कभी-कभार | अशोक वाजपेयी: अनेक युवा इतिहासकार और अध्येता आज इतिहास के दुरूपयोग, दुर्व्याख्या और तथ्यों-तर्कों-साक्ष्य के बिना मनगढ़ंत बातें थोपने की लोकप्रिय होती वृत्ति को लेकर क्षुब्ध हैं. इतिहास को उसकी वस्तुनिष्ठता, विश्वसनीयता और प्रामाणिकता में बचाने की कोशिश व्यापक होना चाहिए.
कभी-कभार | अशोक वाजपेयी: गीतगोविन्द याद दिलाता है कि भारत की कला-कल्पना, उसका अध्यात्मिक चिंतन, उसका भाषा-सौंदर्य कैसी समावेशी नैतिकता में मूलबद्ध था और उससे महान काव्य और कला संभव हुई.
कभी-कभार | अशोक वाजपेयी: साहित्य में न कहने की कई विधियां संभव हैं और कौशल और कल्पना ऐसी नई विधियां भी खोज सकते हैं, जो न कह जाएं लेकिन आपत्तिजनक न लगें या दिखाई दें. क्या हमारे समय में चतुराई और हिकमत से ऐसा न कहा जा रहा है? या कि अधिकांशतः न कहने से बचा जा रहा है?
कभी-कभार | अशोक वाजपेयी: कविता और संगीत एकांत में आपके सबसे विश्वसनीय और अनाक्रामक शांत सहचर हो सकते हैं. वे आपके एकांत को अपने ढंग से सामुदायिक बना सकते हैं; आपको बाहर और अंदर की, जानी-अनजानी, विपुल और बहुल दुनिया से जोड़ सकते हैं.
कभी-कभार | अशोक वाजपेयी: मुक्तिबोध की सभी कविताएं, एक तरह से, अपने विषय-वस्तु और उसकी असह्य जटिलता के कारण, उनके बीहड़ अदम्य शिल्प के कारण, अधूरी रहने को अभिशप्त थीं. उनका जीवन भी अधूरा ही रहा आया.
कभी-कभार | अशोक वाजपेयी: लोकतंत्र और पत्रकारिता के इस अंधेरे समय में जो कुछ ईमान, साहस, निडरता और प्रतिरोध बचा हुआ है, उसके प्रहरी और अग्रदूत कुछ पत्रकार हैं: वे थोड़े हैं और सच बोल-लिख-दिखा रहे हैं. आशय यह भी है कि सच और तथ्यों को जानने की सहज नागरिक इच्छा बिल्कुल ग़ायब नहीं हो गई है.
कभी-कभार | अशोक वाजपेयी: इस समय क्रूरता के इतने स्तर और इतनी बारीकियां सक्रिय हैं कि उदार मूल्यों और दृष्टि की बात करना दयनीय और हास्यास्पद दिखता है. क्रूरता मनुष्यता का स्वभाव प्रतीत होती है, उदारता नहीं.
कभी-कभार | अशोक वाजपेयी: अंतरराष्ट्रीय स्तर पर एक तरह की अराजकता फैल रही है और सारा राजनय बेहद दबाव में है. अनैतिक आचरण अब खुलेआम हो रहा है और लोग लाचार देख रहे हैं. यह अनैतिकता और जुर्रत पूंजी-बाज़ार-मीडिया-राजनीति के महागठबंधन का परिणाम है.
कभी-कभार | अशोक वाजपेयी: चुनाव आयोग देश और जनता के सामने कठघरे में खड़ा किया जा चुका है. वह सवालों के घेरे में है और उसे अपने को बचाने के लिए सत्ता से बेशर्म समर्थन लेना पड़ रहा है.
कभी-कभार | अशोक वाजपेयी: हालांकि आदिकवि वाल्मीकि को माना जाता है, वैदिक ऋषि, जिनमें कई ऋषिकाएं और संभवतः आदिवासी ऋषि भी शामिल हैं, हमारे आदिकवि हैं. ऋग्वेद हमारा प्रथम काव्यग्रंथ है. ऋग्वेद के प्रथम मंडल के 112 सूक्तों का मुकुन्द लाठ द्वारा किया गया हिंदी अनुवाद इसी सप्ताह प्रकाशित हुआ है.
कभी-कभार | अशोक वाजपेयी: कृष्ण बलदेव वैद इस 27 जुलाई को 98 बरसके हो गए होते. वे अपने ढंग के अप्रतिम लेखक थे. उनके भीतर बेबाकी और आत्म की निर्मम चीरफाड़ थी, और उसके साथ परम वेध्यता व अपने लिखे-जिए पर भरोसा भी.
कभी-कभार | अशोक वाजपेयी: मणिपुर की स्थिति पर रतन थियम बहुत दुखी और क्षुब्ध थे. उन्होंने वहां शांति स्थापित करने का सुझाव केंद्र सरकार को भेजा था. लेकिन इस पर सरकार की कोई प्रतिक्रिया नहीं आई.
कभी-कभार | अशोक वाजपेयी: आस्था और हिंसा में संबंध काफ़ी प्राचीन है. ऐसा भी रहा है कि धर्म के नाम पर की गई हिंसा को हिंसा नहीं माना जाता रहा. प्रसिद्ध उक्ति थी: ‘वैदिकी हिंसा हिंसा न भवति' धर्मचिंतन में हिंसा का विरोध भी होता रहा है. भारतीय लोकतंत्र में हिंसा थमी नहीं और वह कई नए क्षेत्रों जैसे भाषा, मीडिया, फ़ैशन, सिनेमा, सामाजिक व्यवहार आदि में फैलती गई है.
कभी-कभार | अशोक वाजपेयी: हिंदी दूसरी भारतीय भाषाओं को पीछे छोड़कर, उनके अंचलों में लादी जाकर, आगे नहीं बढ़ सकती है. उसका हिंदुत्व की भाषा बन इतराना उसके स्वभाव और परंपरा का अपमान और अवमूल्यन होगा. वह अपनी बहुलता की दुश्मन बनेगी और भारतीय भाषाओं की भी. यह उसका विस्तार नहीं विनाश होगा.
कभी-कभार | अशोक वाजपेयी: कृष्ण खन्ना, हमारे समय के, अपनी कला भर से नहीं, अपनी सक्रियता-विचार और परामर्श से भी, एक निर्णायक मूर्धन्य रहे हैं. इस समय घिरते अंधेरों में वे एक मशाल हैं जो बहुलता, सद्भाव, जातीय स्मृति, सच के लिए और बढ़ते झूठों और घृणा के विरुद्ध निष्कंप, निर्भीक और निरन्तर जल रही है.