नॉर्थईस्ट डायरी: असम सरकार का बहुविवाह करने वालों को सरकारी योजनाओं का लाभ न देने का प्रस्ताव

इस हफ्ते नॉर्थ ईस्ट डायरी में असम, मणिपुर, अरुणाचल प्रदेश और त्रिपुरा के प्रमुख समाचार.

(फोटो: पीटीआई)

नई दिल्ली: भाजपा के नेतृत्व वाली असम सरकार ने शुक्रवार ( 10 जुलाई) को बहुविवाह करने वाले लोगों को सरकारी कल्याणकारी योजनाओं के लाभ से वंचित करने और ऐसा करने वाले सरकारी कर्मचारियों को नौकरी से बर्खास्त करने का प्रस्ताव रखा.

द टेलीग्राफ की रिपोर्ट के मुताबिक, सरकार ने इसके पीछे महिला सशक्तीकरण और लैंगिक न्याय के प्रति अपनी प्रतिबद्धता का हवाला दिया है.

ये प्रस्ताव असम विधानसभा में वित्त और वन मंत्री जयंत मल्ला बरुआ द्वारा पेश किए गए 2026-27 के 118 पन्नों के राज्य बजट में घोषित किए गए. बरुआ ने 2,85,084 करोड़ रुपये का बजट पेश किया, जिसका उद्देश्य 2047 तक असम को ‘विकसित भारत और विकसित असम के विजन में अग्रणी योगदानकर्ता’ बनाना है.

अपना पहला बजट पेश करते हुए बरुआ ने कहा कि बहुविवाह करने वाला कोई भी पुरुष किसी भी सरकारी कल्याणकारी योजना के तहत लाभ पाने का पात्र नहीं होगा.

उन्होंने कहा, ‘महिला सशक्तीकरण, लैंगिक न्याय और जिम्मेदार पारिवारिक मूल्यों के प्रति हमारी सरकार की अटूट प्रतिबद्धता के अनुरूप सरकार असम सेवा (अनुशासन और अपील) नियम, 1964 में संशोधन का प्रस्ताव करती है. इसके तहत बहुविवाह करने वाला कोई भी सरकारी कर्मचारी कानून के अनुसार सेवा से बर्खास्त किए जाने का पात्र होगा.’

सरकार ने किसी भी आपराधिक कानून के तहत अपराध के लिए दोषी ठहराए गए व्यक्ति को अधिसूचित कल्याणकारी योजनाओं के लाभ से वंचित करने का भी प्रस्ताव रखा है.

सरकार के अनुसार, कल्याणकारी योजनाओं का लाभ सबसे अधिक जरूरतमंद लोगों तक पहुंचना चाहिए और साथ ही समाज में समावेशिता, ईमानदारी और नैतिक मूल्यों को बढ़ावा दिया जाना चाहिए.

मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा शर्मा ने एक्स पर किए गए पोस्ट में कहा कि असम सरकार बहुविवाह और आपराधिक मामलों से जुड़े लोगों के खिलाफ अपने ‘इतिहास का सबसे बड़ा और सबसे निर्णायक कदम’ उठा रही है. उन्होंने कहा कि बहुविवाह में शामिल लोग अब सरकारी लाभ के पात्र नहीं होंगे. साथ ही उन्होंने बताया कि सरकार कल्याणकारी योजनाओं पर 6,000 करोड़ रुपये खर्च कर रही है.

शर्मा ने एक संवाददाता सम्मेलन में कहा, ‘अब से बहुविवाह में शामिल लोगों और आपराधिक पृष्ठभूमि वाले लोगों को सरकारी योजनाओं से वंचित रखा जाएगा.’

शुक्रवार को पेश किए गए ये प्रस्ताव मई में विधानसभा द्वारा समान नागरिक संहिता, असम, 2026 विधेयक पारित किए जाने के बाद सामने आए हैं. इस विधेयक का उद्देश्य विवाह, तलाक, उत्तराधिकार और लिव-इन संबंधों के लिए एक समान कानूनी ढांचा स्थापित करना है.

यह कानून अनुसूचित जनजातियों को इसके दायरे से बाहर रखता है, बहुविवाह पर प्रतिबंध लगाता है, पुरुषों के लिए विवाह की न्यूनतम आयु 21 वर्ष और महिलाओं के लिए 18 वर्ष निर्धारित करता है और उत्तराधिकार में लैंगिक समानता का प्रावधान करता है.

असम से पिछले 40 सालों में 31,789 अवैध प्रवासियों को वापस भेजा गया है: सरकार

मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा शर्मा ने सोमवार (6 जुलाई) को विधानसभा में कहा कि ऐतिहासिक असम समझौते की कट-ऑफ तारीख के आधार पर 1985 से अब तक कुल 31,789 अवैध प्रवासियों को असम से वापस भेजा गया है.

यह समझौता 1985 में छह साल लंबे खूनी असम आंदोलन (प्रवासियों के खिलाफ आंदोलन) के खत्म होने पर हुआ था. इसमें कहा गया है कि 25 मार्च 1971 के बाद असम में आए अवैध प्रवासियों को वापस भेजा जाएगा.

भारत-बांग्लादेश सीमा पर अपने देश लौटने का इंतजार कर रहे बांग्लादेशी नागरिक. (फोटो: पीटीआई)

न्यू इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक, असम गण परिषद की विधायक दीप्तिमयी चौधरी के सवाल का जवाब देते हुए शर्मा ने कहा – जो राज्य के गृह मंत्री भी हैं – कि समझौते के आधार पर कुल 1,72,673 अवैध प्रवासियों की पहचान की गई थी और उनमें से 31,789 को वापस भेजा गया.

2011 और इस साल 30 जून के बीच वापस भेजे गए प्रवासियों की संख्या 2,366 थी. राज्य में मई 2016 से भाजपा सत्ता में है.

शर्मा के अनुसार, 73,750 अन्य लोगों के मामले अलग-अलग फॉरेनर्स ट्रिब्यूनल (विदेशी न्यायाधिकरण) में लंबित हैं. ये ट्रिब्यूनल अर्ध-न्यायिक निकाय हैं जो संदिग्ध अवैध प्रवासियों के मामलों को देखते हैं.

मुख्यमंत्री ने यह भी कहा कि 174 ‘घोषित विदेशियों’ को मटिया ट्रांजिट कैंप और कुछ होल्डिंग सेंटरों में रखा गया था.

इस बीच, 70 लोगों ने नागरिकता (संशोधन) अधिनियम (सीएए) के तहत भारतीय नागरिकता के लिए आवेदन किया है, और उनमें से छह को अब तक नागरिकता दी जा चुकी है.

सीएए बांग्लादेश, पाकिस्तान और अफगानिस्तान से आए हिंदू, ईसाई, बौद्ध, सिख, जैन और पारसी समुदायों के उन प्रवासियों को भारतीय नागरिकता के लिए आवेदन करने की अनुमति देता है जो 25 मार्च 1971 और 31 दिसंबर 2014 के बीच धार्मिक उत्पीड़न के कारण भारत आए हैं.

सर्वे ऑफ इंडिया के अनुसार, असम बांग्लादेश के साथ 267.5 किलोमीटर लंबी सीमा साझा करता है. अंतरराष्ट्रीय सीमा से सटे असम के जिले धुबरी, दक्षिण सालमारा-मानकाचर, कछार और श्रीभूमि हैं.

चौधरी के एक और सवाल का जवाब देते हुए सीमा सुरक्षा और विकास के मंत्री अतुल बोरा ने कहा कि सीमा के 228.54 किलोमीटर हिस्से पर पहले ही बाड़ लगाई जा चुकी है.

उन्होंने बताया कि 34.6 किलोमीटर के हिस्से पर बाड़ नहीं लगाई जा सकी क्योंकि वहां से एक नदी गुजरती है, जबकि 4.35 किलोमीटर के एक अन्य हिस्से पर ‘बॉर्डर गार्ड बांग्लादेश’ के विरोध के कारण बाड़ नहीं लगाई जा सकी.

मंत्री के अनुसार, ‘कॉम्प्रिहेंसिव इंटीग्रेटेड बॉर्डर मैनेजमेंट सिस्टम’ के तहत नदी वाले हिस्से की निगरानी सीमा सुरक्षा बल (बीएसएफ) करती है. उन्होंने कहा कि भारत-बांग्लादेश सीमा को पूरी तरह से सील करने का फैसला केंद्र सरकार को करना है.

मणिपुर: कुकी-जो क्रिश्चियन फोरम ने मुख्यमंत्री से न्याय सुनिश्चित करने और नाकेबंदी हटाने की मांग की

कुकी-जो क्रिश्चियन फोरम (केसीएफ) ने बुधवार (8 जुलाई) को मणिपुर के मुख्यमंत्री युमनाम खेमचंद सिंह को एक ज्ञापन सौंपकर 14 कुकी-जो पीड़ितों के लिए न्याय, कुकी-जो क्षेत्रों को प्रभावित कर रही आर्थिक नाकेबंदी को तुरंत हटाने और समुदाय की चिंताओं को सरकारी और मीडिया विमर्श में अधिक निष्पक्ष तरीके से पेश किए जाने की मांग की.

नॉर्थईस्ट नाउ की रिपोर्ट के मुताबिक, यह ज्ञापन मुख्यमंत्री के कांगपोकपी दौरे के दौरान सौंपा गया, जहां उन्होंने कुकी-जो क्रिश्चियन फोरम के नेताओं से बातचीत की. इस दौरान मुख्यमंत्री ने एक सार्वजनिक सभा को भी संबोधित किया और हिंसाग्रस्त राज्य में शांति एवं मेल-मिलाप की आवश्यकता पर जोर दिया.

हिंसाग्रस्त मणिपुर में सीआरपीएफ के वाहन. (फोटो: पीटीआई)

ज्ञापन में केसीएफ ने आरोप लगाया कि हालिया हत्याओं के बाद की परिस्थितियों पर तो अधिक चर्चा हुई है, लेकिन खुद पीड़ितों और कुकी-जो समुदाय को प्रभावित करने वाली व्यापक हिंसा के पैटर्न पर पर्याप्त ध्यान नहीं दिया गया.

फोरम ने 14 कुकी-जो पीड़ितों के लिए न्याय की मांग की, जिनमें तीन पादरी और चार चर्च नेता शामिल हैं. फोरम का कहना है कि ये लोग जारी जातीय हिंसा से जुड़े अलग-अलग घटनाक्रमों में मारे गए. ज्ञापन में 13 मई 2026 को चर्च नेताओं को ले जा रहे दो वाहनों पर हुए हमले का भी जिक्र किया गया, जिसमें कुकी-जो क्रिश्चियन फोरम के एक पूर्व अध्यक्ष सहित तीन चर्च नेताओं की हत्या कर दी गई थी.

ज्ञापन में यह भी कहा गया कि 3 मई 2023 को मणिपुर में जातीय हिंसा भड़कने के बाद से 350 से अधिक चर्च नष्ट कर दिए गए हैं. फोरम ने कहा कि हिंसा के बावजूद कुकी-जो पादरी और चर्च नेता लगातार शांति और संयम की अपील करते रहे हैं.

फोरम ने मुख्यमंत्री से आग्रह किया कि वे उसकी चिंताओं को राज्य मंत्रिमंडल और केंद्र सरकार के समक्ष रखें, पीड़ितों और उनके परिवारों के लिए न्याय सुनिश्चित करने का प्रयास करें.

केसीएफ ने कुकी-जो क्षेत्रों को प्रभावित कर रही, उसके अनुसार, जारी आर्थिक और भौतिक नाकेबंदी को तत्काल समाप्त करने की भी मांग की. फोरम ने कहा कि खाद्य सामग्री, ईंधन, दवाइयों, आवश्यक वस्तुओं और स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुंच में बाधा आने से आम नागरिकों को गंभीर कठिनाइयों का सामना करना पड़ रहा है. इसका सबसे अधिक असर महिलाओं, बच्चों, बुजुर्गों, बीमार लोगों और विस्थापित परिवारों पर पड़ा है.

फोरम ने आगे सरकार से कुकी-जो समुदाय के लोगों की जान और उनकी पैतृक जमीनों की सुरक्षा सुनिश्चित करने, मानवीय सहायता की पहुंच बहाल करने और जारी शांति प्रक्रिया के दौरान सभी समुदायों के साथ समान और न्यायसंगत व्यवहार सुनिश्चित करने की अपील की.

त्रिपुरा: सभी स्कूलों में राष्ट्रगीत और राष्ट्रगान गाना अनिवार्य

त्रिपुरा के मुख्यमंत्री माणिक साहा ने मंगलवार (7 जुलाई) को कहा कि स्कूल शिक्षा विभाग ने राज्य के सभी स्कूलों में राष्ट्रगान ‘जन-गण-मन’ के साथ-साथ राष्ट्रगीत ‘वंदे मातरम’ गाना अनिवार्य कर दिया है.

मुख्यमंत्री ने एक फेसबुक पोस्ट में कहा कि केंद्रीय गृह मंत्रालय ने राष्ट्रगीत ‘वंदे मातरम’ के सम्मान, शिष्टाचार और इसके आधिकारिक संस्करण को लेकर विस्तृत और महत्वपूर्ण दिशानिर्देश जारी किए हैं.

उन्होंने लिखा, ‘इन दिशानिर्देशों का मुख्य उद्देश्य देश की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत को संजोकर रखना और नागरिकों के भीतर राष्ट्रगौरव की भावना को और गहरा करना है. दिशानिर्देशों के अनुसार, सभी औपचारिक, अर्द्ध-औपचारिक और शैक्षणिक मंचों पर राष्ट्रगीत गाते समय निर्धारित शिष्टाचार और नियमों का पालन करना अब पूरी तरह से अनिवार्य होगा.’

(प्रतीकात्मक फोटो: पीटीआई)

साहा ने कहा, ‘ऊपर बताए गए राष्ट्रीय निर्देशों के पालन में और राष्ट्रीय एकता को बढ़ावा देने तथा युवाओं में राष्ट्रीय प्रतीकों के प्रति बिना शर्त सम्मान की भावना पैदा करने के लिए, शिक्षा (स्कूल) विभाग इन दिशानिर्देशों को सभी सरकारी, सरकारी सहायता प्राप्त और निजी तौर पर संचालित स्कूलों में एक समान रूप से लागू करने का प्रस्ताव करता है. इसमें राज्य के प्रशासनिक अधिकार क्षेत्र में चलने वाले सभी सरकारी सहायता प्राप्त और बिना सहायता प्राप्त मान्यता प्राप्त मदरसे भी शामिल हैं.’

उन्होंने कहा, इसलिए यह प्रस्ताव है कि सभी स्कूलों की रोज़ाना की शैक्षणिक दिनचर्या की शुरुआत औपचारिक रूप से राष्ट्रगीत ‘वंदे मातरम’ के गाने और उसके बाद राष्ट्रगान ‘जन-गण-मन’ को गाने के साथ होगी.

उन्होंने आगे कहा, ‘यह 25 जून को हुई त्रिपुरा मंत्रिपरिषद की बैठक में लिए गए फ़ैसले के अनुसार जारी किया गया है.’

अरुणाचल-असम सीमा विवाद: बेहाली वन क्षेत्र में वन रक्षकों पर गोलीबारी के बाद तनाव

असम के बिस्वनाथ जिले में मंगलवार (7 जुलाई) को असम-अरुणाचल प्रदेश सीमा पर तनाव फैल गया, जब बेहाली आरक्षित वन के भीतर कथित अवैध रूप से पेड़ों की कटाई रोकने की कोशिश कर रहे वन रक्षकों पर हथियारबंद बदमाशों ने गोलीबारी कर दी.

असम ट्रिब्यून की रिपोर्ट के अनुसार, अधिकारियों बताया कि वनकर्मियों पर लगभग 16 राउंड गोलियां चलाई गईं, जिसके बाद उन्हें अपनी सुरक्षा के लिए उस क्षेत्र से पीछे हटना पड़ा.

बाद में घटनास्थल का जायजा लेने के लिए सोनितपुर के सांसद रंजीत दत्ता, बिस्वनाथ की जिला आयुक्त कराबी सैकिया करन, वरिष्ठ पुलिस अधिकारी और वन विभाग के अधिकारियों की एक टीम मौके पर पहुंची.

मीडिया से बातचीत करते हुए सांसद रंजीत दत्ता ने आरोप लगाया कि आरक्षित वन के भीतर वर्षों से अवैध कटाई जारी है. उन्होंने यह भी दावा किया कि हाल ही में संपन्न असम विधानसभा चुनाव के बाद ऐसी गतिविधियों में और तेजी आई है.

उन्होंने कहा, ‘पेड़ों की अवैध कटाई कोई नई बात नहीं है. विधानसभा चुनाव के बाद जंगलों में सुरक्षा बलों की मौजूदगी कम होने का फायदा पड़ोसी राज्य के असामाजिक तत्वों ने उठाया है. यह जमीन असम की है और वे इस पर अपना दावा नहीं कर सकते.’

भाजपा सांसद ने कहा कि मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा शर्मा भी घटनाक्रम से पूरी तरह अवगत हैं और मामले पर लगातार नजर बनाए हुए हैं.

दत्ता ने बताया कि 1972 में अरुणाचल प्रदेश के असम से अलग राज्य बनने के बाद से बेहाली आरक्षित वन और उससे लगे क्षेत्र संवेदनशील बने हुए हैं. उन्होंने कहा कि वर्ष 2021 के बाद दोनों राज्यों के मुख्यमंत्रियों और क्षेत्रीय समितियों के बीच हुई वार्ताओं के जरिए सीमा विवाद के समाधान की दिशा में उल्लेखनीय प्रगति हुई है.

उन्होंने कहा, ‘हालांकि पाक्के-केसांग सेक्टर से जुड़े विवाद का समाधान हो चुका है, लेकिन पापुम पारे सेक्टर से संबंधित मुद्दे अब भी लंबित हैं.’

जिला आयुक्त कराबी सैकिया करन ने बताया कि ताजा घटनाओं की सूचना मिलने के बाद जिला प्रशासन ने डिकल कैंप और राधा सुक कैंप दोनों का निरीक्षण किया.

उन्होंने कहा, ‘जब हम राधा सुक कैंप पहुंचे, तो वहां कई पेड़ों की कटाई होती मिली और हमने स्थानीय ग्रामीणों से भी बातचीत की. इससे पहले 23 जून को हुई छोटी-मोटी झड़पों और घटनाओं की जानकारी हम सरकार को पहले ही दे चुके हैं. वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक (एसएसपी) और प्रभागीय वन अधिकारी (डीएफओ) की रिपोर्ट भी राज्य सरकार को भेजी जा चुकी है.’

करन ने कहा कि मंगलवार की गोलीबारी की घटना के बाद अब एक नई विस्तृत रिपोर्ट भी राज्य सरकार को सौंपी जाएगी.

यह घटना ऐसे समय हुई है, जब इसी वर्ष असम-अरुणाचल प्रदेश सीमा समझौते को लागू करने की दिशा में प्रगति दर्ज की गई थी.

फरवरी में दोनों राज्यों के अधिकारियों ने भारतीय सर्वेक्षण विभाग की सहायता से पाक्के-केसांग (अरुणाचल प्रदेश) – बिस्वनाथ (असम) सेक्टर में संयुक्त रूप से सीमा स्तंभ (बाउंड्री पिलर) स्थापित करने का काम शुरू किया था. यह प्रक्रिया दोनों राज्यों के बीच दशकों पुराने सीमा विवाद के समाधान की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम मानी गई थी.