पाठ्यक्रम में मनुस्मृति और बाबरनामा: विश्वविद्यालय कीर्तन नहीं, अध्ययन की जगह है

किसी भी व्यक्ति या पाठ को अध्ययन का विषय बनाने का मतलब है उसकी आलोचनात्मक पड़ताल. पढ़ाने का मतलब प्रचार नहीं है. धर्म के अध्ययन को लेकर संकट पैदा होता है क्योंकि धार्मिक लोग धर्म को आलोचना नहीं आस्था का विषय मानते हैं. पर श्रद्धा,आवेश से मुक्त होना कक्षा में प्रवेश की पहली शर्त है.

त्रिभाषा विवाद: भाषा उस तिकड़मी दरिंदे का कौर है, जो सड़क पर और, संसद में कुछ और है

शिक्षा मंत्री त्रिभाषा सूत्र को संवैधानिक प्रावधान बतला रहे हैं. वे झूठ बोल रहे हैं. संविधान में कहीं भी भाषा के मामले में ऐसा कोई प्रावधान नहीं है. संविधान में हिंदी अन्य भारतीय भाषाओं की तरह की एक भाषा है लेकिन हिंदीवादी उसे राष्ट्रभाषा कहते रहे हैं.

हिंदू राष्ट्र में प्रतिबंधित है मृतक का शोक

कुंभ भगदड़ हुई. कितनी मौतें हुईं, अब तक हमें नहीं मालूम. कोविड के चलते कितनी मौतें हुईं, हमें नहीं मालूम. सरकार का कहना है कि इतने लोग ज़िंदा बच गए, उसके लिए हमें सरकार का शुक्रिया अदा करना चाहिए.

चतुर सांप्रदायिकता पर सवार आम आदमी पार्टी आखिर कितना दूर जा सकती थी?

‘इंडिया अगेंस्ट करप्शन’ की नीतिविहीनता और चतुर सांप्रदायिकता का प्रदर्शन ‘आप’ ने पिछले 11 सालों में बार-बार किया. हर बार कहा गया कि वह अपने आदर्श से विचलित हो रही है. लेकिन वह आदर्श क्या था, यह आज तक किसी ने न बताया. फिर हम किस आदर्शवादी राजनीति से धोखे का रोना रो रहे हैं?

ज़किया जाफ़री: प्रतिरोध का स्वर जो कभी थका नहीं

ज़किया जाफ़री ने अपनी ज़िंदगी के पिछले 22 साल इंसाफ़ की जद्दोजहद में झोंक दिए. हर कदम पर भारत के ताकतवर निज़ाम की तरफ़ से रुकावट और मुख़ालिफ़त के बावजूद उन्होंने इंसाफ़ की अपनी टेक नहीं छोड़ी.

राहुल गांधी का मुक़ाबला क्या सिर्फ़ भाजपा-संघ से है, समूची सत्ता से नहीं?

राहुल गांधी मात्र एक तथ्य बयान कर रहे थे. भारतीय राज्य का चरित्र पिछले दस बरसों में बुनियादी तौर पर बदल गया है. यह कहने से किसी को बुरा क्यों लगना चाहिए? जो इसके कारण उनकी निंदा कर रहे हैं क्या वे ख़ुद इस बात को नहीं जानते और मानते?

मनमोहन सिंह ने प्रधानमंत्री के तौर पर राज्य-नीति को राजनीति से अलग नहीं किया

मनमोहन सिंह ने अपनी शांत मुद्रा में लेकिन दृढ़ता से यह बात कही थी कि राज्य के संसाधनों पर पहला अधिकार वंचित समुदायों का है- अनुसूचित जाति, जनजाति, पिछड़ी जातियों और मुसलमानों का. यह कहना भारत में राजनीतिक रूप से जोखिम भरा काम था. मनमोहन सिंह ने यह जोखिम उठाया था.

तथ्य बनाम भावना: इतिहासकार अपर्णा वैदिक पर हुए हमले क्या दर्शाते हैं?

इतिहासकार डॉ. अपर्णा वैदिक पर सोशल मीडिया के माध्यम से हमले हो रहे हैं. कानपुर के एक लिट फ़ेस्ट में उनकी नई किताब पर चर्चा के दौरान कुछ विवाद उठे. आरोप लगा कि अपर्णा ने भगत सिंह जैसे क्रांतिकारियों के लिए अपमान सूचक शब्दों का प्रयोग किया. लेकिन सच्चाई कुछ और है.

शाहीन बाग से लेकर राहुल गांधी पर हमला: अराजक हिंसा को भड़काती भाजपा

19 दिसंबर को भाजपा ने जो कुछ भी किया उसकी गंभीरता को समझने की ज़रूरत है. हिंसा के बाद हमेशा संदेह पैदा होता है. दो पक्ष बन जाते हैं. दूसरे पक्ष को सफ़ाई देनी पड़ती है. भाजपा हर जन आंदोलन या विपक्ष के विरोध के दौरान हिंसा पैदा करके यही करती है.

हिंदू अपने बारे में क्या सोचते हैं?

हम पीढ़ी दर पीढ़ी हम मानते आए हैं कि हिंदू का विपरीतार्थक शब्द मुसलमान है. मैंने अपने बचपन में सुना था कि मुसलमान हर चीज़ हिंदुओं के उलट करते हैं. यही बात मेरी बेटी को उसकी अध्यापिका ने बतलाई. हिंदू समझते हैं कि मुसलमान कट्टर और संकीर्ण होते हैं, क्रूर होते हैं और उन्हें हिंसा की शिक्षा बचपन से दी जाती है. उनकी मस्जिदों में हथियार रखे जाते हैं.

इतिहास का वॉट्सऐप संस्करण: अकादमिक इतिहासकार नहीं, राजनीति को दोष दीजिए

विलियम डेलरिंपल ने हाल ही कहा कि भारत में भ्रामक इतिहास की लोकप्रियता के लिए पेशेवर इतिहासकार भी ज़िम्मेदार हैं क्योंकि उन्होंने आसान ज़बान में इतिहास नहीं लिखा, इसलिए इतिहास का वॉट्सऐप संस्करण लोकप्रिय हो गया. लेकिन उनकी यह प्रस्तावना सही नहीं है, क्योंकि जनता सजग होकर भ्रामक और ग़लत व्याख्याओं को चुनती आई है.

मुक्तिबोध स्मरण: ख़ुद को लगातार बदलने की कोशिश स्वतंत्रता का उद्गम है

मार्क्सवादी मुक्तिबोध के लिए आत्म-संशोधन हमेशा चलने वाली प्रक्रिया है. ज़ाहिर है, यह संशोधन सबके बस की बात नहीं और जो इंसान इससे गुजरता है, वह मामूली नहीं.

राष्ट्रवाद के सरकारी नारे नहीं, संस्कृत को स्वतंत्र शोध चाहिए

संस्कृत को एक विशेष धर्म या संस्कृति के ‘मूल्यों’ की वाहक बना दिया गया है. उसका मूल उद्देश्य ज्ञान का प्रसार नहीं, लोगों को राष्ट्रवादी और संस्कारी बनाने का है. एक विशेष प्रकार की नैतिकता के बोझ से दबी बेचारी संस्कृत किस तरह विद्यार्थियों को आकर्षित करे?

क्या नया हिंदू पूरी तरह धर्म-विहीन हो चुका है?

इस नए हिंदू अधिकार के सहारे कोई हिंदू किसी मुसलमान से किसी भी विषय में पूछताछ कर सकता है. उसे ‘जय श्रीराम’ का नारा लगाने को बाध्य कर सकता है, किसी मुसलमान का टिफ़िन खोलकर देख सकता है, उसके फ्रिज की जांच कर सकता है, उसकी नमाज़ को बाधित कर सकता है.

मुसलमानों का अपने लिए आवाज़ उठाना नागरिक भाव को सक्रिय कर रहा है

भारत में मुसलमानों के ख़िलाफ़ हो रहे अन्याय के प्रति ग़ैर-मुसलमान भी बोल रहे हैं, लेकिन इससे यह निष्कर्ष नहीं निकाला जाना चाहिए कि मुसलमानों को अपने अधिकार के लिए या अपने ऊपर हुए अन्याय के ख़िलाफ़ अकेले आवाज़ नहीं उठानी चाहिए.

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