जिन राजाओं को प्रजापालन से ज्यादा प्रजा पर नाना प्रकार के अत्याचार कर उसे सताने और धर्म, शील व सदाचार के सिर पर पाद-प्रहार के लिए जाना जाता है, एक समय उनको राजा बनने के लिए राजाधिराज, बादशाह या उनके प्रतिनिधि के बाएं पैर के अंगूठे से अपना राजतिलक कराना पड़ता था और वे खुशी-खुशी खुद को इसके लिए 'प्रस्तुत' कर देते थे. बिना इस सवाल के कि इस तरह किया गया राजतिलक राजतिलक है, अपमानतिलक?
सीवी रमन की यादों को ताज़ा करने या उनके प्रति श्रद्धा निवेदित करने की दिशा में इससे बेहतर कोई और क़दम नहीं हो सकता कि देश को उस वैज्ञानिक दृष्टिकोण की दिशा में ले जाने के बहुविध जतन किए जाएं, जिसकी अपेक्षा हमारे संविधान में की गई है.
इंदिरा गांधी को आम तौर पर उनके बड़े फैसलों, करिश्मों और कीर्तिमानों आदि की रोशनी में 'आयरन लेडी' या कि तानाशाह की छवि को मजबूत करने वाले आईने में ही देखा जाता है, जबकि उन्हें उनके दैनंदिन जीवन के छोटे-छोटे फैसलों के आईने में देखना भी कुछ कम दिलचस्प नहीं है.
अक्टूबर का महीना ढेरों भारतीय विभूतियों या महापुरुषों की इस संसार में आवाजाही के सिलसिले से जुड़ा हुआ है. ऐसी सामूहिकता से कि जब भी यह महीना आता है, मन-मस्तिष्क में बरबस ऐसे भाव आने ही लगते हैं कि वे सब के सब एक साथ सामने आ खड़े हुए हैं. उनमें किसी के आगमन की बेला है तो कोई अलविदा कहने को आतुर है.
इस देश की पत्रकारिता में, वह अंग्रेजी की हो, हिंदी की या किसी अन्य भारतीय भाषा की, एक समय संपादक बहुत शक्तिशाली हुआ करते थे. अब वैसे संपादक या तो हैं ही नहीं या हैं तो अधिकांश बंगला, गाड़ी आदि की चाह में इतने अशक्त हो गए हैं कि उनके होने का इसके सिवा कोई अर्थ नहीं रह गया है कि उनके रहते उनके मालिकान को अलग से पीआरओ नहीं रखना पड़ता.
कोई तो बताए कि इस तरह अंधेरों को घना करते फिरने को अभिशप्त समाज अपने आम लोगों की दीपावली शुभ होने को लेकर आश्वस्त क्योंकर हो सकता है? खासकर तब, जब उसका सुखासीन हिस्सा अपने सुख व समृद्धि के लिए दूसरों के सारे सुख-चैन छीन लेने में कतई कोई बुराई नहीं देख रहा. इसके चलते गैरबराबरी और उसके जाए उत्पीड़न व शोषण हमारे आकांक्षा व प्रतीक्षा के द्वंद्वों का खात्मा ही नहीं होने दे रहे.
लखनऊ में फिरंगीमहल नाम की एक ऐतिहासिक इमारत भी है और मुहल्ला भी. लेकिन जानें क्यों, इस महल या मुहल्ले की दूसरे ऐतिहासिक महलों व मुहल्लों जैसी चर्चा नहीं होती, जबकि आज़ादी की लड़ाई में इनके योगदान का इतिहास इतना गौरवशाली है कि उसकी बाबत जानकर दुनिया के सात आश्चर्यों में शामिल आगरा के ताजमहल को भी ईर्ष्या होने लग जाए!
हाल में पंजाब व हरियाणा हाईकोर्ट में डॉक्टरों की लिखावट का मामला किसी मरीज़ ने नहीं उठाया. रेप, धोखाधड़ी के आरोपों से जुड़े एक मामले की सुनवाई में जज साहब ने इसका स्वत: संज्ञान-सा लिया, जब वे सरकारी डॉक्टर द्वारा लिखी पीड़िता की मेडिको-लीगल रिपोर्ट का एक शब्द भी नहीं समझ पाए. ये लापरवाही है या संवेदनहीनता?
‘चरथ भिक्खवे’ का अर्थ है: बुद्ध जिस पथ पर गए, उस पर चलना. चरथ भिक्खवे-2, पांच अक्टूबर को रोहिन के मुहाने पर कविता पाठ से आरंभ होकर अगले दिन भारत में प्रवेश करेगी. आयोजक सदानंद शाही कहते हैं कि हमारा जीवन नदियों से जुड़ा हुआ है पर जैसे-जैसे यह जुड़ाव विच्छिन्न हुआ हमारे जीवन से नमी लुप्त होती गई है. यह यात्रा उस लुप्त नमी के पुनराविष्कार और बुद्ध की महाकरुणा के अवगाहन का प्रयास है.
गांधी जयंती विशेष: महात्मा गांधी ने आज़ादी की लड़ाई में अंग्रेज़ों से शत्रुता नहीं, बल्कि न्याय और सम्मान पर आधारित मित्रता की अपील की थी. जलियांवाला बाग़ जैसे नरसंहार और दमन के बीच भी उन्होंने उन्हें खुला ख़त लिखकर उनसे आत्ममंथन और बदलाव का आह्वान किया था. हालांकि यह कारगर नहीं हुआ.
जयंती विशेष: 28 सितंबर हो या शहादत दिवस (23 मार्च), इन चर्चाओं में इस बात पर हैरत व अफ़सोस जताने से परहेज़ संभव नहीं हो पाता कि देश का सत्तातंत्र भगत सिंह की शहादत का सिला उनके अरमानों से मुंह मोड़कर और उनके परिजनों से कृतघ्नता बरत कर देता आ रहा है.
राम मंदिर निर्माण का श्रेय लेने के बावजूद भाजपा अयोध्या में लगातार विवादों और शर्मिंदगी का सामना कर रही है. मार्ग नामकरण विवाद, ठगी के आरोप, मोदी प्रदर्शनी की नाकामी और गेस्ट हाउस सेक्स रैकेट के भंडाफोड़ ने पार्टी और सरकार की साख पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं.
शिक्षा का भगवाकरण राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ परिवार की सबसे महत्वाकांक्षी और पुरानी परियोजनाओं में से एक है. वह जानता है कि इस बहुधर्मी, बहुभाषी देश को हिंदू राष्ट्र के सांचे में ढालने का लक्ष्य तब तक पूरा नहीं हो सकता, जब तक देशवासियों, खासकर युवाओं, के दिलो-दिमाग और सोच-सरोकारों पर प्रभावी नियंत्रण स्थापित न कर ले.
आज़ादी के दो साल बाद 1949 में 14 सितंबर को संविधान सभा में एक वोट के बहुमत से हिंदी को देश की राजभाषा घोषित किया गया था. चूंकि यह आज़ादी की लड़ाई में उसके योगदान के पुरस्कार जैसा था, इसलिए इससे उसके प्रेमियों की, जिनमें अनेक गैरहिंदीभाषी भी शामिल थे, खुशी का पारावार नहीं रह गया था.
अवध में उर्दू शायरी के लखनऊ स्कूल की 18वीं शताब्दी के अंत से 19वीं शताब्दी के आरंभ तक की बुलंदी किसी से छिपी नहीं है. मगर जब यह स्कूल आसमान चूम रहा था, तब भी उसमें सब हरा-हरा ही नहीं था. उस दौर में अवध दरबार में उर्दू शायरी की अनेक नामी शख़्सियत की परवरिश जरूर हुई, लेकिन ‘शेखचिल्ली’ भी कुछ कम नहीं थे.