बजट सत्र में विपक्ष के लगातार सवालों के बाद मोदी सरकार अपनी भरपूर तल्ख़ी के बावजूद नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी पर ठीक से आक्रामक तक नहीं हो पा रही: विशेषाधिकार हनन प्रस्ताव लाने का मंसूबा बांधा, जो टूट गया, क्योंकि सरकार को अचानक याद आया कि अभी तो उन्होंने लोकसभा की विशेषाधिकार हनन समिति ही नहीं बनाई, प्रस्ताव लाए तो भला उसे भेजेंगे कहां?
देश की संवैधानिक संस्थाएं नफ़रत से लड़ नहीं रहीं, वे महज़ दिखावे की कार्रवाई करती हैं या अक्सर नफ़रती भीड़ के साथ खड़ी रह जाती है. नफ़रत से लैस भीड़ के आगे समाज जिस तरह चुप्पी साध रहा है, उससे यही संकेत जाता है कि समाज भी उस हिंसा में शामिल है. दीपक ने इस चुप्पी को तोड़ दिया है.
1784 में भीषण अकाल के वक़्त अवध सूबे के नवाब आसफुद्दौला की हुकूमत ने लोगों को रोज़गार उपलब्ध कराने के लिए जो क़दम उठाए, उनके तहत मनरेगा की ही तर्ज पर उनसे काम लेकर मेहनताना कहें या मजदूरी दी जाती थी. इसने उस दुस्सह अकाल के दौरान जहां बड़ी संख्या में लोगों को भूखे मरने से बचाया, वहीं उनके आत्मसम्मान सम्मान की भी रक्षा की.
जिन सत्य व अहिंसा के बल से महात्मा ने हमारे स्वतंत्रता संग्राम की अगुवाई की, उसे लड़ा व जीता और जिसकी पृष्ठभूमि में देश का संविधान बना और लोकतांत्रिक गणराज्य की स्थापना हुई, आज की सत्ताओं द्वारा उनको उनकी धुरी पर सर्वथा विपरीत दिशा में घुमाकर लोकतंत्र व संविधान से दुश्मनी साधी जा रही है.
वर्तमान में हम भारतीय बेहद यक़ीन के साथ कहते हैं कि देश में कोई सरकार आए, वह संविधान के मूल यानी बुनियादी ढांचे से छेड़छाड़ नहीं कर सकती. क्योंकि यह ढांचा 'संविधान की आत्मा' है. हालांकि याद रखने योग्य बात यह है कि 1973 में केशवानंद भारती बनाम केरल राज्य के मामले में सर्वोच्च न्यायालय द्वारा सुनाए गए ऐतिहासिक फैसले से पहले यह विश्वास हमारे पास नहीं था.
बीते दिनों 'सोमनाथ स्वाभिमान पर्व' के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने डॉ. राजेंद्र प्रसाद की प्रशंसा करते हुए पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू को कभी सोमनाथ न जाने को लेकर कोसा. हालांकि, 1951 में पुनर्निमित सोमनाथ मंदिर के प्राण-प्रतिष्ठा समारोह में डॉ. प्रसाद ने नेहरू से अपनी सारी 'असहमतियों' को धता बताते हुए कहा था कि आस्था और दृढ़ विश्वास ने भारत को धर्मनिरपेक्षता की नीति अपनाने के लिए प्रेरित किया है कि धर्म के आधार पर कोई भेदभाव नहीं किया
ग्यारह जनवरी,1921 वो दिन था जब अवध के किसानों ने तत्कालीन फ़ैज़ाबाद (अब आंबेडकरनगर) ज़िले के नितांत पिछड़े बिड़हर क्षेत्र में ब्रिटिश राज और उसके चहेते ज़मींदारों के ख़िलाफ़ खुला विद्रोह कर दिया था. हालांकि इस विद्रोह का दूसरा पहलू यह रहा कि महात्मा गांधी इसमें हुई हिंसा, लूटपाट व आगजनी से बहुत नाराज़ हुए.
कवि, लेखक, पत्रकार व सामाजिक कार्यकर्ता जसिंता केरकेट्टा को उनके सृजन के अतिरिक्त देश के आदिवासियों की स्थिति पर अनेक राष्ट्रीय व अंतरराष्ट्रीय संवादों-परिसंवादों के लिए भी जाना जाता है. वे मानती हैं कि आदिवासियों की निगाह से देश अपनी परवाह करते हुए अपने आसपास और देश-दुनिया और प्रकृति की परवाह करने का नाम है और इसमें संकीर्णताओं की कोई जगह नहीं है. उनसे बातचीत.
लब्धप्रतिष्ठ कथाकार शिवमूर्ति को पिछले दिनों अवध का प्रतिष्ठित 'माटी रतन' सम्मान दिया गया. उन्हें आम तौर पर दलितों-वंचितों, स्त्रियों और गांवों के ऐसे कथाकार के रूप में जाना जाता है, जो अपनी रचनाओं में क़िस्सागोई की शैली में मानव जीवन की साधारणता के असाधारण आख्यान रचता है. पेश है उनसे लंबी बातचीत के मुख्य अंश.
योगी आदित्यनाथ एसआईआर में गड़बड़ियों को लेकर बोलने वाले देश के पहले भाजपाई मुख्यमंत्री बनने को कुछ लोगों ने इसे पहले से अन्य सीएम द्वारा एसआईआर संबंधी गड़बड़ियों की शिकायतों की पुष्टि के रूप में देखा है. हालांकि कई हलकों में यह सवाल पूछा जाने लगा कि क्या यूपी में एसआईआर में 'खेल' करने के अरमानों के विपरीत उलटे भाजपा को ही बड़े नुकसान का अंदेशा सताने लगा है?
1937 में कांग्रेस की कार्यसमिति द्वारा बंदे मातरम के एक अंश को (ही) स्वीकार करने से जुड़ी छिद्रान्वेषण से भरी वे सभी अतार्किक बातें स्वत: समाप्त हो जानी चाहिए थीं, जिनका सहारा लेकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने गत सप्ताह इस गीत के डेढ़ सौ वर्ष पूरे होने के सिलसिले में लोकसभा में नेहरू को खलनायक बनाने के लिए उनके प्रति दुर्भावनाओं का एक और खेल खेलने की विफल कोशिश की.
पुण्यतिथि विशेष: 2002 में 27 नवंबर के दिन सुमन का निधन हुआ तो अटल प्रधानमंत्री थे और उन्होंने उनको श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए कहा था कि 'सुमन' हिंदी कविता के सशक्त हस्ताक्षर भर नहीं, अपने समय की सामूहिक चेतना के संरक्षक भी थे. क्योंकि उन्होंने अपनी रचनाओं में न केवल अपनी भावनाओं का दर्द व्यक्त किया, बल्कि अपने युग के मुद्दों पर निर्विवाद रचनात्मक टिप्पणियां भी कीं.
अवध के नवाबों की विलासिता के सच्चे-झूठे इतने किस्से न सिर्फ अवध बल्कि उसके बाहर भी प्रचलित हैं कि कोई उन्हें गिनने बैठे तो गिनता ही रह जाए. इस बाबत कोई क़िस्सा बहुत मुश्किल से मिलता है कि इन नवाबों के बुरे दिन आए और उन दिनों को उन्होंने किस तरह सहा. लेकिन ऐसे क़िस्से भी कम नहीं हैं.
बिहार के विधानसभा चुनाव परिणाम के बाद सत्तारूढ़ गठबंधन की जीत के लिए मुख्य चुनाव आयुक्त को इस तरह 'बधाइयां' दी जा रही हैं. ये रोष में दी जा रही हों, क्षोभ में या हताशा में, इनसे इतना तो पता चलता ही है कि बधाइयां देने वालों को इन नतीजों में कितना गहरा अविश्वास है. यह अविश्वास लोकतांत्रिक मूल्यहीनता बरतकर जनादेश को बरबस छीन लेने की उस 'परंपरा' की उपज है, जिसे भाजपा ने पिछले दशक भर में पोषित किया
जन्मदिन विशेष: जोश मलीहाबादी ने लिखा था कि नेहरू की सियासत मौजूदा सियासत के बिल्कुल बरअक्स थी, इसलिए कहा जाता था कि वे अच्छे सियासतदां नहीं थे. मैं इसकी तस्दीक करता हूं. इसलिए कि आज के अच्छे सियासतदां के लिए यह एक लाजिमी शर्त है कि उसूलों की खिदमत और इंसानियत के एतबार से वह नाकाबिल-ए-बर्दाश्त हद तक बुरा आदमी हो.