बंगनामा: छत से झूलते पंखे और पंखा-चालक के वे दिन

यह कहना सही नहीं होगा कि छत से झूलता पंखा भारत में अंग्रेज लेकर लाए. उनके आने से पहले भी राज प्रासादों और दरबारों में हस्त चलित पंखे मौजूद थे. लेकिन बंगाल की गर्मी से त्रसित अंग्रेजों ने अठारहवीं सदी में इन्हें अपनाया, सुधारा तथा कई जगहों पर ले गए. बंगनामा की बाइसवीं क़िस्त.

बंगनामा: आमी बांग्ला भालो कोरे बोलते पारी

सरकारी अधिकारी बनने के बाद राज्य की भाषा सीखना ज़रूरी होता है पर बचपन से बांग्ला परिवेश में पले-बढ़े होने के चलते मुझे लगता था कि मैं इसे धाराप्रवाह बोल सकता हूं, इसलिए इसे सीखने में समय नष्ट नहीं करना चाहिए. पर अहंकार आने के साथ ठोकर खाना भी निश्चित हो जाता है. बंगनामा की इक्कीसवीं क़िस्त.

बंगनामा: दलित बस्ती में साक्षरता की गूंज

1988 में भारत सरकार ने राष्ट्रीय साक्षरता मिशन का शुरू किया था, जिसका मक़सद था अनपढ़ लोगों को व्यावहारिक रूप से साक्षर बनाना, ताकि सभी लोग काम के लायक़ पढ़-लिख सकें. बंगाल की प्रौढ़ महिलाओं की साक्षरता की यात्रा पढ़िए बंगनामा की बीसवीं क़िस्त में.

बंगनामा: अभी दोपहर है, यानी शटर डाउन है

बारासात में दोपहर के वक़्त दुकानें बंद देखकर मुझे वह चर्चित गीत याद आया जो संकेत करता था कि जिन देशों के निवासी धूप बर्दाश्त न कर सके, वहां अंग्रेज़ तीखी दुपहरी में विचरते थे और अपनी हुकूमत चलाते थे. बंगनामा की उन्नीसवीं क़िस्त.

बंगनामा: कॉनटाई के अलबेले किस्से

मिदनापुर ज़िले के कॉनटाई सबडिवीज़न के गांव में आज़ादी की लड़ाई के दौरान ब्रिटिश पुलिस के ख़िलाफ़ नागरिक इतनी दृढ़ता से खड़े हुए और 'पिछाबो नी' यानी 'पीछे नहीं हटेंगे' का नारा दिया कि गांव का नाम ही पीछाबोनी हो गया. बंगनामा की अठारहवीं क़िस्त.

बंगनामा: कलकत्ते में क्रिसमस

कलकत्ता में बड़े दिन के उत्सव की सबसे ख़ास बात यह है कि इसे जोश के साथ मनाने वाले सारे लोग ईसाई धर्म के अनुयायी नहीं हैं, ठीक उसी तरह जैसे दुर्गा पूजा के दौरान पूजा पंडालों में मां दुर्गा को नमन करने वाले सभी लोग हिंदू धर्म के अनुगामी नहीं होते. बंगनामा की सत्रहवीं क़िस्त.

बंगनामा: बंगाली पिकनिक मनाते नहीं, रचाते हैं

आप किसी बड़े कस्बे, या छोटे-बड़े शहर के रहने वाले हों या कलकत्ता के बाशिंदे, सर्दियों के आते ही उनका मन मचलने लगता. पश्चिम बंगाल में पंखों के बंद होते और बंदर टोपी के निकलते ही पिकनिक रचाने की इच्छा कुलाचें भरने लगती है. बंगनामा स्तंभ की सोलहवीं क़िस्त.

बंगनामा: बगैर ‘केमोन आचेन’ के ‘नमस्कार’ अधूरा

बंगालियों को अपनी बीमारी के बारे में बात करने तथा औरों से साझा करने में कोई झिझक नहीं होती. अपनी बीमारी को साझा करते हुए वह कुछ और भी बताते जाते हैं. मसलन, आप किसी व्यक्ति से तीसरी बार मिलें, और वह आपको अपने मर्ज़ और उनकी दवाएं गिनवा दे तो जानिए कि आपने उनका विश्वास अर्जित कर लिया है. बंगनामा स्तंभ की पंद्रहवीं क़िस्त.

बंगनामा: लकड़ी की सीढ़ी चढ़ता विकास

दुमंजिला पंचायत भवन के निर्माण में जब सरकारी राशि पूरी खर्च हो गई और छत पर बने कमरों तक पहुंचने के लिए सीढ़ियां बनाने का पैसा नहीं बचा, तो लकड़ी की नसैनी टिका दी गई. बंगनामा स्तंभ की चौदहवीं क़िस्त.

बंगनामा: बंगाली विविधता के दो पहलू

घोटी और बांगाल समुदाय कई विषयों पर एकमत हो सकते हैं पर जिस बात पर सहमति लगभग असंभव है वह है फुटबॉल का मैदान. सबसे बड़ी टीम कौन-मोहन बागान या ईस्ट बंगाल? बंगनामा स्तंभ की तेरहवीं क़िस्त.

बंगनामा: गांव, घर और सपना

बतौर एक युवा अधिकारी मैं चाहता था कि सरकारी राशि से बनते ग्रामीण घरों का निर्माण नए नक्शों के अनुसार हो, लेकिन प्रत्येक सपना कहां सच हो पाता है. बंगनामा स्तंभ की बारहवीं क़िस्त.

बंगनामा: बंगाली विचार की वाहक लिटिल मैगज़ीन

बंगाल में लिटिल मैगज़ीन की शुरुआत पिछली शताब्दी के तीसरे दशक में 'कल्लोल' के साथ हुई. आरंभ से ही ये पत्रिकाएं लीक से हटकर पनपते प्रयोगात्मक तथा वैकल्पिक सोच की वाहन बनीं और बाद में वाम विचारधारा से भी प्रभावित हुईं. बंगनामा स्तंभ की ग्यारहवीं क़िस्त.

बंगनामा: कलकत्ते पर दस्तक देती फीकी दुर्गा पूजा

दुर्गा पूजा को अब तीन सप्ताह भी नहीं रह गए हैं लेकिन कलकत्ता के बाज़ार लगभग ख़ाली हैं. एक जूनियर डॉक्टर के सामूहिक बलात्कार और हत्या का जन आक्रोश रास्तों पर बह रहा है, चौराहों पर उमड़ रहा है. बंगनामा स्तंभ की दसवीं क़िस्त.

बंगनामा: हम्पी के प्रांगण में बंगाल के फूल

हम्पी जाते वक्त विजयनगर साम्राज्य की कलात्मक राजधानी की छवि मन में थी, लेकिन यह उम्मीद नहीं थी कि वहां पश्चिम बंगाल की झलक दिख जाएगी. बंगनामा स्तंभ की आठवीं क़िस्त.