो गौतम अडानी ने राष्ट्रपति के निजी वकील की मदद से अमेरिका में निवेश का वादा कर आपराधिक कार्रवाई से राहत हासिल कर ली हो.

उन्होंने यह भी कहा कि इस फैसले से यह धारणा और मजबूत हो सकती है कि आखिरकार रिश्वत देकर फायदा उठाया जा सकता है.

सीनेटरों ने इस बात की ओर भी ध्यान दिलाया कि न्याय विभाग द्वारा मुकदमा वापस लेने की पहल के बाद अडानी समूह के शेयरों में तेजी आई और ऐसी टिप्पणियां सामने आईं कि अब समूह अमेरिका में अपना कारोबार बढ़ाने की बेहतर स्थिति में होगा क्योंकि उसके खिलाफ लगाए गए आरोप वापस लिए जा रहे हैं.

ट्रंप और वेंस की भूमिका पर भी सवाल

वॉरेन और ब्लूमेंथल ने न्याय विभाग से यह भी पूछा कि अभियोजन वापस लेने का फैसला किस स्तर पर लिया गया, अंतिम निर्णय किसने लिया, क्या विभाग के किसी अधिकारी ने इसका विरोध किया था और कार्यवाहक अटॉर्नी जनरल टॉड ब्लांश की इसमें क्या भूमिका रही.

उन्होंने यह भी जानना चाहा कि क्या राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप या उपराष्ट्रपति जेडी वेंस इस फैसले की प्रक्रिया में किसी भी स्तर पर शामिल थे.

क्या है पूरा मामला?

अमेरिकी न्याय विभाग ने नवंबर 2024 में गौतम अडानी समेत आठ लोगों के खिलाफ आरोपपत्र दाखिल किया था. आरोप है कि भारतीय सरकारी बिजली परियोजनाओं के ठेके हासिल करने के लिए करीब 25 करोड़ डॉलर की रिश्वत दी गई और इसके लिए एक सुनियोजित साजिश रची गई.

इस मामले में आरोपियों पर निवेशकों के साथ धोखाधड़ी की साजिश, इलेक्ट्रॉनिक माध्यम (वायर) से धोखाधड़ी की साजिश और अमेरिका के विदेशी भ्रष्ट आचरण कानून (फॉरेन करप्ट प्रैक्टिसेज़ एक्ट (एफसीपीए)) के उल्लंघन के आरोप लगाए गए.

इसके अलावा अमेरिकी प्रतिभूति एवं विनिमय आयोग (एसईसी) ने भी गौतम अडानी और सागर अडानी के खिलाफ अलग से दीवानी मामला दायर किया. एसईसी का आरोप है कि वर्ष 2021 में बॉन्ड जारी करते समय निवेशकों को महत्वपूर्ण जानकारियों के बारे में गुमराह किया गया.

हालांकि, कुछ दिन पहले एसईसी ने इस मामले में समझौते का प्रस्ताव रखा था. इसके तहत गौतम अडानी 60 लाख डॉलर और सागर अडानी 1.2 करोड़ डॉलर का दीवानी जुर्माना भरने पर सहमत हुए, लेकिन दोनों ने अपने ऊपर लगे आरोप न तो स्वीकार किए और न ही उनका खंडन किया.

सीनेटरों ने अपने पत्र में एक और मामले का भी जिक्र किया. उन्होंने बताया कि अमेरिकी ट्रेजरी विभाग ने ईरानी मूल की एलपीजी (तरलीकृत पेट्रोलियम गैस) के आयात से जुड़े प्रतिबंधों के कथित उल्लंघन के मामले में अडानी एंटरप्राइजेज के साथ 27.5 करोड़ डॉलर का समझौता किया है.

दोनों सीनेटरों का कहना है कि इन सभी घटनाओं को एक साथ देखने पर यह सवाल उठता है कि क्या ट्रंप प्रशासन कानून को निष्पक्ष ढंग से लागू करने के बजाय अपने राजनीतिक और व्यक्तिगत हितों को ध्यान में रखकर फैसले ले रहा है.

पत्र में न्याय विभाग से 25 जून तक इन सवालों का जवाब देने को कहा गया था. हालांकि, अब तक यह जानकारी सार्वजनिक नहीं है कि विभाग ने इस पर कोई जवाब दिया है या नहीं.