नई दिल्ली: भारत के मुख्य आर्थिक सलाहकार (सीईए) वी. अनंत नागेश्वरन ने कहा है कि पेट्रोल में इथेनॉल मिश्रण के फायदे असीमित नहीं हैं. इंडियन एक्सप्रेस में लिखे एक संपादकीय में नागेश्वरन और वित्त मंत्रालय के सलाहकार आकाश पुजारी ने कहा है कि 20 प्रतिशत से अधिक इथेनॉल मिश्रण से तिलहन किसानों को नुकसान हो सकता है.
दोनों ने लिखा है कि देश में पहले से ही 7.5 से 8 करोड़ कार्ब्यूरेटर वाले वाहन ऐसे हैं, जो 20 प्रतिशत इथेनॉल मिश्रित ईंधन पर ठीक से नहीं चल सकते.
उन्होंने सुझाव दिया, ‘पेट्रोल पंपों पर कम मिश्रण वाला ईंधन, मसलन ई10, फिर से उपलब्ध कराया जाना चाहिए और साथ ही ई-20 खरीदने का विकल्प भी दिया जाना चाहिए. इससे जनता की अधिकांश चिंताएं दूर होंगी, इथेनॉल की कुल खपत बढ़ने के बजाय कम होगी और पुराने वाहनों के मौजूदा बेड़े को तब तक सुरक्षा मिलेगी, जब तक उन्हें नए ईंधन के अनुकूल बनाने का कार्यक्रम पूरा नहीं हो जाता.’
नागेश्वरन और पुजारी केंद्रीय सड़क परिवहन और राजमार्ग मंत्री नितिन गडकरी के रुख से अलग राय रखते हैं. मालूम हो कि गडकरी ने जून में ऐसे नियमों को मंज़ूरी दी थी जिनके तहत वाहन 100% तक इथेनॉल का इस्तेमाल कर सकते हैं.
इसके विपरीत, नागेश्वरन और पुजारी का कहना है कि पुराने वाहनों के मालिकों को 10 प्रतिशत इथेनॉल मिश्रित पेट्रोल इस्तेमाल करने का विकल्प दिया जाना चाहिए और ई-20 से अधिक मिश्रण वाला ईंधन आगे शुरू नहीं किया जाना चाहिए.
उल्लेखनीय है कि केंद्रीय मंत्री गडकरी ने ई-20 यानी 20 प्रतिशत इथेनॉल मिश्रित पेट्रोल से इंजन के प्रदर्शन और वाहनों को होने वाले संभावित नुकसान को लेकर वाहन मालिकों की चिंताओं को बार-बार खारिज किया है.
हालांकि, मुख्य आर्थिक सलाहकार और पुजारी भी अपने लेख में इस बात से सहमत हैं कि ई-20 ईंधन से ईंधन दक्षता में लगभग 6 प्रतिशत की मामूली कमी आती है, लेकिन अगर वाहन ई-20 इस्तेमाल करने के लिए तैयार किए गए हैं तो इससे वाहनों को कोई नुकसान नहीं होता. लेकिन वे वाहन मालिकों की इस मांग का समर्थन करते हैं कि 10 प्रतिशत इथेनॉल मिश्रित ईंधन का विकल्प होना चाहिए.
उनका कहना है कि 75–80 करोड़ वाहन ऐसे हैं, जो पुर्जे बदले बिना 20 प्रतिशत इथेनॉल मिश्रित ईंधन का इस्तेमाल नहीं कर सकते. नागेश्वरन और पुजारी के मुताबिक, स्पेयर पार्ट्स का बाजार और मैकेनिकों का नेटवर्क इतनी तेजी से इस बदलाव को संभालने की स्थिति में नहीं है.
मुख्य आर्थिक सलाहकार ने लिखा, ‘शुरुआती रोडमैप में इस बात का अंदाज़ा था और यह गुज़ारिश की गई थी कि इन (पुराने) वाहनों के लिए कम मिश्रण वाला ईंधन बिक्री के लिए उपलब्ध रहे, लेकिन वह ईंधन चुपचाप पंपों से गायब हो गया और उसे वापस लाने की ज़रूरत है.’
लेखकों का कहना है कि इथेनॉल मिलाने से कच्चे तेल के आयात का बिल कम करने में मदद मिली है, लेकिन यह बचत हमेशा के लिए नहीं बनी रहेगी.
उनका कहना है कि कच्चे तेल के आयात बिल को लगातार कम करने के लिए पेट्रोल में इथेनॉल का अनुपात बढ़ाते जाने का मतलब होगा कि भारत में तिलहन की खेती की जगह मक्का की खेती बढ़ने लगेगी. इसके बावजूद कच्चे तेल के आयात बिल में कमी 3-4 प्रतिशत से अधिक होने की संभावना नहीं है.
इसका अनकहा मतलब यह है कि फ़ायदे हमेशा नहीं मिलेंगे, क्योंकि समय के साथ ईंधन की मांग बढ़ती रहेगी और वैसे भी कच्चे तेल की कीमतें घटती-बढ़ती रहती हैं.
मक्का की बढ़ती मांग से तिलहन किसानों पर असर
दूसरी ओर, लेखकों का कहना है कि चूंकि भारत में इथेनॉल बनाने के लिए मक्का मुख्य स्रोतों में से एक है, इसलिए ईंधन उद्योग को इथेनॉल की सप्लाई के लिए मक्के की खेती बढ़ाने का असर तिलहन उगाने वाले किसानों पर पड़ेगा.
वे लिखते हैं, ‘अभी भारत में लगभग आधा इथेनॉल मक्के से मिलता है और अनाज से कुल मिलाकर लगभग 67% इथेनॉल मिलता है.’ वे आगे कहते हैं, ‘मक्का, सोयाबीन, मूंगफली और सरसों जैसी फसलों के साथ उन्हीं खेतों के लिए मुकाबला करता है.’
लेखकों के मुताबिक, इथेनॉल मिश्रण कार्यक्रम भारत के तिलहन में आत्मनिर्भरता के लक्ष्य को बिगाड़ रहा है. उन्होंने लिखा, ‘कच्चे तेल का आयात बिल बहुत बड़ा है, करीब 11–12 लाख करोड़ रुपये सालाना. खाद्य तेल का आयात बिल इससे काफी छोटा है, लगभग 1.6 से 1.75 लाख करोड़ रुपये. ई-20 कच्चे तेल के बिल में केवल 3 से 4 प्रतिशत की कमी लाता है. खाद्य तेल की कमी कम चुनौतीपूर्ण है और इसे दूर करना कहीं अधिक संभव है.’
गौरतलब है कि नागेश्वरन और पुजारी का कहना है कि इथेनॉल के लिए फसलों की बढ़ती मांग का किसानों पर दोहरा असर पड़ रहा है.
पहला, इथेनॉल के लिए की जाने वाली खेती एक निश्चित मूल्य व्यवस्था के तहत होती है, जबकि तिलहन किसान ऐसी व्यवस्था में काम करते हैं, जहाँ कीमत बाज़ार में मांग और आपूर्ति के आधार पर तय होती है.
दूसरा, इथेनॉल बनाने के बाद बचे हुए मक्के के दाने जानवरों के चारे के तौर पर बेचे जाते हैं और इनकी कीमत सोयाबीन खली की तुलना में कम होती है. लेखकों के अनुसार, ‘तिलहन किसान को दोहरा नुकसान होता है.’
नागेश्वरन और पुजारी ने इथेनॉल मिश्रण के पर्यावरणीय लाभों को पूरी तरह खारिज नहीं किया है. उनका कहना है कि मिश्रित ईंधन से उत्सर्जन कम होने जैसे पर्यावरणीय लाभ हैं. लेकिन भारत को इथेनॉल बनाने के लिए इस्तेमाल होने वाली फसलों—जैसे गन्ना और मक्का—की खेती में लगने वाले पानी को भी ध्यान में रखना होगा.
उन्होंने महाराष्ट्र और कर्नाटक जैसे राज्यों का उदाहरण देते हुए कहा कि वहां गन्ने की खेती ‘पहले से दबाव में मौजूद जल स्रोतों पर भारी दबाव डालती है.’
लेखकों के अनुसार, ‘10–20 प्रतिशत इथेनॉल मिश्रण से आगे बढ़ने का पर्यावरण संबंधी तर्क शायद वैज्ञानिक जांच में खरा न उतरे.’
वे अपनी बात खत्म करते हुए कहते हैं, ‘कीमत और पानी से जुड़ी उन गड़बड़ियों को ठीक करें, जो अनजाने में दूसरी फ़सलों के बजाय मक्के को फ़ायदा पहुंचाती हैं, घरेलू आत्मनिर्भरता को बढ़ावा देने के लिए खाने के तेल पर आयात शुल्क पर फिर से विचार करें और ई-20 पर ही रुके रहें, जब तक कि भारत ‘भोजन बनाम ईंधन’ के बीच के फैसले की लागत का अच्छी तरह से हिसाब-किताब न कर ले, बजाय इसके कि इसे बिना सोचे-समझे मान लिया जाए.’
