स्वतंत्रता की 79वीं वर्षगांठ के अवसर पर द वायर हिंदी ‘आज़ादी के मायने’ नाम से एक श्रृंखला शुरू कर रहा है, जहां हम समकालीन लेखकों-विचारकों के लिए आज़ादी क्या है, इस बारे में उनके विचारों से रूबरू होंगे. एक तरह से यह श्रृंखला स्वतंत्रता को आज के संदर्भो में, उसके रोज़ाना के अर्थों में समझने का, उसके मायनों से वाक़िफ़ होने का अवसर है. प्रस्तुत है नौवीं क़िस्त.
§
अपने देश की आज़ादी को जब आज याद करता हूं तो सहज ही, अपने इर्द-गिर्द शब्दों के कुछ युगल टहलते नजर आने लगते हैं. उदाहरण के लिए, इनमें से कुछ हैं- आज़ादी और अराजकता, स्वाभिमान और अहंकार, प्रशंसा और चाटुकारिता, भक्ति और अंध भक्ति, मैं और हम, नारा और कविता, मनुष्यता और संकीर्ण राजनीति, सत्ता विरोध और देशद्रोह, आंदोलन और आतंक.
आज़ादी क्या है और उसका संकीर्ण अथवा भ्रष्ट रूप क्या है, यह ऊपर दिए शब्द-युगलों के भीतर छिपा हुआ है. लेकिन अंतत: सत्य यही है जिसे कभी पराधीन भारत में तुलसी ने अपने शब्दों में बांधा था- पराधीन सपनेहुं सुख नाहीं. अपनी आज़ादी को सच में चाहने वाला अपनी आज़ादी में दूसरे की पराधीनता किसी सूरत नहीं चाहेगा.
आज़ादी के प्रसंग में मुझे गुरुदेव रवींद्रनाथ टैगोर का गीतांजलि वाला वह गीत कभी नहीं भूलता जिसका बुनियादी भाव है – जहां मन भय से मुक्त हो और मस्तक ऊंचा हो. खोजा तो गीत की व्याख्या कुछ यूं मिली- ‘जहां किसी को डर न हो और इंसान आत्मसम्मान के साथ जी सके, जहां शिक्षा और ज्ञान पर किसी का पहरा न हो और वह सबको मिले, जहां जाति, धर्म या दीवारों के नाम पर समाज न बंटे और जहां लोग सच बोलें और बेहतर बनने की कोशिश करें’. तो कह सकते हैं कि टैगोर ने एक ऐसे स्वतंत्र, भयमुक्त और ज्ञानी देश का सपना देखा था जहां हर नागरिक का मस्तक सम्मान से ऊंचा रहे.
अब जब भी अपने आसपास या कहूं देश के भीतर के आसपास पर नज़र घुमाता हूं तो स्वतंत्रता दिवस पर उत्साह से गाए जाने वाले राष्ट्र गान ‘जन गण मन’ के सृजेता का उक्त गीत अर्थात – जहां मन भय से मुक्त हो और मस्तक ऊंचा उठ सके भी मन ही मन अपनी भूमिका निभाने आ जाता है. नहीं भूलना चाहिए कि 1913 में नोबेल पुरस्कार से सम्मानित गीतांजलि का यह गीत पराधीन भारत में एक स्वतंत्र व्यक्ति या कवि की मानिसकता का गीत है.
मनुष्य की सच्ची आज़ादी का स्वप्न देखते गुरुदेव के इस गीत की संवेदनशील और उत्साहवर्धक सार्थक पहुंच देश की सीमाओं के बाहर तक थी. मसलन अपने कोरिया प्रवास के अनुभव से कहूं तो 1913 में नोबेल पुरस्कार जीतने के तुरंत बाद ही गुरुदेव रवींद्रनाथ टैगोर कोरिया में जाने-पहचाने नाम बन गए. जिस तरह भारत ब्रिटिश शासन के अधीन था, उसी तरह कोरिया भी जापान के साम्राज्यवाद के अधीन था. कोरियाई लोग भी अपनी आज़ादी के लिए संघर्ष कर रहे थे. खुद एशियाई होने के नाते, कोरियाई लोगों ने इस पुरस्कार का स्वागत किया और इसे पहले एशियाई कवि के पुरस्कार के तौर पर मनाया. टैगोर की रचनाएं अंग्रेज़ी अनुवाद के ज़रिए कोरिया पहुंचीं. उनमें दुख-दर्द से जूझती मानवता के प्रति टैगोर की गहरी चिंता और एक ऐसी भविष्य की दुनिया के लिए मज़बूत इच्छाशक्ति और संदेश झलकता था ‘जहां मन निडर हो और सिर गर्व से ऊंचा रहे’. 1916 और 1919 के बीच टैगोर का नाम कोरियाई लोगों के घरों तक पहुंच चुका था.
किसी भी स्वतंत्रताप्रिय, पूरे विश्व की मनुष्यता को एक मानने वाले मनुष्य की तरह कवि टैगोर ने 1929 में उस समय जापान के अधीन ग़ुलाम कोरिया के लिए एक संदेशपरक कविता लिखी थी- और वह भी स्वयं जापान में ही:
एशिया के स्वर्णिम युग में
रहा कोरिया एक दीप वाहकों में
और कर रहा फिर प्रटिकषा
वही दीप होने को ज्योतित
करने को फिर से आलोकित
पूरब का प्रांगण यह सारा
यह कविता टैगोर ने 1929 में जापान की अपनी तीसरी यात्रा के दौरान लिखी थी. उन्होंने इसे टोक्यो में कोरिया के देशभक्त युवाओं के लिए छोड़ा था, जिन्होंने उनसे कोरिया आने का अनुरोध किया था. इस कविता का अनुवाद कवि चू यो-हान ने किया था और इसे अप्रैल 1929 में ‘ईस्ट एशिया डेली’ में ‘तोंगबंद उई तुंगबुल’ (एशिया की रोशनी) शीर्षक से प्रकाशित किया गया था. आज़ादी के कुछ ही समय बाद इसे हाई स्कूल की पाठ्यपुस्तक में शामिल किया गया. इस कविता ने कोरिया में उनके सम्मान और लोकप्रियता को अभूतपूर्व ऊंचाइयों तक पहुंचाया. पद्मश्री से सम्मानित कवयित्री किम यांग शिक के शब्दों में,
‘साल 1929 कोरिया के इतिहास के सबसे यादगार देशभक्ति आंदोलनों में से एक – जापान के खिलाफ ‘मार्च फर्स्ट मूवमेंट’ – की दसवीं सालगिरह का साल था. टैगोर की कविता सिर्फ़ चार लाइनों की है, लेकिन उसमें छिपा गहरा संदेश उस समय कोरियाई लोगों में गहरी भावना जगाने और उन्हें ज़बरदस्त हौसला देने के लिए काफ़ी था. इस तरह, टैगोर की कविता कोरिया के गौरव के फिर से जागने के बारे में उनकी मज़बूत उम्मीद को दिखाती है, जिसे दुर्भाग्य से जापानी उपनिवेशवाद की छाई हुई उदासी ने ढक लिया था. यह कविता आज भी कोरियाई लोगों के मन में बेहतर भविष्य की ओर आगे बढ़ने का आत्मविश्वास और उम्मीद जगाती है; और कोई भी आसानी से कल्पना कर सकता है कि आधी सदी से भी पहले, जब हमारा देश भी भारत की तरह विदेशी शासन की बेड़ियों में जकड़ा हुआ था, तब इस कविता ने उन्हें कितनी प्रेरणा दी होगी’.
नि:संदेह, इतिहास से हर किसी ने आज़ादी दिलाने वाले हमारे गौरव जनों को न केवल जाना है बल्कि पूजा भी है. पर मेरा आग्रह यह भी है कि इतिहास के विस्मृत पन्नों से खोज-खोज कर आज़ादी के लिए संघर्ष करने वाले उन योद्धाओं को भी भी जाना जाए जिनकी बात करने वाला कोई नहीं है, जैसे शहर फैजाबाद के गुलाम हुसैन खाँ के बेटे अहमदशाह. आज़ादी के इस सेनानी पर मेरी एक बाल कहानी है, ‘ग़ुलामी पाप है’. उससे एक अंश देखें-
‘उस समय देश ग़ुलाम था. अंग्रेजों के. बालक अहमदशाह ग़ुलामी का मतलब जानता था. उसने किताबें जो पढ़ी थीं. …. उसे पता चला कि अंग्रेज़ों ने चालाकी से हमें ग़ुलाम बनाया था. उसका तो खून ही खौल उठा. दिमाग में तूफ़ान सा आ गया. देश वासियों पर कोड़े बरसाने वाले अंग्रेज़ों को वह तहस नहस करना चाहता था. निडर जो था. उसने महसूस किया कि लोग ग़ुलामी में कैसे घुट-घुट कर जी रहे थे. ‘कैसे काटे वह गुलामी की बेड़ियों को’ – वह सोचता रहता. सोचते-सोचते उसकी आंख लग जाती. ऐसे ही एक दिन उसकी नींद लगी तो फिर वही परी आई. परी को देख कर खुश होना ही था. परी ने कहा, ‘तुम चिंता मत करो. तुममें हिम्मत है. कुछ कर गुज़रने की ताकत है. जल्दी ही तुम्हें सफलता मिलेगी. ग़ुलामी को पाप समझो.’ अहमदशाह खुश हुआ. उसे जल्दी ही इंग्लैंड जाने का मौका मिला. वह वहां के सैनिकों से मिला. पर अपने मन की बात नहीं बताई. भला कौन सी बात? वही देश को आज़ाद कराने वाली बात. बता देता तो अंग्रेज क़ैद में न डाल देते? उल्लू बनाकर सैनिकों से अस्त्र चलाने की कला सीख ली. रूस, ईरान, ईराक और अरब की भी यात्रा की. उसके बाद तो और भी कई देशों की यात्रा की. लेकिन केवल मज़े के लिए नहीं. कुछ जानने-समझने के लिए, समझदारी बढ़ाने के लिए. इधर देश में क्रांति छिड़ चुकी थी. आज़ादी के लिए. देश भक्त अहमदशाह की तो मानों एक बड़ी इच्छा पूरी हो गई हो. यूं लड़ाई उसे अच्छी नहीं लगती थी. पर अत्याचार के विरुद्ध लड़ना धर्म था. उसने हिंदू-मुसलमान दोनों को मिलाया और अंग्रेजों को ललकारा. सब उन्हें मौलवी कहते थे. मौलवी अहमदशाह. एक पक्का क्रांतिकारी. उसे बहुत कुछ करना था. लेकिन गुपचुप, गुपचुप. समझदारी से’.
बहरहाल, मेरी निगाह में, आज़ादी जब तक मानसिक रूप में स्वीकार्य नहीं होगी, मूल्य की तरह नहीं बनेगी अर्थात भीतरी नहीं होगी तो ऊपरी आज़ादी काफी हद तक लेन-देन की वस्तु ही बनी रह जाएगी. अर्थात तेरी-मेरी में उलझी रह जाएगी. यहां फिर मुझे रवींद्रनाथ टैगोर याद हो आए हैं. गीतांजलि के हिंदी संस्करण में उनकी एक कविता है हे मेरे चित्त! जो ऐसा लगता है मानो भारत के संघर्षशील इतिहास और उसके बहुविध सांस्कृतिक परिदृश्य को ध्यान में रखकर, आज़ाद देश और देशवासियों को भी सही समझ देने के लिए रची गई हो.
इन ध्यान-मग्न पर्वत-शिख्ररों पर, नदियों की जयमाला
धारण किए विस्तृत क्षेत्रों पर, इस पृथ्वी पर भारत
के महामानव-सागर के तट पर तू उसका नित्य अवलोकन कर!
किससे आमंत्रित, कितना जन-प्रवाह अनवरत स्रोतों से उठकर
आया और समुद्र में विलीन हो गया-यह किसी को ज्ञात नहीं.
यहां आर्य, अनार्य, द्रविड़. चीन, शक,हूण, पठान, मुगल-
एक ही देह में विलीन हो गए.
रात्रि के बाद प्रभात का उदय होगा.
विशाल विश्व में भारत के महामानव-तट पर जननी जागी है.
आओ, हे आर्यो, हे अनार्यो, अंग्रेजो, ईसाइयों, आओ!
हे ब्राहम्ण, आ! मन शुद्ध कर और सबका हाथ पकड़!
हे हरिजन, आ! और अपने समस्त अपमान-भार को हल्का कर ले!
(दिविक रमेश वरिष्ठ साहित्यकार हैं.)
(इस श्रृंखला के सभी लेख पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें.)
