नई दिल्ली: 20 अगस्त 2026 को वॉशिंगटन स्थित तीन अमेरिकी सिख संगठनों ने अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो को एक पत्र भेजकर उनसे आग्रह किया है कि 25 अगस्त 2026 को प्रस्तावित यात्रा से पहले मोहन भागवत को अमेरिका में प्रवेश की अनुमति न दी जाए.
भागवत राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के प्रमुख हैं, जिसे एक दक्षिणपंथी हिंदुत्ववादी संगठन और सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) का मातृ संगठन माना जाता है.
अमेरिकन सिख कॉकस कमेटी, सिख कोऑर्डिनेशन कमेटी ईस्ट कोस्ट और अमेरिकन गुरुद्वारा परबंधक कमेटी के प्रतिनिधियों द्वारा हस्ताक्षरित पत्र में कहा गया है, ‘आरएसएस और उससे जुड़े संगठनों का भारत में धार्मिक अल्पसंख्यकों, जिनमें सिख, मुस्लिम और ईसाई शामिल हैं, के खिलाफ हिंसा, भेदभाव और उत्पीड़न को बढ़ावा देने वाली विचारधारा और गतिविधियों को बढ़ावा देने का एक लंबा और अच्छी तरह से दर्ज रिकॉर्ड रहा है.’

अमेरिका स्थित इन सिख संगठनों ने अपने पत्र में लिखा है कि भागवत के 25 अगस्त के आसपास अमेरिका पहुंचने की उम्मीद है और इसमें 29 अगस्त को मैडिसन स्क्वायर गार्डन में एक सार्वजनिक कार्यक्रम का भी उल्लेख किया गया है.
पत्र में आगे कहा गया है, ‘आरएसएस प्रमुख को अमेरिका में प्रवेश की अनुमति देना और यहां उनका सम्मान किया जाना ऐसे समय में बेहद चिंताजनक संदेश देगा, जब अमेरिकी अधिकारियों, जिनमें अमेरिकी अंतरराष्ट्रीय धार्मिक स्वतंत्रता आयोग (यूएससीआईआरएफ) के सदस्य भी शामिल हैं, ने सार्वजनिक रूप से धार्मिक स्वतंत्रता के उल्लंघन में आरएसएस की भूमिका को लेकर गंभीर चिंताएं जताई हैं. अमेरिका को ऐसे संगठनों के नेताओं को राजनयिक शिष्टाचार या उच्चस्तरीय पहुंच नहीं देनी चाहिए, जिनके रिकॉर्ड में धार्मिक अल्पसंख्यकों को नुकसान पहुंचाने के मामले दर्ज हैं.’
इससे पहले, 19 अगस्त 2026 को वॉशिंगटन स्थित यूएससीआईआरएफ ने आरएसएस पर प्रतिबंध लगाने की मांग की थी. यूएससीआईआरएफ के अध्यक्ष आसिफ महमूद ने सोशल मीडिया मंच एक्स पर लिखा, ‘भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी आरएसएस के सदस्य हैं. यह भारत का एक ऐसा संगठन है, जिसके सहयोगी संगठनों ने ईसाइयों और मुसलमानों समेत धार्मिक अल्पसंख्यकों पर हमले किए हैं. अब आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत अमेरिका की यात्रा की योजना बना रहे हैं.’
2022 में भी यूएससीआईआरएफ ने भारत को ‘विशेष चिंता वाले देश’ के रूप में चिन्हित किया था. यह दर्जा उन देशों के लिए इस्तेमाल किया जाता है जो व्यवस्थित, लगातार और गंभीर धार्मिक स्वतंत्रता उल्लंघनों में शामिल हैं या उन्हें सहन करते हैं. यह वर्गीकरण अंतरराष्ट्रीय धार्मिक स्वतंत्रता अधिनियम के तहत किया जाता है.
‘यूएससीआईआरएफ एक पक्षपाती संगठन है’: विदेश मंत्रालय
यूएससीआईआरएफ द्वारा आरएसएस पर प्रतिबंध लगाने की मांग के जवाब में विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने कहा, ‘यह एक पक्षपाती संगठन है. मैं कहूंगा कि हमें ऐसे संगठनों से दूर रहना चाहिए, क्योंकि उनका अपना एजेंडा है और उनकी कोई विश्वसनीयता नहीं है. हमें उम्मीद नहीं है कि यूएससीआईआरएफ भारत के बहुलतावादी ढांचे की वास्तविकता को समझेगा या यहां विभिन्न समुदायों के सौहार्दपूर्ण सह-अस्तित्व को स्वीकार करेगा.’
हालांकि आरएसएस खुद को एक गैर-सरकारी संगठन (एनजीओ) के रूप में पेश करता है, लेकिन हाल के दिनों में इसके वित्त और धन के स्रोत को लेकर भी विवाद सामने आए हैं. कर्नाटक के गृह मंत्री और कांग्रेस नेता प्रियांक खड़गे ने इस साल जून में मोहन भागवत को पत्र लिखकर कहा था कि ‘आरएसएस संविधान का जिम्मेदारी से पालन करे, पंजीकरण कराए, अपनी आय का खुलासा करे, लागू करों का भुगतान करे और संविधान के दायरे में पारदर्शी तरीके से काम करे.’
नवंबर 2025 में डिजिटल पोर्टल प्रिज्म रिपोर्ट्स की एक जांच में सामने आया था कि आरएसएस ने अमेरिका की लॉबिंग फर्म स्क्वायर पैटन बोग्स को नियुक्त किया था. इस फर्म को अमेरिकी सीनेट और प्रतिनिधि सभा के अधिकारियों के बीच लॉबिंग के लिए 3,30,000 डॉलर मिले थे. हालांकि, आरएसएस ने ऐसे आरोपों से इनकार किया है.
जुलाई 2026 में द न्यूज मिनट की एक रिपोर्ट में सामने आया था कि सरकारी कंपनी ऑयल एंड नेचुरल गैस कॉरपोरेशन (ओएनजीसी) के कॉरपोरेट सामाजिक दायित्व (सीएसआर) फंड का 14.7 प्रतिशत हिस्सा आरएसएस से जुड़े संगठनों को दिया गया था.
