आज़ादी किसकी? असमानता के राज में लोकतंत्र का सवाल

'आज़ादी के मायने' श्रृंखला की आठवीं क़िस्त: एक तरफ पिछले बारह सालों में पच्चीस करोड़ लोगों को गरीबी की रेखा से ऊपर किए जाने का दावा है, दूसरी तरफ अस्सी करोड़ से ज़्यादा लोगों को सरकारी राशन पर गुजर-बसर करनी पड़ रही है. इन हालात के मद्देनज़र सोचिए जरा, जिस तरह देश के नागरिक बिकने को मजबूर और निवेशक उनको खड़े-खड़े खरीदने में समर्थ हो गए हैं, वे वैसे ही बने रहे तो आगे क्या होगा?

(इलस्ट्रेशन: परिप्लब चक्रबर्ती/द वायर)

स्वतंत्रता की 79वीं वर्षगांठ के अवसर पर द वायर हिंदी ‘आज़ादी के मायने’ नाम से एक श्रृंखला शुरू कर रहा है, जहां हम समकालीन लेखकों-विचारकों के लिए आज़ादी क्या है, इस बारे में उनके विचारों से रूबरू होंगे. एक तरह से यह श्रृंखला स्वतंत्रता को आज के संदर्भो में, उसके रोज़ाना के अर्थों में समझने का, उसके मायनों से वाक़िफ़ होने का अवसर है. प्रस्तुत है आठवीं क़िस्त.

§

मोहभंग के शिकार हिंदी के जनवादी व प्रगतिशील कवि स्मृतिशेष सुदामा पांडेय धूमिल ने अपनी ‘बीस साल बाद’ कविता में पूछा कि ‘क्या आज़ादी सिर्फ़ तीन थके हुए रंगों का नाम है/ जिन्हें एक पहिया ढोता है/ या इसका कोई ख़ास मतलब होता है?’ तो पंद्रह अगस्त, 1947 यानी आजादी के बाद दो ही दशक बीते थे और हमारी पीढ़ी का होश संभालना बाकी था.

आगे चलकर हताश-निराश बाबा नागार्जुन ने भी पूछ लिया कि ‘किसकी है जनवरी, किसका अगस्त है/कौन यहां सुखी है, कौन यहां मस्त है?’ और यह तक कह गये कि सेठ है, शोषक है, नामी गला-काटू है/गालियां भी सुनता है, भारी थूक-चाटू है/चोर है, डाकू है, झूठा-मक्कार है/कातिल है, छलिया है, लुच्चा-लबार है/जैसे भी टिकट मिला/जहां भी टिकट मिला/शासन के घोड़े पर वह भी सवार है/उसी की जनवरी छब्बीस/उसी का पन्द्रह अगस्त है/बाकी सब दुखी हैं, बाकी सब पस्त हैं..!

और अदम गोंडवी तो अभी चौदह-पंद्रह साल पहले अपने निधन तक यह पूछकर आज़ादी को प्रश्नांकित करते रहे कि सौ में सत्तर आदमी जब देश में नाशाद है, दिल पे रखके हाथ कहिए देश ये आज़ाद है? (इस लिहाज से देखें तो जबाव अभी भी नकारात्मक ही है, क्योंकि नाना प्रकार के दावों के बावजूद सौ में सत्तर के नाशाद होने की स्थिति नहीं बदली है.

2026 की वैश्विक खुशी रिपोर्ट कहती है कि वैश्विक खुशी सूचकांक में 147 देशों में हमारा देश 116वें स्थान पर है. उसका कुल खुशी स्कोर 4.536 है और वह नेपाल व पाकिस्तान जैसे अपने कई पड़ोसी देशों से भी पीछे है.

यहां यह भी जान लेना चाहिए कि यह रिपोर्ट लोगों की जीवन स्थितियों के मूल्यांकन के छह प्रमुख कारकों – प्रति व्यक्ति सकल घरेलू उत्पाद, सामाजिक सहयोग, स्वस्थ जीवन प्रत्याशा, जीवन के विकल्प चुनने की स्वतंत्रता, उदारता व भ्रष्टाचार की धारणा – पर आधारित होती है. जाहिर है कि इनमें से ज्यादातर में हमारे देश का हाल अच्छा नहीं है. तभी तो कई अन्य सूचकांकों में हमारी आजादी को आंशिक और लोकतंत्र को लंगड़ा तक करार दिया जा चुका है.)

बाबासाहब ने चेताया था

प्रसंगवश, आजादी के वक्त कृषि भूमि व उद्योगों समेत देश के ज्यादातर संसाधन, प्रशासनिक पद, न्यायपालिका, शिक्षण संस्थान व नीति-निर्माण वगैरह उच्च व मध्य वर्ग के हाथों में ही केंद्रित थे और निचले वर्गों (दलितों, आदिवासियों और पिछड़ों) के संदर्भ में वह तब तक अधूरी ही रहनी थी, जब तक उन्हें सदियों से चले आ रहे सामाजिक व आर्थिक अन्याय से निजात न मिले. इसीलिए संविधान निर्माता बाबासाहेब डॉ भीमराव अंबेडकर संविधान बनने और लागू हो जाने के बाद बार-बार इस बात पर जोर देते रहे थे कि राजनीतिक लोकतंत्र तब तक अर्थहीन है जब तक वह सामाजिक लोकतंत्र का रूप नहीं लेता.

25 नवंबर, 1949 को संविधान सभा के अपने अंतिम भाषण में उन्होंने अपनी ओर से यह गंभीर चेतावनी भी दी थी कि 26 जनवरी, 1950 को यानी संविधान लागू होने के बाद हम विरोधाभासों के जीवन में प्रवेश कर रहे हैं. अब, राजनीति में हमारे पास समानता होगी (एक व्यक्ति, एक वोट), लेकिन सामाजिक और आर्थिक जीवन में असमानता बनी रहेगी. यदि इस असमानता को जल्द से जल्द दूर नहीं किया गया, तो जो लोग इस असमानता से पीड़ित हैं, वे उस राजनीतिक लोकतंत्र के ढांचे को विस्फोट से उड़ा देंगे जिसे इस सभा ने इतनी मेहनत से बनाया है.

उनकी इस चेतावनी की ओर ठीक से ध्यान नहीं दिया गया तो वैसे सवाल पैदा ही होने थे, जिन्हें धूमिल, नागार्जुन और अदम व उनके जैसे दूसरे कवियों ने स्वर दिये.

बहरहाल, होश संभालने के बाद हमने जाना कि इनमें धूमिल ने अपना आजादी के मतलब वाला सवाल किसी और से नहीं, खुद से, अपने-आपसे ही किया था और इस कविता के ही अनुसार बिना किसी उत्तर के चुपचाप आगे बढ़ गये थे. यों, उनके प्रश्न का कम से कम एक सुविचारित उत्तर 26 नवम्बर, 1949 को अंगीकृत, अधिनियमित और आत्मार्पित देश के संविधान में है, जिसकी प्रस्तावना में समस्त नागरिकों को सामाजिक, आर्थिक व राजनीतिक न्याय, विचार, अभिव्यक्ति, विश्वास, धर्म व उपासना की स्वतंत्रता और प्रतिष्ठा व अवसर की समता प्राप्त कराने का दृढ़ संकल्प लिया गया है – व्यक्ति की गरिमा और राष्ट्र की एकता व अखंडता सुनिश्चित करने की बंधुता बढ़ाने का भी.

लेकिन बाद में यह देखना बहुत दुखद हो गया (और अब तो कुछ ज्यादा ही दुखद हो गया है) कि देश के लोकतांत्रिक ढंग से चुने गये कर्णधारों (जिनमें से 92 प्रतिशत अब करोड़पति हैं) ने संविधान की प्रस्तावना के उस दृढ़ संकल्प की ओर से नजरें चुरा लीं और उसे सिर्फ पोथियों या पंद्रह अगस्त व छब्बीस जनवरी को याद करने भर के लिए मान लिया.

फिर तो जिनपे तकिया था, उन पत्तों को भी हवा देनी ही थी और आजादी को पहले से ही अनेक विशेषाधिकारों से सम्पन्न उच्च व मध्य वर्गों का हथियार बनना और असमानता के राज में बदलना ही था. इस तथ्य को भी भुलाया ही जाना था कि समानता ही सच्ची आजादी की जननी है.

धूमिल के वक्त कम से कम इतनी आज़ादी थी कि वे उसके अधूरेपन को लेकर, किसी और से नहीं तो खुद से ही सही, वैसा चुभता हुआ सवाल पूछ सकते थे. लेकिन आज? एक तरफ पिछले बारह सालों में पच्चीस करोड़ लोगों को गरीबी की रेखा से ऊपर किए जाने का दावा है, दूसरी तरफ अस्सी करोड़ से ज्यादा लोगों को सरकारी राशन पर गुजर-बसर करनी पड़ रही है. तिस पर गरीबों की संख्या तो संख्या, उसे तय करने की प्रणाली तक विवादित बना दी गई है और उसको लेकर कोई भी सवाल ज्यादातर लोगों की प्राथमिकता में नहीं है. क्योंकि वे जानते हैं कि ऐसे सवाल देश को ‘विश्वगुरु’ बनाने की सत्ताधीशों की उतावली को ‘सूट’ नहीं करते और इनको उठाने पर अर्बन या दिमागी नक्सल करार दिये जाने का प्रबल अंदेशा है.

इसके विपरीत हमारे सत्ताधीश इस बात को ठीक से समझते कि देश में सदियों से चली आ रही सामाजिक-आर्थिक व जातीय असमानताएं ही देशवासियों की सभी तरह की स्वतंत्रताओं व न्यायों की सबसे प्रबल दुश्मन हैं और संविधान की प्रस्तावना में जिस समानता का दृढ़ संकल्प लिया गया है, साथ ही वे उसे प्रतिष्ठित होने देते तो सामाजिक न्याय व बंधुत्व उसके पीछे-पीछे चले ही आते और अब तक सारे देशवासियों को प्राप्त हो गये होते.

लेकिन ऐसा न होने देकर उन्होंने उसकी ओर पीठ कर ली, इसलिए आज असमानता के भस्मासुर न सिर्फ हमारी आजादी व लोकतंत्र दोनों के सिर पर अपने हाथ रखकर उन्हें भस्म कर देने पर आमादा हैं, बल्कि हमें धमका भी रहे हैं कि हम उनसे जुड़ी अपनी परिकल्पनाओं को लेकर किसी मुगालते में न रहें.

अमानवीय चेहरा

इस असमानता से पैदा हुई अमीरी के अनेक असुर भी हालात का लाभ उठाकर उन्मत्त भाव से हमारी छाती पर चढ़े आ रहे हैं और आरजू-मिनती कुछ भी सुनने के मूड में नहीं है. गौरतलब है कि इन असुरों की अमीरी कठिन परिश्रम व नवाचार से नहीं बल्कि बेजा संरक्षण, एकाधिकार, विरासत और सरकारों के साथ साठगांठ के बूते करचोरी, श्रमिकों के अधिकारों के हनन और ऑटोमेशन की राह चलकर स्पर्धा का बेहद अनैतिक माहौल बनाकर उनके पास आई है और यह समझने के लिए अर्थशास्त्र की बारीकियों में बहुत गहरे पैठने की भी जरूरत नहीं कि वह ज्यादा से ज्यादा लोगों को आर्थिक विकास का फायदा देकर यानी ‘सबका साथ, सबका विकास’ के नारे को सदाशयता से जमीन पर उतारकर संभव नहीं थी.

इसलिए बदनीयती से अर्थव्यवस्था के ‘विकास’ के सारे लाभों को लगातार कुछ ही लोगों तक सीमित रखकर हासिल की गयी है. साफ कहें तो तथाकथित आर्थिक सुधारों के उस मानवीय चेहरे पर अमानवीयतापूर्वक तेजाब डालकर, जिसकी चर्चा 24 जुलाई, 1991 को देश में भूमंडलीकरण की नीतियों का आगाज करते हुए उसके सबसे बड़े पैरोकार तत्कालीन वित्तमंत्री मनमोहन सिंह ने की थी.

यह अमीरी बहुराष्ट्रीय कम्पनियों के बिग मनी से मिलीभगत कर लेती है तो इस सवाल का भी सामना नहीं करती कि किसी एक व्यक्ति को अमीर बनाने के लिए आम लोगों की कितनी बड़ी संख्या को गरीबी के हवाले करना पड़ता है और क्यों हमें ‘हृदयहीन’ पूंजी को ब्रह्म और ‘श्रम के शोषक’ मुनाफे को मोक्ष मानकर ‘सहृदय’ मनुष्य को संसाधन की तरह संचालित करने वाली अर्थव्यवस्था के लिए अनंतकाल तक अपनी सारी लोकतांत्रिक-सामाजिक नैतिकताओं, गुणों व मूल्यों की बलि देते रहना चाहिए? साथ ही चुनावों, अवसरों, धर्म व उपासना, अभिव्यक्ति, संगति, काम और सीखने की स्वतंत्रताओं की बलि भी.

क्यों हमें हार मानकर कह देना चाहिए कि अब हमारे देश का हमसे ज्यादा निर्माण बड़े-बड़े बदनीयत निवेशक और उनकी बड़ी-बड़ी कंपनियां करेंगी और हमें उनके चौधरी के समक्ष अपनी सम्प्रभुता के बिना शर्त समर्पण में भी कोई हिचक नहीं होगी?

नागरिक बनाम निवेशक

इन हालात के मद्देनजर सोचिए जरा, जिस तरह देश के नागरिक बिकने को मजबूर और निवेशक उनको खड़े-खड़े खरीदने में समर्थ हो गये हैं, वे वैसे ही बने रहे तो आगे क्या होगा? क्या वह उससे भी त्रासद नहीं होगा, जो आज हम होते देख रहे हैं? क्या आगे चलकर ये ‘खरीदार’ अपने द्वारा पैदा की गई असमानता की बिना पर ऐसी स्थिति नहीं बना देंगे कि नागरिकों में से कुछ तो वोट मांगते-मांगते उसे खरीदने का सामर्थ्य भी पा जायें और बहुत से अन्य मांगे जाने पर उसे बेचने या रेवड़ियों के बदले उसका सौदा करने की सीमा तक असमर्थ हो जायें. समर्थ नागरिक एक बार जैसे-तैसे सत्ता में आ जायें तो अपनी सत्ता की उम्र बढ़ाने के लिए नकदी व रेवड़ियां बांटते-बांटते अपने खिलाफ आवाज उठाने वालों के मताधिकार के भी आड़े आने लग जायें और इसके लिए संवैधानिक संस्थाओं के क्षरण को चरम पर व हालात को बकौल एक कवि, यहां तक पहुंचा दें: टोपी कहती है मैं थैली बन सकती हूं, कुर्ता कहता है मुझे बोरिया ही कर लो. ईमान बचाकर आंखें कहती हैं सबकी, बिकने को हूं तैयार खुशी हो जो दे दो.

यहां यह सब कहने का यह आशय कतई नहीं है कि आजादी के बाद विभिन्न वंचित तबकों के लिए सामाजिक न्याय की दिशा में प्रयत्न एकदम से हुए ही नहीं. लेकिन आज हम देख रहे हैं कि उन प्रयत्नों की अपर्याप्तता से पैदा हुए असंतोष को उन्हें ही नहीं, आजादी व संविधान सब को पलट देने के लिए इस्तेमाल कर उच्च व मध्य वर्गों द्वारा गढ़े गये तथाकथित राष्ट्रवाद के ऐसे विमर्श को आगे कर दिया गया है, जो जातिगत व वर्गीय असमानताओं को दूर करने के बजाय समरसता के बहाने उनको ढकने-थोपने में ही लगा रहता है.

ताकि कुछ ‘नखलिस्तानों’ के बीच निचले वर्गों के व्यापक आर्थिक व सामाजिक शोषण पर पर्दा पड़ा रहे, उनके संरक्षण की नीतियां दिखावे भर के लिए रह जायें और हमारे लोकतंत्र की सारी की सारी उपलब्धियां ऊपर ही ऊपर लोक ली जाती रहें. इसीलिए जो सामाजिक रूप से निचला है, वह आर्थिक रूप से भी निचला वर्ग बना हुआ है और थोथे राष्ट्रवाद के फरेब से इतना बेबस कर दिया गया है कि किधर गए वो वायदे, सुखों के ख़्वाब क्या हुए? हमें था जिनका इंतज़ार वो जवाब क्या हुए? सारी उपलब्धियां ऊपर वालों के और सारे संघर्ष व मुसीबतें हमारे नाम क्यों लिख दी गई हैं?

इस कारण असमानता का राज एक ऐसी कड़वी वास्तविकता में बदल गया है, जो विभिन्न शोध पत्रों, अकादमिक अध्ययनों और अंतरराष्ट्रीय रिपोर्टों के आंकड़ों से स्पष्ट रूप से प्रमाणित होती है.

ऑक्सफैम और वर्ल्ड इनइक्वालिटी लैब की रिपोर्टों के अनुसार देश के शीर्ष एक प्रतिशत अमीरों के पास देश की कुल संपत्ति का चालीस से पचास प्रतिशत हिस्सा केन्द्रित हो गया है, जबकि शीर्ष दस प्रतिशत के पास कुल संपत्ति का पैंसठ से बहत्तर प्रतिशत हिस्सा. इसके विपरीत सबसे गरीब आधी जनसंख्या देश की कुल संपत्ति के केवल तीन से छह प्रतिशत हिस्से पर ही गुजर बसर को अभिशप्त है.

अरबपतियों का राज!

पेरिस स्थित वर्ल्ड इन इक्वैलिटी लैब की ताज़ा रिपोर्ट के मुताबिक भारत में अमीर और गरीब के बीच की खाई अंग्रेजों के राज से भी बड़ी हो गई है और अरबपतियों का राज चल रहा है. रिपोर्ट के अनुसार देश की कुल सालाना कमाई की बात करें, तो शीर्ष एक प्रतिशत अमीरों देश की कुल सालाना आय का 22.6 प्रतिशत हिस्सा अपने घर ले जाते हैं, जो कि ऐतिहासिक रूप से सबसे ऊंचा स्तर है. इसी तरह शीर्ष 10% लोग कुल राष्ट्रीय आय का 58% ले जाते हैं, जबकि आधी यानी पचास प्रतिशत आबादी के हिस्से 15% राष्ट्रीय आय ही आती है.

इस मामले में लैंगिक असमानता भी इतनी ज्यादा है कि श्रम आय में पुरुषों की हिस्सेदारी 82% है, जबकि महिलाओं की हिस्सेदारी मात्र 18% है. इस मामले में आक्सफैम इंडिया की रिपोर्ट भी कोई अलग कहानी नहीं कहती और सुझाती है कि इस असमानता को कम करने के लिए अति-अमीर लोगों पर वेल्थ टैक्स और इनहेरिटेंस टैक्स (विरासत कर) लगाकर उससे मिले धन को स्वास्थ्य और शिक्षा पर खर्च करना चाहिए.

गौरतलब है कि यह हालत तब है, जब संविधान में आर्थिक संसाधनों और धन का केन्द्रीकरण न होने देने का स्पष्ट निर्देश है . संविधान के भाग-4 में दिए गए निर्देशक सिद्धांतों का अनुच्छेद 39(सी) राज्य को ऐसी आर्थिक नीतियां बनाने से रोकता है जिनसे धन कुछ ही लोगों के पास इकट्ठा होकर आम लोगों के लिए नुकसानदेह हो जाये. इसी तरह अनुच्छेद 39(b) कहता है कि समाज के भौतिक संसाधनों का स्वामित्व और नियंत्रण इस प्रकार बंटना चाहिए, जिससे सबका भला हो. चूंकि सत्ताधीश इन निर्देशक सिद्धांतों की अवहेलना कर संसाधनों और धन का असीमित केन्द्रीकरण होने दे रहे हैं, देश में आर्थिक तनाव भी बढ़ रहे हैं और जातीय व सामाजिक, साम्प्रदायिक व धार्मिक तनाव भी.

ऐसे में आज़ादी अपने वास्तविक अर्थ और स्वरूप में कैसे फूल और फल सकती है? और क्यों नहीं अदम गोंडवी की तरह आम लोगों को भी लगेगा कि नेजे आज़ाद हैं सीनों में उतरने के लिए,और हम उलझे हैं अभी, ज़ात और लिबास में.

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं.)

(इस श्रृंखला के सभी लेख पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें.)