उत्तर प्रदेश में रद्द हुए उर्स समारोह: मेमने के विरुद्ध भेड़िए के ‘तर्क’! 

यूपी की योगी आदित्यनाथ सरकार द्वारा 'कानून व्यवस्था से जुड़ी चिंताओं' की आड़ में अयोध्या और उसके पड़ोसी बाराबंकी जिले में दो परंपरागत सालाना उर्स समारोहों में एक की अनुमति न देना और दूसरे की अनुमति देकर रद्द कर देना प्रसिद्ध लोककथा के भेड़िए के 'तर्क' याद दिलाता है, जो उसने एक निरीह मेमने को उदरस्थ कर लेने के बहाने ढूंढते हुए दिए थे.

अर्थव्यवस्था ‘बड़ी’ हो रही है या ‘बड़ों की’ होती जा रही है?

किसी भी आम भारतीय को इस भुलावे में नहीं रहना चाहिए कि जीडीपी के लिहाज से उसके देश की अर्थव्यवस्था के बड़े होते आकार का दुखों से निजात के उसके प्रयत्नों से कोई सीधा संबंध है. संसाधनों व अवसरों के समान वितरण के रास्ते की बढ़ती समस्याओं के रहते ऐसा मुमकिन ही नहीं है.

अयोध्या: दूसरी प्राण-प्रतिष्ठा ने कुछ किया न किया हो, चर्चाओं का बाज़ार गर्म कर दिया

गत पांच जून को राम मंदिर में आयोजित दूसरी प्राण-प्रतिष्ठा ने जहां भाजपा-आरएसएस की अंदरूनी राजनीति को लेकर भरपूर चर्चाएं पैदा कीं, वहीं कहानी तब दिलचस्प हुई जब समारोह की तस्वीरों में भाकपा के वरिष्ठ स्थानीय नेता अतुल कुमार सिंह पीत वस्त्रों में यजमानों में बैठे पूजा करते दिखे.

अयोध्या: जिस तिलोदकी गंगा को पुनर्जीवित करने का दावा था, अब वो नाले की गिनती में आ गई

अयोध्या नगर निगम ने साल 2022 में अयोध्या की लुप्तप्राय तिलोदकी गंगा के पौराणिक महत्व के मद्देनज़र इसको पुनर्जीवित करने के दावे किए थे. बीते दिनों इसी निगम ने वर्षा पूर्व निरीक्षण के परिप्रेक्ष्य में इस 'नदी' को नाला बताया है.

फूल को याद थे सारे मौसम: पोस्ट ट्रुथ के समय में सत्य की चिंता करती कविताएं

पुस्तक समीक्षा: हिंदी के वरिष्ठ आलोचक और कवि विजय बहादुर सिंह के कविता संग्रह 'फूल को याद थे सारे मौसम' में कई कविताएं सवाल उठाने वाली हैं. और उनकी खासियत यह है कि वे सवाल उठाकर ही नहीं रह जातीं, जवाब तक भी ले जाती हैं. सवाल राजनीतिक हो तो भी और अराजनीतिक हो तब भी.

हिंदी पत्रकारिता का बड़ा हिस्सा विभाजनकारी मानसिकता वाले सत्ताधीशों का सेवक क्यों हो गया?

महात्मा गांधी का कहना था कि पत्रकारिता की स्वतंत्रता एक बहुमूल्य विशेषाधिकार है, जिसे कोई भी देश त्याग नहीं सकता. अफ़सोस कि आज हिंदी पत्रकारिता का बड़ा हिस्सा यह सब भूलकर प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से स्वतंत्र सोच को ख़त्म कर चुका है.

अयोध्या: उतर गई ‘पर्यटकों’ की बाढ़ और पीले होने लगे सब्ज बागों के पत्ते

पिछले साल इसी मौसम में दर्शनार्थियों, श्रद्धालुओं और पर्यटकों का बोझ उठाते-उठाते अयोध्या की सांसें फूली जा रही थीं, जबकि उसी बीच लोकसभा चुनाव भी थे. पर अब न स्थानीय या आसपास के ज़िलों के दर्शनार्थी आ रहे हैं, न दूरदराज के इलाकों के. उनकी लंबी क़तारें बीते दिनों की बात हो गई हैं.

अवध के नवाबों के दुर्दिन में अंग्रेज़ रेजीडेंटों ने उन्हें बहुत सताया था, दो को तो ज़हर तक दिलवाया!

नवाबों के बुरे दिन बक्सर में अक्टूबर 1764 को हुई ऐतिहासिक लड़ाई के बाद शुरू हुए, जिसमें दिल्ली के मुगल बादशाह और अवध व बंगाल की सेनाएं मिलकर भी ईस्ट इंडिया कंपनी की सेनाओं को नहीं हरा सकीं और अपने माथे पर शर्मनाक पराजय का कलंक लगाकर लौटीं. फिर तो जैसे शेष दोनों का, वैसे ही अवध के नवाब शुजाउद्दौला का इक़बाल भी जाता रहा.

युद्ध: जीतकर भी हार जाते हैं विजेता, जीतते हैं तो बस हथियार निर्माता!

हमारे शांतिप्रिय और अहिंसक कहलाने वाले देश की वीरपूजा की परंपरा और युद्धकामना कम से कम 'महाभारत' जितनी पुरानी तो है ही. नहीं होती तो वह वैसा विनाशकारी युद्ध कैसे लड़ लेता, जिसमें, और तो और, न जीत का कोई अर्थ रह गया, न हार का.

गोपालकृष्ण गोखले: महात्मा गांधी के राजनीतिक गुरु, लासानी थी जिनकी स्वीकार्यता

जयंती विशेष: अपने समय के अग्रणी नरमपंथी राष्ट्रवादी राजनीतिज्ञ, बुद्धिजीवी, विचारक और समाज सुधारक गोपालकृष्ण गोखले उम्र की नाइंसाफी के कारण अपने 38वें वसंत में ही इस संसार को अलविदा कह गए थे. लेकिन अंतिम सांस लेने से पहले सामाजिक आर्थिक सुधारों व स्वतंत्रता संघर्ष के अभियानों में अपने पल-पल का सदुपयोग किया.

कार्ल मार्क्स, जिन्होंने मनुष्य की मुक्तिकामना को नया आयाम दिया

कार्ल मार्क्स ने न सिर्फ नई राह दिखाई बल्कि उसे प्रशस्त भी किया, तो उसके प्रति ज्यादा नहीं तो थोड़ा कृतज्ञ होना तो उन सबके लिए सामाजिक फ़र्ज़ है, जिन्होंने प्रतिकूल समकालीन परिदृश्य में भी बेहतर दुनिया बनाने के अपने सपनों से न समझौते किए हैं और न उन्हें मरने दिया है.

अंग्रेजों ने वाजिद अली शाह को अपदस्थ किया तो लखनऊ में क्यों नहीं गिरा था एक बूंद भी ख़ून?

तत्कालीन इतिहास के कई ज्ञात तथ्य बताते हैं कि वाजिद अली शाह ने किसी भी तरह के खून-खराबे, टकराव या प्रतिरोध के बगैर कंपनी के हाथों अपने राज्य का अपहरण और अपना निर्वासन सिर झुकाकर स्वीकार कर लिया तो इसके पीछे प्रतिकूल परिस्थितियों का दबाव तो था ही, उन्हें विरासत में मिली वे मजबूरियां भी थीं, जिनके बारे में कहा जाता है कि उनके राग-रंग व विलासिता में डूबे रहने के कारण वे लगातार बढ़ती गई थीं.

सरकार के आतंकवाद से निपटने के दावे: लड़ने कम, लड़ने का भ्रम रचते हुए ज़्यादा

पहलगाम हमले के बाद नरेंद्र मोदी सरकार का जैसा रवैया दिखा है, उसके मद्देनज़र इस सरकार से बस यही कहने का मन होता है कि वह, बरा-ये-मेहरबानी, आतंकवाद से इस तरह न लड़े. ख़ासकर विभाजनकारी हिंदू-मुस्लिम सोच के साथ तो कतई नहीं क्योंकि इसके अपने जोखिम हैं, जो और बड़े भी हो सकते हैं.

शलभ श्रीराम सिंह: तबाह की गई दिलों की ख़ूबसूरती…गोलियों से खेले गए मज़हब और ज़बान के खेल

हिंदी में युयुत्सावाद के प्रवर्तक और बगावत के बोहेमियन कवि के रूप में विख्यात रहे स्मृतिशेष शलभ श्रीराम सिंह के सृजन की खूबसूरती यह है कि विडंबनाओं और नकारात्मकताओं के बीच भी वे किसी नकारात्मकता का आह्वान नहीं करते और समूचे भारतीय समाज व राजनीति में आमूलचूल क्रांति का स्वप्न देखते हैं.

अमेरिका हमेशा ‘चित भी मेरी, पट भी मेरी…’ के फेर में क्यों रहता है?

डोनाल्ड ट्रंप अमेरिकी हितों की रक्षा के लिए मनमाने टैरिफ की राह पकड़कर जिस तरह 'युद्वम देहि' के उद्घोष पर आमादा हैं, उसे महज अहमकाना हरकत समझना ग़लत होगा. वे जो कर रहे हैं, वह उस परंपरा की नई कड़ी है, जहां अमेरिका अपने स्वार्थों के मद्देनज़र बार-बार अपनी नीतियां बदलता रहा है.

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