ज्योति बसु: ‘कार्ल मार्क्स का सिद्धांत कोई पूजा करने का मंत्र नहीं है’

ज्योति बसु की दृढ़ मान्यता थी कि कितने ही उतार-चढ़ाव आते रहें, एक ऐसा दिन अवश्य आएगा, जब शोषणरहित समाज की स्थापना संभव हो जाएगी. उनकी जयंती पर उन्हें याद कर रहे हैं वरिष्ठ पत्रकार कृष्ण प्रताप सिंह.

केदारनाथ सिंह: कठिन समय में अक्षरों को ही नहीं, स्वरों को भी बचाया जाना चाहिए…

केदारनाथ सिंह अपने अंतिम दिनों में इस बात को लेकर निराश थे कि अकादमिक संस्थानों के तौर पर विश्वविद्यालयों व कॉलेजों की जो प्रतिष्ठा व भूमिका थी, जिसके चलते परिवर्तनकामी लोग उनकी ओर बड़ी उम्मीद की निगाह से देखते थे, वह अब ख़त्म होती जा रही है. उनके जन्मदिन पर उन्हें याद कर रहे हैं वरिष्ठ पत्रकार कृष्ण प्रताप सिंह.

नेशनल डॉक्टर्स डे: स्वास्थ्य सेवाओं को उन्नत बनाने के सपनों का क्या हुआ?

'दूसरे भगवान' कहलाने वाले चिकित्सकों को याद करते हुए आज हम यह देखने को अभिशप्त हैं कि निजी और सार्वजनिक दोनों क्षेत्रों की स्वास्थ्य सेवाएं अंधाधुंध मुनाफे के प्रति समर्पित हो चली हैं, जिसके चलते न सिर्फ डॉक्टरी पेशे की नैतिकताएं बल्कि हिप्पोक्रेटिक ओथ भी ख़तरे में है.

बाबा नागार्जुन: ‘जनकवि हूं मैं साफ कहूंगा, क्यों हकलाऊं?’

नागार्जुन प्रायः कहा करते थे कि उन्होंने कवि या कथाकार के रूप में अपनी जनता से जो कुछ भी पाया है, अपने सृजन की मार्फत उसे कुछ बढ़ाकर लौटाना उनकी सबसे जरूरी प्रतिबद्धता है, जिसे वे जनकवि के रूप में जनसाधारण की आवाज़ बनकर ही निभा सकते हैं.

आपातकाल को कोसते हुए सत्ता उससे कई गुना ज़्यादा संविधान विरोधी कृत्यों को अंजाम दे चुकी है

इस वक़्त हमारा देश किसी घोषणा के बगैर ही पूर्ण-विकसित अधिनायकवाद की छाया में जिस आपातकाल का अनुभव कर रहा है, उसकी तुलना में क्या 1975 का आपातकाल लगभग अनुभवहीन अभ्यास नहीं था?

कुंदनलाल गुप्त: क्रांतिकारी आंदोलन की नींव की ईंट, जिसे हम भूल गए…

फ़ैज़ाबाद शहर में कपड़ा व्यवसायी के बेटे के तौर पर जन्मे कुंदनलाल गुप्त (जो छुटपन में ही क्रांतिकारी आंदोलन से जुड़ गए थे) जैसे उस आंदोलन की यही ज़रूरत पूरी करने के लिए बने थे. शिखर पर पहुंचने की चाह से परे, किसी भी व्यक्तिगत उपलब्धि या मान से सर्वथा निर्लिप्त, किसी भी तरह के बलिदान व योगदान के लिए प्रस्तुत और किसी भी प्रतिफल की आकांक्षा से सर्वथा मुक्त.

उत्तर प्रदेश में रद्द हुए उर्स समारोह: मेमने के विरुद्ध भेड़िए के ‘तर्क’! 

यूपी की योगी आदित्यनाथ सरकार द्वारा 'कानून व्यवस्था से जुड़ी चिंताओं' की आड़ में अयोध्या और उसके पड़ोसी बाराबंकी जिले में दो परंपरागत सालाना उर्स समारोहों में एक की अनुमति न देना और दूसरे की अनुमति देकर रद्द कर देना प्रसिद्ध लोककथा के भेड़िए के 'तर्क' याद दिलाता है, जो उसने एक निरीह मेमने को उदरस्थ कर लेने के बहाने ढूंढते हुए दिए थे.

अर्थव्यवस्था ‘बड़ी’ हो रही है या ‘बड़ों की’ होती जा रही है?

किसी भी आम भारतीय को इस भुलावे में नहीं रहना चाहिए कि जीडीपी के लिहाज से उसके देश की अर्थव्यवस्था के बड़े होते आकार का दुखों से निजात के उसके प्रयत्नों से कोई सीधा संबंध है. संसाधनों व अवसरों के समान वितरण के रास्ते की बढ़ती समस्याओं के रहते ऐसा मुमकिन ही नहीं है.

अयोध्या: दूसरी प्राण-प्रतिष्ठा ने कुछ किया न किया हो, चर्चाओं का बाज़ार गर्म कर दिया

गत पांच जून को राम मंदिर में आयोजित दूसरी प्राण-प्रतिष्ठा ने जहां भाजपा-आरएसएस की अंदरूनी राजनीति को लेकर भरपूर चर्चाएं पैदा कीं, वहीं कहानी तब दिलचस्प हुई जब समारोह की तस्वीरों में भाकपा के वरिष्ठ स्थानीय नेता अतुल कुमार सिंह पीत वस्त्रों में यजमानों में बैठे पूजा करते दिखे.

अयोध्या: जिस तिलोदकी गंगा को पुनर्जीवित करने का दावा था, अब वो नाले की गिनती में आ गई

अयोध्या नगर निगम ने साल 2022 में अयोध्या की लुप्तप्राय तिलोदकी गंगा के पौराणिक महत्व के मद्देनज़र इसको पुनर्जीवित करने के दावे किए थे. बीते दिनों इसी निगम ने वर्षा पूर्व निरीक्षण के परिप्रेक्ष्य में इस 'नदी' को नाला बताया है.

फूल को याद थे सारे मौसम: पोस्ट ट्रुथ के समय में सत्य की चिंता करती कविताएं

पुस्तक समीक्षा: हिंदी के वरिष्ठ आलोचक और कवि विजय बहादुर सिंह के कविता संग्रह 'फूल को याद थे सारे मौसम' में कई कविताएं सवाल उठाने वाली हैं. और उनकी खासियत यह है कि वे सवाल उठाकर ही नहीं रह जातीं, जवाब तक भी ले जाती हैं. सवाल राजनीतिक हो तो भी और अराजनीतिक हो तब भी.

हिंदी पत्रकारिता का बड़ा हिस्सा विभाजनकारी मानसिकता वाले सत्ताधीशों का सेवक क्यों हो गया?

महात्मा गांधी का कहना था कि पत्रकारिता की स्वतंत्रता एक बहुमूल्य विशेषाधिकार है, जिसे कोई भी देश त्याग नहीं सकता. अफ़सोस कि आज हिंदी पत्रकारिता का बड़ा हिस्सा यह सब भूलकर प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से स्वतंत्र सोच को ख़त्म कर चुका है.

अयोध्या: उतर गई ‘पर्यटकों’ की बाढ़ और पीले होने लगे सब्ज बागों के पत्ते

पिछले साल इसी मौसम में दर्शनार्थियों, श्रद्धालुओं और पर्यटकों का बोझ उठाते-उठाते अयोध्या की सांसें फूली जा रही थीं, जबकि उसी बीच लोकसभा चुनाव भी थे. पर अब न स्थानीय या आसपास के ज़िलों के दर्शनार्थी आ रहे हैं, न दूरदराज के इलाकों के. उनकी लंबी क़तारें बीते दिनों की बात हो गई हैं.

अवध के नवाबों के दुर्दिन में अंग्रेज़ रेजीडेंटों ने उन्हें बहुत सताया था, दो को तो ज़हर तक दिलवाया!

नवाबों के बुरे दिन बक्सर में अक्टूबर 1764 को हुई ऐतिहासिक लड़ाई के बाद शुरू हुए, जिसमें दिल्ली के मुगल बादशाह और अवध व बंगाल की सेनाएं मिलकर भी ईस्ट इंडिया कंपनी की सेनाओं को नहीं हरा सकीं और अपने माथे पर शर्मनाक पराजय का कलंक लगाकर लौटीं. फिर तो जैसे शेष दोनों का, वैसे ही अवध के नवाब शुजाउद्दौला का इक़बाल भी जाता रहा.

युद्ध: जीतकर भी हार जाते हैं विजेता, जीतते हैं तो बस हथियार निर्माता!

हमारे शांतिप्रिय और अहिंसक कहलाने वाले देश की वीरपूजा की परंपरा और युद्धकामना कम से कम 'महाभारत' जितनी पुरानी तो है ही. नहीं होती तो वह वैसा विनाशकारी युद्ध कैसे लड़ लेता, जिसमें, और तो और, न जीत का कोई अर्थ रह गया, न हार का.

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